Friday, February 24, 2017

बीएमसी चुनावों के क्या संकेत?

कल बीएमसी के चुनावों के नतीजे आए, जिसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक बिखरे हुए नज़र आए. 227 में से 84 सीटें जीतकर शिवसेना हालांकि इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी लेकिन बहुमत से दूर ही रह गई. बीजेपी को छोड़कर अन्य किसी दल के पास इतनी सीटें नहीं कि उसे सपोर्ट कर सके. कांग्रेस के साथ जाना उसके लिए आसान नहीं होगा. दो दशकों में पहली बार शिवसेना बीजेपी से अलग होकर बीएमसी चुनाव में उतरी थी. आखिर क्या थी टकराव की वजह? क्या शिवसेना बड़े भाई वाले रोल से निकलने को तैयार नहीं है जैसे कि 1990 में शुरुआत हुई थी. साल 2014 में हुए आम चुनाव में भाजपा ने पहली बार शिव सेना से अधिक सीटें जीतीं. विधानसभा चुनाव में सीटों को लेकर बात बिगड़ गई और दोनों ने अलग लड़ा. बीजेपी ने खुद को साबित किया और अधिक सीटें जीतकर सत्ता में आई. शिवसेना फिर साथ आई. बीएमसी में पिछली बार 31 सीटें जीतने वाली बीजेपी को शिवसेना 60 से अधिक सीट देने को तैयार नहीं थी. दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे और नतीजा सबके सामने है. बीजेपी ने 82 सीटें जीत ली. 
इस बीएमसी चुनाव में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया है. 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद से ये सिलसिला जारी है. बीएमसी में पिछली बार के 52 सीटों के मुकाबले इस बार 31 पर आ गई है. इस नतीजे को लेकर कांग्रेस में घमासान छिड़ गया. नारायण राणे ने मुंबई कांग्रेस चीफ संजय निरुपम के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो हार की जिम्मेदारी लेते हुए निरुपम ने इस्तीफा तो दिया लेकिन हार के लिए सीनियर नेताओं के भितरघात को जिम्मेदार बता दिया.  
मुंबई में बाहर से रोजी-रोटी के लिए आए लोगों के खिलाफ रणनीति और सड़क पर मारपीट के जरिए सुर्खियों में रहने वाले एमएनएस चीफ राज ठाकरे के लिए भी ये चुनाव एक सबक है. पिछली बीएमसी चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली मनसे इस बार के चुनाव में 7 सीटों पर सिमट गई. इतना ही नहीं 2009 के विधनासभा चुनाव में 288 में से 13 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली मनसे 2014 के चुनाव में एक सीट पर सिमट गई और 203 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी. साफ है कि निगेटिव पॉलिटिक्स लोगों के बीच अपनी जगह नहीं बना सकती. महाराष्ट्र की राजनीति लंबे समय से कांग्रेस-एनसीपी के गठजोड़ बनाम शिवसेना-बीजेपी के बीच मुकाबले की गवाह रही है. लेकिन अब स्थिति एकदम बदल गई है. शिवसेना बीजेपी अब अलग हैं, कांग्रेस एनसीपी सफाए की ओर हैं और एकता बरकरार रख पाना मुश्किल दिख रहा है. ओवैसी की पार्टी और सपा कई इलाकों में वोट बैंक में सेंध लगाती दिख रही है. शिवसेना ने गुजरात में बीजेपी के विरोधी हार्दिक पटेल को अपना चेहरा बना दिया. अगर बीएमसी में शिवसेना बीजेपी के साथ नहीं जाएगी तो क्या कांग्रेस के साथ जाएगी. ये सभी समीकरण महाराष्ट्र ही नहीं पूरे देश की राजनीति में चर्चा का केंद्र रहेंगी और काफी कुछ तय करेंगी.
अगर वोट शेयर के हिसाब से देखा जाए तो यहाँ शिवसेना को 37% (84 सीट) और बीजेपी को 36.10% (82 सीट) वोट मिले. वहीं कांग्रेस को 13.7% (31 सीट), एनसीपी को 4% (9 सीटें), मनसे को 3.10% (सात सीटें), सपा को 2.6% (6 सीट), एम आई एम को .9%  मतलब 3 सीटें, और अन्य को 2.6% वोट और 6 सीटें मिलीं.  मतलब यहाँ की सभी पार्टियाँ मिलकर भी शिवसेना या बीजेपी किसी एक के बराबर भी वोट नहीं हो पा रहा है. मतलब यहाँ से एन सीपी और कांग्रेस का ख़ात्मा हो चुका है. समाजवादी पार्टी लगभग अभी भी मुस्लिम मतदाताओं में बनी हुई है, वहीं ओवैसी की एमआईएम भी 3 सीटें लेकर आई है, मतलब मुस्लिम मतदाता उलझे हुए हैं क़ि वोट किसे दें, लेकिन उनके पास ओप्शन नहीं हैं. वो कांग्रेस और एन सीपी से ऊब चुके हैं. ऐसे में हम उम्मीद कर सकते हैं क़ि अगले कुछ सालों तक शिवसेना और बीजेपी ही मुख्य धारा के राजनीतिक दल यहाँ रहेंगे. भगवा राजनीति ही यहाँ पक्ष विपक्ष में रहकर लड़ने वाली है. अगर शिवसेना कुछ हिम्मत दिखाती है तो हो सकता है मुख्य विपक्षी दल बन जाए नहीं तो बीजेपी उसकी सब जगह खा जाएगी. रही बात राज ठाकरे की तो वो शिवसेना में उसकी शर्तों पर विलय कर लें तो ही बेहतर होगा, नहीं तो कहीं के नहीं रहेंगे. दूसरी तरफ कांग्रेस एनसीपी की वापसी मुश्किल है. मैं आम आदमी पार्टी के संगठन से जुड़ा रहा हूँ तो कह सकता हूँ क़ि वो 2019 के चुनाव में बहुत मजबूत चुनाव लड़ेंगे. क्योंकि उनका संगठन भी है, मुस्लिम और उत्तर भारतीय वोटों को एक ओप्शन मिलेगा और रही बात मराठी वोटों की तो उनमें भी जो इन दोनों से तंग आ गए हैं उनको एक अच्छी पार्टी मिलेगी. 

Tuesday, February 21, 2017

यूपी का भविष्य मुसलमानों के मूड पर निर्भर

उत्तरप्रदेश चुनाव में मुस्लिम वोटरों की खास चर्चा हो रही है. इसमें सिर्फ पार्टी की गलती नहीं है बल्कि जाति और धर्म से जकड़े हुए वोटरों का भी यही नजरिया है जो पार्टी की है. बीजेपी के उम्मीदवार की थाली से 20 फीसदी हैसियत वाली मुस्लिम आबादी पूरी तरह गायब है वहीं इसी मुस्लिम वोट के लिए बीएसपी और सपा में मारामारी चल रही है. साफ है कि जिस पार्टी की जेब में जितने मुस्लिम वोट गिरेंगे, उस पार्टी की जीत उतनी ही आसान हो जाएगी. यूपी के चुनाव में मायावती ने इस बार दलित-मुस्लिम गठजोड़ को जीत का फॉर्मूला बनाया है. यही वजह है कि मायावती खुलेआम मुसलमानों से सिर्फ उन्हीं की पार्टी को वोट डालने की अपील कर रही है लेकिन बीजेपी इसे मुद्दा बना रही है. बीजेपी ने चुनाव आयोग से मायावती के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. बीएसपी और सपा की जीत मुस्लिम वोटरों के भरोसे है वहीं बीजेपी बिना मुस्लिम वोट यानि ध्रुवीकरण करके हिंदू वोटरों के सहारे चुनाव जीतने की जुगाड़ में हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में यही हुआ था बीजेपी बिना गठबंधन मुस्लिम वोट के सहारे 73 सीटें जीत गई थीं और पहली बार ऐसा हुआ कि एक भी मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पाया. इसबार ऐसी भूल न हो इसके लिए सपा और बीएसपी खुल्लम खुल्ल्म मुस्लिम वोटरों को लुभाने में लगी है. यूपी के 125 सीटों पर प्रभाव रखनेवाली मुस्लिम आबादी पर मायावती की खास नजर है पिछले चुनाव के मुकाबले बीएसपी ने इस बार 13 ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार को चुनावी दंगल में उतारे हैं. 2012 में बीएसपी ने 88 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिये थे, इसबार ये संख्या बढ़कर 100 हो गई है. सपा-कांग्रेस गठबंधन ने इस बार 72 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं जबकि पिछली बार सपा ने भी 83 उम्मीदवार उतारे थे जबकि कांग्रेस ने सिर्फ 23 ही उम्मीदवार थे. पिछली बार से तुलना नहीं की जा सकती है चूंकि इस बार सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन है. वैसे मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना गुनाह नहीं है क्योंकि उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी मुस्लिम की आबादी है. सवाल है कि कैसे मुस्लिम वोटरों को बीजेपी का डर दिखाकर और लुभाकर वोट लिया जाता है लेकिन मुस्लिम वोटरों की भी मजबूरी मायावती और अखिलेश हैं. दरअसल मुस्लिम वोटरों का मकसद होता है बीजेपी को हराना क्योंकि बीजेपी और मुस्लिम वोटरों के बीच कई मुद्दों को लेकर खाई है और इस खाई को कम करने की कोशिश दोनों तरफ से नहीं हो रही है. मुस्लिम वोटरों की मजबूरी समझा जाए या लाचारी राजनीतिक पार्टियां बीजेपी का हौव्वा दिखाकर वोटरों को लुभावने की कोशिश करती रहती है. ये मालूम होते भी कि आजादी के 70 साल बाद भी मुस्लिम समाज की न तो आर्थिक स्थिति बेहतर हुई और न ही शैक्षणिक स्थिति. सरकारी नौकरियों में स्थिति बदतर ही है. ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम समाज के लिए पहले सम्मान फिर आर्थिक और शैक्षणिक मापदंड है. पहले ऐसा कहा जा रहा था कि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम वोटर अखिलेश के समर्थन में उतर गये हैं लेकिन बीएसपी ने सपा-कांग्रेस के 72 उम्मीदवार के खिलाफ 100 उम्मीदवार उतारकर सारा खेल खराब कर दिया है. अब ये कहा जा रहा है कि सपा को मुस्लिम का एकमुश्त वोट नहीं मिल रहा है इसी वजह से ये सस्पेंस बन गया है कि अब यूपी में किसकी सरकार बनेगी. ये भी देखा गया है कि अगर मुस्लिम वोट बंटते हैं तो कहा जाता है कि वोटरों का धुर्व्रीकरण नहीं हुआ है लेकिन इतिहास गवाह है कि 1993 से ही सपा और बीएसपी के वोट बंटते आ रहे हैं. जिस पार्टी की जीत की उम्मीद जितनी होती है मुस्लिम वोट उसी तरफ मुड़ने की कोशिश करते हैं. अमूमन मुस्लिम वोट 60 और 40 फीसदी के अनुपात में बंट जाता है. जीतने वाली पार्टी को 60 से 65 फीसदी और 35 से 40 फीसदी वोट दूसरी पार्टियों में बंट जाता है. जब 2007 में मायावती जीतीं थीं जो बीएसपी के 30 मुस्लिम उम्मीदवार और सपा के 21 उम्मीदवारों की जीत हुई थी जब 2012 में अखिलेश का पलड़ा भारी हुआ तो 43 मुस्लिम उम्मीदवार सपा से और 15 मुस्लिम उम्मीदवार बीएसपी से जीते थे.
इस बार इस चुनावी दंगल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी करीब 50 सीटों भाग्य आजमा रही है. इसके अलावा छोटी-मोटी पार्टियां भी चुनाव मैदान में हैं. पहले चरण में बीएसपी के 21 मुस्लिम उम्मीदवार हैं तो वहीं सपा-कांग्रेस के सिर्फ 15 उम्मीदवार हैं. दूसरे चरण में बीएसपी के 30  मुस्लिम उम्मीदवार हैं तो सपा-कांग्रेस के 31 उम्मीदवार हैं जिनमें कुछ सीटों पर दोनों पार्टियों के बीच दोस्ताना लड़ाई है. मुस्लिम वोटरों की बिसात पर जीत किसकी होगी, ये तो वक्त ही तय करेगा लेकिन इतने ज्यादा मुस्लिम प्रत्याशियों ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है और सस्पेंस भी पैदा कर दिया है कि किस पार्टी को मुस्लिम वोटरों का सहारा मिलेगा.

यूपी में ज़मीनी सियासी हक़ीकत

मैं हाल ही में उत्तर प्रदेश से आया हूँ, वहाँ की ज़मीनी हक़ीकत जानने के  लिए मैं पहले कानपुर, इलाहाबाद, फ़ारूखाबाद, कन्नौज, कानपुर देहात, उन्नाव और लखनऊ जिलों में गया. जहाँ मैनें रिक्शे वाले, चयवालों या पान की दुकानों पर बात की. वहाँ जो असलियत पता चली वो कुछ हैरान करने वाली थी. उत्तरप्रदेश की राजनीति की चक्करघिन्नी में जमकर माथापच्ची चल रही है कि मुस्लिम वोट बंट रहा है. मुस्लिम वोट का बंटना मतलब यूपी में धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण नहीं हो रहा है. मुस्लिम वोट के बंटने का मतलब सभी पार्टियों का गणित फेल हो रहा है ऐसी स्थिति में सपा और बसपा का गणित खराब हो गया है वहीं जाट वोट बंटने से भी बीजेपी की केमिस्ट्री बिगड़ गई है. ये भी बात दिख रही है कि किसी पार्टी के पक्ष में हवा नहीं है ऐसी स्थिति में नतीजे चौंकानेवाले हो सकते हैं वो किसी भी पक्ष में जा सकते हैं. खासकर त्रिकोणीय मुकाबला होने की वजह से चुनाव बेहद रोचक हो गया है. पहले अखिलेश यादव का पलड़ा भारी दिख रहा था वजह थी कि सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन, अखिलेश का चेहरा और उनका कामकाज भी बेहतर है. सरकार की छवि नकरात्मक नहीं है वहीं उनपर भ्रष्ट्राचार के भी आरोप नहीं लगे हैं. कानून-व्यवस्था के सवाल पर वो विपक्षी पार्टियों के निशाने पर रहते हैं लेकिन उनकी छवि और कामकाज की वजह से फ्लोटिंग वोट उनके पक्ष में जा सकते हैं. जीतने के लिए सिर्फ कामकाज, गठबंधन और चेहरा ही महत्वपूर्ण नहीं होता है क्योंकि जीत का रास्ता धर्म और जाति की राजनीति यूपी में पतली गली से निकलती है. यूपी की राजनीति समझने से पहले ये समझने की जरूरत है कि मोदी के विकास और कामकाज से मुस्लिम-यादव और दलित जाति के वोटरों को कोई खास मतलब नहीं है, अखिलेश के विकास और कामकाज दलित और अगड़ी जातियों के वोटरों को दिल नहीं जीत सकता है वहीं मायावती का चुस्त-दुरुस्त कानून-व्यवस्था यादव जाति और अगड़ी जाति का पैमाना नहीं है यानि सारा पैमाना जाति-धर्म के धर्म में फंसकर रह जाता है. जहां अखिलेश का जनाधार यादव जाति के भरोसे टिका हुआ है. सपा टिकट बंटवारे में यादव, मुस्लिम और ठाकुर जाति पर खास ध्यान देती है जबकि रिजर्व सीटों पर दलितों को टिकट देना सभी पार्टियों की मजबूरी है.  अगर मुस्लिम वोट अखिलेश के समर्थन में उतर जाए तो वो दोबारा मुख्यमंत्री बन सकते हैं लेकिन मायावती ने अखिलेश का खेल खराब कर दिया है. मायावती ने इस बार 100 मुस्लिम उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारकर मुस्लिम वोट में सेंध लगा चुकी हैं. टिकट बंटवारे में सपा-कांग्रेस बीएसपी से काफी पीछे हैं. सपा-कांग्रेस ने बीएसपी के 100 मुस्लिम उम्मीदवार के मुकाबले सिर्फ 72 उम्मीदवार उतारे हैं.
अब सबसे बड़ा सवाल है कि वो कितना मुस्लिम वोट में सेंध लगाती हैं. मायावती के समर्थन में मुस्लिम संगठन और मुस्लिम नेता भी उतर चुके हैं और अखिलेश मुलायम की तरह मुस्लिम कार्ड नहीं खेल पा रहे हैं. चूंकि वो अपनी छवि मुलायम की तरह नहीं बनाना चाहते हैं. मायावती का जनाधार अखिलेश के जनाधार से मजूबत है. अखिलेश के पक्ष में एकमुश्त यादव जाति हैं जिसकी संख्या यूपी में 10 से 11 फीसदी मानी जाती है वहीं मायावती के पक्ष में 21 फीसदी दलित जाति है. मायावती के बारे में कहा जाता है कि कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखने में आगे हैं वहीं टिकट बंटवारे में मायावती ने फूंक-फूंक कदम रखा है. मायावती ने टिकट बंटवारे में मुस्लिम, दलित और ब्राह्मण को खास तवोज्जह दी है. खासकर 2007 से ही टिकट बंटवारे पर खास ध्यान देती आ रही है यही वजह रही कि इसी फॉर्मूले के तहत 2007 में चुनाव जीत गई थी. मायावती ब्राह्मण जाति को महत्व देती हैं तो सपा ठाकुर वोटरों को लुभावने का काम करती है. मायावती ने इस बार भी टिकट बंटवारे में बड़ी चालकी की है. जिस सीट पर जिस जाति का दबदबा है उस जाति को टिकट देने का काम किया है. पिछले चुनाव में जो उम्मीदवार हार गये थे उसे टिकट देने में इसबार कोताही बरती गई है. यही नहीं दूसरी पार्टी की तरह अंदरुनी झगड़ा और विरोध भी नहीं है. इस बार वो मीडिया और सोशल मीडिया पर खास ध्यान दे रही हैं और खुद छोटे से बड़े मुद्दे पर अब बयान देने से नहीं हिचकती हैं. एक बात और ये है कि मायावती के वोटर साइलेंट है. उनकी चाल चुनाव के पहले पता नहीं चलता है बल्कि चुनाव के बाद ही पता चलता है. अब बात बीजेपी की. बीजेपी की सबसे कमजोरी ये है कि अखिलेश-मायावती के चेहरे के सामने राज्य में बीजेपी के पास कोई चेहरा नहीं है. यही वजह है कि नरेन्द्र मोदी को ही बड़ा चेहरा बना दिया गया है. वहीं बीजेपी के जनाधार की रीढ़ है अगड़ी जाति का समर्थन वहीं यादव छोड़कर पिछड़ी जातियों में बीजेपी की अच्छी पकड़ है. राज्य की आधी आबादी दलित-यादव और मुस्लिम खुले तौर पर सपा-बीएसपी के समर्थन में रहती है वहीं आधी आबादी पर बीजेपी की नजर रहती है. बीजेपी टिकट बंटवारे में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया वहीं यादव जाति के मुकाबले दूसरी पिछड़ी जाति को ज्यादा टिकट देती है. यही वजह रही कि 2014 के लोकसभा में बीजेपी गठबंधन को करीब 43 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी ने बड़ी चालाकी की है कि पिछड़ी जाति के सबसे बड़े नेता को अपनी तरफ जोड़ लिया है. वैसे तो यादव छोड़कर दूसरी पिछड़ी जातियों के नेताओं की फौज बीजेपी के पास है वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य को पार्टी में जोड़ लिया गया है. पटेल जाति की नेता अनुप्रिया पटेल पहले से ही बीजेपी के साथ हैं वहीं लोध जाति का झुकाव भी बीजेपी की तरह रहा है. टिकट बंटवारे को लेकर अपने ही कार्यकर्ता पार्टी से नाराज है क्योंकि दूसरी पार्टी से लाए गये नेताओं को तरजीह दी गई है. 2002 से लगातार पार्टी विधानसभा का चुनाव हारती आ रही थी और कई जगहों पर संगठन कमजोर हो गया था. पार्टी को मजबूत करने के लिए दूसरे पार्टियों के नेताओं पर भी ध्यान दिया गया.
सबसे बड़ी बात ये है नोटबंदी के बाद यूपी में पहला चुनाव हो रहा है और कहा जा रहा है कि नोटबंदी से जहां गरीब खुश है वहीं व्यापारी, बड़े किसान और अमीर वोटर नाराज हैं. ये भी देखा गया कि नोटबंदी के बाद जहां पर बीजेपी की वजूद है वहां पर नोटबंदी के बाद हुए चुनाव में पार्टी को फायदा हुआ है यही गणित सारे गणित को डगमगा रहा है. सबसे बड़ी बात ये है कि इस बार उत्तरप्रदेश में एक चमत्कार ये होने की उम्मीद है जो भी पार्टी 31 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करती है उसे बहुमत मिलने की उम्मीद है जैसा कि 2014 लोकसभा चुनाव में हुआ था. अब वोटों के बंदरबांट में किसको कितना हिस्सा मिलता है और कौन बाजी मारता है इसके लिए 11 मार्च का इंतजार करना पड़ेगा

Monday, February 20, 2017

बीएमसी चुनाव पर नज़र

बीएमसी के चुनाव में इसबार ऐसा पहली बार हो रहा है जब ये स्थानीय नहीं राष्ट्रीय मुद्दों पर हो रहे हैं. शिवसेना और बीजेपी का पुराना गठबंधन टूटने के बाद यहाँ की  लड़ाई कुछ और रोमांचक हो गई है. अब सभी दल अकेले अकेले मैदान में हैं. सबसे बड़ी बात यहाँ बसपा और सपा भी कई सीटों पर काफ़ी मजबूत चुनाव लड़ रहे हैं. कांग्रेस और और एनसीपी भी अलग अलग हैं इसलिए अब केवल पोस्ट पॉल एलाइंस की ही उम्मीद कर सकते हैं. क्योंकि बहुमत मिलना किसी भी दल के लिए बहुत मुश्किल काम है. बीजेपी पॉस (गुजराती, मारवाड़ी) इलाक़ों में तो अच्छी नज़र आती है लेकिन स्लॅम मराठी इलाक़ों में शिवसेना अच्छी स्थिति में है. कुछ सीटों पर छोड़कर एमएनएस भी केवल वोट कटवा ही मानी जा रही है. इसबार देखने वाली बात है क़ि उत्तर भारतीय वोट बीजेपी को मिल रहा है. दूसरी तरफ कांग्रेस का खेल एमआईएम बिगाड़ रही है. क्योंकि महाराष्ट्र के मुस्लिम वॉटर्स में ओवैसी की पार्टी ने अच्छी पकड़ बनाकर रखी है. समाजवादी पार्टी और एनसीपी भी मुस्लिम वोट काट रही है और यहाँ एक साथ वोट करने वाला कोई मुद्दा है नहीं इसलिए कांग्रेस या अन्य सेकुलर दल लड़ाई से बाहर जाता दिखता है.
पूरी स्थिति का आकलन करें तो  शिवसेना का मजबूत होना उसके मराठी इलाक़ों में किए गए कामों के कारण है. आप मराठी इलाक़ों में देखिए हर मोहल्ले में शिव सेना की शाखाएँ हैं, युवा सेना, बाल सेना, छात्र सेना, महिला सेना, खेल मंडल जैसे संगठन हर वर्ग में उसकी पैठ मजबूत करते हैं. शिक्षा से लेकर खेल तक में शिवसेना काफ़ी काम और लोगों की मदद करती है. दूसरी मुख्य बात है मराठी अस्मिता का जिंदा रखना. शिवसेना गणपति फेस्टिवल से लेकर शिवाजी महाराज जयंती और हर हिंदू त्यौहार पर सार्वजनिक कार्यक्रम करती है. जिसकी फंडिंग पार्टी करती है. वो बालठाकरे और शिवाजी महाराज के नाम पर लोगों को बाँधकर रखते हैं. इसलिए मराठी वोटों में और किसी दल का सेंध लगा पाना मुश्किल है. अगर एमएनएस चाहे तो कुछ कर सकती है लेकिन इतना आसान नहीं है इतना बड़ा संगठन तैयार करना जो शिवसेना ने 40-50 साल में तैयार किया है. मराठी युवाओं में राज ठाकरे को लेकर एक जोश तो है लेकिन अभी इस पीढ़ी के आगे एक पूरी पुरानी जमात है जिसको बाला साहब ठाकरे के पुत्र के साथ  ही चलना है. इसलिए ही युवा अकेले नहीं जा पा रहा है उसके साथ. दूसरी बात यहाँ की जनता को राजठाकरे पर भरोसा भी कम है कि वो चुनाव जीत पाएँगे. वैसे अगर दोनों दल साथ लड़े तो अच्छे नतीजे आ सकते हैं लेकिन एक साथ लड़ना मुश्किल है. क्योंकि राज ठाकरे को जो पद और सीटें चाहिए वो  उद्धव ठाकरे देने में डरते हैं क्योंकि उनको डर है कि वो शिवसेना पर कब्जा कर लेंगे, और उद्धव की शर्तों पर राज ठाकरे का साथ आना मुश्किल है. फिलहाल तो शिवसेना और बीजेपी में इस बात को लेकर टक्कर है क़ि सीटें किसकी ज़्यादा आएँगी? बहुमत आना तो मुश्किल है. 

बीएसपी और मायावती का क्या होगा?

मायावती का हारना भी उत्तर प्रदेश के लिए घातक होगा. बेहतर राजनीति और लोकतंत्र को बचाए रखने या सामाजिक न्याय के ळिए उनका होना बहुत आवश्यक है. इसलिए मुझे बावजूद इसके क़ि उनके दल और उनमें कुछ कमियाँ होंगी, कहने में कुछ संकोच नहीं है क़ि वो उत्तर प्रदेश के लिए आवश्यक हैं. अगर वो इस चुनाव में हार गईं तो शायद बीएसपी के अस्तित्व को ख़त्म करने की बातें शुरू हो जाएँगी, अखिलेश के पास उम्र है, अभी उनको और भी मौके मिल सकते हैं लेकिन मायावती के लिए ये आख़िरी चुनाव है इसलिए मुझे उनसे सहानुभूति भी  है. मैं अभी उत्तर प्रदेश के दौरे से आया हूँ, वहाँ मैने अपने गाँव और आसपास के लोगों से बात की, ख़ासकर दलित समाज के लोग उनमें अपना हीरो या मसीहा देखते हैं. एक महिला बोलीं बेटा अगर कांशीराम और बहन जी ना होते तो आज हम तुम्हारे सामने खड़े होने लायक भी नहीं थे. हर छोटा बड़ा आदमी बहन जी में कुछ उम्मीद देखता है. मायावती एक बार पूरे 5 वर्षों के लिए सरकार चला चुकी हैं तो अब उनका मूल्यांकन दो तरह से किया जाएगा कि उन्होंने अपने समाज के लिए क्या किया और एक मुख्यमंत्री के तौर पर कैसी रहीं. मूर्तियां और पत्थर लगाने से कई लोगों को नाराज़गी रही. लेकिन किसी लोकप्रिय नेता के नाम पर कब्ज़ा कर लेना और फिर मूर्तियां लगवा देना इस देश के सभी राजनीतिक दलों की राजनीति का हिस्सा रहा है. मायावती ने जो जगहें बनवाईं वो आज लोगों के काम भी आ रही हैं. लेकिन जीते-जी खुद की मूर्ति लगवाना भी अपने आप में एक अलग घटना थी.  मायावती को बारीक नज़र से तब भी देखा गया जब उन्होंने 2007 में अपने दम पर सरकार बनाई. उनके हेयर स्टाइल से लेकर उनके पर्स तक पर आर्टिकल लिखे गए. नोटों की माला पर तंज किए गए. बेशक मायावती का ये आचरण अगड़ी जाति वालों को और मीडिया को चुभा होगा लेकिन इसका एक पक्ष ये भी है कि उस बदलाव में एक रिवोल्ट यानि विद्रोह छुपा हुआ था. उनका ऐसा करना दलित समाज में एक आत्मविश्वास भर रहा था. ये देश के लिए एक ऐतिहासिक मंज़र था जब एक दलित महिला अगड़ी जाति के समर्थन के साथ अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई. महिला होने पर ज़ोर है क्योंकि जयललिता हों या ममता बनर्जी हों, पुरुष सत्ता से लड़ना इतना आसान कभी नहीं रहा जहां कानून बनाने वालों ने किसी महिला नेत्री की साड़ी खींची और कभी किसी के बाल खींचे. इस पूरे पक्ष को मीडिया ने महसूस कम किया. मीडिया को कम से कम इस पहलू के लिए हमेशा ही मायावती और वंचित समाज के दूसरे नेताओं को बढ़त देनी चाहिए. उनके संघर्ष को आप दूसरे किसी नेता के समकक्ष नहीं रख सकते. उत्तर प्रदेश के चुनावों में मायावती को इसलिए भी सबसे मजबूत योद्धा माना जाना चाहिए क्योंकि वो अकेली मैदान में हैं ना किसी से गठबंधन और ना कोई दूसरा नेता जो कैंपेन कर सके. वो अकेली ही मोर्चा संभाले हुए हैं. उनपर टिकट बेंचने या गुण्डों को पार्टी में रखने के आरोप लगते रहे हैं, भ्रष्टाचार के भी आरोप उनकी सरकार पर थे, लेकिन दलित समाज ये सब नहीं देखता है, उसे बड़ा गर्व होता है जब कोई उनके समाज का नेता ख़ासकर महिला इस उँचाई पर जाकर सबपर शासन करते हैं. फिलहाल जो भी होगा बड़ा दिलचस्प होगा क्योंकि मीडिया से दूर उनके वॉटर्स अभी भी कहते हैं कि उनकी पार्टी किसी से कमजोर नहीं है. वो अकेले ही चुनाव जीत रही हैं. 

Tuesday, February 14, 2017

ढाई आखर प्रेम के पढै सो पंडित होय

#Love #Valentine #14Feb
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित होय !
अक्सर देखा जाता है कि कोई अगर “प्यार” इस विषय पर चर्चा करता है तो वह यहीं से शुरू करता है की “प्यार केवल प्रेमी –प्रेमिकाओंका ही नहीं होता, माँ और बेटे का, भगवान और भक्त का भी होता है...” आदि आदि !! लेकिन मुझे यह भाषणबाज़ी नहीं करनी है. या फिर इसकी असलियत पर बात करनी है.
प्रेम को शब्दों में उतारना संभव तो नहीं है, लेकिन कोशिश तो कर ही सकता हूँ. मेरे हिसाब से खुदा जब इश्क की इबारत लिखने बैठा तो थोड़ी देर बाद ही अधूरा छोड़कर उठ गया होगा। इसके अहसास को शिद्दत से महसूस करने के लिए ही इसका अधूरापन बहुत जरूरी है। खुदा ने यह जान-बूझकर अधूरा छोड़ा होगा, क्योंकि इसे पूरा कर देता तो इंसान को किसी चीज की जरूरत नहीं होती। आपने कभी सोचा है कि क्यों किसी को खो देने की कशिश किसी को पा लेने से खुशी से ज्यादा असर रखती है? हर किसी की जिंदगी में किसी को पा लेने की आकांक्षा होती है, जो मंजिल तक नहीं पहुंच पाने के दर्द की शक्ल में हमेशा जिंदा रहती है। चाहे कुछ भी हो, प्रेम आपके अंतर्मन को नई परिभाषा देता है। राधा और कृष्ण के नाम एक ही पन्नो पर लिखे हैं। फर्क बस इतना है कि दोनों एक-दूसरे के पीछे लिखे हैं। साथ भी हैं, जुदा भी नहीं और जुदा भी। ठीक ऐसी ही है इश्क की कायनात जिसमें आप जिसे खो देते हैं, वह आपके जहनो-दिल में ऐसा बस जाता है कि आप उसके साथ भी हैं और जुदा भी। इस अधूरी मोहब्बत ने ही हमें गालिब, फराज, साहिर, फिराक जैसे अजीम शायर दिए हैं। उनके लफ्जों में इश्क के मायने और निखरकर आते हैं। हमेशा किसी की हां से या किसी के पहलू में जिंदगी गुजारने से ही इश्क पूरा नहीं होता। इश्क होने से पहले क्या इस बात की शर्त रखी जाती है कि आप जिसे चाहें वह ताउम्र आपके पास रहे? क्या साथ रहना भी पास रहने जितना अहम नहीं है?शायद है, क्योंकि आपको उस शख्स से अहसासों का जुड़ाव है जो उम्र या फासलों से कभी नहीं मिट पाता।जीवन के हर मोड़ पर जब आप थोड़ी देर रुककर अपने माजी को याद करेंगे तो वह चेहरा आपका पीछा करता नजर आएगा। ऐसा होना आपकी आने वाली जिंदगी पर असर डाले, ऐसाभी नहीं है। वह जो पीछे छूट गया है, उसे आप वापस तो नहीं ला सकते लेकिन उसकी यादें सहेजकर आने वाली जिंदगी में वही रंग भर सकते हैं। यह बात सच है कि अतीत अच्छा हो या बुरा, आगे चलकर दुःख ही देता है। अहमद फराज का एक शेर है :
"उस शख्स को बिछड़ने का सलीका भी नहीं,
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया।"
जिंदगी इस इश्क के फलसफे से पूरी हो जाती है लेकिन इश्क कभी खुद पूरा नहीं हो पाता। दिलों को दिलों से जोड़ने वाला यह अनूठा एहसास दिलों में नमी भी भर देता है। हर अफसाना बहुत मीठे दर्द से शुरू होता है लेकिन जरूरी नहीं कि ऐसे एहसास पर ही खत्म हो। कई कहानियां अनचाही चुभते हुए अंत पर पर खत्म होती हैं। ऐसे में लगता है कि दुनिया में कुछ भी नहीं बचा। सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन यहीं से आपकी मोहब्बत आपकी प्रेरणा बन जाती है। आपके सोचने की शक्ति आश्चर्यजनक रूप से बदलने लगती है। यह ऐसा वक्त होता है जब आपके भीतर सब कुछ टूटने लगता है लेकिन आपके अंदर सृजन नई अंगड़ाई लेता है। लेकिन सबसे मुश्किल लम्हा वह होता है जब वक्त की सीढ़ियों पर वह कभी आपको बैठे मिल जाए। तब क्या कीजिएगा, मुंह फेरकर चले जाइएगा या मुलाकात कीजिएगा? उनकी दहलीज पर न जाने की कसम तो आपने खाई ही होगी लेकिन अगर राह में ही टक्कर हो जाए तो क्या कीजिए? भले ही दोनों के बीच वक्त और हालात बहुत फासला बना देते हैं लेकिन एक-दूसरे को आप दोनों ने कभी भुलाया ही नहीं। एक शायर का शेर है,
"न जाने कितनी बातें थी, न जाने कितने शिकवे थे,
हुआ जब सामना उनसे तो न वो बोले ना हम बोले."
यादों में जिंदा शक्लें ख्वाबों के दरीचों में जब-तब उभर आती हैं। आंखों से समंदर फूट पड़ता है। कदम पीछे जाने को बेताब होते हैं लेकिन उसका कोई रास्ता ही नहीं होता। उसे भूलने के बहाने बार-बारयाद करते हैं।
'मुद्दतें गुजरी, तेरी याद भी आई ना हमें,
और हम भूल गए हों तुझे, ऐसा भी नहीं...।'
इश्क वह मुकद्दस जज्बा है जिसमें डूबकर ही उसे समझा जा सकता है। किनारे बैठकर इसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगा सकते। हर किसी की जिंदगी में ऐसा मौका आता है जब आपकी मोहब्बत उजड़ जाती है लेकिन यह अंत नहीं होता। यहां से आपकी नई यात्रा शुरू होती है। आपके अंतर की यात्रा, जिसमें आपको खुद को खोजना और पाना होता है। बिछड़े हुए साथी की याद को दिल में दफन करने की कोशिश सभी करते हैं लेकिन ऐसा कभी मुमकिन नहीं होता। और इसे गम की तरह लेने की जरूरत ही नहीं। ऐसी स्थिति में यह सोचें कि आप कितने खुश किस्मत हैं कि खुदा ने इश्क की नेमत आप पर बरसाई है।
प्यार की बात होते ही आजकल सोसल मीडिया पर बेवफ़ाई की बात करना शुरू कर दी जाती है. इसपर ही लिखने वाले शायर ज़्यादा फेमस हुए हैं. फ़राज़ का बड़ा ही मशहूर शेर है,
"बेवफा ने हमारे जख्म का कुछ यूँ किया इलाज,
मरहम भी लगाया तो खंजर की नोक से..."
मेरे हिसाब से किसी को बेवफा कहकर नफ़रत करना ठीक नहीं होता है. सबकी अपनी अपनी मजबूरियाँ होती हैं.
"कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी ग़ालिब,
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता...."
कुमार विश्वास की "एक पगली लड़की" कविता की एक लाइन है,
"वो पगली लड़की कहती है, मैं प्यार तुम्ही से करती हूँ,
हूँ बहुत मजबूर, मगर अम्मा बाबा से डरती हूँ..."
मेरा उन मित्रों से भी कहना है जो कल किसी को प्रपोस करने वाले हैं. अगर आपका प्यार आपको स्वीकार करता है, तो खुश हो जाना लेकिन अगर अस्वीकार हो जाता है, तो उसको हंसकर टाल देना. मैने अभी ही चार पाँच दिन पहले एक शेर लिखा था.
"कोई ठुकरा दे तो हंसकर जी लेना,
क्योंकि मोहब्बत की दुनियाँ में जबरजस्ती नहीं होती."
इतने खूबसूरत एहसास से आपको तरबतर किया है। जब भी माजी की यादों में खोएंगे तो हमेशा कुछ न कुछ जरूर पाएंगे। यह बेवजह जाया नहीं हुआ है।भगवान ने दिल के रूप में सबसे अहम हिस्सा हमको दिया है। इसका काम है सिर्फ प्यार करना। यह प्रेम जानता है, प्रेम करता है और प्रेम चाहता है। इसे मौका दें कि आपके अंदर के प्यार को बाहर बिखेरें। अतृप्ति तो प्रेम का स्थार्यी भाव है, जो हमेशा रहेगा। लेकिन इसे तृप्त करने की कोशिश ही जिंदगी को जिंदा रखती है वर्ना दुनिया वीरान होती।
अंत में मेंहदी हसन की कुछ पंक्तियों के साथ ख़त्म करना चाहूँगा,
"बन गए दोस्त भी मेरे दुश्मन,
इक तुम्हारे करीब आने से,
जबकि अपना तुम्हें बना ही लिया,
तो कौन डरता है अब जमाने से,
तुम भी दुनिया से दुश्मनी ले लो,
दोनो मिल जाएँ इस बहाने से,
चाहे सारा जहाँ मिट जाए,
इश्क मिटता नहीं मिटाने से.

Sunday, February 12, 2017

यूपी चुनाव से कौन क्या खोएगा क्या पाएगा?

उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव यूं तो हमेशा से ही दिलचस्प रहे हैं, लेकिन 2017 का चुनाव जिन समीकरणों के बीच हो रहा है, उसकी चर्चा राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हर शख्स की जुबान पर है। राम मंदिर आंदोलन के दौर के बाद से बीजेपी प्रदेश में इतनी ताकतवर कभी नहीं रही। उधर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी पहली बार चुनावी मैदान में साथ आए हैं। मायावती की बहुजन समाज पार्टी के लिए लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति वाला बन चुका है। ऐसे में सभी दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। आइये जानते हैं कि सभी मुख्य पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव में हार और जीत के क्या मायने होंगे. 
2014 के चुनाव सहित लगातार दो चुनावी हार के बाद अगर मौजूदा विधानसभा चुनाव में भी मायावती की बीएसपी को हार का सामने करना पड़ता है तो पार्टी एक बार फिर से 1990 के उस दौर में पहुंच जाएगी जिसमें उसे सरकार बनाने के लिए दूसरे दलों पर निर्भर रहना पड़ता था।  चुनावी हार बीएसपी के संस्थापक कांशीराम के उस बहुजन आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका होगी जिसके तहत उन्होंने दलितों, पिछड़ों और मुस्लिमों को साथ लाने की कोशिश की थी। चुनाव में हार के बाद मायावती के लिए अपने दलित वोट बैंक पर पकड़ बनाए रखना काफी मुश्किल हो जाएगा। मायावती इस बार दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ के सहारे 2007 का प्रदर्शन दोहराने की कोशिश कर रही हैं, पर इस बार वह मुस्लिमों को अपनी तरफ लाने के लिए काफी आक्रामक हैं जो आमतौर पर मुलायम के साथ जाते हैं। 2017 के चुनाव में जीत अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी के निर्विवाद नेता के तौर पर स्थापित कर देगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी उनका कद काफी बढ़ जाएगा। अखिलेश ने इस चुनाव में कोई जोखिम न उठाते हुए, कुनबे में चली वर्चस्व की लड़ाई के चलते हुए नुकसान की भरपाई के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। अखिलेश की छवि एक ऐसे नेता के तौर पर पेश की गई है जो सांप्रदायिक ताकतों को रोकने को लेकर गंभीर है, ताकि वह मुस्लिमों की पहली पसंद के तौर पर उभरें और पार्टी का कोर वोट बैंक साथ बना रहे। सीएम लगातार अपने कार्यकाल में हुए विकास की बात करते ही नजर आए। चुनाव में हार से परिवार का विवाद एक बार फिर सतह पर आ सकता है और ऐसे में हो सकता है कि अखिलेश के कई समर्थक उनका साथ छोड़ दें।
बीजेपी ने इस बार भी अपने चुनाव प्रचार को ध्रुवीकरण और विकास के वादे के इर्द गिर्द रखा। चुनाव में कम अंतर से मिली जीत भी मोदी और उनकी नीतियों पर मुहर लगाने का काम करेगी। खासतौर पर नोटबंदी पर यह तय है कि पार्टी अपने 2012 के प्रदर्शन को सुधारने वाली है जब उसे महज 47 सीटें मिली थीं। अगर पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, तो इसका सीधा अगर पीएम मोदी की छवि पर पड़ेगा और पार्टी में अंदरूनी कलह शुरू हो सकती है। इसका खामियाजा अमित शाह को भुगतना पड़ सकता है। अगर हार होती है तो 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले आरएसएस प्रदेश में हिंदुत्व को लेकर और आक्रामक रवैया अपना सकता है।
यह चुनाव कांग्रेस के लिए भी प्रदेश में प्रासंगिक बने रहने का सवाल है। चुनाव में सफलता मिली तो राहुल गांधी तीन बड़े राज्यों गुजरात, एमपी और राजस्थान में बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में आ जाएंगे। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इन बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस का सामना सीधे बीजेपी से होगा। चुनावी असफलता पार्टी के अंदर राहुल के लिए मुश्किलें लेकर आ सकती है।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...