इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत पसंद किया जा रहा है. इसमें कन्दिल बलोच की कहानी है, और इरफ़ान रिंद ने डायरेक्ट किया है. पंजाबी और उर्दू मिक्स गजब की भाषा और जगह सिंध-पंजाब की है. सबा कमर की एक्टिंग का तो मैं पहले से ही "हिन्दी मीडियम" फिल्म से दीवाना हूँ, इसमें तो वो पर्दे पर एक्टिंग को असलियत में ढाल देती हैं.
इस ड्रामा का सबसे महत्वपूर्ण उसकी भाषा है, फिर उसका बैक ग्राउन्ड जो पंजाब (पाकिस्तान) के गाँव का है. उसमें खेत खलियान, हरियाली से लेकर मिट्टी से बने घर, छप्पर, गोबर की लिपाई, दीवारों पर पीली मिट्टी की फीनिया, और तालाब. ये सब चीज़ें ड्रामा को एक खूबसूरती देते हैं. कहानी में बिल्कुल आम लड़की जो आम घर में पैदा हुई बड़े सपने लेकर. उसकी नादानियाँ जो समाज की हक़ीकत से परे थी. फिर वो जवान हुई तो भाई और बाप के ज़ोर में शादी करने को तैयार तो हुई लेकिन निकाह से भाग गई. वो आवाज़ उठाकर लड़ती है और फिर प्रेम में पड़ जाती है. हर प्रेमी की तरह उसका वाला भी सपने पूरे करने के सपने दिखाता है, उसी झाँसे में आकर वो अपने प्रेमी से शादी करती है. फिर आम महिला सी जिंदगी घर के काम, चौका बर्तन में सिमट कर सपनों की बलि चढ़ा लेती है. हर आम प्रेम कहानी की तरह उसका पति भी बदल जाता है, खुद को परमेश्वर समझ कर बार बार उसको, " तू औरत है, औकात में रह......." कहकर हुकुम झाड़ता रहता है. फिर बच्चा पैदा हुआ, और पति किसी और के प्यार में पड़ जाता है. इस बीच बीच में वो पति से लड़ती रहती है, लेकिन जब वो गर्भवती होती है उसी समय उसका पति उसको तलाक़ देकर घर से निकल देता है, और वो परिवार व मौलवी द्वारा डरा धमकाकर फिर उसके यहाँ भेज दी जाती है. लेकिन वो कहीं अख़बार या टीवी से धर्म में महिलाओं को मिली आज़ादी पर समझ बनाना शुरू कर देती है, और पुरुष प्रधान समाज का पुरुष वहाँ चिढ़ना शुरू कर देता है. वो तीन तलाक़, बहु विवाह, परदा, महिलाओं के अधिकार, उसके घर से निकलने आदि पर बात करती है. फिर एक बार बग़ावत कर देती है. यहीं तक अभी 6 एपीसोड में दिखाया है. लेकिन कन्दिल बलोच की कहानी पढ़ने पर पता चला कि वो पति को छोड़कर खुद अपने दम पर गायक और मॉडल बनेगी, फिर शहरी फेम में व्यस्त जिंदगी से तंग आकर आत्म हत्या कर लेती है. अभी तक जितना भी देखा बेहतरीन था. भारतीय सीरियल्स से तो नफ़रत होती है, लेकिन उसमें कहीं भी बोरियत और अश्लीलता ना होते हुए बहुत अच्छा सिनेमैटोग्राफ किया है. डायलॉग राइटिंग जिसकी भी है बहुत गजब है. अपने यहाँ के सीरियल्स के जैसे सास बहू और वो ख़तरनाक म्यूजिक नहीं है. सबसे बड़ी बात है इसमें समाज में उठी आवाज़ काफ़ी दूर तक जाएगी. ये बात कुछ कट्टर पंथियों को खराब भी लगी, लेकिन काफ़ी लोगों ने पसंद भी किया है. कम से कम हमारे यहाँ ऐसे सीरियल्स का आना भी बहुत ज़रूरी है. और इनको ये सीखना होगा कि हर सीरियल में मेहता और सिंघानिया साहब जैसे करोड़पति कैरेक्टर ही क्यों होते हैं, आम इंसान का संघर्ष क्यों नहीं?
पाकिस्तान की एक एक्ट्रेस हैं सबा कमर. जिनकी पहली भारतीय फिल्म " हिन्दी मीडियम" बहुत अच्छी थी. फिर मुझे उसकी एक्टिंग पसंद आ गई तो उसके बाद एक फिल्म लाहौर से आगे देखी थी, जो काफ़ी अच्छी अच्छी थी. ये मैने पहली बार कोई पाकिस्तानी फिल्म देखी थी. पाकिस्तान का सिनेमा लगभग नकारा ही माना जाता है, बशर्ते वहाँ के सीरियल्स काफ़ी अच्छे होते हैं. वहाँ सीरियल्स का बड़ा इतिहास रहा है. वो भी सास बहू वाले एकता कपूर के जैसे नहीं बड़े बड़े लेखकों के लिखे ड्रामा वाले सीरियल्स. क्योंकि वो लेखक डीडी उर्दू या पाकिस्तान रेडियो में काम करते हैं, किसी को फिल्म उद्योग में इतनी दिलचस्पी नहीं. इसलिए वो सिनेमा अलग ही सिमट कर रह गया.
No comments:
Post a Comment