Sunday, January 28, 2018

आम बजट का पूर्वानुमान

जट पेश होने में कुछ ही समय बचा है. जाहिर है कि सरकार चार साल की अपनी उपलब्धियों को दिखाने के लिए आंकड़ेबाजी के सारे हुनर लगा देगी.  इसीलिए बजट की समीक्षा का काम हमेशा से ज्यादा कठिन और चुनौती भर होगा. बजट के मकसद को नहीं भूला जा सकता. बजट के जो मकसद हमने पहले से तय कर रखे हैं उनमें सरकार के लिए सबसे बड़ा काम यह है कि वह कैसे देश के कमजोर तबकों को सहूलियत पहुंचाए. लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में सरकार की आमदनी और खर्च का हिसाब बनाते समय यही देखा जाता है कि उसने समर्थ और संपन्न लोगों से कितनी उगाही की और असमर्थ और विपन्न रह गए लोगों को कितना सुख बांटा. बजट के मकसद में यह भी शामिल है कि उसके ज़रिए महंगाई को काबू में रखा जाए. इसके अलावा भाविष्य में विकास की संभावनाएं बनाए रखने के लिए नई-नई कोशिश करना बजट का मकसद होता ही है. लेकिन हमारी मौजूदा माली हालत ऐसी नहीं बन पाई है कि ज्यादा आगे की बात सोच पाएं. इस बार के बजट में सिर्फ 2018 19 के साल के लिए गुजारे लायक हिसाब बना लें उतना ही काफी है. अब ये बात अलग है कि अपने निकट भविष्य के एक साल की आवश्यकताओं की कीमत पर भविष्य की बातों में उलझा दिया जाए. यह अंदेशा इस आधार पर है कि फिलहाल अपनी माली हालत ऐसी बनी दिख नहीं रही है कि निकट भविष्य की जरूरतों को ही पूरा कर पाएं. आइए देखते हैं कैसे? वैसे इसे तय करना हमेशा मुश्किल माना जाता है, लेकिन मौजूदा हालात में यह आसान इसलिए है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी जो गांव में बसती है और जिसे किसान कहते हैं वह मरणासन्न हालत में पहुंच गए हैं. इस आधार पर कह सकते हैं कि देश का बजट बनाते समय जो यह दुविधा बनी रहती है कि उद्योग व्यापार पर ज्यादा ध्यान लगाएं या कृषि पर, वह दुविधा इस बार बिल्कुल नहीं है. वैसे भी देश के सकल घरेलू उत्पाद के आकलन के लिए जो तीन क्षेत्र तय हैं उनमें सबसे बुरी हालत कृषि क्षेत्र की ही है. उसकी वृद्धि दर ऐतिहासिक रूप से नीचे यानी सिर्फ ढाई फीसद है. जो विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की वृद्धि दर की तुलना में सबसे कम है. देश की आधी से ज्यादा आबादी से सरोकार रखने वाले कृषि क्षेत्र का जीडीपी में योगदान सिर्फ 17 फीसद निकलकर आया है. जाहिर है कि देश में वंचित तबके को ढूंढना हो तो वह देश के ग्रामीण क्षेत्र में ही पाया जाएगा. यानी इस बार के बजट से कोई तर्कपूर्ण उम्मीद लगाना हो तो वह गांव और कृषि क्षेत्र के पक्ष में लगाना ही जायज़ है. पिछले साल के अनुभवों में जो सबसे भयावह है, वह बेरोजगारी की समस्या रही. यह समस्या जितने विकराल रूप में हमारे सामने है उसे किसी भी तरह अब और आगे टाला नहीं जा सकता. बेरोजगारी के आबड़ में गांव और शहर दोनों हैं. गांव के गरीब तो पहले ही बेरोजगारी से परेशान हो रहे थे अब शहरी ग़रीब भी इसकी जद में है. इस तरह इस बार के बजट में अगर रोज़गार बढ़ाने के लिए पर्याप्त धन का प्रावधान नहीं दिखा तो बजट की समीक्षा करने वाले तीखी प्रतिक्रिया कर रहे होंगे. पिछले कुछ साल से संतुलित बजट का जुमला चलने लगा है. लोकतांत्रिक राज व्यवस्था में 'सबका साथ-सबका विकास' नारा सुनने में अच्छा लग सकता है. लेकिन लोकतांत्रिक राजव्यवस्था के बजट का मकसद सबके विकास की बजाए संवेदनशील रूप से वंचित वर्ग का ध्यान रखने की बात करता है. बजट का मकसद ही समर्थ से लेकर असमर्थ को देना है. यह मकसद खूब सोच समझकर बनाया गया है. कोई भी नया तर्क पैदा नहीं किया जा सकता कि देश में पूंजी बढ़ाना इसलिए जरूरी है क्योंकि उससे गरीब और असमर्थ के पास पैसा अपने आप पहुंच जाएगा. दुनिया में जिन लोगों ने और खुद हमने भी यह करके देख लिया है कि यह तर्क काम का नहीं है. अब अमीरों के रूट से गरीबों को सुविधा पहुंचाने की बजाए गरीबों को सीधे रास्ते से देने के इंतजाम की दरकार है. यानी बहुत कम आसार हैं कि इस बार संतुलित बजट के जुमले को सरकार की तारीफ के लिए इस्तेमाल किया जा सके. दरकार यह है कि इस बार का बजट अच्छा खासा अंसतुलित होकर गरीब, किसान, महिलाओं, बच्चों और बुजु़र्गों के पक्ष में झुका दिखे. वैसे सरकार की तरफ से ये इशारा पहले ही दिया जा चुका है कि इस बार लोकलुभावन बजट की उम्मीद न करें. लेकिन इसकी व्याख्या नहीं की गई है. बेशक बजट बहुत ही गोपनीय दस्तावेज होता है क्योंकि इसके बारे में पहले पता चल जाए तो निवेशकों के सबसे बड़े बाजार जिसे शेयर बाजार कहते हैं उसमें लूट मचने का अंदेशा हो जाता है. सो सरकार के इशारे से बिल्कुल भी अटकल नहीं लगती कि उसका आखिरी बजट किसके पक्ष में होगा. हो सकता है कि इसका यह मतलब हो कि सरकारी खर्च के लिए पैसे की उगाही ताबड़तोड़ ढंग से की जाएगी. लेकिन ऐसी बातें कोई सरकार पहले से नहीं कहती. वह तो सनसनीखेज तरीके से उगाही को भी देश हित में बताकर सहलाते हुए टैक्स और दूसरे तरीकों से उगाही करती है. वैसे भी उद्योग और व्यापार का भी हाल अच्छा नहीं है. उन पर और ज्यादा बोझ पड़ा तो अब वे झल्ला उठेंगे. इस तरह बिल्कुल भी अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि इस बार के बजट में गाज किस तबके पर गिरने वाली है.

कासगंज हिंसा

मीडिया भी घटिया रिपोर्टिंग पर उतारू है. हिन्दी के 3 बड़े अख़बारों ने खबर में लिखा है," तिरंगा यात्रा का मुस्लिम समाज द्वारा विरोध करने के बाद सांप्रदायिक दंगे भड़के. 1 हिंदू युवक की मौत."....  इसे ये नहीं लिख सकते थे क़ि, " कासगंज में सड़क झंडा रोहण कर रहे लोगों के साथ तिरंगा रैली निकाल रहे लोगों से झड़प के बाद हिंसा में एक युवक की मौत" 
जबकि एबीपी न्यूज के वयराल सच में चश्मदीदों द्वारा बताया गया क़ि सड़क के किनारे मुस्लिम समुदाय ने झंडा रोहण का कार्यक्रम रखा था, वहीं से एबीवीपी के बाइक सवार लगभग 70-80 लोग निकले और जाने के लिए रास्ता माँगने लगे. उन्होने कहा क़ि थोड़ी देर रुक जाइए फिर चले जाना यहाँ भी तो तिरंगा ही फहरा रहे हैं. तो उन्होनें नारे बाजी शुरू कर दी. हिन्दुस्तान में रहना है तो वन्दे मातरम कहना है, हिंदू हिंदू हिन्दुस्तान, कटुए जाएँ पाकिस्तान..... और वीडियो में साफ दिखा क़ि तिरंगों के बीच में भगवा झंडा फहराया जा रहा था. ऐसे महॉल में लोग न भड़केंगे तो क्या होगा? मैं नहीं पक्ष ले रहा मूसलमानों का, जो भड़के और हिंसा की उनको क़ानून के हिसाब से सज़ा दी जाए. उनको उकसावे में न आकर खुद को शांत रखना चाहिए था. लेकिन क्या इसका ज़िम्मेदार आपको नहीं नज़र आया? बड़े शातिराना ढंग से लोग चंदन के खून, तिरंगे और हिंदू की बात करके खुद की लड़ाई को धर्म और देश की लड़ाई बना रहे हैं. इसमें साफ दिखता है क़ि लड़ाई एबीवीपी और कुछ मुसलिमलोगों के बीच थी. ना क़ि तिरंगे और हिन्दुस्तान के बीच. क्योंकि मुसलमान भी तो तिरंगा ही फहरा रहे थे. रही बात वन्दे मातरम की, तो गाने में कोई दिक्कत न होना चाहिए. जो ना गाना चाहे उसे पाकिस्तान भेजने और गद्दार कहने का कोई मतलब नहीं वैसे भी वो जय हिंद तो बोल ही रहा है. ये केवल और केवल आपके रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर पूछे गये सवालों के जवाब से बचकर 2019 के चुनाव की तैयारी है.   
मुझे नहीं शक है किसी पर. 26 जनवरी को मैं अपने घर से ओफिस के बीच में 3-4 जगह ये देखता आया क़ि दाढ़ी टोपी वाले मुसलमान भी तिरंगा फहरा रहे थे. फेसबुक और व्हाट्सएप पर अधिकतर मुसलमान मित्रों ने तिरंगे का डीपी रखा या फिर अपनी फोटो के साथ तिरंगा लगाकर कोई अच्छा सा स्लोगन के साथ लगाया था. खूब शुभकामनाएँ दी. मैने तो कहीं नहीं सुना पाकिस्तान का समर्थन और हिन्दुस्तान या तिरंगे का विरोध करते हुए किसी को. ये  केवल और केवल उकसावे की राजनीति है. मुझे पता है आप मुझे भी मुस्लिम कहेंगे, मुझे भी पाकिस्तानी और देश द्रोही कहेंगे. लेकिन सच में सोचकर देखिए क्या इंसानों की लाशों पर बन रहा देश बहुत सुन्‍दर बन जाएगा? मान लिया सब मुसलमान पाकिस्तान चले गए.  या सब ख़त्म कर दिए आपने. फिर?????  जब आप किसी समाज में लोगों को लड़ने और हिंसा करने की आदत पड़ जाएगी, वो आपस में लड़ेंगे. किसी बच्चे को आवारा बना दो, वो सबसे लड़ता फिरे, घर वाले उसे ना रोके, फिर बड़ा होकर वो अपने ही माँ- बाप को कब मारने लगे कोई भरोसा नहीं है. इसलिए उनको प्यार से रहना सिखाइए. पाकिस्तान और तालिबान सब क्यों बर्बाद हो गये? क्योंकि वो पहले दूसरों को मारते थे, आज जब दूसरे नहीं बचे तो खुद के लोगों को मारते हैं. इसका उदाहरण आप, राम रहीम के लोगों का बवाल, हरियाणा और राजस्थान में जाट आरक्षण हिंसा, शहरनपुर में राजपूत और दलितों के दंगे, गुजरात में चली पाटीदार आंदोलन की हिंसा, अभी महाराष्ट्र में दलितों पर हमले फिर उनके द्वारा की गई हिंसा, और हाल ही में हुई राजपूतो की बच्चों तक पर हुई हिंसा में देख सकते हैं. इन हिंसाओं में कितने लोग मरे कोई जाकर देखता है उनके परिवारों को? जिन्होने अपने बेटे, पति और बाप खोए हैं, आज चंदन का नाम प्रयोग कर लो कल उसके माँ बाप को बुढ़ापे में जब बेटे की ज़रूरत होगी तो कोई नहीं जाएगा. इंसान मरते हैं, इंसानियत मरती है लेकिन होता कुछ नहीं क्योंकि नेता जिंदा रह जाता है. 

Mera Wala Review "Padmavati"

संजय लीला भंसाली की चर्चित और विवादित फिल्म पद्मावत करीब एक मिनट लंबे डिस्क्लेमर के साथ शुरू होती है। संजय लीला भंसाली जैसी बड़े स्तर की फिल्म बनाने के लिए जाने जाते हैं वो आपको पद्मावत देखकर हर क्षण महसूस होगा। फिल्म के भव्य सेट, मंदिर, किला, किले के बाहर पड़ी सेना की छावनी के चलते ये फिल्म आपको दूसरी हिन्दी ऐतिहासिक फिल्मों से एक स्तर ऊपर की महसूस होगी। फिल्म में एक भी ऐसा दृश्य या संवाद नहीं है जिसके चलते विवाद की गुंजाइश महसूस हो। फिल्म पूरी तरह से राजपूताना गौरव का बखान करती है और खिलजी को हिंसक, क्रूर और आक्रमणकारी दिखाती है। सही मायनों में फिल्म खिलजी या दिल्ली सल्तनत को कबीलाई, औरतों और सत्ता के लिए लड़ते, सनकी लोगों के झुंड की तरह दिखाती है। दूसरी तरफ राजपूतों को बेहद संयमित, नियम-कायदों से लड़ने वाला दिखाया गया है।
फिल्म की कहानी मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य पद्मावत पर आधारित ये फिल्म 13वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश और मेवाड़ के राजपूत सिसोदिया वंश के बीच लड़ी गई लड़ाई पर आधारित है। फिल्म शुरू होती है अपने चाचा जलालुद्दीन खिलजी को मार कर दिल्ली की शाही गद्दी पर बैठने वाले अलाउद्दीन खिलजी से जो हर बेशकीमती चीज को हासिल करना चाहता है। उसके पास पहुंचकर मेवाड़ से देश निकाला झेल रहा राजपुरोहित चेतन राघव उसे मेवाड़ की महारानी पद्मावती को नायाब बताते हुए हासिल करने के लिए उकसाता है और इसके बाद शुरू होती राजपूतों और खिलजी के बीच एक लंबी जंग। फिल्म में एक भी ऐसा दृश्य नहीं है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी बने रणवीर सिंह और रानी पद्मावती बनी दीपिका पादुकोण एक साथ नजर आए हों। पूरी फिल्म में खिलजी रानी पद्मावती की झलक देखने के लिए उतावला नजर आता है। फिल्म का एक हिस्सा जिसमें खिलजी को शीशे में से रानी पद्मावती की झलक दिखाने की बात मानी जाती है वहां भी एक क्षण के लिए घूंघट में दिखाकर पर्दा बंद कर दिया जाता है। बाद में खिलजी ये बात बोलता भी है कि एक झलक दिखाने के नाम पर तुम राजपूतों ने भी तो मेरे साथ धोखा किया।
अभिनय के हिसाब से फिल्म के तीनों मुख्य एक्टर रावल रतन सिंह के रोल में शाहिद कपूर, रानी पद्मावती के रोल में दीपिका पादुकोण और अलाउद्दीन खिलजी के रोल में रणवीर सिंह अपने किरदार के साथ न्याय करते दिखते हैं। खिलजी के रोल में रणवीर सिंह इतने उम्दा लगे हैं कि ये रोल उनके करियर में एक मील का पत्थर साबित होगा। कुछ सीन में उनके संवाद और चेहरे के मक्कारी से भरे भाव देखने लायक है। अपने सर के ताज और पद्मावती को लेकर खिलजी की सनक उनके अभिनय में साफ नजर आती है। शाहिद कपूर अपने अभिनय से तो प्रभावित करते हैं लेकिन अपनी कद-काठी से मात खाते दिखते हैं। फिल्म के एक दृश्य जिसमें रावल रत्न सिंह की पीठ पर तीर खाए हुए हैं और खिलजी उनकी तलवार के पहुंच में होते हुए भी वो मार नहीं पाते बेहद शानदार है। दीपिका पादुकोण रानी पद्मावती के रोल प्रभावित करती हैं। खूबसूरती, प्रेम, धैर्य, युद्ध और त्याग सभी तरह के मनोभाव में रानी पद्मावती के किरदार में वो प्रभावित करती हैं। मलिक काफूर के रोल जिम सरब के हिस्से में कई अच्छे दृश्य हैं और वो आपको फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रहेंगे। 
भारत में इतिहास आधारित फिल्म बनाने की ज्यादा परंपरा नहीं है। ऐसे में ये फिल्म आपको अपनी आन बान शान के लिए लड़ते राजपूताना के इतिहास की झलक देगी। चित्तौड़गढ़ दुर्ग जिसमें माना जाता है कि आक्रमणकर्ताओं से बचने के लिए तीन बार जौहर किया गया है उन्हें ये फिल्म एक श्रद्धांजलि की तरह है। इसके अलावा राजस्थान की लोक संस्कृति भी फिल्म के माध्यम से करीब से देखने को मिलती है। वहीं फिल्म की सबसे बड़ी कमी है इसकी रफ्तार। फिल्म शुरुआत में बेहद धीमी है जिसके चलते दूसरे हाफ में काफी बोरिंग समय बीतता है। फिल्म के संगीत पर राजस्थानी भाषा और संस्कृति के साथ मिलाकर बेहतरीन डांस के साथ प्रस्तुत किया है। कुल मिलाकर देखने लायक फिल्म जिसे मैं 3.5 स्टार देता हूँ। एक स्टार शायद फिल्म के 33 कट्स पर मैंने काट लिया। असली कहानी और बेहतर होती।

Saturday, January 20, 2018

नौकरियों पर रवीश कुमार की रिपोर्ट सीरीज़

1- क्या जीएसटी के कारण राज्यों का औसत राजस्व घटा है? दावा था कि राज्यों का राजस्व बढ़ेगा. बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का कहना है कि ज़्यादातर व्यापारी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले हो गए. इसके लिए सुशील मोदी ने suppression of turnovers शब्द का इस्तेमाल किया है. साफ शब्दों में व्यापारी टैक्स चोरी करने के लिए अपना टर्नओवर 20 लाख से कम दिखा रहे हैं. इसके कारण उन्हें जीएसटीएन में पंजीकरण की ज़रूरत नहीं होती है. यह भी देखा जा रहा है 1 करोड़ से अधिक टर्नओवर वाले जिन व्यापारियों ने कंपोजिशन स्कीम में पंजीकरण कराया था वो टैक्स नहीं दे रहे हैं. हमें तो यही बताया गया था कि जीएसटी लागू होने के बाद कोई टैक्स चोरी कर ही नहीं सकेगा तो फिर ये suppression of turnover कैसे हो रहा है सर. क्या जीएसटी के बाहर कोई दूसरा नेटवर्क बन चुका है जिससे कारोबार चल रहा है और चलने दिया जा रहा है. राज्य सरकार के कर्मचारी ही बता सकते हैं कि सैलरी समय पर मिल रही है या नहीं, बिल का पेमेंट हो रहा है या नहीं. कोई सुनने वाला नहीं तो मैं हूं न!
अख़बार ने लिखा है कि जीएसटी आने के बाद राज्यों का औसत राजस्व नवंबर और दिसंबर 2017 में 20 प्रतिशत कम हो गया है. अगर यह जारी रहा तो केंद्र सरकार को भरपाई करनी होगी. सितंबर के बाद फिर से पेट्रोल के दाम 70 रुपये प्रति लीटर के पार जा चुके हैं. कई शहरों में 80 रुपये प्रति लीटर हो गया है. भोपाल में 76 रुपये प्रति लीटर से ज़्यादा पर पेट्रोल मिल रहा है. वो भी क्या दौर था जब 60-65 होने पर ख़ूब प्रदर्शन होता था, अब 75 और 80 पर भी शांति है. यह बताता है कि लोग अभी 100 रुपये प्रति लीटर तक देने की स्थिति में आ गए हैं! काश कहीं चुनाव हो जाए, दाम अपने आप कम हो जाएं. 500 अरब उधारी का इरादा था मगर अब 200 अरब ही उधारी लेगी सरकार. ख़बर सुनकर नाचा बाज़ार. सेंसेक्स झम से पहुंचा 35,000 पार. मगर इससे नहीं मिलता रोज़गार. अब आपको इस ख़बर का गेम समझाते हैं. टाइम्स ऑफ इंडिया ने जहां इस ख़बर को डाला है उसी के बगल में एक और ख़बर है. आप यह न समझें कि सरकार ने कुछ अच्छा किया इसलिए अब वह 50,000 करोड़ की उधारी नहीं लेगी, 30,000 करोड़ की उधारी ही लेगी. बगल में खबर है कि सरकार इस वित्त वर्ष के आखिर तक अपनी हिस्सेदारी बेचकर 90,000 करोड़ जुटाएगी. आमतौर पर इसे विनिवेश कहते हैं जिसकी सब तारीफ करते हैं मगर ज़रा सोचिए. आप अपने भविष्य के लिए कुछ हिस्सा रखते हैं, क्या उसे बेचना हमेशा ही अच्छा होता है.
सरकार ने हिन्दुस्तान पेट्रोलियम, ओएनजीसी में अपनी हिस्सेदारी बेच दी है. पिछले साल सरकार ने 46,000 करोड़ की हिस्सेदारी बेची थी, इस साल 90,000 करोड़ तक पहुंचने के आसार दिख रहे हैं. फिर सरकार का कौन सा वित्तीय प्रबंधन है कि सब कुछ बेच ही रहे हैं. अगले वित्त वर्ष में सरकार अपना हिस्सा बेचकर 1 लाख करोड़ रुपये जुटाएगी. हिस्सा का मतलब है सरकार की पूंजी. संपत्ति. पहले के विनिवेश से मुल्क के आर्थिक जीवन में और आपके जीवन में क्या बदलाव क्या आया है, इसे कोई नहीं बताता है. बस सब कहेंगे अच्छा हुआ, अच्छा हुआ. बात समझो न बच्चा, कि क्या अच्छा हुआ. हुज़ूर को विदेशी निवेश से हो रहा प्यार है. मेक इन इंडिया नहीं चला तो 100 परसेंट एफ डी आई की पतवार है. उम्मीद बिकती है बाज़ार में, वोटर ख़रीदार है. रिटेल में 100 परसेंट, प्राइवेट बैंक में 74 परसेंट से बढ़कर 100 परसेंट. बस मत समझना बैंकों में बढ़ रहीं नौकरियां हैं. ज़रा अख़बार पढ़ना सीख लो, पता कर लो, बड़े बैंकों का क्या हाल है. जर्मनी का एक बड़ा भारी बैंक है डोएचे बैंक. आर्थिक और तकनीकी कारणों से यह बैंक 2015 से लेकर 2019 के बीच करीब 20,000 लोगों को निकाल देगा. अभी ख़बर आई है कि नीचे के 20 प्रतिशत कर्मचारियों को भी निकालेगा. 2007 की मंदी में बैंक ही तो डूबे थे. केंद्र सरकार के पास प्रत्यक्ष करों का जमावड़ा बढ़ा है. सोमवार तक 18.7 प्रतिशत बढ़ा है. बजट में अनुमान था कि 9.8 खरब जमा होगा और यह 6.89 खरब हो गया. बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि 1.22 खरब रिफंड भी करना है. उसे लौटाने की गति धीमी है. क्या असर पड़ेगा, किस पर असर पड़ेगा, इसका ज्ञान हमको नहीं है. फिलहाल अखबार ने लिखा है कि प्रत्यक्ष करों का जमा होना बता रहा है कि कई सेक्टर में प्रगति दिख रही है.

आम आदमी पार्टी की असली परीक्षा अब

आप' के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से पैदा हुआ राजनीतिक संकट दिल्ली की तीनों पार्टियों बीजेपी, कांग्रेस और आप के लिए एक नई चुनौती भी है. अगले छह महीने में इन 20 सीटों पर चुनाव होंगे जो किसी छोटे राज्य के पूरे चुनाव से कम नहीं होंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले ये चुनाव अपने-अपने पानी की परख करने का अवसर होंगे. गुजरात में 100 सीटों तक सिमट गई बीजेपी अगर इन 20 सीटों में 10 पर भी जीत हासिल करती है तो 2019 से पहले ये उसके लिए एक बड़ा टॉनिक होगा. आख़िर पिछली बार पूरी विधानसभा में उसके कुल 3 विधायक थे जो एक ही गाड़ी में विधानसभा आ सकते थे. अगर वह 10 से भी ज़्यादा सीटें जीत ले तो 2019 की भूमिका बन जाएगी. यही बात कांग्रेस के बारे में कही जा सकती है. दिल्ली में 15 बरस राज करने वाली कांग्रेस पिछले चुनावों में खाता तक नहीं खोल पाई. ऐन गुजरात चुनावों के वक़्त कांग्रेस के अध्यक्ष बने राहुल गांधी के आने के बाद कांग्रेस के पुनर्जीवन का दावा दिल्ली के चुनाव पुख़्ता कर सकते हैं. अगर कांग्रेस इन 20 में से 5 सीटें भी जीत ले तो उसके लिए बड़ी बात होगी.  लेकिन इस फ़ैसले के असली सबक आम आदमी पार्टी के लिए हैं. लोकपाल बिल के लिए चलाए गए अण्णा आंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी शहरी मतदाताओं के बीच अचानक इसलिए लोकप्रिय हुई कि लोगों ने उसमें राजनीतिक सड़ांध के ख़िलाफ़ एक विकल्प बनने की उम्मीद देखी और माना कि वह राजनीतिक शुचिता को बहाल करेगी. वह दौर ऐसा था जब अरविंद केजरीवाल बिल्कुल बिजली का तार लगते थे जिसको किसी ने छू लिया तो करेंट लग जाए. लेकिन बिजली का यह तार धीरे-धीरे जैसे ठंडा होता हुआ व्यवस्था का पुर्जा होकर रह गया है. उस आम आदमी पार्टी में तीन तरह के लोग शामिल हुए थे- एक तो वे जो लोकपाल आंदोलन से पैदा हुए थे. ये नेक इरादों वाले नौजवान थे जो अपने समाज की बुराइयां दूर करना चाहते थे, लेकिन किस तरह- ये उन्हें नहीं मालूम था. दूसरी कतार उन लोगों की थी जो आप की लोकप्रियता देख दूसरे दलों से आप का हिस्सा बनते चले गए. 
लेकिन आप में एक और हिस्सा था जिसने इसे एक रचनात्मक व्यक्तित्व दिया था. यह समाजवादियों का वह धड़ा था जो किसी वैकल्पिक राजनीतिक-सामाजिक आंदोलन के अभाव में मायूस था और जिसने आप से बड़ी उम्मीद पाली थी. योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और दिल्ली और देश भर के ढेर सारे ऐसे सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी थे जिनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे केजरीवाल के जादू और आम आदमी पार्टी की ऊर्जा को वास्तविक बदलाव के वाहन की तरह इस्तेमाल कर सकेंगे. इन तीनों तरह के लोगों के समन्वय ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी को ऐसी विराट ताकत बनाया जिससे पूरे देश में एक उम्मीद फैल गई. 2013 में इसी ताकत के सहारे अरविंद केजरीवाल ने शीला दीक्षित जैसी दिग्गज उम्मीदवार को धूल चटा दी थी. 2015 में पूरी दिल्ली जैसे आम आदमी पार्टी के कब्ज़े में आ गई. तब पार्टी को सिर्फ़ अपने कार्यकर्ताओं और विराट जन समर्थन के सहारे जीत मिली थी. मगर क्रांतियां सबसे पहले अपने बच्चों को खा जाती हैं. सत्ता सबको बदलती है, उसने आप को भी बदला. आम आदमी पार्टी के भीतर टकराव दिखे, उसके सबसे ज़्यादा साख वाले नेता अपमानित करके निकाले गए, केजरीवाल ने पार्टी के भीतर स्टिंग की संस्कृति को बढ़ावा दिया, पूरी दिल्ली को स्टिंग करने की सलाह दे डाली, सरकार ने विज्ञापन पर इतने पैसे ख़र्च किए कि उस पर जांच बैठ गई. वह एक के बाद एक चुनावी मोर्चे पर भी शिकस्त खाती दिखी. बीते दिनों राज्यसभा में तीन सदस्यों को भेजे जाने पर जो अरुचिकर विवाद हुआ और उसका जो दिलचस्प अंत हुआ, वह भी आम आदमी पार्टी के बदलते चरित्र का सुराग देने वाला साबित हुआ. यह ताबूत की आख़िरी कील नहीं है. आम आदमी पार्टी अब भी दिल्ली में एक बड़ी ताकत है. उसके पास स्पष्ट से ज़्यादा बहुमत है. कार्यकर्ताओं का एक बड़ा समूह है. कई ऐसे नेता हैं जो अब भी दूसरे दलों के नेताओं से ज़्यादा साफ़-सुथरे हैं. लाभ के पद के जिस मामले में विधायक अयोग्य घोषित हुए हैं, उसका एक तकनीकी पहलू भी है. बल्कि सरकार चलाते हुए यह दिखता रहा है कि आम आदमी पार्टी नियम-कायदों की औपचारिकता की अक्सर अवहेलना करती रही है जिस पर उपराज्यपाल से उसका विवाद भी होता रहा है. तो ये छह महीने आप के लिए अपनी छूटी हुई लड़ाई वापस लड़ने के महीने होंगे. पार्टी में विज्ञापनबाज संस्कृति को बढ़ाने की जगह उसे कार्यकर्ताओं और लोगों में विश्वास को बढ़ावा देना होगा- उसे फिर उसी वैकल्पिक राजनीति की राह पर चलना होगा जिसे वह भूल आई है. इस क्रम में वह चाहे तो अपने पुराने और छूटे हुए दोस्तों को जोड़ने का काम भी कर सकती है. अब इस नई जंग के लिए आप का समय शुरू होता है.

Thursday, January 18, 2018

भारत के साथ इजरायल के रिश्ते

इजराइल और भारत के बीच बढते सम्बन्ध से भारत सरकार का किसी भी तरह से कोई फायदा नहीं है. सैन्य संबंध से सिर्फ और सिर्फ इजराइल का ही फायदा होगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि हिंदुस्तान में शुरू से दो तरह की चीज़े बराबरी में चलती आई है एक सरकार थी वो प्रो-फिलिस्तीन रही है और बरबरी में आरएसएस का नेटवर्क जुड़ा था.  यह नेटवर्क अपनी विचारधारा को बढ़ाने का काम कर रहा था. अब मोदी सरकार आई है वो उसी फ़िक्र की सरकार आ गयी है. दरअसल इजराइल यह सब कुछ करके ‘ग्रेटर इजराइल’ बनाना चाहता है. अगर हम “ग्रेटर इजराइल” के झंडे को देखें तो उसमें एक सितारा बना हुआ है और दो नीली रेखाए बनी हुई है, यह रेखाएं पानी की लहरों को दर्शा रही है यानी दरया-ए-फरात से लेकर दरया-ए-नील तक “ग्रेटर इजराइल” बनाना चाहता है और इसका एलान खुलेआम किया गया है. ग्रेटर इजराइल में मदीने का एक बड़ा हिस्सा है इसी के साथ जॉर्डन,सीरिया, इराक का एक बड़ा हिस्सा शामिल है. भारत को इस वक़्त पाकिस्तान से भी हमले का बड़ा खतरा नज़र आ रहा है. क्योंकि पाकिस्तान को इजराइल का साथी कहा जाने वाला सऊदी अरब पाकिस्तान को फण्ड दे रहा है. इजराइल भारत को खुलेआम इस्तेमाल कर रहा है. अगर हम येरुशलम मुद्दे की बात करें तो फिलिस्तीन के समर्थन में पूरी दुनिया के मुस्लिम एक तरफ थे और अमेरिका इजराइल एक तरफ है. अगर भारत ने वाकई फिलिस्तीन का समर्थन करता है तो उसने इजरायल के राष्ट्रपति को भारत में बुलाकर इतनी मेहमानवाजी में क्यों लगा हुआ है. अब सवाल उठता है क़ि इजरायल से भारत के संबंध अच्छे रखने से क्या फ़र्क पड़ेगा? असल में इस कदम से पाकिस्तान को मज़बूत बनाया जा रहा है. और इसकी वजह यह है कि जो बैतूल मुकद्दस से सभी मुसलमानों की भावनाएं जुड़ी हुई है, इजराइल इसे  खत्म करने की तैयारी में लगा हुआ है. OIC की एक बैठक हुई जिसमें तमाम मुस्लिम देश एक तरफ खड़े हो गए कि अगर भारत इजराइल के साथ अच्छे संबंध बनता है तो यह तमाम देश पाकिस्तान की तरफ खड़े हो जाएँगे और उन देशों के साथ चीन के संबंध बहुत अच्छे है. चाइना और पाकिस्तान के संबंध भी बहुत अच्छे रहे है. अब ट्रम्प का रवैया भले बदला है लेकिन अधिकतर इंटेलीजेंस और सिस्टम अभी भी ओबामा की नीति वाला ही है वहाँ. अमेरिका और इजराइल के इन सभी देशों से रिश्ते अच्छे नहीं है और अब रूस से भी संबंध खराब होते जा रहे है तो अब यह सवाल उठता है अब इन्हें बचाने कौन आएगा? तो इस से  साफ़ ज़ाहिर होता है कि हिंदुस्तान अगर इजराइल के साथ अच्छे संबंध बनाया है तो इससे यह साबित होगा कि भारत अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है और यह देश के बहुत खराब स्थति हो सकती है. कुछ लोग कह रहे हैं क़ि एक वक़्त आएगा जब पाकिस्तान भी फिलिस्तीन के साथ खड़ा होगा क्योंकि पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध खराब होते हुए नज़र आ रहे है. खैर मुझे ये बात नही समझ आई. यहाँ तक क़ि अमेरिका ने पाकिस्तान पर सहायता राशि देने से भी रोक लगा दी है. इस वक़्त पाकिस्तान को सहायता राशि की ज़रूरत जो वह अमेरिका से ना लेकर रूस से ले सकता है क्योंकि रूस और पाकिस्तान के संबंध पहले से ही ठीकठाक रहे हैं. न्यूक्लियर  पॉवर भी सिर्फ एक ही इस्लामिक देश के पास है और वो है पाकिस्तान. अगर भविष्य में अगर इजराइल के खिलाफ लड़ाई हुई तो पाकिस्तान की अहमियत और भी ज्यादा हो जाएगी. इस स्थिति में पाकिस्तान का साथ देने सभी मुस्लिम देश आ जाएँगे. तो सब बातों से पता चलता है कि भारत यह सब करके अपने दुश्मन देश पाकिस्तान को मज़बूत बना रहा है.
अगर इतिहास में देखें तो सऊदी अरब, और भी ज़्यादातर अरब देशों, भी इजरायल के बहुत अच्छे संबंध रहे है. लेबनान और जॉर्डन के इजराइल के साथ अच्छे संबंध रखे थे और उनका हाल सब जानते है. OIC की मीटिंग में सभी मुस्लिम देश एकजुट हो गए थे. सऊदी अरब का सब इतना साथ तो दे रहे है. लेकिन सऊदी अरब की इस वक़्त हालत की है यह सब जानते है. जबकि इजराइल को कोई भी देश पसंद नहीं कर रहा है. इजराइल और अमेरिका का साथ देना वाला कोई  भी देश नहीं बचा है. ट्रम्प के येरुशलम फैसले से एक बहुत अच्छी चीज़ सामने आई है और वो है “एकजुटता.” ट्रम्प के फैसले ने दुनिया भर के मुसलमानों को एकजुट कर दिया है और आने वाले वक़्त में हालत ऐसे पैदा होंगे कि पूरी दुनिया एक तरह होगी और अमेरिका और इजराइल एक तरफ.
अगर हिंदुस्तान भविष्य में इजराइल के साथ खड़ा हो जाता है तो एशिया में इसकी स्थिति पर क्या फर्क पड़ेगा?इस वक़्त हिंदुस्तान को ISIS का खतरा बढ़ता हुआ नज़र आ रहा है. ISIS को हिंदुस्तान में एयरलिफ्ट अमेरिका और इजराइल के द्वारा ही किया जा रहा है. अमेरिका और इजराइल अपने हथियार किसी ना किसी तरह से आतंकवाद समूह को बेच रहे है. जिससे भी सिर्फ अमेरिका और इजराइल का फायदा होता हुआ नज़र आ रहा है. हिंदुस्तान को इजराइल के साथ खड़े होने पर भी आतंकी हमलों का डर सताएगा और कुछ नहीं. हिंदुस्तान में आये दिन हिन्दू-मुस्लिम के बीच पैदा हो रही नफरत का उदहारण देखने को मिलता रहता है यह सब इसी का नतीजा है. भारत में इस तरह का खून खराबा आगे भी बहुत ज्यादा देखने को मिल सकता है अगर हिंदुस्तान यूं ही आँख बंद करे हुए इजराइल और अमेरिका का साथ देता रहा. भारत पर यह बहुत बड़ा खतरा है. यह अशांति का माहौल सिर्फ उन्ही इलाकों में है जहाँ “ग्रेटर इजराइल” बनाया जाएगा जैसे कि जॉर्डन, सीरिया, इराक, आदि. अफगानिस्तान में ISIS की दखलंदाजी बढती ही जारी है इसके पीछे भी अमेरिका और इजराइल का हाथ है. इजराइल को अपना “डिवाइड एंड रूल” फार्मूला पूरा करना जिसके लिए वो किसी भी हद्द तक जा सकता है. हिंदुस्तान में हिन्दू-मुस्लिम का विवाद इसका सबसे बड़ा उदहारण है. अमेरिका काम सिर्फ हिंदुस्तान के हिन्दू-मुस्लिम को बाटने करने का है, इसलिए हर कोई अमेरिका और इजराइल से खुद को बचाने की कर रहे है.

इजरायल और फ़लस्तीन का इतिहास

ऑटमन साम्राज्य ने 14वीं शताब्दी तक पूरे मिडिल ईस्ट पर अपना कब्जा कर लिया था और 19वीं सदी तक यह कमजोर होने लगा था। 19वीं सदी में पूरे यूरोप में राष्ट्रवाद की बहार आ गई, जिसमें इटली, जर्मनी अहम हैं, ये तमाम देश छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे थे, लेकिन एकीकरण के इस दौर में यह देश 1950 के आस-पास एक होना शुरु हो गए। इसी एकीकरण के दौर में थियोडोर हर्जल ने यहूदी राष्ट्र की बात शुरु की, इसे जाइनिस्ट आंदोलन का नाम दिया गया। जाइनिस्ट आंदोलन उसे कहते हैं जिसमें यहूदी एक बार फिर से अपनी पवित्र धरती पर जाना चाहते हैं, जहां से यहूदी धर्म की शुरुआत हुई थी, यह तकरीबन तीन हजार साल पहले फिलिस्तीन में इसकी शुरुआत हुई थी। यहूदियों के इजरायल जाने की एक और बड़ी वजह यह थी कि पूरे यूरोप में यहूदियों का संहार किया जा रहा था, जिसमें सिर्फ जर्मनी या हिटलर नहीं आता है, बल्कि पूरे यूरोप में फ्रांस, रूस, इटली, पोलैंड के देशों में यहूदियों पर काफी अत्याचार किया गया, इनके धर्म को कई जगहों पर बैन कर दिया गया। इन अत्याचारों के चलते यहूदियों ने अपनी धरती पर वापस जाने की शुरुआत की।  1917 में जब प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था, तभी ऑटमन साम्राज्य हारने की कगार पर था, तभी ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर आर्थर बैलफॉर ने कहा कि हम यहूदियों को युद्ध खत्म होने के बाद फिलिस्तीन में स्थापित करने की पूरी कोशिश करेंगे। लेकिन इसी दौरान ब्रिटेन ने गुपचुप तरीके से एक साइक्स पीको करार किया, इसे फ्रांस और रूस के साथ किया गया था, जिसमें यह कहा गया था कि प्रथम विश्व युद्ध खत्म होने के बाद कौन सा देश किस देश पर अपना कब्जा करेगा। इस करार के तहत ब्रिटेन में फिलिस्तीन को अपने हिस्से में रखा था, जबकि सीरिया, जार्डन को फ्रांस को दे दिया गया था, जबकि टर्की के कुछ इलाकों को रूस को दे दिया गया था। इसके साथ ही अरब देशों को ब्रिटेन ने भरोसा दिया कि युद्ध के बाद वह फिलिस्तीन को आपको दे देंगे, अगर आप ऑटमन साम्राज्य के खिलाफ हमारा साथ दें। पहले विश्व युद्ध के बाद फिलिस्तीन में एक नई सरकार का गठन हुआ, इस दौरान बड़ी संख्या में फिलिस्तीन में यहूदी शरण लेने लगे, यहां इस समय यहूदियों की कुल आबादी सिर्फ 3 फीसदी थी, लेकिन अगले तीस साल में यह बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई। यहूदियों ने यहां आकर अरब लोगों से जमीन खरीदनी शुरू कर दी और यहां यहूदी बस्तियों की स्थापना करनी भी शुरू कर दिया। इसी दौरान 1936 में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अरब ने बगावत शुरू कर दी, इस बगावत को खत्म करने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने यहूदी लड़ाकों का साथ दिया। इस बगावत के बाद ब्रिटेन की सरकार ने यहूदियों के फिलिस्तीन आने पर कुछ पाबंदी लगा दी, जैसे अब हर साल 10 हजार से अधिक यहूदी यहां नहीं आ सकते हैं, ताकि अरब लोगों की बगावत को थोड़ा रोका जा सके। जिसके बाद यहूदी लड़ाके ब्रिटेन की सरकार के खिलाफ शुरू कर दिया और गुरिल्ला लड़ाई करने लगे। फिलिस्तीन में इस समय चल रहे विवाद के बीच ही 1939 में दूसरा विश्व युद्ध शुरू हुआ, इस वक्त यूरोप में बड़ी त्रासदी हुई थी जिसे होलोकास्ट कहते हैं इसका मतलब होता है यहूदियों का जनसंहार, जर्मनी में लाखों की संख्या में यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया था। कहते हैं कि इस दौरान 40 लाख यहूदियों को गैस चैंबर में डालकर मार दिया गया। इस अत्याचार के दौर में यहूदी फिलिस्तीन की ओर भागने लगे, क्योंकि उन्हें लगने लगा था अगर जीवित रहना है तो हमें अपने ही देश जाना होगा। 1947 में यूएन में एक नया रिजोल्यूशन हुआ कि क्या यहूदियों को अपना एक देश मिलना चाहिए, जिसपर इजराइल को समर्थन मिला। इस रिजोल्यूशन के बाद इजरायल को दो भाग में बांट दिया गया, एक हिस्सा था यहूदी राज्य और एक था अरब राज्य। लेकिन बड़ी समस्या थी जेरूसलम क्योंकि यहां आधी आबादी यहूदियों की थी और आधी आबादी मुसलमानों की थी। इसलिए यूएन ने फैसला दिया कि जेरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय सरकार के द्वारा चलाया जाएगा। लेकिन इस घोषणा के तुरंत बाद इजराइल के आस-पास के देशों ने इजराइल पर हमला कर दिया। मिश्र, सीरिया, इऱाक, जॉर्डन ने इजरायल पर हमला कर दिया, इसे 1948-49 का अरब इजराइल युद्ध कहते हैं। इसमें खास बात ये है क़ि अपने सुना होगा क़ि इजरायल बहुत ताकतवर देश है. दरअसल वो शुरुआत से ही बिना किसी को खबर किए अपनी सेना तैयार करने लगा था. इस युद्ध में इजरायल ने अपनी ताकत का परिचय देते हुए इन देशों को पीछे ढकेलकर अपनी जमीन में इजाफा किया, यानि कि जो जमीन इजराइल को यूएन की द्वारा दी गई थी अब वह इस युद्ध के बाद और बढ़ गई थी। इस लड़ाई के दौरान बड़ी संख्या में शरणार्थियों की समस्या खड़ी हो गई, इजरायल से तकरीबन सात लाख लोग विस्थापित हो गए, इस लड़ाई के बाद गाजा पट्टी का नियंत्रण इजरायल के पास चला गया और पश्चिमी घाट पर जार्डन ने कब्जा कर लिया था। मिश्र, सीरिया और जॉर्डन से इजरायल के रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे थे, इनके बीच में आपसी तनाव काफी ज्यादा था, 1967 में मिश्र ने अपनी सेना इजरायल की सीमा पर तैनात कर दी, लेकिन इजरायल ने मिश्र के हमले से पहले ही हमला कर दिया और इस लड़ाई में इजरायल ने मिश्र, जॉर्डन और सीरिया को बुरी तरह से हराया और कई इलाकों को इन देशों से इजरायल ने अपने कब्जे में कर लिया, जिसमें गाजा और वेस्ट बैंक आज भी इजरायल के कब्जे में है। 1978 में इजरायल को मिश्र ने पहली बार एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी थी जिसपर काफी विवाद हुआ था। उस वक्त मिश्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सदाक की कुछ साल बाद हत्या तक कर दी गई थी। इन तमाम संघर्ष के बाद फिलिस्तीन और इजरायल के बीच विवाद शुरू हुआ, इजरायल के खिलाफ PLO यानि पैलेस्टाइन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ने इजरायल के खिलाफ अपनी लड़ाई शुरू की, जिसके काफी चर्चित नेता थे यासिर अराफात। फिलिस्तीन के लोगों ने इजरायल सरकार के खिलाफ अपना विरोध शुरू कर दिया, क्योंकि इन लोगों को इनके अधिकार नहीं मिले और वेस्ट बैंक पर इजरायल की सेना तैनात थी। यह विवाद हिंसा में तब्दील हो गई और तकरीबन 100 यहूदी और 1000 अरब की मौत हो गई। इसी दौरान हमास का जन्म हुआ, जो कि PLO से भी ज्यादा खतरनाक थी। PLO इजरायल से समझौते के पक्ष में था, जबकि हमास का मानना था कि इजरायल देश का अस्तित्व ही नहीं है, हम इसे राष्ट्र नहीं मानते हैं। 1993 में ओस्लो करार के तहत इजरायल और फिलिस्तीन या यूं कहें इजरायल के पीएम येट्सचाक राबिन और पीएलओ के नेता यासिर अराफात के बीच समझौता हुआ, इन दोनों ही नेताओं को नोबेल पीस अवॉर्ड मिला था। इस समझौते के तहत पीएलओ ने इजरायल को एक राष्ट्र के तौर पर मान्यता दी और इजरायल की सरकार ने पीएलओ को मान्यता दी। इससे पहले पीएलओ को आतंकी संगठन माना जाता था। समझौते के तहत पांच साल के लिए हिंसा को रोकने पर करार हुआ। वर्ष 2000 में एक बार फिर से इजरायल और फिलिस्तीन के बीच संबंध खराब हो गए, इसकी बड़ी वजह थी उस वक्त इजरायल के राष्ट्रपति एहूद बराक 1000 सुरक्षा गार्ड को लेकर टेंपल माउंट पर चले गए, इसे यहूदियों और मुस्लिम दोनों का पवित्र स्थान कहा जाता है। इसके चलते फिलिस्तीन के लोग भड़क गए और हिंसा शुरू हो गई, इस दौरान तकरीबन 1000 यहूदी और 3200 फिलिस्तिनियों को मार दिया गया, कई बसों को उड़ा दिया गया और कई जगह पर धमाके किए गए। इस हिंसा के बाद इजरायल की सरकार इस विवाद का समाधान निकालने की बजाए इसे रोकने पर ध्यान लगाने लगी। इसके तहत इजरायल की सरकार ने गाजा पट्टी से यहूदियों को हटा दिया, इसके अलावा सेना को भी यहां से हटा लिया गया। इसके कुछ समय बाद यहां चुनाव होता है और हमास ने यहां का चुनाव जीत लिया। लेकिन PLO की पार्टी फताह ने हमास को सरकार में लेने से इनकार कर दिया। जिसके बाद 2007 में हमास ने गाजापट्टी पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और फतह को यहां से खदेड़ दिया और इसके बाद काफी ताकतवर बन गया। इस विवाद के बाद हमास ने इजरायल पर हमला करना शुरू कर दिया, हमास ने रिहायशी इलाकों में हमला करना शुरू कर दिया, ऐसे में इजरायल ने गाजा पट्टी की घेराबंदी कर दी, इसके तहत अब गाजा में किसी भी तरह का सामान नहीं जा सकता, कई जगह पर चेकपोस्ट बना दिया गया, कोई भी बाहर का जहाज गाजा में नहीं आ सकता है। इजरायल का कहना है कि इरान जैसे कई देश यहां रॉकेट को भेजता है। लेकिन इस नाकेबंदी के चलते अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से मिलने वाली मदद यहां नहीं पहुंच पाती, जिसकी वजह से पिछले 10 सालों में गाजा की स्थिति काफी खराब हो गई है। यहां 40 फीसदी तक बेरोजगारी है, लोगों के घर में बिजली-पानी नहीं है। गाजा में हमास और इजरायल के बीच कई बार युद्ध हुए, जिसमें हजारों लोगों की मौत हो चुकी है, इस लड़ाई में दोनों ही गुट स्थानीय नागरिकों को भी निशाना बनाते हैं। यरूशलम बहुत बड़ा शहर है, यह इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म के लिए काफी अहम है। यह यहूदियों का दुनिया में सबसे पवित्र स्थान है, इस्लाम में मक्का और मदीना के बाद यह तीसरा सबसे पवित्र स्थान है। ईसाई धर्म के लिए भी यह काफी अहम स्थान है क्योंकि यहां जीसस क्राइस को सूली पर चढ़ाया गया था। तीनों धर्म को अब्राहम धर्म कहा जाता है। पूर्वी यरूशलम में ज्यादातर मुस्लिम आबादी है, जबकि पश्चिमी हिस्से में यहूदी आबादी है, जबकि इनके बीचो-बीच यह पवित्र स्थान मौजूद है। यहां अल अक्सा मस्जिद में इजरायल 18-50 वर्ष के लोगों को जाने से रोकता है क्योंकि ये लोग अक्सर यहां प्रदर्शन करते हैं। यरूशलम को पूरी दुनिया में आज भी इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता नहीं मिली है। इजरायल यरूशलम को अपनी राजधानी मानता है, जबकि दुनिया के अन्य देश अभी भी तेलावीव है, लिहाजा सारे दूतावास यहीं स्थित हैं।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...