Sunday, October 23, 2022

ऋषि सुनक V/S पेनी मॉर्डेन्ट/बोरिस जॉनसन?

गुरुवार को ब्रिटेन की प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस के इस्तीफ़ा देने के बाद दोबारा सुनक को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की रेस में बताया जा रहा है. इस बीच वहां के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज़ है कि पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी पद पर वापसी कर सकते हैं. हालांकि जेरेमी हंट का भी नाम सामने आया था, लेकिन उन्होंने लीडरशिप की दौड़ में शामिल होने से इनकार कर दिया.
इस बीच पेनी मॉरडॉन्ट ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की रेस के लिए आधिकारिक तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर दी है. वो पिछली दौड़ में भी शामिल हुई थीं, लेकिन नाकाम रही थीं.
पार्टी में ऐसे सांसद हैं जो बोरिस जॉनसन को वापस लाना चाहते हैं, कुछ दूसरे सांसदों का कहना है कि अगर बोरिस लौटते हैं तो वो इस्तीफ़ा दे देंगे.
42 साल के ऋषि सुनक इस साल जुलाई तक देश के वित्त मंत्री थे. उनके इस्तीफ़े के बाद ही पार्टी में उस समय के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के ख़िलाफ़ पार्टी में विद्रोह शुरू हुआ था और कई मंत्रियों ने अपने पदों से इस्तीफ़ा दे दिया था.
उनके इस्तीफे के बाद बोरिस जॉनसन को भी प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा था. कई हफ़्तों तक चले लीडरशिप की दौड़ में पार्टी सांसदों ने ऋषि सुनक और लीज़ ट्रस को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना.
पार्टी के 1 लाख 60 हज़ार से अधिक सदस्यों को इन दोनों में से एक को चुनना था. लिज़ ट्रस को ज़्यादा सदस्यों का समर्थन मिला और वो प्रधानमंत्री बन गईं, और सुनक हार गए.
लिज़ ट्रस ने टैक्स कम करने और गैस के दाम को स्थिर करने जैसे कई वादे किए थे जिनके बारे में ऋषि सुनक ने आगाह किया था कि ये क़दम देश को एक बड़े आर्थिक संकट में डाल देंगे.
लिज़ ट्रस और ऋषि सुनक के बीच मुक़ाबले में दो बातें खुलकर सामने आई थीं. ऋषि सुनक को पार्टी के अधिकतर सांसदों का समर्थन हासिल था और पार्टी सदस्यों की युवा पीढ़ी उनके साथ थी. लेकिन पार्टी के अंदर पुराने कंज़र्वेटिव विचारधारा के लोग बहुमत में हैं जिन्होंने ऋषि सुनक के ऊपर लीज़ ट्रस को तरजीह दी थी."
साउथम्पटन से ऋषि सुनक को जानने वाले नरेश सोनचटला कहते हैं कि उन्हें विश्वास है कि ऋषि सुनक इस बार फिर प्रधानमंत्री पद के दावेदार होंगे.
जहाँ तक मुझे मालूम है ऋषि को कैबिनेट का पूरा समर्थन हासिल है, देश उनके साथ है. सट्टेबाज़ भी ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.

बोरिस की वापसी मुमकिन?
हालांकि अभी तक किसी नेता ने प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उम्मीदवारों को सोमवार दोपहर तक अपने नाम देने होंगे.
माना जा रहा है कि ऋषि सुनक और बोरिस जॉनसन मुख्य दावेदार बन कर उभरेंगे. ख़बरें ये आ रही हैं कि बोरिस जॉनसन, जो अपनी छुट्टी गुज़ारने के लिए विदेश में थे, अब ब्रिटेन वापस आ रहे हैं.
ब्रिटेन के राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि फ़िलहाल दोनों नेता इस बात का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करेंगे कि उन्हें कितने सांसदों का समर्थन हासिल है.

लेकिन क्या उनके पास आम चुनाव जिताने की अपील है? उनके आलोचकों द्वारा हो सकता है एक बार फिर 'स्टॉप ऋषि' अभियान चलाया जाए".
पार्टी के नियमों के मुताबिक़, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के अगले उम्मीदवार को लीडरशिप की रेस में शामिल होने के लिए 357 में से कम से कम 100 सांसदों का समर्थन हासिल करने की ज़रूरत होगी.
इसका मतलब है कि अधिकतम तीन उम्मीदवार खड़े हो सकते हैं. सांसदों के बीच पहले मतदान होगा और तीन उम्मीदवारों के होने पर सबसे कम वोट वाले व्यक्ति को हटा दिया जाएगा.

इसके बाद अगर दो उम्मीदवार बच जाएं और किसी भी सूरत में दूसरे दौर के वोटिंग की ज़रूरत पड़ती है तो सांसद दोनों उम्मीदवार में अपनी वरीयता के ज़रिए अपना मत दे सकते हैं.
इस दौर के बाद भी अगर दोनों उम्मीदवार को एक समान मत मिलते हैं तो अंतिम निर्णय पार्टी के सभी सदस्यों के ऑनलाइन वोट के माध्यम से होगा. अगस्त और
सितंबर में कराई गई लीडरशिप पर वोटिंग कई हफ़्तों तक क्यों चली और इस बार एक हफ्ते में ही अगला प्रधानमंत्री कैसे चुन लिया जाएगा?
इस बार किसी भी उम्मीदवार को प्रधानमंत्री की रेस में शामिल होने के लिए कम से कम 100 सांसदों का समर्थन ज़रूरी है. पिछली बार ये पैमाना 30 सांसदों के समर्थन का था. ऐसे में ख़ुद ही उम्मीदवारों की संख्या तीन से ज़्यादा नहीं हो पाएगी और इसलिए अगला प्रधानमंत्री चुनने में वक़्त पिछली बार से कम लगेगा. यदि नामांकन बंद होने पर सोमवार को केवल एक उम्मीदवार बचता है, तो उसे विजेता और अगला प्रधान मंत्री घोषित किया जाएगा.

Tuesday, September 27, 2022

इटली के चुनाव पर एक नजर


जब कभी फासीवाद और तानाशाही के उदाहरण देने पड़ते हैं तो सबसे पहले हिटलर और मुसोलिनी का ही नाम आता है. जब से इन दोनों का अंत हुआ तब से कभी इनके देशों जर्मनी और इटली ने इस विचारधारा के नेता को पसंद नहीं किया.
लेकिन इस बार हो रहे चुनावों में वहां की एक राइट विंग ब्रेनितो मुसोलिनी को आदर्श मानने वाली ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी को एक्सिट पोल्स में बढ़त मिलती दिख रही है.
इटली में भी भारत की तरह ही राजनितिक सिस्टम है. इसकी संसद में दो सदन होते हैं, अपर हाउस सेनेट में 200 और लोअर हाउस चेम्बर ऑफ़ डेपुटीस में 400 संसद होते हैं, जो पांच साल के लिए चुने जाते हैं. इस बार दोनों सदनों के लिए चुनाव हुआ, वोटर्स ने दोनों के लिए एक साथ ही वोट किया. इसमें 35% संसद सीधे तौर पर और बाकी के मेंबर पार्टिस को मिले टोटल वोट % के हिसाब से नॉमिनेट करना होता है. किसी पार्टी को संसद में एंट्री के लिए कम से कम 3% और अलायन्स को 10% वोट मिलना जरुरी है. (यहाँ अभी तक बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन अभी तक नहीं आई है.)
पार्टियों की बात करें तो पहले यहाँ केवल दो पार्टियां क्रिश्चियन डेमोक्रेसी और इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी थी, लेकिन एक समय कई बड़ी घटनाएं होने पर वहां की राजनीति बदली। बर्लिन की दीवार गिरी, यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारों के गिरने का सिलिसिला चालू हुआ तो सोवियत संघ तक टूट गया.
इसके बाद 1992 मिलान के कुछ अधिकारीयों ने कुछ घूसखोरी के कुछ स्कैंडल की जांच चालू हुई. यहाँ प्रधानमंत्री से लेकर उद्योगपति और 200 से अधिक सांसदों को सजा हुई. इसको ऑपरेशन क्लीन हंट कहा जाता है. इसके बाद राजनितिक सुधारों के तौर पर सभी राजनितिक पार्टियां ख़तम कर दी गई और फिर इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी नए नाम डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ लेफ्ट फिर 2008 में डेमोक्रेटिक पार्टी नाम से आई, इसको सेन्ट्रल लेफ्ट से मिलाकर बनाया गया था. क्रिश्चियन डेमोक्रेसी कभी वापस नहीं हुई तो उसकी जगह कई पार्टियां आईं.
2017 में बनी लीग राइट विंग पार्टी जो पिछली सरकार में थी, ये पार्टी प्रवासियों का खुलकर विरोध करती है. दूसरी पार्टी फोर्जा इटालिया सिल्विओ बर्लुस्कोनी की पार्टी है जो चार बार इटली के प्रधानमंत्री रहे. 1993 में बनी, 2009 में इसको ख़तम कर दिया गया लेकिन 2013 में इसने फिर से काम करना चालू कर दिया.फिर एक पार्टी है फाइव स्टार मोमेंट। 2009 में इसको एक कॉमेडियन और और वेब डेवेलपर ने मिलकर चालू किया था. 2017 के चुनाव में ये सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, तब से ये राइट और लेफ्ट दोनों तरफ की पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला रही थी. पांचवी बड़ी पार्टी का नाम है ब्रदर्स ऑफ़ इटली। ये 2012 में बनी. अब इसका मुसोलिनी से सम्बन्ध बताता हूँ.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब मुसोलिनी की फासिस्ट पार्टी को बैन कर दिया गया तो इसके लोगों ने बनाई मोवीमेंटो सोसिओ इटालियना (MSI) पार्टी. इसने नेशनल अलायन्स के साथ में कई साल सरकार भी चलाई. 2009 में नेशनल अलायन्स ख़त्म हुआ तो पहले कुछ नेता बर्लुस्कोनी की पार्टी में गए फिर वहां भी झगड़ा हुआ तो नई पार्टी बनाई ब्रदर्स ऑफ़ इटली. इसका सिंबल, कलर और झंडे का निशान भी MSI से लिया गया है. 2014 में ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी की कमान जॉर्जिया मेलोनी के हाथ आई. इस पार्टी के सिद्धांतों में व्यक्तिगत आजादी का विरोध, समलैंगिकों के अधिकारों को ख़त्म करना, यूरोपियन यूनियन से इटली को बाहर निकलना मुख्य है. वैसे तो जॉर्जिया मिलोनी यंग लीडर हैं. वो शुरु से ही MSI के यूथ विंग में काम करती रही हैं. वो शुरू से ही मुसोलिनी की तारीफ़ करती रही हैं. इस चुनाव में भी जब कभी मीडिया ने उनसे मुसोलिनी के बारे में पूछा तो यही कहती हैं कि वो अच्छे नेता थे, हमारी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी है लेकिन फासिज़्म तो बीते दिनों की बात हो गई है. मतलब खुलकर कभी नकारा नहीं। 
इनका गठबंधन बर्लुस्कोनी और प्रवासी विरोधी द लीग के साथ गठबंधन भी बनाया है. अब चुनाव के बाद इनकी जीत की सम्भावना है. अगर ऐसा हुआ तो जॉर्जिया मेलोनी इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं. ये एक इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि कोई पहली महिला प्रधानमंत्री बनेगी लेकिन मेलोनी की पार्टी की नीतिओं और विचारधारा की वजह से इटली ही नहीं पूरे यूरोप की लिबरल आबादी की चिंता बढ़ गई है. सबसे ज्यादा ये कि पूरा यूरोप बाढ़, भूकंप, आतंकवाद, युद्ध और भुखमरी से प्रभावित अफ़्रीकी, अफगानी, सीरियन या मिडल ईस्ट के प्रवासियों के लिए दरवाजे खोले रखता है, लेकिन ये पार्टी सत्ता में आई तो इटली में प्रवासियों पर रोक के साथ साथ उनको निकालने की भी प्रक्रिया चालू हो जाएगी. मेलोनी खुद सिविल और समलैंगिग अधिकारों के खिलाफ बात करती हैं, यहाँ तक की जनसँख्या बढ़ाने की भी बात करती हैं.
सबसे मुख्य बात है कि ब्रदर्स ऑफ़ इटली को पिछले चुनाव में सिर्फ 4% वोट मिले थे जो इसबार 26% हो गए हैं.

Sunday, June 26, 2022

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का तख्तापलट


आजकल महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है. जिस शिवसेना को बालासाहेब ठाकरे ने बनाया और अपनी मेहनत से खड़ा किया वो अब शिंदेसेना में बदल गई है. उद्धव ठाकरे की विधायकों और राजनीतिक राजधानी पर पकड़ कमजोर होती जा रही है. इस पूरे तख़्तापलट की कहानी के अपने अपने मायने निकाले जा रहे हैं. लेकिन मुझे जो समझ में आया उसके दो कारण हैं. पहला कि जब 2014 में शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी तब उस सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने जमकर लूट की. शिवसेना के विधायकों और उनके रिश्तेदारों ने भी अपनी जेबें भरने में कोई कमी नहीं रखी. उद्धव ठाकरे के करीबियों और रिश्तेदारों ने भी खूब पैसा जमा किया। यही कारण है कि 2019 में महाविकास अघाड़ी बनाने के बाद इनपर एकदम से इनकम टैक्स और ईडी के छापे चालू हो गए. क्योंकि अगर इन्होने इस सरकार में ही सब घपले किये होते तो उसकी तो ठीक से असेसमेंट भी नहीं हुई होगी. दूसरी बात अगर इसी सरकार में किये हुए घोटाले होते तो सबसे अधिक छापे तो एनसीपी और कांग्रेस के विधायक और मंत्रियों पर होती और वो पार्टी छोड़कर भाग जाते क्योंकि वो तो भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हैं. इससे जाहिर है कि ये सब पहले का होगा.
आपको याद होगा कि जब अजित पवार ने सुबह 4 बजे फडणवीस को मुख्यमंत्री बनवाया था तब उनके 70000 करोड़ के घोटाले की फ़ाइल बंद कर दी गई थी. आज भी सभी मंत्री विधायक इसी उम्मीद में बीजेपी के पास गए हैं, क्योंकि जब उद्धव ठाकरे के पास ये सब जाते थे तो वो इसमें इनका बहुत साथ नहीं देते थे. इस वजह से इन विधायकों में नाराजगी बहुत थी.
इस एपिसोड का दूसरा कारण जो मुझे समझ में आया वो ये कि उद्धव ठाकरे की सरकार ने बहुत से कॉर्पोरेट्स को नाराज किया या फिर कहें कि उनको खुश नहीं किया. पहले आरे जंगल की कटाई को रोक दिया. फिर इसी साल मार्च के आसपास महाराष्ट्र के रूरल इलाकों में लोगों के बिजली के कनेक्शन अडानी पवार ने काटने शुरू कर दिए जिन्होंने बिल नहीं भरे थे. यहाँ बिजली मंत्री थे कांग्रस के नितिन राउत। उनके ऊपर राहुल गाँधी ने दबाव डाला तो ये कनेक्शन काटने बंद हुए. ऐसे ही बहुत से कॉर्पोरेट्स के हितों को उद्धव सरकार ने रोका. इन्ही कॉर्पोरेट्स ने इस पूरे दल बदल की फंडिंग की है. कोई पार्टी बनाएगा, किसी की सदस्यता जाएगी, अब इस सबके बाद जो कानूनी पेंच हैं, वकील सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे, नेता टीवी पर लड़ेंगे और फ्लोर टेस्ट होगा. राज्यपाल अपनी भूमिका निभाएंगे जिसमें ज्यादातर चांस यही हैं कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिरेगी और फडवणीस साहब CM बनकर इन सभी बागियों को सर्फ़ एक्सल में धुलकर नीट एन्ड क्लीन कर देंगे. इसलिए इसपर ज्यादा बात करके कोई फायदा नहीं.अब सवाल ये कि इतना सब हो गया और उद्धव ठाकरे को खबर नहीं लगी? असल में इस बात का उनको एक महीने पहले ही पता चला था और उन्होंने एकनाथ शिंदे को घर बुलाकर पूछा भी था तो उन्होंने कहा कि विधायक तो मेरे पास वैसे भी आते जाते रहते हैं लेकिन आपको जो खबरें मिल रही हैं वो एकदम गलत हैं. मैं ठाकरे परिवार का सदस्य हूँ. पत्रकार अशोक वानखेड़े बताते हैं कि ये कहते हुए वो रोने लगे तो उद्धव ठाकरे को उनपर भरोसा हो गया. वो बोले कि चलो ठीक है जो भी ख़बरें आ रही हैं उनको ख़तम करो और राज्यसभा और विधान परिषद् के चुनावों में विधायकों के वोट कराने की जिम्मेदारी आपकी है. इसी बहाने उनको और मौका मिल गया इन सबसे मिलकर मीटिंग और डील करने की. फिर जब विधान परिषद् में क्रॉस वोटिंग हुई तो आदित्य ठाकरे और एकनाथ शिंदे में खूब बहस हुई जिसके बाद एकनाथ शिंदे को मौका मिल गया. बीजेपी की मदद से खेल करने का. क्योंकि एकनाथ शिंदे अकेले इतने विधायक साथ ले आएंगे ये कोई नहीं कह सकता। उनको ठाणे के बाहर अभी भी कोई बहुत वर्चस्व वाले नेता नहीं हैं. हाँ ये है कि उद्धव ठाकरे की तरफ से भी कुछ गलतियां हुईं जो विधायकों और नेताओं के बीच कम्युनिकेशन गैप रहा. वो लोगों से मिलने का ज्यादा समय नहीं देते थे, कई फैसले उनके किचेन कैबिनेट (पत्नी, बेटे और परिवार) में होते थे. उनके ज्यादा समय नहीं देने के दो कारण हो सकते हैं एक तो उनकी लगातार तबियत का ख़राब रहना और दूसरा एक ठाकरे ब्रांड का होना कि ऐसे ही सबको कैसे रोज रोज समय दिया जा सकता है.
अब सवाल ये कि अभी तक शिवसेना मतलब ठाकरे परिवार और ठाकरे मतलब शिवसेना समझा जाता था. पहली बार किसी ने हिम्मत की है ठाकरे परिवार को चुनौती देने की. तो क्या इससे ये समझा जाए कि मातोश्री का वर्चस्व शिवसेना से ख़तम हो जाएगा? क्या उद्धव ठाकरे की राजनीति अब ख़त्म हो जायेगी? तो इसकी संभावनाएं भी बहुत कम हैं. भारतीय राजनीती में खासकर क्षेत्रीय दलों में एक फर्स्ट फॅमिली के लोगों को लेकर कार्यकर्ताओं का बड़ा भरोसा होता है. बालासाहब ठाकरे से जुड़े लोगों को उद्धव ठाकरे ही पसंद आएंगे एकनाथ शिंदे नहीं. अगर शिंदे कोई पार्टी बना लें या शिवसेना पर कब्ज़ा कर लें और उद्धव कोई पार्टी बना लें तो भी उनके सफल होने की सम्भावना बहुत कम है. इसका रेकॉर्ड रहा है, पहले छगन भुजबल, राज ठाकरे, नारायण राणे जैसे बहुत से नेता जो शिवसेना से अलग होकर राजनीती करने निकले लेकिन पब्लिक ने उनको पसंद नहीं किया, इसलिए अगर ये सभी विधायक या एकनाथ शिंदे भाजपा में भी शामिल हो जाएँ तो बहुत कम सम्भावना है उनके सफल होने की. थोड़े दिन में ठाणे की सीट जीतना भी मुश्किल हो जायेगा.
शिवसेना की राजनीति को अबतक मैंने जितना समझा है वो किसी जातीय समीकरण से नहीं चलती है, उसके चलने का एक बेस है बालासाहब ठाकरे का चेहरा और मराठी मानुष या शिवाजी महाराज और उनके हिंदुत्व पर उनकी क्लियर विचारधारा. इसमें ओबीसी और सोसल रिफार्म को भी बहुत आसानी से मिक्स करके रखा है. वो जब किसी को टिकट देते हैं तो इस वजह से नहीं देते हैं कि उसकी जाति क्या है? वो टिकट देते हैं उस आदमी की क्रेडिबिलिटी पर और उसकी पार्टी या परिवार में आस्था पर. अधिकतर पब्लिक भी वोट उस आदमी को नहीं शिवसेना को देती है.
ये बात तो हुई जो साफ साफ नजर आ रही हैं. लेकिन इसकी और भी संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है. राजनीति में कई बार जो दिखता है वो होता नहीं है. कई लोगों का स्पेकुलेशन ये भी है हो सकता है ये सब उद्धव ठाकरे की जानकारी में हुआ होगा, लेकिन इसकी सम्भावना बहुत कम है. दूसरी सम्भावना ये है कि हो सकता है ये पूरा खेल एनसीपी से अजित दादा पवार की मदद हुआ हो. थोड़े दिन में जैसे जैसे परतें निकलेंगी वैसे वैसे चीजें सामने आएँगी.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...