अगर भाषणों में अपना एजेंडा प्रस्तुत करना ही नेता की सबसे बड़ी खूबी है तो किसी भी समाजवादी, लेफ्ट नेता या केजरीवाल से भी बेहतर मुझे पप्पू यादव लगते हैं. आज के पहले लोकसभा में बोलते सुना था, तो तोड़ा बहुत पसंद थे. आज उनके कई इंटरव्यू और भाषण सुने तो लगा ये तो लालू यादव के शुरुआती दौर को आजतक पकड़ कर चलना चाहते हैं. वो संपत्ति और मनी के centralisation की बात करते हैं. मतलब किसी भी आदमी के पास 1 करोड़ से अधिक की संपत्ति या 10 लाख रुपए से अधिक पैसा नहीं होना चाहिए. वो शिक्षा और स्वास्थ्य के माफियाओं को उखाड़ फेकने की बात करते हैं. निजीकरण के खिलाफ क़ानून लाना चाहते हैं. वो indirect टैक्स ख़त्म करना चाहते हैं. वो रोज़गार पर बहुत फ़िक्स एजेंडा रखते हैं क़ि अगर सरकार रोज़गार ना दे पाती है तो लोगों को सोसल सिक्योरिटी देना होगा. वो सीनियर सिटीज़न के देखरेख के लिए एक अलग से आयोग और फंड की व्यवस्था सोचते हैं. वो इंटरकास्ट मैरीजेस करने वालों को सरकारी नौकरी या 10 लाख रुपए देना चाहते हैं. वो जातिवाद को जड़ से ख़त्म करने के कई कड़े नियम बताते हैं. वो राजनीतिक चंदे और चुनाव प्रक्रिया पर पब्लिक फंडिंग (एक लिमिट तक ) चाहते हैं. वो राजनीति से पैसे और अपराध को खतम करना चाहते हैं। पार्लियामेन्ट्री सिस्टम में भी कई बदलाव करना चाहते हैं. जैसे जिसको अधिकतम 2 बच्चे हों, पढ़ा लिखा और संविधान की कुछ समझ रखता तो साथ ही साथ उसने इंटरकास्ट शादी भी की हो उसी को चुनाव लड़ने को मिलेगा. वो संविधान को किसी धार्मिक ग्रंथ से ऊपर बनाने के लिए कई कदम उठाना चाहते हैं. वो धर्म को निजी मानकर पब्लिक में नहीं देखना चाहते हैं, मतलब किसी धार्मिक रैली या जुलूस का आयोजन पब्लिक प्लेस में नहीं हो. यहाँ तक क़ि वो शिक्षा को अनिवार्य बनाना चाहते हैं. वो क्रिकेट को पैसे से दूर करके अन्य खेलों को बढ़ाने के कई कार्यक्रम बताते हैं. वो किसी मार्क्सवादी या लेनिन वादी सिद्धांत से प्रेरित नेता से भी बेहतर व्यवस्था देखना चाहते हैं. वो राजनीति की गंदगी को बेहतर समझते हैं, इसलिए उसमें सफाई के लिए कई कीटनाशक क़ानून भी लाना चाहते हैं. वो दुनिया की हर घटना का ज़िम्मेदार राजनीति को मानते हैं. मतलब दुनियाँ में होने वाली हर घटना के पीछे सीधे या अपरोक्ष रूप से राजनीति को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. वो दहेज विरोधी क़ानून लाकर इस कुप्रथा को ख़त्म करने के कई उपाय बताते हैं. वो इसे प्रमोट करने के कई उपाय बताते हैं. जब कोई उनसे पूछे कि आप खुद कौन से संत हो? आप भी तो बाहुबली हो. तो वो बड़ी बेबाकी से कहते हैं क़ि हाँ मैने अपराध किए हैं केश भी हुए हैं और मैने जीते भी हैं. इस देश के सिस्टम में केश जीतना कौन सी बड़ी बात हैं. लेकिन मेरे हर अपराध के पीछे एक सच था कभी किसी बड़े बाप की औलाद ने किसी ग़रीब औरत के साथ कुछ किया तो मैने उसको अगवाह करके उससे पैसे वसूल कर उसके जैसी न जाने कितनी लड़कियों की मदद की. मैने अब तक 1000 से अधिक लड़कियों की तरफ से शिकायतों में लड़के को डरा धमका के बिना दहेज के शादी करवाई है. मैने हज़ारों शादियों मे आर्थिक मदद की है. कितनों को नौकरी दिलवाई है. ग़रीबों की मदद की है दबंगो से. किसी भी दलित या पिछड़े पर हुए अत्याचारों के खिलाफ फारवर्ड लोगों को पीटा है. क्योंकि मुझे पता चल चुका था क़ि इस देश में "रण में विजय उसी की होगी जिसके बाहों में बल होगा." कोर्ट के चक्कर सालों लगाउँगा लेकिन न्याय न मिल पाएगा. कम से कम वो अपने अति आदर्शवादी व्यवस्था को सामने रखने में किसी भी नेता से बेहतर और बेबाक दिखते हैं. ऐसा लगता है क़ि काश इसे भी नायक फिल्म के अनिल कपूर जैसा मौका मिल जाए.
Sunday, January 14, 2018
Saturday, January 13, 2018
आख़िर जजों को न्याय के लिए क्यों बोलना पड़ा?
सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने आज सुबह मीडिया से बात करते हुए शीर्ष अदालत के काम के तरीके पर सवाल उठाए हैं, साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को एक पत्र भेजा है. शीर्ष अदालत के न्यायाधीशों के इस तरह मीडिया में आने की घटना देश में पहली बार हुई है. इन चार जजों के इस कदम पर देश भर के न्यायपालिका से जुड़े लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. रिटायर्ड जज आरएस सोढ़ी ने जजों की मीडिया से बातचीत पर कहा, ‘मामला कोई मायने नहीं रखता. उनकी शिकायत प्रशासनिक मामलों को लेकर है. वे 4 हैं, उनके अलावा 23 और हैं. ये 4 मिलकर चीफ जस्टिस की गलत छवि बना रहे हैं. ये अपरिपक्व और बचकाना है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि इन चारों पर अभियोग लगाया जाना चाहिए. उन्हें अब बैठकर फैसले देने का कोई अधिकार नहीं है. यह ट्रेड यूनियननुमा व्यवहार गलत है. लोकतंत्र पर खतरा उनके बताने की बात नहीं है, हमारे यहां संसद, कोर्ट और पुलिस काम कर रहे हैं.’ देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीश मीडिया के सामने आए. इन न्यायाधीशों में जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ शामिल है. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का प्रशासनिक कार्य ठीक से नहीं हो रहा है. ये चार जज शुक्रवार सुबह चीफ जस्टिस से मिले थे और अपना विरोध दर्ज कराया था है. ये प्रेस कॉन्फ्रेंस जस्टिस जे. चेलामेश्वर के घर पर हुई.
जस्टिस जे. चेलामेश्वर ने कहा, ‘हम चारों मीडिया का शुक्रिया अदा करना चाहते हैं. यह किसी भी देश के इतिहास में अभूतपूर्व घटना है क्योंकि हमें यह ब्रीफिंग करने के लिए मजबूर होना पड़ा है. हमने ये प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए की ताकि हमें कोई ये न कहे हमने अपनी आत्मा बेच दी.’ जस्टिस चेलामेश्वर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जो नहीं होना चाहिए था. हमें लगा, हमारी देश के प्रति जवाबदेही है और हमने मुख्य न्यायाधीश को मनाने की कोशिश की, लेकिन हमारे प्रयास नाकाम रहे अगर संस्थान को नहीं बचाया गया, लोकतंत्र नाकाम हो जाएगा.’ सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश को सुधारात्मक कदम उठाने के लिए कई बार मनाने की कोशिश की गई, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे प्रयास विफल रहे. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में प्रशासन सही से नहीं चल रहा है.
एफडीआई के नए नियमों के मायने
हमारी मौजूदा सरकार अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों के लिए एक से बढ़कर एक चुनौतियां पेश कर देती है, और अब उसने यह चुनौती पेश की है कि अर्थशास्त्री और पत्रकार विश्लेषण करें कि फ्डी (यानी फॉरिन डाइरेक्ट इनवेस्टमेंट यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) के नए सरकारी ऐलानों का क्या असर पड़ेगा...? वैसे इस सरकार का यह कोई नया ऐलान नहीं है, क्योंकि पुरानी सरकार भी यह कवायद कर रही थी और नई सरकार अपने कार्यकाल में शुरू से विदेशी निवेश लाने की कवायद में लगी है. लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे अब तक नहीं आए. यह मसला जहां का तहां है कि ऐसा क्या करें कि विदेशी निवेशक अपना पैसा लेकर भारत में कारोबार करने आ जाएं. विदेशी पैसे की ज़रूरत हमें इसलिए है कि हमारे पास करने को बहुत से काम पड़े हैं, लेकिन हमारे पास उतने पैसे नहीं हैं. ये काम चालू हों, तो अर्थव्यवस्था आगे बढ़े और फिर बेरोज़गारी की समस्या भी निपटे. इसीलिए विदेशी निवेश बढ़ाने के काम में जुटी सरकार अब निर्माण, सिंगल ब्रांड रीटेल और विमानन के क्षेत्र में विदेशी निवेशकों को नए तरीके से लुभाने के लिए नई पेशकश लेकर आई है. वैसे तो सरकार के कार्यकाल का डेढ़ साल बचा है, लेकिन अगले महीने वह अपना आखिरी पूर्ण बजट पेश करने जा रही है. कहते हैं कि किसी सरकार का आखिरी बजट लोकलुभावन ऐलानों का होता है. इन्ही ऐलानों को वह अगले चुनाव में दोहराती है, लेकिन इस बार के बजट में सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह आने का अंदेशा है कि उन कामों को करने के लिए बजट में पैसे का इंतजाम वह कैसे दिखाएगी. दरअसल अब तक सब करके देख लिया, लेकिन सरकारी खजाने की हालत जस की तस है. सो, विदेशी निवेश और निजीकरण बढ़ाने के अलावा विकल्प हो ही क्या सकता है. वह तो पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ही थे, जो एक बार कह गए कि पैसे पेड़ों पर नहीं उगते, और वहीं वह यह बात भी दर्ज करा गए कि किफायत बरतिए. लेकिन उनकी वह बात पसंद नहीं की गई थी. एक अर्थशास्त्री की बात का विरोध किया गया था और यहां तक कि खुद उनके विरोधी अर्थशास्त्रियों ने उनका मज़ाक तक उड़ाया था. बहरहाल, आज के मुश्किल हालात में विदेशी निवेश के अलावा कोई तरीका कोई नहीं सुझा पाता. इसी महीने दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक हो रही है, जिसमें इस बार वित्तमंत्री नहीं, खुद प्रधानमंत्री जा रहे हैं. वह वहां विश्व की कई अर्थशक्तियों के बीच होंगे. दुनिया की बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रमुखों के बीच भी उन्हें बोलने का मौका मिलेगा. विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए भरपूर वकालत का इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता है. ज़ाहिर है, उन बैठकों के ऐन पहले अपने यहां निर्माण, सिंगल ब्रांड रीटेल और विमानन के क्षेत्र में विदेशी निवेशकों के लिए भारी छूट का ऐलान करने के बाद ही वह वहां जा रहे हैं. खासतौर पर भारीभरकम जमीन-जायदाद वाली सरकारी विमानन कंपनियों में विदेशी कारोबारियों के लिए हिस्सेदारी का प्रस्ताव लेकर.
विदेशी निवेश के लिए विश्व में कारोबारियों को संकेत देने का एक माघ्यम कारोबार सुगमता की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग को भी माना जाता है. सरकार के इन ऐलानों से यह रैंकिंग बढ़ने के बानक बन गए हैं. इस रैंकिंग बढ़े आंकड़े से घरेलू राजनीति में प्रचार का एक मुद्दा भी तैयार हो जाता है कि सरकार ने देश की छवि चमकाने में क्या काम किया. विदेशी निवेश आए या न आए, इन ऐलानों से रैंकिंग का मकसद तो सध ही गया है. कहने को तो मौजूदा सरकार दावा करती है कि उसकी कोशिशों से अच्छा-खासा विदेशी निवेश आया. आंकड़ों के मुताबिक 17 फीसदी विदेशी निवेश बढ़ा. हालांकि यह उपलब्धि गिनाते वक्त यह नहीं बताया जाता कि हमें उम्मीद कितनी थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें दोगुने-तिगुने यानी 200 या 300 फीसदी बढ़ने की उम्मीद रही हो. अब अपने यहां लक्ष्य की नापतौल करने का रिवाज़ या चलन है नहीं, सो, ऐसे मामले में उपलब्धियों का आकलन भी मुश्किल है. फिर भी अगर फ्डी को आकर्षित करने के लिए इतने ताबड़तोड़ ढंग से नई छूटों का ऐलान करना पड़ा हो, तो यह खुद ही साबित कर देता है कि हमें पर्याप्त विदेशी निवेश की ज़रूरत है. यानी पुरानी कोशिशों का अपेक्षित असर हुआ नहीं. अब तक विदेशी निवेश के जो फायदे गिनवाए जाते रहे हैं, उनमें सबसे लुभावना फायदा रोज़गार के मौके पैदा होने का बताया जाता रहा है. आमतौर पर विशेषज्ञों का कहना है कि यह निवेश देश में पहले से काम कर रहे लोगों के रोज़गार खत्म भी करेगा. इसमें कोई शक नहीं कि विदेशी कंपनियां सबसे पहले अपने व्यापार के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करना चाहेंगी, जिसमें मानव संसाधन कम लगते हों. अभी अपना छोटा दुकानदार भी एक-दो नौकरों को ज़रूर रखता है, और वह खुद भी नौकर की तरह लगा रहता है. जब करोड़ों छोटे दुकानदारों पर ही बेरोज़गार हो जाने का अंदेशा बताया जा रहा हो, तो विदेशी कंपनियों के रोज़गार बढ़ाने और देसी कारोबार में रोज़गार खत्म होने का अंतर आसानी से समझा जा सकता है. इस सिलसिले में दो साल पहले इसी स्तंभ में बेरोज़गारी पर लिखे एक आलेख को भी याद किया जा सकता है. यह आलेख उस समय का है, जब कुछ दिनों के लिए सरकार ने 'मेक इन इंडिया' की बात चलाई थी और विदेशों में ब्रांड इंडिया की लोकप्रियता बढ़ाने की बात सोची थी. हालांकि बाद में वह विचार भी आगे बढ़ा नहीं दिखा.
Tuesday, January 9, 2018
दलितों के नए नेता जिग्नेश मेवानी
जिग्नेश मेवाणी गुजरात से आते हैं और हाल ही में हुए चुनाव में वह कांग्रेस के समर्थन से विधायक बने हैं. गुजरात में वह दलितों के नेता बनकर उभर रहे हैं लेकिन अभी उनको अपने दम पर बहुत कुछ साबित करना है. कांशीराम के बाद जितने भी दलित नेता हैं उनमें मायावती को छोड़कर कोई अलग धारा नहीं बना पाया है. महाराष्ट्र में रामदास अठावले एनडीए में हैं. दिल्ली में डॉ. उदितराज ने दलितों के लिए नया मंच खड़ा करने की कोशिश की लेकिन वह भी बीजेपी सांसद बन गए. बिहार से रामविलास पासवान भी एनडीए सरकार में मंत्री हैं. मायावती का भी जादू अब दलितों के सिर चढ़कर बोल नहीं रहा है. ये जिग्नेश मेवाणी के लिए चुनौती भी है और मौका भी. क्योंकि दलितों के दम पर ही मायावती उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बन चुकी हैं. अभी वर्तमान राजनीति में ऐसा कोई नेता नहीं है जो दलितों का विश्वास पूरी तरह से जीत सके. भीमराव अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर इस मामले में उनकाे चुनौती दे सकते हैं लेकिन उनका प्रभाव भी महाराष्ट्र से बाहर देखना अभी बाकी है. लेकिन जिग्नेश जैसी ऊर्जा उनके अंदर नहीं है. जिग्नेश मेवाणी एक पढ़े-लिखे युवा नेता हैं. अंग्रेजी साहित्य से उन्होंने मास्टर्स, एलएलबी और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है. साल में 2016 में उन्होंने गुजरात में दलितों पर गोरक्षकों की ओर से किए गए हमले के खिलाफ अहमदाबाद से ऊना तक मार्च निकाला था जिसमें 20 हजार के करीब लोगों ने हिस्सा लिया था. जिग्नेश मेवाणी के अंदर सड़क पर संघर्ष करने की क्षमता है. वह मृदुभाषी हैं, किसी भी तरह के प्रोपेगेंडा के खिलाफ वह सोशल मीडिया का अच्छा इस्तेमाल करना जानते हैं और टीवी पर बहस के दौरान भी वह जोरदार और तर्कों के साथ अपना पक्ष रखते हैं. जिग्नेश मेवाणी कांग्रेस के समर्थन से विधायक जरूर बन गए हैं लेकिन यहीं से अब उनको अपनी राजनीति का रास्ता खोजना चाहिए.
चैनलों पर जिग्नेश को सुनने-देखने तथा अखबारों में उनके भाषणों के अंशों को पढ़ने पर वे जोशीले, ऊर्जावान तथा साहसी लगे. इस उम्र में, और वह भी नेतृत्व के लिए ये स्वाभाविक गुण हैं. लेकिन साथ में बहुत स्पष्ट तौर पर यह भी आभास हो रहा था कि उनमें उस वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक समझ एवं दूरदर्शिता का अभाव है, जो उन्हें रचनात्मकता तक पहुंचा सकेगा. उनकी बातें तीन मुख्य स्तम्भों पर टिकी मालूम पड़ती हैं-मनुस्मृति का विरोध, संविधान का फ्रेम तथा मार्क्सवाद का दर्शनशास्त्र. इन तीनों में नया कुछ इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से उभरे लगभग सभी आंदोलनों ने अपने-अपने ढंग से इन्हीं उपायों को अपनाया है. जाहिर है कि अब तो ये उपाय और भी पुराने पड़कर अप्रभावी हो गए हैं. हां, शुरुआत करने के लिए ये थोड़े ठीक हो सकते हैं. लेकिन यदि इस शुरुआत को वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक संदर्भों में प्रौढ़ता प्राप्त नहीं हुई, तो इसका भी अंत अपने पूर्ववर्तियों की तरह होना निश्चित है. यह अवश्य होगा कि जिग्नेश सहित उनके कुछ अन्य सहयोगी (कन्हैया जैसे नौजवान) विधानसभाओं और संसद में अपनी सीटें सुरक्षित कर लेंगे, जैसा कि पैंथर पार्टी के साथ हुआ. या यदि जातिगत तत्व को छोड़ दिया जाए, तो आम आदमी पार्टी के साथ हुआ.
जिग्नेश मेवाणी को यह समझना होगा कि एक अधिनायकवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठाए गए हथियार लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विरुद्ध उतने कारगर नहीं होते. मार्क्सवाद आज एक ऐसा ही हथियार है. और यदि उन्हें इसका इस्तेमाल करना भी है, तो फिलहाल ‘मनुस्मृति’ के ‘जातिगत विभाजन’ की बजाय ‘वर्ग चरित्र’ के सिद्धांत पर ध्यान दें. उनके सामने इसके कई जीवंत प्रमाण मौजूद हैं कि उनके अपने समुदाय के ही प्रतिनिधि राजसत्ता प्राप्त करते ही स्वयं तथाकथित उच्च वर्ग; जिसे कार्ल-मार्क्स ‘शोषक वर्ग’ कहते हैं, बन जाते हैं. और डॉ आम्बेडकर की पूजा करने के बावजूद उनकी व्यक्तिपूजा के विरुद्ध विचारों को दरकिनार करके मूर्तियों की स्थापनाएं करने में जुट जाते हैं. ‘‘आरक्षण के सिद्धान्त को जाति समूह के अंदर ही आर्थिक आधार से न जोड़ने देना’’ इसी वर्ग-चरित्र की रणनीति है. इसलिए बाह्य सामाजिक विरोध (मनुस्मृति) से कहीं अधिक जरूरी है, अपने समुदाय के अंदर की प्रतिक्रियावादी शक्तियों का विरोध करना. साथ ही समुदाय को सक्षम बनाने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों तथा सरकार द्वारा प्रदत्त उन सुविधाओं का समुचित रूप में उपयोग कराया जाना, जो उनके जीवन पर तत्काल सकारात्मक प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं. यह काम भी किसी राजनीतिक आंदोलन का ही अंग होता है, क्योंकि इससे आंदोलन को शक्ति मिलती है. हां, यदि जिग्नेश के मन में आंदोलन की जगह क्रांति की बात हो, तब बात कुछ अलग हो जाएगी.
चैनलों पर जिग्नेश को सुनने-देखने तथा अखबारों में उनके भाषणों के अंशों को पढ़ने पर वे जोशीले, ऊर्जावान तथा साहसी लगे. इस उम्र में, और वह भी नेतृत्व के लिए ये स्वाभाविक गुण हैं. लेकिन साथ में बहुत स्पष्ट तौर पर यह भी आभास हो रहा था कि उनमें उस वैचारिक स्पष्टता, सामाजिक समझ एवं दूरदर्शिता का अभाव है, जो उन्हें रचनात्मकता तक पहुंचा सकेगा. उनकी बातें तीन मुख्य स्तम्भों पर टिकी मालूम पड़ती हैं-मनुस्मृति का विरोध, संविधान का फ्रेम तथा मार्क्सवाद का दर्शनशास्त्र. इन तीनों में नया कुछ इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वतंत्रता के बाद से उभरे लगभग सभी आंदोलनों ने अपने-अपने ढंग से इन्हीं उपायों को अपनाया है. जाहिर है कि अब तो ये उपाय और भी पुराने पड़कर अप्रभावी हो गए हैं. हां, शुरुआत करने के लिए ये थोड़े ठीक हो सकते हैं. लेकिन यदि इस शुरुआत को वर्तमान राजनीतिक एवं सामाजिक संदर्भों में प्रौढ़ता प्राप्त नहीं हुई, तो इसका भी अंत अपने पूर्ववर्तियों की तरह होना निश्चित है. यह अवश्य होगा कि जिग्नेश सहित उनके कुछ अन्य सहयोगी (कन्हैया जैसे नौजवान) विधानसभाओं और संसद में अपनी सीटें सुरक्षित कर लेंगे, जैसा कि पैंथर पार्टी के साथ हुआ. या यदि जातिगत तत्व को छोड़ दिया जाए, तो आम आदमी पार्टी के साथ हुआ.
जिग्नेश मेवाणी को यह समझना होगा कि एक अधिनायकवादी व्यवस्था के विरुद्ध उठाए गए हथियार लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसके विरुद्ध उतने कारगर नहीं होते. मार्क्सवाद आज एक ऐसा ही हथियार है. और यदि उन्हें इसका इस्तेमाल करना भी है, तो फिलहाल ‘मनुस्मृति’ के ‘जातिगत विभाजन’ की बजाय ‘वर्ग चरित्र’ के सिद्धांत पर ध्यान दें. उनके सामने इसके कई जीवंत प्रमाण मौजूद हैं कि उनके अपने समुदाय के ही प्रतिनिधि राजसत्ता प्राप्त करते ही स्वयं तथाकथित उच्च वर्ग; जिसे कार्ल-मार्क्स ‘शोषक वर्ग’ कहते हैं, बन जाते हैं. और डॉ आम्बेडकर की पूजा करने के बावजूद उनकी व्यक्तिपूजा के विरुद्ध विचारों को दरकिनार करके मूर्तियों की स्थापनाएं करने में जुट जाते हैं. ‘‘आरक्षण के सिद्धान्त को जाति समूह के अंदर ही आर्थिक आधार से न जोड़ने देना’’ इसी वर्ग-चरित्र की रणनीति है. इसलिए बाह्य सामाजिक विरोध (मनुस्मृति) से कहीं अधिक जरूरी है, अपने समुदाय के अंदर की प्रतिक्रियावादी शक्तियों का विरोध करना. साथ ही समुदाय को सक्षम बनाने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों तथा सरकार द्वारा प्रदत्त उन सुविधाओं का समुचित रूप में उपयोग कराया जाना, जो उनके जीवन पर तत्काल सकारात्मक प्रभाव डालने की क्षमता रखते हैं. यह काम भी किसी राजनीतिक आंदोलन का ही अंग होता है, क्योंकि इससे आंदोलन को शक्ति मिलती है. हां, यदि जिग्नेश के मन में आंदोलन की जगह क्रांति की बात हो, तब बात कुछ अलग हो जाएगी.
क्या जेल जाने से ख़त्म होंगे लालू?
लालू प्रसाद यादव की पहचान एक ऐसे नेता की रही है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों का फायदा उठाना बखूबी आता है. जब वे बिहार की राजनीति में नए-नए उभरे थे तो उस दौर में लोग उन्हें भदेस और असभ्य कहते थे. लेकिन लालू यादव ने इसे अपना एक स्टाइल बना लिया और यादव समाज के बीच न सिर्फ अपनी पैठ बनाई बल्कि समय के साथ इसे मजबूत करते चले गये. लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तो जब भी विपक्ष उन्हें वाजिब मसलों पर भी घेरने का प्रयास करता, वे इसे जाति और वर्ग का रंग दे देते थे. वे कहते थे कि अगड़ी जाति के नेताओं को यह बात अच्छी नहीं लगती कि पिछड़े वर्ग से आने वाला लालू यादव प्रदेश का मुख्यमंत्री बन गया है. इससे न सिर्फ वे मुद्दे धराशाई हो जाते बल्कि पिछड़ा वर्ग के बीच लालू का समर्थन कुछ और मजबूत हो जाता. इस शैली में राजनीति करने वाले लालू यादव एक बार फिर जेल में हैं. चारा घोटाले से संबंधित एक मामले में उन्हें अपराधी घोषित किया जा चुका है. ऐसे में उन्हें होने वाले राजनीतिक नुकसानों की चर्चा तो हर तरफ चल रही है लेकिन उनकी राजनीतिक शैली को जो भी समझते हैं, उनका कहना है कि लालू इस स्थिति का भी फायदा उठा सकते हैं. लालू यादव को सजा होते ही उन्होंने और उनके परिवार व पार्टी के नेताओं ने इसे केंद्र सरकार की बदले की कार्रवाई के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है. राजद नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लालू को ठिकाने लगाने की साजिश में केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं. स्थानीय स्तर पर राजद के नेता लालू के समर्थक वर्ग, खास तौर पर यादव और मुस्लिम समाज में, इस बात का प्रचार कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार और नीतीश कुमार उनके वर्ग के नेता को निपटाकर उनके शोषण की साजिश पर काम कर रहे हैं. बिहार की राजनीति को जिसने भी करीब से देखा है, उसे यह मालूम होगा कि कुछ खास वर्ग के लोग लालू यादव की बातों पर आंख मूंदकर विश्वास करते हैं. 2015 के विधानसभा चुनावों में भी इसे देखा जा सकता था. जानकारों का कहना है कि ऐसे में लालू यादव अपनी पार्टी के लिए जितने उपयोगी जेल से बाहर थे उससे कम उपयोगी जेल के अंदर नहीं हैं.
दूसरे मामले में सजायाफ्ता होने की वजह से लालू यादव अब चुनाव नहीं लड़ सकते. वे सभा कर सकते हैं. लेकिन अगर उन्हें नये मामले में जमानत नहीं मिली तो तेजस्वी और तेजप्रताप यादव राजद के समर्थकों के बीच उनकी तस्वीर के साथ सभा करते हुए यह कह सकते हैं कि उनके नेता को साजिश के तहत जेल में डाला गया है. बिहार की राजनीति को समझने वालों का मानना है कि इसका राजनीतिक फायदा राजद को मिलना तय है. 2015 के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद जब तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बने और तेजप्रताप यादव कैबिनेट मंत्री तो उस वक्त यही कहा गया कि दोनों को लालू यादव का बेटा होने की वजह से ये जिम्मेदारियां मिलीं. लेकिन नीतीश सरकार से बाहर होने के बाद दोनों ने अपने-अपने स्तर पर पार्टी और कार्यकर्ताओं को नेतृत्व देने की कोशिशें की हैं. तेजस्वी पार्टी के उदार चेहरे की नुमाइंदगी करते हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं तो तेजप्रताप यादव बिहार के अलग-अलग हिस्सों में जाकर जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को पार्टी के साथ बनाए रखने और उन्हें उत्साहित रखने के काम में अधिक सक्रिय हैं. राजद के जमीनी कार्यकर्ता खुद को तेजप्रताप से अधिक जोड़कर देखते हैं. उन्हें लगता है कि तेजप्रताप अपने पिता लालू यादव की तरह ही सीधा हमला करते हैं. तेजस्वी के संबोधन में कार्यकर्ता खूब तालियां बजाते हैं और उत्साह दिखाते हैं. अब तक इन दोनों के बारे में यही माना जाता था कि ये पूरी तरह लालू यादव के कहे पर चलते हैं. लेकिन लालू यादव के जेल जाने के बाद से दोनों ने जिस तरह से अलग-अलग मोर्चों पर आक्रामक रुख अपनाया हुआ है, उससे इनकी छवि एक स्वतंत्र नेता के तौर पर स्थापित हो रही है. लालू यादव के बाहर न होने पर अगर तेजस्वी और तेजप्रताप एक प्रभावी जनसंपर्क अभियान चलाने में सफल हो जाते हैं तो इससे न सिर्फ लालू समर्थक पार्टी से जुड़े रहेंगे बल्कि तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव पूरी तरह से एक स्वतंत्र नेता के तौर पर भी राजद और बिहार में स्थापित हो जाएंगे.
Wednesday, January 3, 2018
भीमा कॉरेगांव घटना के बाद गुस्से में दलित
पुणे ज़िले में भीमा-कोरेगांव युद्ध की 200वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सोमवार को हुई हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गई है. इस लड़ाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने पेशवा की सेना को हराया था. दलित ब्रिटिश सेना की इस जीत का जश्न मनाते हैं. ऐसा समझा जाता है कि तब अछूत समझे जाने वाले महार समुदाय के सैनिक ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की ओर से लड़े थे. भीमा-कोरेगांव की लड़ाई एक जनवरी 1818 को लड़ी गई थी. कुछ विचारक और चिंतक इस लड़ाई पिछड़ी जातियों के उस समय की उच्च जातियों पर जीत के रूप में देखते हैं. हालांकि, पुणे में कुछ दक्षिणपंथी समूहों ने इस जीत का जश्न मनाए जाने का विरोध किया था. जब लोग गांव में युद्ध स्मारक की ओर बढ़ रहे थे तो सोमवार दोपहर शिरूर तहसील स्थित भीमा-कोरेगांव में पथराव और तोड़-फोड़ की घटनाएं हुईं. हिंसा तब शुरू हुई जब एक स्थानीय समूह और भीड़ के कुछ सदस्यों के बीच स्मारक की ओर जाने के दौरान किसी मुद्दे पर बहस हुई. भीमा-कोरेगांव की सुरक्षा के लिए तैनात एक पुलिस अधिकारी ने बताया, बहस के बाद पथराव शुरू हुआ. हिंसा के दौरान कुछ वाहनों और पास में स्थित एक मकान को क्षति पहुंचाई गई. हिंसा में 25 से अधिक गाड़ियां जला दी गईं और 50 से ज़्यादा गाड़ियों में तोड़-फोड़ की गई. पुलिस ने घटना के बाद कुछ समय के लिए पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर यातायात रोक दिया. राज्य रिज़र्व पुलिस बल की कंपनियों समेत और पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है. उन्होंने बताया कि मोबाइल फोन नेटवर्क को कुछ समय के लिये अवरूद्ध कर दिया गया ताकि भड़काऊ संदेशों को फैलाने से रोका जा सके. प्रदर्शनकारियों में मुंबई के कई इलाकों में सड़कें अवरूद्ध कर दीं, दुकानें बंद करा दीं और एक टेलीविजन समाचार चैनल के पत्रकार पर हमला भी किया.
पुणे में सोमवार को युद्ध की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में एक व्यक्ति की मौत से आक्रोशित लोगों के समूहों ने मंगलवार सुबह शहर के पूर्वी उपनगरीय इलाकों चेम्बूर, विखरोली, मानखुर्द और गोवंडी में विरोध प्रदर्शन किया और दुकानों एवं प्रतिष्ठानों को बंद करने पर मजबूर कर दिया. ईस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर प्रियदर्शन, कुर्ला, सिद्धार्थ कॉलोनी और अमर महल इलाकों में सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की भीड़ जुट गई और उन्होंने जुलूस निकाला एवं सरकार तथा प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की. प्रदर्शनकारियों ने हार्बर लाइन के गोवंडी एवं चेंबूर रेलवे स्टेशनों पर स्थानीय ट्रेन सेवाएं रोक दीं. इस हिंसा के ख़िलाफ़ औरंगाबाद में भी प्रदर्शन हुए. इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पथराव किया. प्रदर्शन के दौरान आगज़नी भी की गई. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर पत्थरबाज़ी की. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट से मामले की न्यायिक जांच के लिए आग्रह किया जाएगा. इसके अलावा एक युवा की मौत के मामले की जांच सीआईडी करेगी. मृतक के परिजन को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा.
दलित नेता और गुजरात से निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी ने हिंसा से पहले गांव में बने युद्ध स्मारक का दौरा किया था. 31 दिसंबर को मेवाणी पुणे में हुई यलगार परिषद में भी शामिल हुए थे.
वहां पिछले 200 सालों से लोग जा रहे हैं, लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. यह ज़ाहिर था कि वहां ज़्यादा लोग जमा होंगे ऐसे में वहां ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत थी.
Sunday, December 31, 2017
क्या जीएसटी से टैक्स चोरी रुकी है?
फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी आने के बाद कंपोजिट स्कीम में आए व्यापारियों ने टैक्स चोरी अधिक की है. कंपोज़िशन स्कीम क्या है, इसे ठीक से समझना होगा। "छोटी कंपनियों के लिए रिटर्न भरना आसान हो इसलिए यह व्यवस्था बनाई गई है। उनकी प्रक्रिया भी सरल है और तीन महीने में एक बार भरना होता है." आज की तारीख़ में कंपोज़िशन स्कीम के तहत दर्ज छोटी कंपनियों की संख्या करीब 15 लाख है. जबकि सितंबर में इनकी संख्या 10 से 11 लाख थी। इनमें से भी मात्र 6 लाख कंपनियों ने ही जुलाई से सितंबर का जीएसटी रिटर्न भरा है. इन 6 लाख कंपनियों ने मात्र 250 करोड़ का टैक्स दिया है. इन कंपनियों का औसत टर्नओवर 2 लाख है। अगर आप पूरे साल का इनका डेटा देखें तो मात्र 8 लाख है। समस्या यह है कि जिन कंपनियों का या फर्म का सालाना 20 लाख से कम का टर्नओवर हो उन्हें जीएसटी रिटर्न भरने की ज़रूरत भी नहीं है। इसका मतलब है कि छोटी कंपनियां अपना टर्नओवर कम बता रही हैं। भारत की व्यवस्था आप जानते ही हैं कि दस लाख कंपनियों का आडिट करने में ज़माना गुज़र जाएगा। इस रिपोर्ट के आधार पर कहा जा सकता है कि बड़े पैमाने पर कर चोरी की छूट दी जा रही है। आखिर जीएसटी के आने से कर चोरी कहां बंद हुई है? क्या 20 लाख से कम के टर्नओवर पर रिटर्न नहीं भरने की छूट इसलिए दी गई ताकि कंपनियां इसका लाभ उठाकर चोरी कर सकें और उधर नेता जनता के बीच ढोल पीटते रहें कि हमने जीएसटी लाकर चोरी रोक दी है। जीएसटी फाइल करने को आसान बनाने के नाम पर राजनेता से लेकर जानकार तक यह सुझाव दे रहे हैं कि कंपोज़िशन स्कीम के तहत कंपोज़िशन स्कीम के तहत डेढ़ करोड़ के टर्नओवर वाली कंपनियों को भी शामिल किया जाए। यह ज़रूर कुछ ऐसा खेल है जिसे हम आम पाठक नहीं समझते हैं मगर ध्यान से देखेंगे तो इस खेल को समझना इतना भी मुश्किल नहीं है। कंपोज़िशन स्कीम के तहत 20 लाख टर्नओवर की सीमा को बढ़ा कर डेढ़ करोड़ करने की कोई ज़रूरत नहीं है बल्कि टैक्स चोरी रोकने के लिए ज़रूरी है कि 20 लाख से भी कम कर दिया जाए। बिजनेस स्टैंडर्ड में श्रीमि चौधरी की रिपोर्ट पर ग़ौर कीजिए। CBDT ( central board of direct taxex) को दिसंबर की तिमाही का अग्रिम कर वसूली का के आंकड़ो को जुटाने में काफी मुश्किलें आ रही हैं। दिसंबर 15 तक करदाताओं को अग्रिम कर देना होता है। चोटी की 100 कंपनियों ने जो अग्रिम कर जमा किया है और जो टैक्स विभाग ने अनुमान लगाया था, उसमें काफी अंतर है। मिलान करने में देरी के कारण अभी तक यह आंकड़ा सामने नहीं आया है। नवंबर की जीएसटी वसूली काफी घटी है। वित्तीय घाटा बढ़ गया है। सरकार ने 50,000 करोड़ का कर्ज़ लिया है। ऐसे में अग्रिम कर (Advance Tax) वसूली का आंकड़ा भी कम आएगा तो विज्ञापनबाज़ी का मज़ा ख़राब हो जाएगा। अधिकारियों ने कहा है कि हर तिमाही में हमारे आंकलन और वास्तविक अग्रिम कर जमा में 5 से 7 फीसदी का अंतर आ ही जाता है मगर इस बार यह अंतर 15 और 20 फीसदी तक दिख रहा है।
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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