इस समय महाराष्ट्र की राजनीति में बडा भूचाल मचा हुआ है, ये एकदम यूपी बिहार स्टाइल वाली राजनीति है शायद इसलिए ही हमारे जैसे कानून और राजनीति के स्टूडेंट को इसमें इतनी दिलचस्पी है। शुक्रवार शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की बातें हुईं और सुबह-सुबह भाजपा के देवेंद्र फणनवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नज़र आए. और ये सब किया शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने। महाराष्ट्र की राजनीति की बिसात पर अजित पवार की इस चाल ने सबको चौंका दिया. उन लोगों को भी, जो उन्हें बेहद क़रीब से जानते हैं. शाम होते-होते राजनीति की ये बाज़ी पूरी तरह बदली हुई नज़र आई. अजित पवार को राजभवन में भाजपा की सरकार बना रहे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ लेते देखने वाले एनसीपी के कई विधायक शाम होते-होते पार्टी नेता शरद पवार के पास पहुंच गए और सत्ता के खेल के समीकरण फिर बदल गए. हिसाब लगाने वाले हिसाब लगाते रह गए कि कौन फ़ायदे में रहा और कौन नुक़सान में. लेकिन अभी के समीकरणों को देखते हुए लगता है कि सबसे बड़े लूज़र देवेंद्र फडणवीस ही रहेंगे क्योंकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और उनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल होगा. दूसरे लूज़र होंगे अजित पवार. उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बग़ावत की और एनसीपी के विश्वास को ठेस पहुंचाई है. इससे उनकी साख़ को बहुत नुक़सान हुआ है. उन्हें शरद पवार के वारिस के तौर पर भी देखा जाता था. उन्होंने उनके साथ भी गद्दारी की है. देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है लेकिन उनके कई इम्तिहान अभी बाक़ी है. ताज़ा आंकड़ें देखें जो बीजेपी के पास 105 के विधायक, निर्दलीय और छोटे दलों के 14 विधायकों को मिलाकर कुल 119 विधायक हो गए. कल सुबह अजित पवार के साथ एनसीपी के 11 विधायक गए थे. अब इनमें से छह शरद पवार के पास वापस आ गए हैं और उन्होंने कहा कि हमें तो कुछ पता ही नहीं था हमें तो अचानक पकड़ कर राजभवन ले गए. ऐसे में अजित पवार के पास अब बच गए पांच विधायक. इन पांच को अगर 119 के साथ जोड़ दें तो संख्या होती है 124 और बहुमत का आंकड़ा है 145. ऐसे में भाजपा को 20 विधायकों की जरूरत है और वह कहां से लाएगी शायद किसी को नहीं पता.
थोड़ी देर पहले नारायण राणे ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि बाजार में बहुत सारे विधायक बाकी हैं. इसका मतलब यह है कि बीजेपी यह सोच रही है कि वो बहुमत के लिए एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के अलावा और कहां-कहां से विधायक ला सकती है.
ऐसा लग रहा है कि जैसे कर्नाटक में 'ऑपरेशन कमल' कई चरण में हुआ था, वैसे ही महाराष्ट्र मे भी 'ऑपरेशन कमल' अभी बाकी है. देवेंद्र फडणवीस आगे क्या रणनीति अपनाएंगे, इस बारे में अभी कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि उन्होंने शपथ तो ले ली लेकिन उनके पास उतने विधायक नहीं है. फ़िलहाल कोई नहीं जानता कि फडणवीस 145 विधायक कहां से लाएंगे.
उन्हें 30 नवंबर को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना है.
दूसरी ओर शनिवार तड़के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ लेने के बाद कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. तीनों पार्टियों का कहना है कि राज्य में जो कुछ भी हुआ है, असंवैधानिक है. कांग्रेस ने इसे विशेष रूप से चुनौती दी है. अतीत में पिछले राज्यों में पैदा हुई ऐसी ही परिस्थितियों पर वापस नज़र डालें तो ऐसे में विधानसभा में शक्ति परीक्षण सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ है. महाराष्ट्र में शक्ति परीक्षण 30 नवंबर को होगा जिसमें अभी छह दिन-छह रातें बाकी हैं. ये रातें ही नहीं बल्कि अगली कई रातें भी महाराष्ट्र पर भारी पड़ने वाली हैं और ऐसा पिछले एक महीने से चलता रहा है. ईमानदारी से कहें तो जो कुछ हो रहा है, उसकी ठीक-ठीक जानकारी नेताओं और पत्रकारों को भी नहीं है. सारे सूत्र फ़ेल हो गए हैं.
अब बात अगर पवार फैमिली की राजनीति की करें तो एक ज़माने में अजित पवार एनसीपी के बहुत बड़े नेता हुए करते थे. जब से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले राजनीति में आईं, तब से अजित पवार ने कई बार अपनी नाराज़गी जताई. धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद छोटा होता गया और ऐसा शरद पवार ने जानबूझकर भी किया. चाचा-भतीजे की आपस में नहीं बनती है लेकिन कोई इस बारे में खुलकर बात नहीं करता. बात तब भी ऐसी ही अदावत की हुई जब अजित पवार के बेटे पार्थ पवार को लोकसभा की टिकट मिली और वो हार गये, जबकि शरद पवार के बडे भाई अन्ना साहब पवार के पोते रोहित पवार को विधायकी का टिकट मिला और वो जीत गये। पार्टी में उनको तरजीह अधिक मिल रही थी। अब अजित पवार ने शपथ तो ले ली है लेकिन उनके पास सिर्फ़ पांच विधायक ही बचे हैं. ऐसे में वो एनसीपी में अलगाव पैदा करके विधायकों को अपने साथ ला पाएंगे, ये मुश्किल लगता है. देवेंद्र फडणवीस के शपथ लेने के बावजूद अगर आज महाराष्ट्र में अगर किसी के पास ताकत है तो शरद पवार के पास है. फिर चाहे वो अलग-अलग पार्टियों के साथ रिश्तों के मामले में हो या फिर संख्याबल के बारे में.
मिशन नाकाम रहा तो क्या होगा? अगले कुछ दिनों में क्या होगा, अभी इस बारे में ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता. यह भी ठीक-ठीक नहीं मालूम कि किस पार्टी के विधायक किसके संपर्क में हैं। राजनीति और क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है.'' यह बयान नितिन गडकरी ने कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात पर दिया था. उनके ये शब्द तब सच साबित हो गए जब महाराष्ट्र सहित देश की अधिकांश जनता शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनने की ख़बरें सुनते हुए सोने के लिए गई लेकिन सुबह उठी तो बीजेपी के नेता देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे और उनके साथ एनसीपी के प्रमुख नेता अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.
कुछ पल के लिए आम जनता ही क्या राजनीतिक जगत की हर ख़बर सूंघने का दम भरने वाले बड़े पत्रकार और कई नेता अचंभे में थे. धीरे-धीरे ख़बरें खुलने लगीं और मालूम चला कि रात ही रात में बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने की पेशकश की.
इसके बाद राज्यपाल ने प्रदेश में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की प्रक्रिया प्रारंभ की और सुबह तड़के देवेंद्र फडणवीस को राज्य की कमान सौंप दी गई. महाराष्ट्र के इतिहास में 22 नवंबर की रात हमेशा के लिए दर्ज हो गई. पूरी रात महाराष्ट्र की सत्ता की चाभी एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन में किस तरह निकली या निकाली गई, यह अपने-आप में बेहद दिलचस्प है.
मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक ये पूरा खेल 22 नवंबर को देर शाम शुरू हुआ जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार करीब 54 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास पहुंचे. इसके बाद देर रात देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से मुलाक़ात की और सरकार बनाने का दावा पेश किया. उन्होंने अपने साथ एनसीपी के विधायकों के समर्थन की बात बताई.
इसके बाद मामला पूरी तरह राजधानी दिल्ली शिफ्ट हो गया. राज्यपाल कोश्यारी ने केंद्र को इस पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया, इसके बाद राष्ट्रपति भवन तक जानकारी भेजी गई. शनिवार यानी 23 नवंबर की सुबह 5.47 मिनट पर केंद्र ने महाराष्ट्र में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की बात कही. महाराष्ट्र में राज्यपाल ने 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया था.
राष्ट्रपति शासन हटते ही महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया और फिर सुबह करीब 7.30 बजे देवेंद्र फडणवीस ने राजभवन में शपथ ग्रहण कर ली. जिस तरह से बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से रात ही रात में सरकार बनाई उसे विपक्षी दल असंवैधानिक बता रहे हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस मामले पर अपनी मंजूरी पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए लिखा, ''संविधान के आर्टिकल 356 के खण्ड दो में दिए गए अधिकारों के तहत, मैं राम नाथ कोविंद, भारत का राष्ट्रपति, मेरे द्वारा 12 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को, 23 नवंबर 2019 को हटाए जाने का आदेश देता हूं.''
अगर संविधान के नियमों के हिसाब से देखें तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं हुआ है, लेकिन नैतिकता के आधार पर यह कोई अच्छा उदाहरण नहीं है. राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं, उन्हें अगर लगता है कि कोई दल सरकार बनाने के लिए बहुमत साबित कर सकता है तो वह उसे निमंत्रण भेज सकते हैं. लेकिन बीजेपी पहले ही राज्यपाल के सामने सरकार ना बनाने की बात कह चुकी थी ऐसे में उन्हें दोबारा सरकार बनाने का मौका देना नैतिकता के आधार पर सही नहीं है. महाराष्ट्र में 12 नवंबर से राष्ट्रपति शासन जारी था. 23 नवंबर की रात इसे हटाया गया और उसके बाद सरकार का गठन हुआ.
सवाल उठाया जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी की ज़रूरत होती है, ऐसे में रात भर में कैबिनेट की मंजूरी कैसे ली गई?
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यह 'एलोकेशन ऑफ़ बिज़नेस रूल्स' के रूल नंबर 12 के तहत लिया गया फ़ैसला है और वैधानिक नज़रिए से बिल्कुल ठीक है.
रूल नंबर 12 कहता है कि प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वे एक्सट्रीम अर्जेंसी (अत्यावश्यक) और अनफ़ोरसीन कंटिजेंसी (ऐसी संकट की अवस्था जिसकी कल्पना न की जा सके) में अपने-आप निर्णय ले सकते हैं. संविधान में यह बताया गया है कि जब भी राष्ट्रपति कोई निर्णय लेते हैं तो वह इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी लेते हैं. अब इस मामले में कैबिनेट की बैठक कब हुई यह साफ़ नहीं है. फिर भी नियमों के अनुसार अगर प्रधानमंत्री अकेले भी राष्ट्रपति के फै़सले पर मंजूरी देते हैं तो वह भी कैबिनेट की ही मंजूरी मानी जाती है.'
इस बीच एक बार फिर संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल की भूमिका सवालों के घेरे आ गई है. सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर उन्होंने एनसीपी के किन विधायकों के समर्थन की चिट्ठी प्राप्त की और अगर उनके पास देवेंद्र फडणवीस सरकार बनाने के लिए आए भी तो उन्होंने सुबह तक का इंतज़ार क्यों नहीं किया? कांग्रेस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर अमित शाह के हित के लिए काम करने का आरोप लगाया. यह बातें निश्चित तौर पर राज्यपाल पर सवाल उठाने का काम करती हैं. उन्हें देवेंद्र फडणवीस से पूछना चाहिए था कि सरकार बनाने के लिए जो विधायक उनके साथ हैं उनके सिर्फ हस्ताक्षर ही नहीं चाहिए वो खुद भी राजभवन में मौजूद होने चाहिए.
ख़ैर फडणवीस के शपथ ग्रहण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शिव सेना ने देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका दायर की. अब देश की सर्वोच्च अदालत ही यह फ़ैसला करेगी कि रात में बनी इस सरकार में कितने नियमों को ताक रखा गया.
अब चर्चा में है दल बदल कानून। आइए हम आपको समझाते हैं इस कानून के बारे में। दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके. 1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था. उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा ख़ूब प्रचलित था. दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद आया राम गया राम प्रचलित हो गया.
लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई. संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वें संशोधन था. इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.
कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
3. अगर कोई सदस्य पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करता.
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.
लेकिन इसमें अपवाद भी है......
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी. वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया. इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया. विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.
तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून:
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा. पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवेधानिक क़रार दे दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.
एनसीपी के 54 विधायक हैं, अगर अजित पवार 36 विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो दल-बदल क़ानून उन पर लागू नहीं होगा। अगर वो इतने नंबर नहीं ला पाते, तो उनकी सदस्यता जा सकती है.
अब मुझे कुछ और संदेह है कि इसमें एक बहुत बारीक चीज आप लोगों ने देखी हो तो ये कि अजीत पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन ये भी कह रहे हैं कि हम एनसीपी में हैं और हमारे नेता भी शरद पवार हैं। एनसीपी ने अपना विधायक दल का नेता तो बदला लेकिन कानूनी तौर पर इसके बदलने का क्या प्रावधान है नहीं पता। क्या अजीत पवार का रोल नहीं है उसमें? एनसीपी ने अभी तक आधिकारिक तौर पर अपना चीफ व्हिप किसी को नहीं बनाया है तो हो सकता है कि राज्यपाल या सुप्रीम कोर्ट व्हिप जारी करने का अधिकार अजीत पवार को दे दें? और याद रहे कि वो पार्टी के महासचिव भी हैं।
और फ्लोर टेस्ट के दिन अजीत पवार बीजेपी के समर्थन में व्हिप जारी कर दें और एनसीपी विधायक विरोध में अपना वोट दे दें तो उनकी सदस्यता चली जाए। और बहुमत का आकडा ही खिसक कर 215/20 तक आ जाए? आप बीजेपी की खामोशी और आज उसके मुम्बई अध्यक्ष आशीष सेलार के बयान (अभी भी संवैधानिक तौर पर एनसीपी के विधायक दल के नेता अजीत पवार ही हैं,) से अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी रणनीति क्या हो सकती है।
एक दोस्त ने इसके जवाब में बताया कि महाराष्ट्र में एनसीपी विधानमंडल दल के नेता को लेकर तमाम मित्रों में संदेह है, विधानमंडल दल का नेता चुनने का अधिकार विधायकों (या बहुमत से विधायकों को) को है उन्होंने पहले अजित पवार को चुना लेकिन अगले दिन 41 विधायकों ने जयंत पाटिल को विधानमंडल दल का नेता चुन लिया। जो विधानमंडल दल का नेता होगा उसे व्हिप चुनने का अधिकार है अगर वो ऐसा नहीं करता है तो व्हिप की पावर विधानमंडल दल के नेता के पास ही रहेगी। यहां तक की अगर कल फिर एनसीपी अपना विधानमंडल दल का नेता बदलना चाहती है तो विधायक बहुमत से ऐसा फिर कर सकते हैं और स्पीकर से लेकर राज्यपाल दोनों के पास ये अधिकार नहीं है कि विधायकों के चुने हुए नेता के चुनाव को खारिज कर दे। बस इस परिवर्तन की सूचना पार्टी को राज्यपाल को देनी होती है जो जयंत पाटिल राजभवन जाकर दे चुके हैं और एहतियातन कल सभी विधायकों का साइन किया हुआ एफिडेविट भी सुप्रीम कोर्ट में जमा करेगी।