Sunday, January 24, 2016

छात्र राजनीति पर चिंता

अभी हाल ही में मेरे पास भी मुंबई यूनिवर्सिटी में एनएसयूआई की तरफ से एक छात्रनेता मित्र की तरफ से वैचारिक नेता के तौर पर शामिल होने का निमंत्रण मिला था, लेकिन स्थितियों के हिसाब से और कांग्रेस की वजह से मुझे वहाँ जाना ठीक नहीं लग रहा था छात्र संगठनों की राजनीतिक उठापठक बताती है, क़ि देश के सभी राजनैतिक दल किस तरह की राजनीति करना चाहते हैं। यूपी में समाजवादी छात्रसभा, बंगाल में टीएमसी की स्टूडेंट विंग, कर्नाटक और केरल सही पूर्वोत्तर में एनएसयूआई और पूरे देश में एबीवीपी अलग अलग मुद्दों पर बहुत उग्र होकर छात्र राजनीति कर रहे हैं। अपवाद स्वरूप आजतक मैने कभी भी एएसए(अंबेडकर स्तडेंट एसोसिएसन) को ऐसा कभी यूपी की मायावती सरकार में करते नहीं देखा। लेफ्ट का छात्र संगठन भी बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के समय ऐसा ही करता रहा है। यूपीए सरकार में हमेशा ही एन एस यू आई ख़ासकर दिल्ली में आक्रामक रही है। महाराष्ट् ख़ासकर मुंबई में शिवसेना का छात्र संगठन युवा सेना तो हमेशा ही ऐसा करता रहा है। आजकल दिल्ली में सीवाईएसएस (आम आदमी पार्टी) भी विश्व विद्यालय में भले ही कोई सीट जीती हो, लेकिन दिल्ली सरकार का फ़ायदा तो उठाती है। पूरे देश में राजनीति को लेकर जिस तरह की शुरुआत की उम्मीद की जाती है, वो तो इन संगठनों से निकलकर नहीं पाते हैं। जो वैचारिक नेता निकालने चाहिए वो तो बेचारे नौकरी करने और अपने अपने परिवार पालने निकल जाते हैं, केवल राजनेता वही बन पाते हैं जो धन बल और बाहुबल अपने साथ रखते हैं।
मैं कानपुर की छात्र राजनीति के बहुत नेताओं से परिचित हूँ जिन्होने काफ़ी संघर्ष किए थे, लेकिन कभी उनको सार्वजनिक क्षेत्र में राजनीति करते हुए नहीं देखा। कुछ नेता बने भी तो वो जिनके बाप बड़े पैसे वाले या कोई नेता थे। अभी हाल ही में एक छात्र नेता जिला पंचायत सदस्य बनकर आया है, जो कानपुर यूनिवर्सिटी में प्रेसीडेंट बना था, उसके बाद वो 2-3 साल तक बड़े अपराधी केस में जेल में रहा। अब चुनाव जीता एक ख़ास जाति की बहुलता के कारण।
ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों ने छात्र समस्याओं के लिए कुछ ख़ास कार्य किया हो। लेकिन ऐसा भी इतिहास दर्ज नहीं करा पाए हैं जिसको आने वाली पीढ़ी एक बड़े छात्र आंदोलन के रूप में देखे। सभी राजनीतिक पार्टियों ने छात्रों का अपने अपने हिसाब से प्रयोग किया है। ख़ासकर मंडल के समय समाजवादियों ओबीसी छात्रों का और और 1992 के बाद दक्षिणपंथियों ने अपने अपने आंदोलनों में। वर्तमान परिस्थिति में देखा जाए तो सबसे मजबूत स्थिति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ही है। जिसकी टक्कर में अलग अलग राज्यों में सत्ताधारी दलों के छात्र संगठन तो हो सकते हैं लेकिन कोई एक नहीं जो हर जगह लड़ सके। वैचारिक रूप से इनको सीधी टक्कर कम्युनिस्ट छात्र संगठन ही दे पाते हैं। बाकी सबके पास तो कोई वैचारिक नीति या शब्द तक नहीं मिलते हैं। किसी समाजवादी संगठन के नेता को को अपना इतिहास नहीं पता होगा, विचारधारा की तो बात छोड़िए। ऐसे में एबीवीपी कई तरीके से अपने कार्यकर्ताओं का प्रयोग करती है। असल में इनका प्रयोग आर एस एस करता है, जो पहले छात्रों के रूप में फिर अन्य संगठनों बजरंग दल, हिंदू सभा आदि में प्रयोग करता है। यहाँ एक बात और गौर करने वाली है कि संघ भी एबीवीपी के छात्रों को कभी भाजपा में नहीं भेजता है। इसके बजाय अपना स्वयम् सेवक बनाने में अधिक विश्वास करता है। संघ के 1 या 2 विश्वासपात्र नेता (राम माधव जैसे लोग) तो नियंत्रण में भाजपा में आते हैं, लेकिन जिस नेतृत्व फौज की उम्मीद की जाती है, वो नहीं पाती है। फिलहाल तो भाजपा में अमित शाह और मोदी युग चल रहा है, जहाँ विचारधारा के साथ साथ धन और वोट बल भी देखा जाता है। कांग्रेस के संगठन एन एस यू आई में राहुल गाँधी ने 2012 के आसपास युवा कांग्रेस के नाम पर कुछ शुरुआत तो की लेकिन फिर ध्यान नहीं दे पाए। दलित या कम्युनिस्ट संगठन जो एबीवीपी को टक्कर दे सकते हैं, वो बिल्कुल भी ऐसी स्थिति में नहीं हैं जो एबीवीपी की सत्ता, उसका धनबल, कार्यकर्ताओं का हुजूम, व्यवस्था, वैचारिक समर्थक(आज का माहौल बहुत अनुकूल है, उनकी विचारधारा को फैलाने के लिए), नीतियों और टेक्नॉलॉजी ज़रूरतों के आगे खड़ा भी हो सके। केवल विचारधारा से ही उनसे लड़ना मुस्किल है, वो हैदराबाद के रोहित और डीयू, बीएचयू या जेएनयू में लेफ्ट संगठन करने की कोशिश करते हैं। एबीवीपी से लड़ने के लिए आपको उसको मुद्दों पर भी घेरना पड़ेगा, जिसमें एन एस यू आई कांग्रेस के पिछले कार्यकाल की वजह से कमजोर पड़ जाता है। आम आदमी पार्टी का सीवाईएसएस तो उससे हर मोर्चे पर लड़ सकता है, लेकिन दिल्ली के बाहर अभी उसके पास संगठन नहीं है। इसमें एक बात यह मुझे निजी तौर पर लगती है, कि एबीवीपी और आप के युवाओं में कुछ वैचारिक अंतर तो नहीं है। आप के युवा स्टूडेंट्स भी दक्षिण पंथियों के जैसे ही सोंच के हो जाते हैं भड़काए जाने पर। उनमें वैसी वैचारिक स्थिरता नहीं नज़र आती है, उदाहरण के तौर पर सेकूलरिज़्म पर ही। जो भी हो लेकिन भविष्य मे एक अच्छी छात्र राजनीति की उम्मीद तो की ही जा सकती है। अगर ऐसी शुरुआत नहीं हुई तो यह बहुत ही ग़लत होगा देश और समाज की राजनीति के लिए। मैं हर यूनिवर्सिटी में ऐसी राजनीति की उम्मीद करता हूँ जिसमे विरोध तो हो लेकिन आक्रामकता कम और बहस अधिक हो। अगर "मुज़फ़्फ़रनगर बाकी है दिखाया जाता है" तो उसको दिखाने दिया जाए और जिसको ऐतराज है वो बहस करे, लेख लिखे, जवाब में फिल्म बनाए, लोगों के बीच में जाए लेकिन ऐसे फालतू टाइप के फर्जी आंदोलन ना करे जिसमें दूसरे की अभिव्यक्ति की आज़ादी का हनन हो। किसी के विचार व्यक्त करने पर उसको राष्ट्रविरोधी या राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट ना बाँटा जाए। बल्कि ऐसे मुद्दों पर ऐसे सेमिनार होने चाहिए जिसमें हर विचारधारा के लोग आकर बहस करें। आपस में चर्चा करें। सुब्रमण्यम स्वामी टाइप लोग जाएँ तो अरुंधती राय को भी उसी सेमिनार में बोलने का मौका मिले। किसी को रोंका मत जाए ना बाबा रामदेव को जेएनयू में और ना किसी और को।


Saturday, January 23, 2016

क्या सच में मोदी जी चिंतित हैं?

भले ही देर से लेकिन प्रधानमंत्री का रोहित की मौत पर दुख जताना अच्छा लगा। हो सकता है कि उनकी सोचपहले राजनीति न कर समय पर बोलने की हो। उम्मीद है कि जांच भी निष्पक्ष कराएंगे और दोषियों को सजा दिलाएंगे। शिक्षा मंत्री वसांसद को फटकार तो लगा ही सकते हैं। अच्छा होगा कि अति राष्ट्रवादी सेनाओं परलगाम लगाएंगे। लेकिन अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो हमें यही लगेगा कि आप नाटक कर रहेहैं।अन्य दलों को देखिए मौत पर मातम मनाने का ढोंग सियासी सूझबूझ से जारी है. जहां सांत्वना देनी चाहिए वहां सियासत होने लगी. ऐसे सियासी देश में आजाद ख्याल के रोहित का जीना बेकार था। व्यवस्था पर प्रश्न किए जाने पर गद्दार कहा गया।स्याही से अपनी तकदीर लिखने वह विश्वविद्यालय आया था. उस नासमझ को यही पता था कि तकदीर ऐसे ही लिखी जाएगी.पता है कि उस दिन अखबार के पन्ने से झांकती हुई रोहित की तस्वीर किसी को भी असहज कर सकती थी. असहज करने की वजह रोहित के मरने की ‘वजह’ थी. मैं अखबारों के पेज पर ज्यादा देर तक नजरें नहीं टिकाता. शायद इसीलिये अखबारों के जिस पन्ने पर आमतौर पर नजर भी नहीं रुकती,ठिठकी हुई अंगुलियां जानेंक्यों वही पन्ना पलट नहीं पाईं थी. स्याही से तकदीर लिखने की बात करने वालों ने ही उसका गलाघोंट दिया था.आज आंबेडकर यूनिवर्सिटी में रोहित को याद कर पीएम भावुक हो गए. पीएम ने कहा कि मजबूर होकर रोहित को खुदकुशी करनी पड़ी. उन्होंने कहा, ”जब ये खबर मिलती है कि मेरे देश के एक नौजवान बेटे रोहित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा, उसके परिवार पर क्या बीती होगी. मां भारती ने अपना एक लाल खोया है.” प्रधानमंत्री ने आगे कहा, ”कारण अपनी जगह पर होंगे, राजनीति अपनी जगह परह होगी, लेकिन सच्चाई यही है कि मां भारती ने अपना एक लाल खोया है.”‘कारण अपनी जगह पर होंगे’ बड़ी ही सफाई से इसे टाल रहेहैं. अरे कारण ही तो जिम्मेदार हैं। मुझे भारत के हर सियासी दल से वैसे ही घृणा हो रही है.. जैसे गुलाम भारत के लोगों को अंग्रेजों से थी. ये रोने धोने का नाटक करने के बजाए आप सत्ता में हैं ‘कारण’ पर कार्रवाई क्यों नहीं करते हैं? 125 करोड़ का दंभ भरते हैं.. 56 इंच के सीने का दावा करते हैं और जब कठोर कदम उठाने की बात आती है तो सिर्फ रो धोकर.. भावुक होकर… खत्म कर लेते हैं.मौत पर शर्मिंदा होने का नाटक करने वाली सरकार झूठ बोल रही है. आपकी सरकार ने एबीवीपी के कार्यकर्ताओं से भिड़ने की सजा उन छात्रों को दे दी. कार्रवाई को लेकर आपकी सरकार इतनी बेसब्र हो उठी थी कि वीसी को26 दिन के भीतर 3 रिमाइंडर भेजे गये. रोने के बजाए जाकरजरा पूछिएगा अपने शिक्षा मंत्रालय से.. कि ऐसी कौन सी बेचैनी थी? मानव संसाधन एवंविकास मंत्रालय छात्र राजनीति के मतभेदों को राष्ट्रविरोधी साबित करने के एकसूत्री कार्यक्रम मेंजुट गया. स्मृति ईरानी करीब आधे घंटे तक रोहित की मौत परसफाई देती रहीं. सियासत न करने की अपील कर रही थीं और सिर्फ सियासत कर रही थीं.बर्बादियों के बेहिसाब टीसों को सिर्फ रोहित का परिवार ही नहीं लाखों करोड़ों लोग रोज महसूस कर रहे हैं. आप रोने के बजाए बस कुछ काम करिये.. उस दर्द के खिलाफ होने के बजाए, उस दर्दको मिटाएं..उनका साथ दें. रोहित को जिस पाप की खातिर अपनी बलि देनी पड़ी उसके सूत्रधार आपकी सरकार के ही दो मंत्री हैं. रोहित तो अब लौट नहीं सकता, लेकिन पाप काप्रायश्चित तो हो सकता है. तो कीजिए. अपने दोनों मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर करके दिखाइए. देश कोये सन्देश दीजिए कि आपकी आंखों में घड़ियाली आंसू नहीं हैं.राजनीति, संवेदनाओं के साथ ही वादों का सिलसिला भी चलता रहेगा, लेकिन उसके परिवार का दुःख शायद ही कम हो. उसकी मौत शर्म भी है और सबक भी. सवाल अब भी वही है कि रोहित की मौत का आखिर जिम्मेदार कौन है? अकेले ‘आप’ ‘हम’ या ‘सब’?

Friday, January 22, 2016

पाकिस्तान के इतिहास पर कुछ जानकारी

मंगलवार की रात को ऐसे ही एबीपी न्यूज पर मुकेश कुमार सिंह का ब्लॉग पढ़ने लगा तो काफ़ी अच्छा लगा पाकिस्तान के इतिहास के बारे में जानकर। इसके बाद और अधिक जानकारी के लिए व्याकुल सा हो गया और गूगल करने लगा लेकिन वहाँ से मिली जानकारी से बिल्कुल भी संतुष्टि नहीं मिल पाई। इसके बाद मैने लाइब्रेरी से एक किताब "ग्रेट पारटिशन: मेकिंग ऑफ इंडिया आंड पाकिस्तान" लेकर आया और दो दिन तक पढ़ी। असल में पढ़ने का उद्देश्य यह था कि राजनीतिक स्तर पर अगर पाकिस्तान को देखना है, तो उसके इतिहास को भी देखना ही पड़ेगा। इतिहास को देखे बिना आप वर्तमान भी नहीं देख पाएँगे।  संयोग की बात ही है कि जिस पेशावर के पास यूनिवर्सिटी में आतंकवादियों ने हमला किया वह पाकिस्तान के गाँधी बाचा ख़ान के नाम पर ही है। उन्हें (ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को) सीमांत गाँधी और ना जाने कितने नामों से जान जाता है। सुना है कि विभाजन के बाद उन्होने एक बार महात्मा गाँधी से कहा था कि "   ‘आपने हमें भेड़ियों के बीच छोड़ दिया है…।"
बाचा ख़ान की इस बात ने महात्मा गांधी को निरुत्तर कर दिया। उन्होंने अपने शिष्य को नसीहत दी कि ‘भूल जाओ उन बातों को, अब पाकिस्तान को ही अपना देश समझो। उसी की सेवा करो।’ आज़ादी के वक़्त भारत में जो 535 रजवाड़े थे, उनमें से चार बलूचिस्तान के इलाके में थे। इनमें से तीन – मकरान, लास बेला और ख़रान ने तो मोहम्मद अली जिन्ना के दबाव में पाकिस्तान में अपना विलय कर लिया। लेकिन चौथे यानी कलात रियासत के नवाब अहमद यार ख़ान ने ख़ुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इतिहास गवाह है कि पाकिस्तानी सेना ने 27 मार्च 1948 को कलात को ज़बरन पाकिस्तान में मिला लिया। इसके बाद भी कई साल तक कलात के लोगों ने अपना संघर्ष जारी रखा। 1955 में चारों रियासतों को मिलाकर पाकिस्तान का चौथा प्रान्त ख़ैबर पख्तूनख़्वा बना। पाकिस्तान सेना ने कश्मीर को भी हड़पने की कोशिश की। तब उसे प्रथम भारत-पाक युद्ध के रूप में भारतीय सेना से लोहा लेना पड़ा। भारत ने न सिर्फ़ तब बल्कि उसके बाद भी हमेशा पाकिस्तानी सेना को मात दी थी। यहां तक कि 1971 में पाकिस्तानी सेना के ज़ुल्म से बांग्लादेश को भी मुक़्ति दिलवायी। लेकिन ख़ैबर पख्तूनख़्वा का सवाल हमेशा अनसुलझा ही रहा। उस दौर से लेकर आज तक ख़ैबर पख्तूनख़्वा, पाकिस्तान का सबसे ग़रीब, शोषित और उपेक्षित इलाक़ा बना हुआ है। आज तक वहां के पख़्तूनियों या पठानों ने अपने विरोध का परचम लहरा रखा है। दरअसल, पठानों ने कभी उस द्विराष्ट्रवाद (Two nation theory) का समर्थन नहीं किया जिसकी बुनियाद पर पाकिस्तान का जन्म हुआ था।
मुकेश कुमार सिंह के ब्लॉगानुसार कई विद्वानों का मानना है कि मुम्बई में जन्मे शिया मुसलमान और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना बुनियादी तौर पर धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी थे। लेकिन पाकिस्तान बनते ही कट्टरवादियों ने जिन्ना को बहुत जल्द हाशिये पर ढकेल दिया। बंटवारे के बमुश्किल साल भर बाद ही जिन्ना ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को बराबरी का दर्ज़ा देने के लिए पाकिस्तान रेडियो पर अपना ज़बरदस्त भाषण रिकॉर्ड करवाया था। लेकिन कट्टरवादी अफ़सरों और नेताओं ने जिन्ना के जीते-जी कभी उस भाषण को प्रसारित नहीं होने दिया। जिन्ना की वो रिकॉर्डिंग भी ऐसे ग़ायब करवायी गयी कि आज तक उसका सुराग नहीं है। अलबत्ता, जिन्ना के उस भाषण की स्क्रिप्ट ज़रूर बरामद हुई है। 
हालाँकि मुझे इस बात पर बहुत कम विश्वास होता है। अगर ऐसा ही होता तो क्यों उन्होने पाकिस्तान की माँग ही क्यों की थी? 
जिन्ना की ख़्वाहिश के विपरीत वहां के पहले प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ान ने बंटवारे के बाद पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की जगह मुसलिम देश बनाने का प्रस्ताव पारित करवा लिया। आगे चलकर वही पाकिस्तान के संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बना। उस संविधान की सबसे बड़ी ख़राबी यही थी कि पाकिस्तान में जो मुसलमान नहीं हैं, उन्हें मुसलमानों जैसे हक़ हासिल नहीं होंगे। यही वजह है कि 1947 में जहां पाकिस्तान में 23 फ़ीसदी आबादी ग़ैर-मुसलिमों की थी, वो अब घटकर महज़ 3-4 फ़ीसदी रह गयी है। इसमें भी ग़रीब अहमदियों की संख्या तो अब मुट्ठी भर ही बची है। उन्हें लेकर ऐसा भेदभाव है कि पाकिस्तान में पासपोर्ट बनवाने वाले हरेक व्यक्ति को एक ऐसे फ़ार्म पर दस्तख़त करना होता है जो कहता है कि आवेदक की राय में अहमदी, ग़ैर-मुसलिम हैं। साफ़ है कि पाकिस्तान का संविधान ही अपने ही नागरिकों के प्रति भेदभाव करता है।
दूसरे दौर में 1958 से 1971 के दौरान पाकिस्तान की विशुद्ध ‘मुसलिम पहचान’ बनाने के नाम पर सरकार ने स्कूली क़िताबों से हर उन बातों को हटवा दिया जो बहुलतावाद (Pluralism) के प्रतीक थे। इससे देखते ही देखते हड़प्पा और मोहन जोदाड़ो की संस्कृति के अलावा सूफीवाद भी हाशिये पर पहुंच गया। तीसरा दौर 1974 में उस वक़्त आया जब इस्लामीकरण को क़ानून ज़ामा पहनाने का काम शुरू हुआ। ज़ुल्फ़िकार अली ख़ान भुट्टो की हुक़ूमत ने क़ानून बनाकर अहमदियों को ग़ैर-मुसलिम क़रार दे दिया। इसके लिए भुट्टो पर उलेमाओं और फ़ौज का भारी दबाव था। उन्होंने सोचा था कि ये अस्थायी उपाय होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मज़े की बात ये भी रही कि ख़ुद भुट्टो को भी इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ।
इस्लामीकरण के चौथे दौर की शुरुआत 1988 में ज़िया उल हक़ की बदौलत हुई। 1990 तक संगठित आतंकवाद ने अपनी शक्ल अख़्तियार कर ली। इसके तहत मसजिद और सेना के गठबन्धन से बने तमाम ज़िहादी (धर्म के सैनिक) संगठनों ने पूरे पाकिस्तान को अपनी मुट्ठी में कर लिया। हरेक फ़ैसला इनके हाथों में ही था। ज़िहादी नीतियों की वजह से मुसलिम बहुल कश्मीर से हिन्दुओं और सिखों को पलायन करना पड़ा। पाकिस्तानी अल्पसंख्यकों की तरह धीरे-धीरे सबने ख़ुद को नयी जगहों पर बसा लिया। अब शायद ही कभी उनकी वापसी हो पाये। 
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का हाल सबसे बुरा है। हिन्दू-सिख-ईसाई जो भी देश छोड़कर जा सकते थे, चले गये। सिर्फ़ बेहद ग़रीब बचे हैं। जिन्हें कोई नहीं पूछता। अल्पसंख्यक शियाओं का भी आये दिन क़त्लेआम होता रहता है। वहाँ की जो सरकार भी किसी तरह से सरिया क़ानून, वहाँ की सेना या आई एस आई या कट्टरपंथियों के खिलाफ काम करने की कोशिश करती हैं, उन्हें उसका ख़ामियाजा उठाना पड़ता है। कुछ ही प्रधानमंत्री होंगे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया होगा। नवाज शरीफ भी आज विश्व के सामने शांति बहाली पर खूब काम करना चाहते हैं। लेकिन उनके अपने हाथों में भी सबकुछ नहीं होता है। लेकिन अगर पाकिस्तान की सिविल सोसायटी भी ऐसे ही खून में संघर्ष करती रहेगी, उनके बच्चे भी स्कूल में मारे जाएँगे। 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...