Saturday, October 31, 2020

बिहार चुनाव में चिराग फैक्टर

बिहार चुनाव के पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुआ है, उन जगहों से मिल रहे फ़ीडबैक के मुताबिक़ चिराग की पार्टी भले ही बहुत बड़ा करिश्मा नहीं करने जा रही हो लेकिन उनके उम्मीदवारों ने जनता दल यूनाइटेड खेमे की नींद उड़ा दी है. इन उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर ही चिराग पासवान दावा कर रहे हैं कि नीतीश कुमार किसी भी हाल में 10 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे, हालांकि वे यह दावा भी करते हैं कि बीजेपी-एलजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगी. पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुए हैं, उनमें से 42 सीटों पर चिराग पासवान ने अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 18-20 सीटों पर उनके उम्मीदवार जितने वोट जुटाने का दावा कर रहे हैं, उससे जनता दल यूनाइडेट के उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. चिराग को उम्मीद है कि आने वाले दो चरणों में भी उनके उम्मीदवार यही करने जा रहे हैं.  एनडीए के समर्थकों और ख़ासकर जनता दल यूनाइटेड के समर्थकों का कहना है कि चिराग पासवान के चलते कुछ जगहों पर समीकरण प्रभावित हो रहा है. जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता प्रगति मेहता कहते हैं कि चिराग पासवान के दावों की हक़ीक़त 10 नवंबर को सामने आ जाएगी, क्योंकि बिहार में नीतीश कुमार से बड़ा चेहरा कोई नहीं है और लोगों का भरोसा उन पर बना हुआ है. 
वहीं, दूसरी ओर चिराग पासवान की सारी रणनीति नीतीश कुमार की सीटों को कम से कम करने पर फोकस दिखती है. उनकी बातों से ज़ाहिर होता है कि वे इस चुनाव को रणनीतिक स्तर पर कम और भावनात्मक स्तर पर ज़्यादा लड़ रहे हैं और उनकी इस लड़ाई के चलते ही तीन महीने पहले तक सुनिश्चित दिख रही बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की जीत अब आसान नहीं लग रही है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि वो वजहें क्या रहीं जिसके चलते चिराग़ पासवान उस स्तर तक पहुँच गए जहां से वे नीतीश कुमार के लिए ख़तरे की घंटी बन गए हैं. इसकी भूमिका कोई एक-दो महीने में नहीं बनी है. चिराग के पिता रामविलास पासवान की राजनीति का शत-प्रतिशत हिस्सा केंद्र में गुजरा था और वे बिहार पर उस तरह से फ़ोकस नहीं कर पाए थे जिसकी महत्वाकांक्षा हर नेता को होती है. पार्टी की कमान थमाने के साथ-साथ उन्होंने यह दायित्व भी चिराग को सौंपा था. बिहार की राजनीति को गंभीरता से लेते हुए नवंबर, 2019 में लोक जनशक्ति पार्टी ने एक सर्वे कराया. सर्वे का सैंपल साइज़ महज़ 10 हज़ार था लेकिन उससे चिराग और उनकी टीम को एक आइडिया लगा कि बिहार की जनता क्या चाहती है. उस सर्वे में शामिल क़रीब 70 प्रतिशत लोगों ने नीतीश कुमार को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की थी. इस सर्वे के आकलन के बाद चिराग ने यह भांप लिया कि बिहार की राजनीति में स्पेस है जिसको भरने की कोशिश होनी चाहिए और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष स्तर के लोगों तक यह फ़ीडबैक पहुँचाया कि बिहार में नीतीश कुमार को लेकर भारी नाराज़गी है. NDA में रहते हुए चिराग पासवान की टीम ने यह रणनीति बनाई कि नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ आक्रोश को काउंटर करने के लिए उनके ख़िलाफ़ सवाल पूछे जाने चाहिए. फ़रवरी आते-आते उन्होंने बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट का कॉन्सेप्ट तैयार कर लिया. जिसमें बिहार के आम लोगों की ज़रूरतों को देखते हुए कई पहलूओं को शामिल किया गया. चिराग़ इस डॉक्यूमेंट को लेकर कितने गंभीर थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसकी प्रति को समाज के विभिन्न तबके के हज़ारों लोगों को पढ़वाया और उनकी राय को जोड़ते हुए इसे सार्वजनिक किया गया. चिराग़ ने इसके बाद नीतीश कुमार के सात निश्चय और दूसरे मुद्दों पर सवाल पूछना शुरू किया. उन्हें लगा कि नीतीश कुमार की तरफ़ से उनके सवालों के जवाब आएँगे लेकिन यह नहीं हुआ. इन सब मुद्दों पर बात करने के लिए चिराग पासवान ने नीतीश कुमार से फ़रवरी, 2020 में वक़्त माँगा. तीन दिन तक वे पटना में इंतज़ार करते रहे लेकिन नीतीश कुमार के दफ़्तर से उन्हें मिलने का वक़्त नहीं मिला. अभी बिहार चुनाव के दौरान चिराग की रणनीति के पीछे प्रशांत किशोर का दिमाग़ होने की बता कहने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. लेकिन, यह जानना दिलचस्प है कि फ़रवरी, 2020 में नीतीश कुमार से समय नहीं मिलने के बाद चिराग पासवान की टीम आगे की रणनीति के लिए प्रशांत किशोर से भी मिली थी. चिराग पासवान की टीम के एक सदस्य के मुताबिक़, उस बैठक में प्रशांत किशोर ने हमारे आइडिया में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. अगर वे साथ आ जाते तो हमारी स्थिति और भी बेहतर होती क्योंकि उनके पास एक पूरी टीम है जो इस काम को आसानी से मैनेज कर सकती थी. 
यहाँ यह भी देखना होगा कि प्रशांत किशोर ने बिहार की बात का एलान मार्च, 2020 में किया था, जिससे एक महीना पहले चिराग बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट का विजन जारी कर चुके थे. इस बीच में लॉकडाउन के चलते बिहार में नीतीश कुमार के तौर-तरीक़ों की खासी आलोचना हुई और उनके प्रति नाराज़गी बढ़ी. एक और बात ये हुई कि तत्कालीन खाद्य आपूर्ति मंत्री के तौर पर रामविलास पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के बीच तल्खियाँ बढ़ गईं. लॉकडाउन के दौरान आम लोगों को मुफ़्त में अनाज वितरित करने के मुद्दे पर दोनों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी. लेकिन अगस्त, 2020 तक चिराग अलग रास्ता ले लेंगे यह तय नहीं हो पाया था. इसी दौरान किसी इंटरव्यू में उनसे पूछ लिया गया कि बिहार का अग़ला मुख्यमंत्री कौन होगा, तो उन्होंने कहा कि बीजेपी जिसे बनाएगी, वे उनके साथ हैं. इन बयानों से भी यह झलकने लगा था कि चिराग़ पासवान अपनी राह अलग लेने वाले हैं, वैसे भी उनकी पार्टी ने बिहार में कभी जनता दल यूनाइडेट के साथ चुनाव नहीं लड़ा था. इसके अलावा चिराग की अपनी पार्टी का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा ने भी जन्म ले लिया और उन्हें लगा कि उनके पास खोने को कुछ भी नहीं है. आख़िर बिहार की 2015 की विधानसभा चुनाव में उनके महज़ दो विधायक ही चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे. इस दौरान बिहार में एनडीए की रूपरेखा की एक मीटिंग में बिहार बीजेपी के एक प्रभावी नेता ने ये कहा कि चिराग पासवान की पार्टी के गठबंधन में शामिल होने से 20 सीटें ज़्यादा आएंगी लेकिन उनके बिना भी 160 से ज़्यादा सीटें आ जाएंगी. चिराग को यहां भी लगा कि गठबंधन के साथ रहने पर उनकी उतनी अहमियत नहीं रहेगी जितनी अकेले जाने से हो सकती है. सीटों के बँटवारे की चर्चाओं के बीच तीन अक्टूबर को चिराग पासवान ने बिहार में अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ़ से कभी उन्हें यह नहीं कहा गया कि वे चुनाव में अकेले ना लड़ें. वे लगातार बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बने रहने की बात करते रहे.

बिहार के पहले चरण के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तारीख़ 12 अक्टूबर थी, आठ अक्टूबर को राम विलास पासवान का निधन हो गया, नौ को उनका अंतिम संस्कार करने के बाद चिराग ने आख़िरी 48 घटों में उम्मीदवारों के नाम फाइनल किए. वो दुख के इन पलों में रणनीतिक तौर पर नहीं डगमगाए. इसमें दिनारा से राजेंद्र सिंह पालीगंज से बीजेपी की पूर्व विधायक रहीं उषा विद्यार्थी और सासाराम से रामेश्वर चौरसिया जैसे बीजेपी के बड़े नेताओं को टिकट दिया गया, जिससे यह संदेश भी लोगों तक गया है कि एलजेपी बीजेपी के साथ मिलकर जनता दल यूनाइटेड को साइडलाइन करने जा रही है.

ऐसी ही एक सीट शेखपुरा की बरबीघा भी है, जहां से महागठबंधन के उम्मीदवार कांग्रेस नेता गजानंद शाही हैं और उनकी स्थिति इस वजह से मज़बूत हो गई है क्योंकि चिराग़ पासवान ने पिछली विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार डॉ. मधुकर को टिकट दे दिया. जिसके चलते जेडीयू उम्मीदवार सुदर्शन कुमार की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

लेकिन, चिराग की मौजूदा रणनीति इसलिए ज़्यादा मुफ़ीद दिख रही है क्योंकि अगर वे कम से कम 15-20 सीट ले आते हैं तो उनके बिना कोई सरकार नहीं बन पाएगी. लेकिन, चिराग इन दिनों इस बात पर ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं कि उनका कौन-सा उम्मीदवार नीतीश कुमार के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है. इस लड़ाई में उनका एक फ़ायदा तो यह हुआ है कि बिहार फ़र्स्ट की बात कह कर वे बिहार के युवाओं के बीच जगह बनाने में कामयाब हुए हैं, यही वजह है कि उनकी सभाओं में ठीक-ठाक भीड़ आ रही है. इतना ही नहीं उन्होंने एक झटके में 143 विधानसभा सीटों पर पार्टी का ढाँचा, संगठन और उम्मीदवार खड़े कर लिये हैं. अब उनकी नज़र विधानसभा सीटों से ज़्यादा वोट प्रतिशत बढ़ाने की है, इसमें वो कामयाब होते दिख रहे हैं. दरअसल, चिराग जिस रणनीति के ज़रिए मैदान में उतरे हैं, उससे उनका अपना और बीजेपी का फ़ायदा तो दिख रहा है लेकिन, जेडीयू का नुक़सान तय है. यही वजह है कि जब तीन अक्टूबर को उन्होंने अलग चुनाव लड़ने की घोषणा की तो नीतीश कैंप की ओर से उन्हें एक दिन में दर्जनों बार फ़ोन किए गए. लेकिन, तेजस्वी यादव की सभा में उमड़ती भीड़ ने बीजेपी को आशंकित किया है कि कहीं चिराग के चलते गठबंधन का इतना नुक़सान ना हो जाए जिससे सरकार के गठन में ही मुश्किलें आ जाएं. ऐसी सूरत में भी चिराग पासवान अपनी अहमियत साबित कर देंगे कि उनके पास एक ट्रांसफर होने लायक वोटबैंक है.

Tuesday, October 6, 2020

आर्मेनिया अजरबैजान युद्ध


इस विवाद के केंद्र में नागोर्नो-काराबाख का पहाड़ी इलाक़ा है जिसे अज़रबैजान अपना कहता है, हालांकि 1994 में ख़त्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाक़े पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है. 1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध के दौरान 30 हज़ार से अधिक लोगों को मार डाल गया और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए थे. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया, हालांकि 1994 में युद्धविराम के बाद भी यहां गतिरोध जारी है. कल रात नागोर्नो-काराबाख के अधिकारियों ने कहा कि लड़ाई में उनकी सेना के 26 और लोग मारे गए हैं जिसके बाद मरने वालों की कुल संख्या 80 तक पहुंच गई है.

इस विवाद को लेकर अब चिंता जताई जा रही है कि इसमें तुर्की, रूस और ईरान भी कूद सकते हैं. इस इलाक़े से गैस और कच्चे तेल की पाइपलाइनें गुज़रती है इस कारण इस इलाक़े के स्थायित्व को लेकर जानकार चिंता जता रहे हैं. एक दूसरे पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाने के बाद रविवार को आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया. इसके बाद दोनों पक्षों ने कहा कि उन्होंने सीमा पर सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है और कई इलाक़ों में मार्शल लॉ लगा दिया है. इससे पहले यहां साल 2016 में भी भीषण लड़ाई हुई थी जिसमें 200 लोगों की मौत हुई थी. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों के अनुसार रविवार को यहां 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि सौ से अधिक लोग घायल हुए थे.

वहीं समाचार एजेंसी इंटरफैक्स ने अर्मीनियाई अधिकारियों को ये कहते बताया है कि वहाँ अब तक दो सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं. और अज़रबैजान में अधिकारियों का कहना है कि रविवार को कुछ लोगों की मौत हुई है जबकि तीस से अधिक घायल हुए हैं. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों ने दावा किया है कि रविवार को जिन इलाक़ों पर अज़रबैजान के सैनिकों ने कब्ज़ा किया था उन्हें फिर छुड़ा लिया गया है.  वहीं अज़रबैजान सरकार ने सोमवार को कहा है कि विवादित इलाक़े में रणनीतिक तौर पर अहम कुछ जगहों को उनकी सेना ने कब्ज़े में ले लिया है. जुलाई में सीमा पर हुई हिंसा में 16 लोगों की मौत के बाद अज़रबैजान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस इलाक़े को देश अपने कब्ज़े में ले.

पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके आर्मीनिया और अज़रबैजान नागोर्नो-काराबाख के इलाक़े को लेकर 1980 के दशक में और 1990 के दशक के शुरूआती दौर में संघर्ष कर चुके हैं. दोनों ने युद्धविराम की घोषणा भी की लेकिन सही मायनों में शांति समझौते पर दोनों कभी सहमत नहीं हो पाए. दक्षिणपूर्वी यूरोप में पड़ने वाली कॉकेशस के इलाक़े की पहाड़ियां रणनीतिक तौर पर बेहद अहम मानी जाती हैं. सदियों से इलाक़े की मुसलमान और ईसाई ताकतें इन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती रही हैं. 1920 के दशक में जब सोवियत संघ बना तो अभी के ये दोनों देश - आर्मीनिया और अज़रबैज़ान - उसका हिस्सा बन गए. ये सोवियत गणतंत्र कहलाते थे.

नागोर्नो-काराबाख की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है लेकिन सोवियत अधिकारियों ने उसे अज़रबैजान के हाथों सौंप दिया. इसके बाद दशकों तक नागोर्नो-काराबाख के लोगों ने कई बार ये इलाक़ा आर्मीनिया को सौंपने की अपील की. लेकिन असल विवाद 1980 के दशक में शुरू हुआ जब सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ और नागोर्नो-काराबाख की संसद ने आधिकारिक तौर पर खुद को आर्मीनिया का हिस्सा बनाने के लिए वोट किया.

इसके बाद यहां शुरू हुए अलगाववादी आंदोलन को अज़रबैजान ने ख़त्म करने की कोशिश की. हालांकि, इस आंदोलन को लगातार आर्मीनिया का समर्थन मिलता रहा. नतीजा ये हुआ कि यहां जातीय संघर्ष होने लगे और सोवियत संघ से पूरी तरह आज़ाद होने के बाद एक तरह का युद्ध शुरू हो गया.

यहां हुए संघर्ष के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा. दोनों पक्षों की तरफ़ से जातीय नरसंहार की ख़बरें भी आईं. साल 1994 में रूस की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा से पहले नागोर्नो-काराबाख पर आर्मीनियाई सेना का क़ब्ज़ा हो गया. इस डील के बाद नागोर्नो-काराबाख अज़रबैजान का हिस्सा तो रहा लेकिन इस इलाक़े पर अलगाववादियों की हूकूमत रही जिन्होंने इसे गणतंत्र घोषित कर दिया. यहां आर्मीनिया के समर्थन वाली सरकार चलने लगी जिसमें आर्मीनियाई जातीय समूह से जुड़े लोग थे.

इस डील के तहत नागोर्नो-काराबाख लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट भी बना, जो आर्मीनिया और अज़रबैजान के सैनिकों को अलग करता है. इस इलाक़े में शांति बनाए रखते के लिए 1929 में फ्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में बनी ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता जारी है लेकिन अब तक किसी समझौते तक पहुंचा नहीं जा सका है. भौगोलिक और रणनीतिक तौर पर अहम होने के कारण भी ये विवाद जटिल हो गया है. अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नैटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कह दिया. आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी. ताज़ा विवाद गहराया तो तुर्की एक बार फिर अपने मित्र के समर्थन में आ गया. वहीं आर्मीनिया के रूस के साथ गहरे संबंध हैं. यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं.

हालांकि, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अज़रबैजान के साथ भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं और उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम की अपील की है. साल 2018 में आर्मीनिया में लंबे वक्त से गद्दी पर रहे शेर्ज़ सार्गिसान के ख़िलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रद्रर्शन हुए. इसके बाद इसी साल हुए निष्पक्ष चुनाव में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे निकोल पाशिन्यान को प्रधानमंत्री चुन लिया गया. इसके बाद हुई बातचीत में पाशिन्यान और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीव के बीच सीमा पर तनाव कम करने और दोनों देशों के बीच पहली मिलिटरी हॉटलाइन शुरू करने पर सहमति बनी. साल 2019 में दोनों देशों ने एक बयान जारी कर कहा कि इस इलाक़े में शांति स्थापित करने के लिए दोनों देशों को कारगर कदम उठाने की ज़रूरत है.

हालांकि अब तक ऐसा कुछ होता नज़र नहीं आया है. अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि ताज़ा तनाव की शुरूआत किसने की है, हालांकि जुलाई के बाद के महीनों से लगातार इस इलाक़े में तनाव अपने चरम पर था. तुर्की के राष्ट्रपति के मुख्य सलाहकार इलनूर चेविक ने आर्मीनिया के आरापों का खंडन किया है कि तुर्की इस लड़ाई में सीधे तौर पर शामिल है. हालांकि उन्होंने कहा कि नागोर्नो-काराबाख में अज़रबैजान जितना संभव हो सके आगे बढ़े और इस इलाक़े से आर्मीनिया तुरंत पीछे हटे. उन्होंने कहा, "ये बात सभी तो मालूम होनी चाहिए कि तुर्की और अज़रबैजान 'दो देश एक राष्ट्र' की तरह हैं. अच्छा वक्त हो या बुरा हम दोनों साथ हैं. और आज भी हम उन अज़रबैजानी भाइयों के साथ हैं जो अपनी मातृभूमि को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आर्मीनिया तुरंत हमले बंद करे और विदेश से लाए सैनिकों को इस इलाक़े से पीछे हटाए. अज़रबैजान के जिस इलाक़े पर उसने कब्ज़ा किया है, वो वहां से पीछे हटे."

आर्मीनिया के विदेश मंत्री ज़ोहराब एमनासाकयान ने बीबीसी से कहा कि अज़रबैजान दशकों पुराने विवाद का शांतिपूर्ण हल खोजने से पीछे हट रहा है और अब नागोर्नो-काराबाख के पास अपनी रक्षा खुद करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है, और आर्मीनिया के पास भी नागोर्नो-काराबाख का समर्थन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. उन्होंने कहा, "हमारी प्राथमिकता है कि हम अज़रबैजान के हमले का जवाब दें और उसे बातचीत के लिए कदम बढ़ाने के लिए कहें."

वहीं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्मीनिया और अज़रबैजान से लड़ाई जल्द रोकने की अपील की है और कहा है कि मौजूदा हालातों से "वो काफी चिंतित हैं". अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसा रोकने के लिए अपील की है. फ्रांस ने भी दोनों देशों से तुरंत लड़ाई बंद कर बातचीत का रास्ता तलाशने की अपील की है. फ्रांस में बड़ी संख्या में आर्मीनियाई लोग रहते हैं. ईरान विवाद में फंसे दोनों देशों के साथ अपनी सीमा साझा करता है. उसने कहा है कि दोनों देश बातचीत की मेज़ पर आएं तो वो मध्यस्थता करने के लिए तैयार है. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों ने दावा किया है कि रविवार को जिन इलाक़ों पर अज़रबैजान के सैनिकों ने कब्ज़ा किया था उन्हें फिर छुड़ा लिया गया है.

वहीं अज़रबैजान सरकार ने सोमवार को कहा है कि विवादित इलाक़े में रणनीतिक तौर पर अहम कुछ जगहों को उनकी सेना ने कब्ज़े में ले लिया है. जुलाई में सीमा पर हुई हिंसा में 16 लोगों की मौत के बाद अज़रबैजान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस इलाक़े को देश अपने कब्ज़े में ले.

अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नैटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कह दिया. आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी.

वहीं आर्मीनिया के रूस के साथ गहरे संबंध हैं. यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं.हालांकि, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अज़रबैजान के साथ भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं और उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम की अपील की है.

अज़रबैजान और आर्मीनिया ने सोमवार को एक-दूसरे पर रिहाइशी इलाक़ों में हमले करने का आरोप लगाया है. दोनों देशों का कहना है कि दक्षिण कॉकेशस इलाक़े में पिछले 25 सालों में हो रही सबसे घातक लड़ाई में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. पश्चिमी मीडिया से मिल रही ख़बरों के अनुसार पर नागोर्नो-काराबाख़ के रिहाइशी इलाक़ों में अज़रबैजानी सैना क्लस्टर बम गिरा रही है. अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुसार क्लस्टर बम का इस्तेमाल प्रतिबंधित है. हालांकि न तो अज़रबैजान ने और न ही आर्मीनिया ने इससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेन्शन पर हस्ताक्षर किए हैं. 

तुर्की में सोमवार को दिखाए गए एक इंटरव्यू में अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हमा अलीयेव ने कहा कि इस लड़ाई को रोकने के लिए आर्मीनिया को नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों से अपनी सेना हटानी होगी. उन्होंने रविवार को राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा था, "हम किसी और देश की ज़मीन पर नज़र नहीं डाल रहे हैं लेकिन जो हमारा है उसे हमारा होना चाहिए."

वहीं, आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने भी पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दिए हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ उन्होंने सोमवार को फ़ेसबुक पर पिछले साल सेना से अलग होने वाले सैन्यकर्मियों से लड़ाई में शामिल होने की अपील की. नाटो प्रमुख जेंस स्टोलनबर्ग ने दोनों पक्षों से नागोर्नो-काराबाख़ में जारी तुरंत लड़ाई ख़त्म करने के लिए कहा है. उन्होंने तुर्की के दौरे के दौरान कहा कि इसका कोई सैन्य समाधान नहीं है. वहीं अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने भी कहा है कि युद्ध तो तुरंत रोका जाना चाहिए. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "ओएससीई मिंस्क समूह के सह-अध्यक्ष देशों के विदेश मंत्रियों ने नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों में हिंसा बढ़ने की निंदा की है. साथ ही तुरंत और बिना शर्त युद्धविराम की मांग की है." ओएससीई यानी ऑर्गेनाइजे़शन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कॉर्पोरेशन इन यूरोप एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन है.
इस बीच कनाडा ने सोमवार को तुर्की को हथियार देने से मना कर दिया है. सामाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार सोमवार को कनाडा ने नैटो के सदस्य तुर्की को हथियार देने से मना कर दिया है. कनाडा का कहना है कि आर्मीनिया-अज़रबैजान की लड़ाई में इन सैन्य उपकरणों के कथित इस्तेमाल की जांच होने तक इस तरह के समझौतों को निलंबित किया जा रहा है. मौजूदा हालातों के मद्देनज़र रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान से लड़ाई में हुए गंभीर नुक़सानों को लेकर चर्चा की है और जल्द युद्धविराम की घोषणा करने की अपील की है. आर्मीनिया की राजधानी येरेवान में लोगों ने काराबाख़ में लड़ रही अपनी सेना के लिए समर्थन जताया है. यहां के टाउन हॉल में एक बड़ी स्क्रीन लगाई गई है जिसमें देशभक्ति गाने बज रहे हैं और वहां रहने वाले लोगों ने गलियों में झंडे फहराने शुरू कर दिए हैं. दशकों से चले आ रहे दोनों देशों के विवाद में किसने पहले गोली चलाई, इस तरह के आरोप एक दूसरे पर मढ़ना आम बात है.

अज़रबैजान का दावा है कि उसने आर्मीनियाई नियंत्रण वाले इलाके को मुक्त करवा दिया है, तो आर्मीनियाई अधिकारी इसे ख़ारिज करते हैं. इसी तरह आर्मीनिया दावा करता है कि अज़रबैजान को काफी नुकसान पहुंचा है तो अज़रबैजान की तरफ से इसका खंडन किया जाता है. इसके अलावा अज़रबैजान ने देश में इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, ख़ास कर सोशल मीडिया पर.
रूस पारंपरिक रूप से आर्मीनिया का मित्र राष्ट्र रहा है, लिहाज़ा तुर्की का समर्थन अज़रबैजान को साहस दे सकता है क्योंकि अगस्त में ही अज़रबैजान के रक्षा मंत्री ने कहा था कि तुर्की की सेना की मदद से अज़रबैजान अपने 'पवित्र धर्म' को पूरा करेगा- दूसरे शब्दों में वो अपने गंवाए हुए क्षेत्रों को वापस ले सकेगा.







Monday, October 5, 2020

अमेरिकी चुनाव का गणित


उनके अनेक नज़दीकी सलाहकार और सहयोगी या तो जेल में हैं या मुक़दमों का सामना कर रहे हैं. कुछ उनके ख़िलाफ़ गवाह भी बने हैं. ताज़ा उदाहरण स्टीव बैनन का है, जो पिछले चुनाव के आख़िरी दौर में ट्रंप अभियान के मुखिया थे और राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने उन्हें अपने प्रशासन का प्रमुख रणनीतिक सलाहकार बनाया था. धोखाधड़ी के मामले में बैनन की गिरफ़्तारी अनेक वजहों से अहम है. एक तो यह है कि यह मसला सीमा पर दीवार बनाने से जो जुड़ा हुआ है, जो ट्रंप अभियान का सबसे बड़ा मुद्दा था. दूसरी वजह है कि फ़ेसबुक के डेटा को आपराधिक रूप से कैंब्रिज़ एनालाइटिका द्वारा इस्तेमाल करने और ऑनलाइन वेबसाइट ब्रीटबार्ट के प्लेटफ़ॉर्म से नफ़रत व झूठ से भरीं ख़बरें व लेख छापने तथा सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक विज्ञापन देने जैसी गतिविधियों के आरोप स्टीव बैनन पर लगे.

पिछले चुनाव में राजनीतिक नैतिकता और भद्रता की सीमाओं को जिस तरह से ट्रंप अभियान ने लांघा था, वह सब बैनन की ही रणनीति थी. बैनन यूरोप, एशिया और लातिन अमेरिका में धुर दक्षिणपंथी, संकीर्ण राष्ट्रवादी, नव-फ़ासीवादी राजनीति के न केवल समर्थक हैं, बल्कि उन्हें मदद करने और एक वैचारिक मंच पर लाने की कोशिश भी करते रहे हैं.

तीसरा कारण यह है कि पहले मानाफ़ोर्ट, कोहेन, रॉजर स्टोन जैसे ट्रंप के सहयोगियों के अपराधी साबित होने के बाद बैनन का गिरफ़्तार होना धुर दक्षिणपंथी राजनीति के लिए बड़ा झटका है तथा उनकी रही सही साख को इससे बहुत नुक़सान होगा. शायद ही उनकी कीचड़ उछालने और नफ़रत फैलाने की कोशिशों के लिए इस बार मौक़ा बन सकेगा. धुर दक्षिणपंथी पैंतरा इस दफ़ा काठ की हांडी साबित हो सकता है.

बहरहाल, तीन नवंबर में अभी कई दिन बाक़ी हैं. कई लोग कह रहे हैं कि अभी ट्रंप की हार और बाइडेन की जीत की भविष्यवाणी करना जल्दबाज़ी होगी. ऐसा कहने का बड़ा कारण यह है कि लोगों के ज़ेहन में 2016 की याद ताज़ा है, जब मतदान के दिन तक हिलेरी क्लिंटन तमाम सर्वेक्षणों में आगे थीं और बड़े-बड़े पॉलिटिकल पंडित मानकर बैठे थे कि बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस पहुंचने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लेकिन, आठ नवंबर को 304 डेलिगेट वोटों के साथ डोनाल्ड ट्रंप को जीत हासिल हुई. यह जुमला भी उछाला जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संभावनाएं भी संदर्भ और पृष्ठभूमि में ही घटित होती हैं.

पिछले चुनाव में हिलेरी क्लिंटन को ट्रंप से तीस लाख वोट ज़्यादा मिले थे और वे अमेरिकी चुनावी इतिहास में सबसे अधिक वोट पानेवाले उम्मीदवारों में दूसरे पायदान पर हैं. उन्हें 48 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि ट्रंप के खाते में 46 फ़ीसदी वोट गए थे. लेकिन अमेरिका में राष्ट्रपति वह व्यक्ति चुना जाता है, जिसे इलेक्टोरल कॉलेज के डेलीगेट वोट अधिक मिलते हैं.

साल 2016 में कुल 538 वोटों में से ट्रंप को 304 (306) वोट मिले थे और क्लिंटन को 227 (232) डेलीगेट वोटों से संतोष करना पड़ा था. अब तक हुए 54 चुनावों के डेलीगेट वोटों के आंकड़े देखें, तो उसमें ट्रंप के वोट 44वें स्थान पर हैं. आम तौर पर नतीजों में वही राष्ट्रपति बनता आया है, जिसे दोनों ही श्रेणियों में अधिक वोट मिलते हैं. लेकिन 2016 के अलावा 2000 में भी जॉर्ज डब्ल्यू बुश डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अल गोर से 5.44 लाख वोट कम पाकर भी डेलीगेट वोटिंग सिस्टम की वजह से राष्ट्रपति बन गए थे.

इससे पहले ऐसा संयोग 1888 के चुनाव में हुआ था. इस सिस्टम में हर राज्य के सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव के सदस्यों की संख्या के बराबर डेलीगेट होते हैं. माना जाता है कि अमेरिकी संविधान में इसकी व्यवस्था सीधे मतदान और कांग्रेस में प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन साधने के लिए की गयी थी.

तो 2016 की स्थिति फिर बन सकती है, लेकिन इस साल के अमेरिकी चुनाव की तुलना 2016 से करना बहुत हद तक ठीक नहीं है. हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी के सम्मेलन में ख़ुद हिलेरी क्लिंटन ने वोट डालने की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा है कि जो बाइडेन और कमला हैरिस की जोड़ी तीस लाख वोट अधिक लाकर भी चुनाव हार सकती है. एक तो यह है कि ओबामा और क्लिंटन से जुड़ी शिकायतों तथा ट्रंप से जुड़ी उम्मीदों का समीकरण बदला है. पिछले चुनाव में डेमोक्रेटिक सम्मेलन के बाद हिलेरी क्लिंटन ने सर्वेक्षणों में जो ऊंची छलांग लगायी थी, उस स्तर को बाइडेन सम्मेलन से पहले ही पार कर चुके हैं. फ़ाइव थर्टी एट ने विभिन्न सर्वेक्षणों का जो औसत निकाला है, उसके मुताबिक 19 अगस्त तक राष्ट्रीय स्तर पर बाइडेन 51.1 फ़ीसदी के साथ ट्रंप से 8.6 फ़ीसदी आगे थे.

इस साल बाइडेन को कुछ महत्वपूर्ण रिपब्लिकन नेताओं का समर्थन भी हासिल है. ओहायो के पूर्व गवर्नर और 2016 में पार्टी की ओर से राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के इच्छुक जॉन कसिच, न्यू जर्सी की पूर्व गवर्नर क्रिस्टीन व्हिटमैन, न्यूयॉर्क से पूर्व हाउस सदस्य सुज़न मोलिनरी, ट्रंप प्रशासन के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी माइल्स टेलर, पेंसिलवेनिया से पूर्व हाउस सदस्य चार्ली डेंट तथा राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में विदेश सचिव रहे कॉलिन पॉवेल ने कहा है कि देश को आज बाइडेन जैसे राष्ट्रपति की आवश्यकता है.

डेमोक्रेटिक सम्मेलन में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति उम्मीदवार रहे जॉन मैक्केन के परिवार ने दोनों नेताओं व परिवारों की दशकों की घनिष्ठता का हवाला देते हुए बाइडेन का समर्थन किया है. ट्रंप के चुनाव के बाद से बुश परिवार के सदस्य, पॉल रेयान और मिट रोमनी जैसे कई प्रभावशाली रिपब्लिकन दूरी बनाकर चल रहे हैं. वरिष्ठ रिपब्लिकनों द्वारा संचालित मंच ‘द लिंकन प्रोजेक्ट’ भी बाइडेन के समर्थन में है. यह मंच लगातार ट्रंप को निशाना बनाता रहता है और वे भी इसकी आलोचना करते रहते है.

गणित का हिसाब लगाने से पहले यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रंप द्वारा जीते गए राज्यों- विस्कोंसिन, मिशिगन और पेंसिलवेनिया- में 2018 के चुनावों में डेमोक्रेट पार्टी ने भारी जीत हासिल की थी. इन राज्यों के महत्व को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इनमें मिले 77,744 वोटों की बदौलत ही ट्रंप राष्ट्रपति बन सके थे. इन राज्यों से उन्हें कुल 46 डेलीगेट वोट हासिल हुए थे, जबकि इनमें हिलेरी क्लिंटन से उनकी जीत का अंतर एक फ़ीसदी से भी कम था.

ट्रंप पेंसिलवेनिया में 0.7 फ़ीसदी (44,292 वोट), विस्कोंसिन में 0.7 फ़ीसदी (22,748 वोट) तथा मिशिगन में 0.2 फ़ीसदी (10,704 वोट) से जीते थे. वाशिंगटन एक्ज़ामिनर के विश्लेषण में 2016 में बदलाव को रेखांकित करते हुए बताया गया था कि 2012 में इन तीन राज्यों में बराक ओबामा अच्छे अंतर से जीते थे, लेकिन 2016 में जहां राष्ट्रीय स्तर पर रिपब्लिकन पार्टी की तरफ तीन फ़ीसदी का झुकाव बढ़ा था, वहीं इन राज्यों में यह झुकाव छह से 10 फ़ीसदी बढ़ गया था. लेकिन 2018 में इन राज्यों में सीनेट की तीन सीटों और गवर्नरों के चुनाव में सभी सीटें डेमोक्रेट पार्टी ने अच्छे अंतर से जीत लीं. स्थानीय चुनाव में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था और राष्ट्रीय स्तर पर भी हाउस में बहुमत हासिल किया था. सर्वेक्षणों में इन तीन राज्यों में और कुछ अन्य बैटलग्राउंड/स्विंग राज्यों में बाइडेन बहुत बढ़त बनाये हुए हैं और 2016 का चमत्कार इस बार घटित होने की आशा बहुत क्षीण है. बैटलग्राउंड/स्विंग राज्य उनको कहा जाता है, जहां पलड़ा कभी रिपब्लिकन, तो कभी डेमोक्रेट के पाले में झुकता रहता है.

ऊपर के विवरण के साथ अगर आप बैटलग्राउंड/स्विंग राज्यों का विस्तार से हिसाब लगाएं, तो लड़ाई राज्यों में भी नहीं, बल्कि उनके कुछ काउंटी यानी इलाकों में तय होगी. द हिल ने कई विशेषज्ञों से चर्चा के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि ऐसे 10 इलाकें हैं, जहां के मतदाता अमेरिका के अगले राष्ट्रपति का निर्णय करेंगे और इनमें से ज़्यादातर जगहों में अभी बाइडेन आगे चल रहे हैं. द हिल की एक अन्य रिपोर्ट में रेखांकित किया है कि इस चुनाव में ट्रंप के पाले में 126 सुरक्षित और 78 ठोस झुकाव के वोटों के साथ 204 डेलीगेट वोट हैं और बाइडेन के पास 183 सुरक्षित और 18 ठोस झुकाव के वोटों के साथ 201 डेलीगेट वोट हैं. जीतने के लिए 538 में से कम-से-कम 270 वोटों की दरकार होगी.

तीन नवंबर को राष्ट्रपति के साथ हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव की सभी सीटों तथा सीनेट की 35 सीटों के लिए भी चुनाव होंगे. साल 2018 में 435 में से 235 सीटें जीतकर डेमोक्रेट ख़ेमे ने हाउस में बहुमत हासिल किया था. उसे बेदख़ल करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी को अभी की सीटों के अलावा 20 और सीटों को जीतना होगा. सीनेट में रिपब्लिकन का बहुमत है. वहां अब बहुमत के लिए डेमोक्रेट को तीन-चार सीटें जीतनी होंगी. इस बार रिपब्लिकन पार्टी अपनी 23 सीटें और डेमोक्रेटिक पार्टी अपनी 12 सीटें बचाने के लिए मैदान में है. जिस तरह के सर्वेक्षण आ रहे हैं और जैसा विशेषज्ञ बता रहे हैं, सीनेट में भी कड़ा मुक़ाबला हो सकता है तथा हाउस में डेमोक्रेटिक पार्टी अपना बहुमत बचा लेगी. कुल मिलाकर, अभी यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुसीबत बड़ी है.

Thursday, October 1, 2020

ट्रम्प v/s जो बाइडन (पहली डिबेट कौन जीता?)


अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली बहस में मंगलवार को बहुत ही तीख़ी ज़ुबानी जंग देखने को मिली.
बहस के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन के बीच काफ़ी तू-तू मैं-मैं हुई और दोनों नेताओं ने विभिन्न मुद्दों को लेकर एक-दूसरे पर छींटाकशी की.
यह एक ऐसी बहस थी, जिसका लाखों अमरीकियों को काफ़ी समय से इंतज़ार था, और बहस इतनी गर्मा-गर्म रहेगी, ऐसी भी बहुत से लोगों ने पहले ही उम्मीद की थी.
लेकिन सवाल ये है कि इस बहस का सुननेवालों पर क्या असर हुआ होगा? और डोनाल्ड ट्रंप-जो बाइडन के बीच हुई इस पहली बहस में किसे जीता हुआ समझा जाए?
पहली बहस में जो बाइडन का मक़सद अमरीकियों को यह दिखाना था कि वे दबाव की स्थिति का आसानी से सामना कर सकते हैं, बढ़ती उम्र कहीं से भी उनकी कमज़ोरी नहीं है और बहुत ही शांत ढंग से अपनी सारी बातें रख सकते हैं. बहस को देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने इस मक़सद को पूरा करने में सफल रहे. हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप लगातार उन्हें टोकते रहे और ट्रंप ने बाइडन को कम ही मौक़े दिए कि वे कुछ ऐसा कह पाएँ, जिससे ट्रंप के चुनावी अभियान को भारी चोट पहुँचे.
वहीं डोनाल्ड 'ट्विटर' ट्रंप ने भी क़रीब डेढ़ घंटे लंबी इस डिबेट में पूरा प्रदर्शन किया. लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि बहुत से अमरीकी, यहाँ तक कि उनके समर्थक भी, ट्रंप के सोशल मीडिया स्टाइल को उनके ऐसे गुणों में से एक मानते हैं, जो आकर्षक नहीं हैं.
ट्रंप को चाहिए था कि वे पहली ही बहस के ज़रिए चुनावी दौड़ को हिलाकर रख दें जो अब तक उनके ख़िलाफ़ जाती दिखी है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस उन 10 अमरीकी मतदाताओं में से सिर्फ़ एक मतदाता के नज़रिए को बदलने में सफल रही होगी, जो अभी भी यह तय नहीं कर पाए हैं कि वो किसे वोट करने वाले हैं.
यह स्पष्ट था कि ये बहस किस तरह की होगी. डोनाल्ड ट्रंप का उद्देश्य जो बाइडन को परेशान करना था और इसके लिए उन्होंने पूर्व उप-राष्ट्रपति को लगातार टोकने की योजना बनाई.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने बाइडन को कुल 73 बार बीच में टोका, जिसकी वजह से तीख़ी नोकझोंक भी हुई. ट्रंप ने बाइडन की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाया, तो बाइडन ने ट्रंप को जोकर कहा, उन्हें चुप कराया और यह तक कहा कि "क्या आप थोड़ा चुप रहोगे?" कई बार ऐसा हुआ कि जब ट्रंप ने जो बाइडन पर हमला किया, तो डेमोक्रेट नेता धीमे-धीमे मुस्कुराते रहे.
जब बहस के संचालक क्रिस वैलेस ने घोषणा की कि अगला विषय कोरोना वायरस है और राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों के पास अपना-अपना पक्ष रखने के लिए ढाई-ढाई मिनट होंगे, तो बाइडन ने ट्रंप को ताना मारा: "इस विषय के लिए शुभकामनाएँ." लोग कह रहे हैं कि इस प्रतिष्ठित बहस का संचालन मंगलवार की रात अमरीका में 'सबसे ख़राब काम' रहा होगा.
कोरोना वायरस महामारी हमेशा से ही राष्ट्रपति ट्रंप के बोलने के लिए मुश्किल विषय रहा है. मंगलवार की बहस में यह विषय काफ़ी शुरुआत में ही आ गया और डोनाल्ड ट्रंप को यह बताना था कि उन्होंने उस महामारी से लड़ने के लिए क्या किया, जिससे अमरीका में अब तक दो लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा किया भी. उन्होंने दलील दी कि उनके प्रशासन ने महामारी को रोकने के लिए कई क़दम उठाए, लोगों के बचाव के लिए फ़लां चीज़ें कीं, लेकिन जो बाइडन ने अपनी बातों से उनके लिए मुश्किलें पैदा कीं.
ट्रंप की दलीलों के जवाब में जो बाइडन ने कैमरे से नज़र मिलाते हुए, दर्शकों से पूछा कि 'क्या वो ट्रंप की इन बातों पर विश्वास करेंगे?' जो बाइडन ने कहा, "बहुत सारे लोग महामारी के कारण मारे जा चुके हैं, और अगर ट्रंप ने अपने काम करने की रफ़्तार नहीं बढ़ाई और वे पहले से ज़्यादा स्मार्ट नहीं बने, आगे भी बहुत सारे लोग इस महामारी से मारे जाएँगे."
ट्रंप ने बहस के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि जो बाइडन की रैलियों में बिल्कुल भीड़ नहीं दिखाई देती.
इसी दौरान उन्होंने कहा कि 'लोग चाहते हैं कि उनके काम-धंधों को खुलने दिया जाए.'
जिसके जवाब में जो बाइडन ने कहा, "लोग सुरक्षित भी रहना चाहते हैं."
इस बहस ने यह भी साफ़ किया कि दोनों नेताओं के बीच कोरोना वायरस महामारी और उससे लड़ने को लेकर कितना मतभेद है.
नस्लभेद के मुद्दे और शहरी हिंसा के मामलों पर बात करने को लेकर जो बाइडन तो सहज दिखे, लेकिन ट्रंप को देखकर ऐसा लगा कि वे इन विषयों पर ज़्यादा बात नहीं करना चाहते.
जो बाइडन ने राष्ट्रपति ट्रंप पर नस्ल आधारित विभाजन भड़काने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अमरीकी शहरों में अब नस्लवाद काम नहीं करता. ज़्यादातर बड़े शहर एकजुट हैं. इनके लिए वास्तविक ख़तरा कोविड-19 और जलवायु परिवर्तन रहा है. बहस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप को एक मौक़ा दिया गया कि 'वे गोरे कट्टरपंथियों और दक्षिणपंथी लोगों की हिंसा को अस्वीवार कर सकते हैं', जिसपर ट्रंप ने कहा कि 'वे ऐसा करेंगे, लेकिन फिर उन्होंने ऐसा करने की बजाय- सिर्फ़ एक दक्षिणपंथी संगठन 'द प्राउड बॉयज़' से ही कहा कि वो पीछे रहें.' इसके बाद उन्होंने फ़ासीवाद-विरोधी कार्यकर्ताओं और एंटीफ़ा समर्थकों पर हमला करने की कोशिश की.
जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत, अमरीका में संस्थागत नस्लवाद और पुलिस द्वारा की जाने वाली हिंसा पर सवाल उठना और उसके बाद पूरे देश में हुए विशाल प्रदर्शन - अमरीका में दशकों से ऐसा नहीं देखा गया. लेकिन मंगलवार की बहस में इतिहास के उन क्षणों पर बहुत ही कम प्रकाश डाला गया.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डिबेट के दौरान यह दलील दी कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कम से कम चीज़ों को आगे बढ़ाया, बल्कि डेमोक्रेट लंबे वक़्त तक चीज़ों को लेकर बैठे रहे.
उन्होंने जो बाइडन को ताना मारा कि "मैंने अपने कार्यकाल के 47 महीने में जितना काम किया है, वो आपने 47 साल में भी नहीं किया."
जिसके जवाब में जो बाइडन ने कहा, "ट्रंप के कार्यकाल में अमरीका कमज़ोर हुआ है, बीमार हुआ है, ग़रीब हुआ है, पहले से ज़्यादा विभाजित दिखता है और पहले से ज़्यादा हिंसक भी."
साल 2016 में सारे अनुमानों के विपरीत डोनाल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने. पिछले साढ़े तीन सालों में उनका इस पद पर होना हर तरीक़े से चुनौतीपूर्ण रहा है. अपनी उस जीत को दोहराने के लिए ट्रंप के पास एक तरीक़ा यह है कि वो जो बाइडन के लंबे सार्वजनिक जीवन का इस्तेमाल, उन्हीं के ख़िलाफ़ करें.
बहस के दौरान ट्रंप के अन्य लक्ष्यों में से एक था बाइडन को उनकी पार्टी के लेफ़्ट विंग के रूप में चित्रित करना. लेकिन बाइडन ने इस मामले में बखूबी अपना बचाव किया.
जो बाइडन ने कुछ नीतियों पर खुलकर अपनी राय पेश की. ख़ासकर उन नीतियों के बारे में, जिन्हें उनकी पार्टी की ओर से पहले समर्थन मिला था, लेकिन अब बाइडन ने कहा है कि वो इन पर विचार कर रहे हैं.
बाइडन ने यह भी कहा कि जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आएगी, तब तक उनकी पार्टी का लेफ़्ट विंग भी उनके साथ मज़बूती से खड़ा होगा.
रविवार को जब न्यूयॉर्क टाइम्स अख़बार ने रिपोर्ट लिखी कि 'राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने कार्यकाल में बहुत कम टैक्स दिया या टैक्स की चोरी की', तो उस रिपोर्ट को एक बड़े धमाके की तरह देखा गया.
अख़बार ने कुछ दस्तावेज़ों के हवाले से लिखा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले वर्ष और उसके अगले साल व्हाइट हाउस में जाने के बाद केवल 750 अमरीकी डॉलर का आयकर अदा किया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ट्रंप ने पिछले 15 में से 10 सालों में कोई आयकर नहीं चुकाया.
राजनीतिक विश्लेषकों ने सोचा कि ट्रंप पहली डिबेट के दौरान इस मुद्दे को आख़िर कैसे संभालेंगे. लेकिन जो बाइडन बहस के दौरान इस मुद्दे को उम्मीद के अनुसार बड़ा बना पाने में असमफल रहे.
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सफ़ाई में वही दलील दी जो उन्होंने 2016 में दी थी कि 'वे पिछले किसी भी राष्ट्रपति की तुलना में अमरीकी टैक्स सिस्टम के बारे में ज़्यादा बेहतर समझ रखते हैं, इसी वजह से वे टैक्स बचा पाते हैं.' ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अपने अनुभव के दम पर टैक्स अधिनियमों का फ़ायदा उठाया.
बहरहाल, आने वाले वक़्त में अगर टैक्स से जुड़ा यह मुद्दा थोड़ा बहुत उछलता है और चुनाव पर इसका ज़रा भी असर दिखता है, तो ऐसा कम से कम इस बहस की वजह से नहीं होगा.
बहस का आख़िरी हिस्सा चुनाव की सुरक्षा और उससे जुड़ी चिंताओं पर केंद्रित था, जिसमें दोनों ही पक्षों ने यह चिंता ज़ाहिर की कि यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होगा. अगर इस बहस के मुद्दों पर जाया जाए तो आप कह सकते हैं कि बहस के ज़्यादातर हिस्सों में डोनाल्ड ट्रंप भ्रामक बातें कर रहे थे.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि 'इस चुनाव का अंत अच्छा नहीं होगा'... और उनके इस बयान से दोनों ही पक्ष सहमति रख सकते हैं, हालांकि इस सहमति की वजहें अलग-अलग होंगी.
जो बाइडन ने इस बहस में अपना क़द बड़ा बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि "वो उम्मीद करते हैं कि वोटों को गिनने और विजेता की घोषणा करने की पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता और सम्मान के साथ निभाई जाए." 
ऐसा लग रहा था कि उन्हें निष्कर्ष में कुछ और बातें भी कहनी हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें बीच में ही टोक दिया. इसके बाद क्रिस वैलेस ने बहस समाप्ति की घोषणा कर दी.
इस अव्यवस्थित शाम का अंत भी अचानक ही हो गया, और जो बातें हुईं उन्हें एक सार्थक बहस के रूप में नहीं देखा जा सकता. ऐसे कार्यक्रमों का असर चुनावों पर कम ही पड़ता है और ये बहस इतनी अव्यवस्थित थी कि इसने शायद ही मतदाताओं के निर्णय पर कोई असर डाला होगा.
ट्रंप के लिए शायद यह बुरी ख़बर है, क्योंकि उपनगरीय महिला मतदाता उनकी कमज़ोरी हैं, जिनका कहना है कि वो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तौर-तरीक़ों को ही नापसंद करती हैं.
लेकिन अगर ट्रंप का लक्ष्य यह था कि वो इस चुनाव अभियान को एक ऐसी शक़्ल दे दें जिसे कोई पहचान ही ना पाए और मतदाता इस कशमकश में ही रहें कि उन्हें इस चुनाव से क्या चाहिए और उनका इस चुनाव में क्या योगदान हो सकता है, तो उनकी इस शाम की मेहनत बेकार नहीं गई.

Monday, July 27, 2020

दुनिया में लोकतंत्र की हालत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 की तरह एक बार फिर संकेत दिया है कि इस बात की गारंटी नहीं है कि वे नवंबर के चुनाव परिणामों को स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने संदेहास्पद अंदाज में कहा है कि `मैं देखूंगा।’ फॉक्स न्यूज़ के मॉडरेटर क्रिस वैलेस से एक इंटरव्यू के दौरान यह पूछे जाने पर कि क्या वे चुनाव परिणाम को स्वीकार कर लेंगे तो उन्होंने कहा, “ मैं देखूंगा। ….मैं न तो हां कहने जा रहा हूं और न ही न कहने जा रहा हूं। मैंने पिछली बार भी हां या न कुछ नहीं कहा था।’’

उधर तुर्की में सोफिया स्मारक को मस्जिद घोषित करने जा रहे राष्ट्रपति तैयब एर्दोगन ने एक सेक्युलर देश को इस्लामी राष्ट्र घोषित करने की तैयारी कर ली है। भारत में भी अगले महीने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर का शिलान्यास करेंगे तब संभव है कि उन्हें राष्ट्रपिता घोषित कर दिया जाए और उनके समर्थक यह मान लें कि अगले कार्यकाल के लिए भी वे ही चुनाव जीतेंगे। उसके बाद भारत को हिंदू राष्ट्र न घोषित किया जाएगा इस बात की क्या गारंटी है? उधर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आजीवन पद पर रहने के लिए संविधान में संशोधन कर लिया है और रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी ऐसा ही इंतजाम किया है।

ऊपर अमेरिका और भारत के साथ चीन और रूस के उदाहरण देने का अर्थ यह है कि जो लोकतांत्रिक देश हैं वहां खेल के नियम बदले जा रहे हैं और अधिनायकवाद स्थापित होता जा रहा है और जो अधिनायकवादी देश हैं उनकी लोकतंत्र की ओर यात्रा होती नहीं दिखाई दे रही है। बल्कि वे अपनी व्यवस्था में और मजबूत हो रहे हैं। ऐसे माहौल में जब यूरोप के भी लोकतांत्रिक देश तानाशाही की ओर जा रहे हैं तब कहां से उम्मीद की जाए। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ का सदस्य हंगरी अब कहने के लिए लोकतांत्रिक बचा है। उसके प्रधानमंत्री विक्टर ओरबन ने विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया पर एक तरह से कब्जा जमा लिया है और विपक्ष को बेअसर कर दिया है। इसी तरह आर्थिक संकट से गुजर रहे अन्य यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की समस्या से पैदा हुआ राष्ट्रवाद और मजबूत होगा जो एक प्रकार से लोकतंत्र को कमजोर ही करने वाला है।

यहां एक अमेरिकी लेखक डैनियल एलेन की एक उक्ति का विशेष महत्व बन जाता है जिसमें वे कहते हैं, “इस पूरे मामले का साधारण तथ्य यह है कि दुनिया आज तक ऐसा बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र नहीं स्थापित कर सकी है जिसमें कोई भी जातीय समूह बहुसंख्यक न हो। न ही ऐसा देश बन सका है जहां पर सामाजिक समता, राजनीतिक समता और सभी को सबल बनाने वाली अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल किया जा सका हो।’’ एलेन की तरफ से कल्पित यह लोकतंत्र की ऐसी शर्त है जिसे शायद ही कभी हासिल किया जा सके। हां इतना जरूर है कि भारत और अमेरिका जैसे लोकतंत्र यूरोप की तुलना में ज्यादा बहुलता लिए हुए हैं। वहां की विविधतापूर्ण संरचना और लोगों में लोकतंत्र के लिए आकर्षण देखते हुए यह यकीन किया जाता था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था लंबे समय तक चलने वाली है या यह तब तक चलेगी जब तक उससे बेहतर व्यवस्था न ढूंढ ली जाए।

लेकिन भारत और अमेरिका दोनों देशों में ऐसे राजनेता और उन्हीं के साथ ऐसे राजनीतिक दलों का उभार हो चुका है जो हर हाल में सत्ता हासिल करने और कायम करने में यकीन करते हैं और उसके लिए लोकतांत्रिक खेल के नियमों को बदलने से भी गुरेज नहीं करते। अमेरिका में वीजा के नियम, प्रवासियों और उनके बच्चों की देखभाल के नियम, मतदाता बनाने के नियम और वोट देने के नियमों में तरह-तरह के बदलावों के प्रस्ताव लोकतंत्र को एक संकीर्ण और बहुसंख्यकवादी व्यवस्था बनाने के लिए चल रहे हैं। इस मामले में अमेरिका और भारत में कौन आगे है कहा नहीं जा सकता। अगर अमेरिका के उत्तरी कैरिलोना जैसे विविधता वाले प्रांत में इस तरह के तमाम बदलाव पिछले दिनों किए गए हैं तो भारत में सीएए और एनआरसी के बहाने अल्पसंख्यकों को दरकिनार करने के नए नियम बन रहे हैं।

सवाल उठता है कि लोकतंत्र के प्रति विकर्षण का यह दौर आया कैसे? सन 1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद जिस लोकतंत्र की तूती पूरी दुनिया में बोलती थी अचानक ऐसा क्या हुआ कि लोकतांत्रिक संस्थाएं पस्त हो गईं और लोकतांत्रिक समाज का सपना टूटने लगा? निश्चित तौर पर इसके पीछे वह स्थितियां तो हैं ही जिसकी ओर डैनियल एलेन संकेत करते हैं। यानी समाज में बढ़ती असमानता लोकतंत्र के प्रति घटते विश्वास का एक प्रमुख कारण है। लोकतंत्र जो बराबरी का एक सपना है और जिसे पूरा करने का दावा उदारीकरण ने किया था वह टूट गया है।

अविश्वास के साथ बढ़ती है हिंसा और उससे राज्य को दमनकारी होने का बहाना मिलता है। इस तरह एक दुष्चक्र निर्मित होता है जिसके भीतर लोकतांत्रिक संस्थाएं न तो मूल्यों के लिए दृढ़ता दिखा पाती हैं और न ही मानवाधिकारों की रक्षा कर पाती हैं। बढ़ती असमानता के बारे में बढ़-चढ़ कर चिंता जताने वाले फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थामस पिकेटी अपनी नई पुस्तक- कैपिटल एंड आइडियोलाजी— में कहते हैं कि वर्ग आधारित राजनीति के कमजोर पड़ने के साथ असमानता तेजी से बढ़ी है। जाहिर सी बात है कि उसकी जगह धर्म, जाति और जातीयता की राजनीति ने ले ली है और वे अपने ढंग से जो काम कर रहे हैं उससे असमानता के साथ नए किस्म का द्वेष भी बढ़ रहा है।

भले ही ऐसी राजनीति बहुसंख्यक एकता का दावा कर रही है और अपनी चुनावी संभावनाओं को प्रबल बना रही है। इसीलिए पिकेटी कहते हैं कि अगर धन के वितरण की नई और कारगर व्यवस्था नहीं की गई तो बहुत कुछ ध्वस्त हो जाएगा। हालांकि वे इस मामले में यूरोपीय परिदृश्य पर ही ध्यान केंद्रित करते हुए अपने उदाहरण प्रस्तुत करते हैं लेकिन उनकी एक बात गौर करने लायक है कि विश्ववादी और राष्ट्रवादी जनमत के भीतर समतावादी और समता विरोधी लोगों का खेमा है। जरूरत इन दोनों खेमों को तोड़कर समतावादियों की एकता कायम करने की है।


मिस्र लीबिया और तुर्की की नई लडाई


कुछ दिन पहले मिस्र की संसद ने लीबिया में सेना तैनात करने के एक प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी जिसके बाद इस छोटे से मध्यपूर्व के देश को लेकर मिस्र और तुर्की के बीच सशस्त्र संघर्ष की संभावना बनने लगी.
तुर्की, संयुक्त राष्ट्र की मदद से बनी लीबिया की त्रिपोली में मौजूद सरकार (गवर्नमेन्ट ऑफ़ नेशनल अकॉर्ड, जीएनए) का समर्थन करता है जिसका मिस्र लगातार विरोध करता रहा है.
मिस्र के विदेश मंत्री सामेह शुक्रे ने लीबिया की स्थिति को लेकर यूरोपीय संघ के विदेशी मामलों से प्रतिनिधि और संघ के कुछ और सदस्यों से फ़ोन पर चर्चा की है. उनका कहना है कि "ग़ैर-ज़िम्मेदार तरीके से लड़ाकों और आतकंवादियों को लीबिया भेजा जा रहा है जिससे वहां स्थिति गंभीर होती जा रही है."
लीबिया को लेकर मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अल सिसि और यूनान के प्रधानमंत्री किर्याकोस मित्सोताकिस ने भी आपस में चर्चा की है और दोनों नेता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि लीबिया में किसी तरह के बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया जाना चाहिए.
गुरुवार को मिस्र के राष्ट्रपति के प्रवक्ता ने एक बयान जारी कर कहा कि फ़ोन पर हुई इस चर्चा के दौरान सिसि और मित्सोताकिस ने लीबियाई संकट के मद्देनज़र मिस्र की स्थिति पर चर्चा की और दोनों पक्षों ने कहा कि वो लीबियाई मामलों में "अवैध विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं."
मिस्र का कहना है कि इसके साथ जुड़े सशस्त्र विद्रोहियों के कारण मिस्र और अरब के पूरे इलाक़े के लिए ख़तरा पैदा हो गया है. लेकिन तुर्की का कहना है कि वो लीबिया में स्थायी सरकार की उम्मीद करता है.
लेकिन तुर्की और मिस्र के बीच तनाव केवल लीबिया के कारण नहीं. भूमध्यसागर में तेल के लिए तुर्की की ड्रिलिंग की योजना को लेकर भी दोनों के बीच तनाव है.
तुर्की ने मंगलवार में अपने दक्षिण में मौजूद एक द्वीप के पास ड्रिलिंग सर्वे करने के लिए जहाज़ भेजने का ऐलान किया था. ये द्वीप मिस्र के नज़दीक है.
तुर्की ने कहा है कि ये जहाज़ समंदर में उसके इलाक़े में ड्रिलिंग का काम करेंगे लेकिन तुर्की की इस घोषणा के बाद मिस्र ने मंगलवार को चेतावनी जारी की और कहा कि इस इलाक़े में उसके जहाज़ भी लगातार निगरानी करेंगे. यहीं से विवाद शुरू हुआ है जिसने अब गंभीर रूप अख्तियार कर लिया है.
तुर्की की चेतावनी के विरोध में यूरोपीय संघ भी सामने आया है जिसने कहा कि "उसकी घोषणा से ग़लत संदेश गया है."
बुधवार को मिली जानकारी के अनुसार तुर्की का जहाज़ ओरुक रीज़ बंदरगाह अंताल्या पर खड़ा है. लेकिन नैवटेक्स (चेतावनी देने की एक तकनीक) पर दिए गए तुर्की के अलर्ट से मिस्र की सेना में हलचल शुरू हो गई. मिस्र ने तुर्की के इस कदम को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया.
कैसे बिगड़ते गए आपसी संबंध?
तुर्की अपना ये ड्रिलिंग सर्वे भूमध्यसागर में साइप्रस और क्रेट के इलाक़ों के बीच करना चाहता है.
मिस्र से मिल रही अपुष्ट ख़बरों के अनुसार तुर्की और यूनान के नेवी के जहाज़ यूनानी द्वीप कास्टेलोरिज़्ज़ो की तरफ जाते देखे गए हैं. ये द्वीप तुर्की के नज़दीक है.
यूनान और तुर्की के बीच हाल के दौर तक रिश्ते बेहतर नहीं थे. भूमध्यसागर पार कर यूनान आ रहे प्रवासियों को लेकर दोनों देश पहले भी कई बार आपस में भिड़ चुके हैं.
इस महीने की शुरुआत में तुर्की ने कहा था कि वो इस्तांबुल में मौजूद ऐतिहासिक हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलेगा. ये मस्जिद सालों पहले ऑर्थोडॉक्स परंपरा को मानने वाले ईसाइयों का अहम केंद्र था. तुर्की के इस फ़ैसले को यूनान ने ग़ैर-ज़रूरी बताया था.
अब भूमध्यसागर में तुर्की की ड्रिलिंग की योजना योजना के बारे में उसका कहना है कि इसके ख़िलाफ़ यूरोपीय संघ को भी कदम उठाने की ज़रूरत है.
तुर्की और यूनान दोनों देश नैटो देशों के समूह के सदस्य हैं लेकिन भूमध्यसागर से कच्चा तेल लेने की होड़ में दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं.
हाल के सालों में साइप्रस के नज़दीक समंदर में कच्चे तेल के बड़े भंडारों का पता चला है, जिसके बाद इसके इस्तेमाल को लेकर साइप्रस, इसराइल, यूनान और मिस्र के बीच अहम सहमति बनी है.
इस समझौते के तहत यहां से मिलने वाले कच्चे तेल को भूमध्यसागर से गुज़रने वाली 2,000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के ज़रिए यूरोप भेजा जाएगा.
लेकिन बीते साल तुर्की ने साइप्रस से पश्चिम में ड्रिलिंग का काम बढ़ा दिया. इस द्वीप के इलाक़े पर साल 1974 से ही विवाद है. तुर्की के नियंत्रण वाले पूर्वी साइप्रेस को केवल तुर्की ही मान्यता देता है. तुर्की ने इस सप्ताह इस विवाद को एक तरह से स्वीकार करते हुए कहा कि इस द्वीप के संसाधनों का साझा इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
नवंबर 2019 में तुर्की ने लीबिया के साथ एक करार किया था जिसके बारे में तुर्की का कहना था कि उसके दक्षिणी तट से लेकर लीबिया के उत्तर पूर्वी तट तक एक एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन बनाया गया था.
मिस्र ने इसका विरोध किया था और कहा था कि इस पूरी प्रक्रिया में इस जगह के बीच में पड़ने वाले यूनान के क्रेट द्वीप को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया था.
मई के आख़िर तक तुर्की ने ऐलान कर दिया कि वो आने वाले महीनों में दूर पश्चिम तक ड्रिल करने की योजना बना रहा है. उसके इस ऐलान से यूरोपीय संघ के सदस्य, यूनान और साइप्रस ने नाराज़गी जताई.
यूनान के रोड्स और क्रीट द्वीपों समेत भूमध्यसागर के पूर्वी इलाक़े में ड्रिलिंग का काम करने के लिए तुर्की पेट्रोलियम को कई लाइसेंस भी जारी किए गए हैं.
तुर्की के उप राष्ट्रपति का कहना है कि "सभी को तुर्की और उत्तरी साइप्रस के तुर्की गणराज्य को स्वीकार करना चाहिए और उसे इस इलाक़े के संसाधनों के इस्तेमाल की आज़ादी होनी चाहिए."
ईजियन में कई यूनानी द्वीप और पूर्वी भूमध्यसागर का इलाक़ा तुर्की तट से क़रीब है और इसलिए यहां क्षेत्रीय जल के मुद्दे जटिल हैं. इन मुद्दों को लेकर दोनों देश अतीत में युद्ध की कगार तक भी पहुंच गए हैं.
अगर यूनान अपने समुद्रतट से लगी समुद्री सीमा को छह मील से बढ़ाकर अधिकतम 12 तक कर देता है (जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है) तो तुर्की का कहना है कि उसके समुद्री मार्ग बुरी तरह प्रभावित होंगे.
समुद्री सीमा के अलावा तुर्की और लीबिया के बीच, साइप्रस और लेबनान के बीच और मिस्र और इसराइल के बीच एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन हैं जिनकी सीमाओं का भी करीब 200 नॉटिकल मील तक विस्तार किया जा सकता है.
तो ऐसे में यूनानी द्वीप कास्टेलोरिज़्ज़ो का क्या होगा, जो तुर्की से केवल दो किलोमीटर की दूरी पर है?
यूनान का कहना है तुर्की की चेतावनी कास्टेलोरिज़्ज़ो के एक बड़े कॉन्टिनेल्टल शेल्फ़ तक पहुंचती है. हालांकि तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत चोवाशुग्लू का कहना है कि जो द्वीप तुर्की के बेहद करीब हैं उनका अपना कॉन्टिनेल्टल शेल्फ़ नहीं हो सकता.
जर्मनी के विदेश मंत्री हेइको मास ने हाल में यूनान का दौरा किया था. उन्होंने कहा था कि तुर्की से "पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उकसावे" को रोकने की अपील की थी.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी गुरुवार को इस इलाके के दौरे पर थे. उन्होंने साइप्रस और यूनान को अपना पूरा समर्थन दिया और कहा कि तुर्की ने "उनकी संप्रभुता का उल्लंघन" किया है और जो कोई "यूरोपीय संघ के सदस्य के समुद्री मार्गों को लेकर आक्रामक होगा उन पर प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए."
फ्रांस और तुर्की के बीच हाल में संबंध तनावपूर्ण रहे हैं, ख़ास कर लीबिया को लेकर दोनों में तनाव बढ़ा है.
बुधवार को, यूरोपीय संघ के एक प्रवक्ता ने कहा कि तुर्की का ये कदम "दूसरे देशों के ग़लत संदेश दे रहा है."
यूरोपीय संघ ने बार-बार एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन की सीमित शक्तियों का हवाला देते हुए कहा है कि कॉन्टनेन्टल शेल्फ़ के मुद्दे को देशों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए.

तुर्की को राष्ट्रवाद में झोकते आर्दोआन


तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इस्तांबुल के ऐतिहासिक हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को दोबारा मस्जिद में बदलने के आदेश दे दिए हैं. इससे पहले शुक्रवार को ही तुर्की की एक अदालत ने हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को मस्जिद में बदलने का रास्ता साफ़ कर दिया था. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि हागिया सोफ़िया अब म्यूज़ियम नहीं रहेगा और 1934 के कैबिनेट के फ़ैसले को रद्द कर दिया.
1500 साल पुरानी यूनेस्को की ये विश्व विरासत मूल रूप से मस्जिद बनने से पहले चर्च था और 1930 के दशक में म्यूज़ियम बना दिया गया था. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले साल चुनाव में इसे मस्जिद बनाने का वादा किया था.
डेढ़ हज़ार साल पुराने चर्च को पहले मस्जिद, फिर म्यूज़ियम बनाया गया, अब फिर मस्जिद बनाने का फ़ैसला किया गया है. तुर्की का हागिया सोफ़िया दुनिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक रहा है. इसे छठी सदी में बाइज़ेंटाइन सम्राट जस्टिनियन के हुक्म से बनाया गया था. यह संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक मामलों की संस्था यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में आता है. जब उस्मानिया सल्तनत ने 1453 में क़ुस्तुनतुनिया (जिसे बाद में इस्तांबुल का नाम दिया गया) शहर पर क़ब्ज़ा किया तो इस चर्च को मस्जिद बना दिया गया था.
इस्तांबूल में बने ग्रीक शैली के इस चर्च को स्थापत्य कला का अनूठा नमूना माना जाता है जिसने दुनिया भर में बड़ी इमारतों के डिज़ाइन पर अपनी छाप छोड़ी है.
पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार और फिर वहां उस्मानिया सल्तनत के ख़ात्मे के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा का शासन आया. उन्हीं के शासन में 1934 में इस मस्जिद (मूल रूप से हागिया सोफ़िया चर्च) को म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला किया गया.
आधुनिका काल में तुर्की के इस्लामवादी राजनीतिक दल इसे मस्जिद बनाने की माँग लंबे समय से करते रहे हैं जबकि धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ पुराने चर्च को मस्जिद बनाने का विरोध करती रही हैं. इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ भी आई हैं जो धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष आधार पर बँटी हुई हैं.
ग्रीस ने इस फ़ैसले का विरोध किया है और कहा है कि यह चर्च ऑर्थोडॉक्स ईसाइयत को मानने वाले लाखों लाख लोगों की आस्था का केंद्र है. ग्रीस की सांस्कृतिक मामलों की मंत्री ने इसे 'धार्मिक भावनाएँ भड़काकर राजनीतिक लाभ लेने की राजनीति' क़रार दिया है.
यूनेस्को के उप-प्रमुख ने ग्रीक अख़बार को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा है कि इस चर्च के भविष्य का फ़ैसला एक बड़े स्तर पर होना चाहिए जिसमें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की बात भी सुनी जानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रतिनिधि का कहना है कि तुर्की को इस बारे में एक पत्र लिखा गया था लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि इस इमारत की स्थिति में बदलाव ठीक नहीं होगा क्योंकि 'यह अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के बीच एक पुल का काम करता रहा है.
गुम्बदों वाली ऐतिहासिक इमारत इस्तांबूल में बॉस्फ़ोरस नदी के पश्चिमी किनारे पर है, बॉस्फ़ोरस वह नदी है जो एशिया और यूरोप की सीमा तय करती है, इस नदी के पूर्व की तरफ़ एशिया और पश्चिम की ओर यूरोप है.
सम्राट जस्टिनियन ने सन 532 में एक भव्य चर्च के निर्माण का आदेश दिया था, उन दिनों इस्तांबूल को कॉन्सटेनटिनोपोल या क़ुस्तुनतुनिया के नाम से जाना जाता था, यह बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य की राजधानी थी जिसे पूरब का रोमन साम्राज्य भी कहा जाता था.
इस शानदार इमारत को बनाने के लिए दूर-दूर से निर्माण सामग्री और इंजीनियर लगाए गए थे.
यह तुर्की के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है.
यह चर्च पाँच साल में बनकर 537 में पूरा हुआ, यह ऑर्थोडॉक्स इसाइयत को मानने वालों का अहम केंद्र तो बन ही गया, बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य की ताक़त का भी प्रतीक बन गया, राज्यभिषेक जैसे अहम समारोह इसी चर्च में होते रहे.
हागिया सोफ़िया जिसका मतलब है 'पवित्र विवेक', यह इमारत क़रीब 900 साल तक ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का मुख्यालय रही.
लेकिन इसे लेकर विवाद सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाइयों में ही नहीं है, 13वीं सदी में इसे यूरोपीय ईसाई हमलावरों ने बुरी तरह तबाह करके कुछ समय के लिए कैथोलिक चर्च बना दिया था.
1453 में इस्लाम को मानने वाले ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमद द्वितीय ने क़ुस्तुनतुनिया पर क़ब्ज़ा कर लिया, उसका नाम बदलकर इस्तांबूल कर दिया और इस तरह बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य का ख़ात्मा हमेशा के लिए हो गया. सुल्तान मेहमद ने आदेश दिया कि हागिया सोफ़िया की मरम्मत की जाए और उसे एक मस्जिद में तब्दली कर दिया जाए. इसमें पहले जुमे की नमाज़ में सुल्तान ख़ुद शामिल हुए. ऑटोमन साम्राज्य को सल्तनत-ए-उस्मानिया भी कहा जाता है.
इस्लामी वास्तुकारों ने ईसायत की ज़्यादातर निशानियों को तोड़ दिया या फिर उनके ऊपर प्लास्टर की परत चढ़ा दी. पहले यह सिर्फ़ एक गुंबद वाली इमारत थी लेकिन इस्लामी शैली की छह मीनारें भी इसके बाहर खड़ी कर दी गईं.
17वीं सदी में बनी तुर्की की मशहूर नीली मस्जिद सहित दुनिया की कई मशहूर इमारतों के डिज़ाइन की प्रेरणा हागिया सोफ़िया को ही बताया जाता है.
पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, साम्राज्य को विजेताओं ने कई टुकड़ों में बाँट दिया. मौजूदा तुर्की उसी ध्वस्त ऑटोमन साम्राज्य की नींव पर खड़ा है.
आधुनिक तुर्की के निर्माता कहे जाने वाले मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और इसी सिलसिले में हागिया सोफ़िया को मस्जिद से म्यूज़ियम में बदल दिया.
1935 में इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया तब से यह दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में एक रहा है.
क़रीब डेढ़ हज़ार साल के इतिहास की वजह से तुर्की ही नहीं, उसके बाहर के लोगों के लिए भी बहुत अहमियत रखता है, ख़ास तौर पर ग्रीस के ईसाइयों और दुनिया भर के मुसलमानो के लिए.
तुर्की में 1934 बने क़ानून के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन होते रहे हैं जिसके तहत हागिया सोफ़िया में नमाज़ पढ़ने या किसी अन्य धार्मिक आयोजन पर पाबंदी है.
राष्ट्रपति एर्दोआन इन इस्लामी भावनाओं का समर्थन करते रहे हैं और हागिया सोफ़िया को म्यूज़ियम बनाने के फ़ैसले को ऐतिहासिक ग़लती बताते रहे हैं, वे लगातार कोशिशें करते रहे हैं कि इसे दोबारा मस्जिद बना दिया जाए.

Wednesday, July 22, 2020

बर्लिन की दीवार पर सिनेमा


दुनिया में इन दिनों हर तरफ दृश्य-अदृश्य दीवारें खड़ी करने के सपने पल रहे हैं. इस सनकी दौर में नफरत इस कदर कहर बरसा रही है कि केवल हिंदुस्तान में ही लोगों को जात-पात-नस्ल के नाम पर नहीं बांटा जा रहा. ट्रंप साहब शिद्दत से चाह रहे हैं कि उनके पड़ोसी देश मैक्सिको की सीमा पर मौजूदा दीवार से भी लंबी-चौड़ी एक दीवार खड़ी कर दी जाए, ताकि वहां से अमेरिका की तरफ होने वाला पलायन रोका जा सके. ब्रिटेन के कई नेतागण और नागरिक चाहते हैं कि उनका देश यूरोपीय संघ से अलग हो जाए और सिमटकर एक ताकतवर मुल्क बनने का सपना देखे.

चीन में इंटरनेट पर अदृश्य दीवारें पहले से तैनात हैं (फायरवॉल) और हर सूचना सरकार से छनकर नागरिकों तक पहुंचती है. नॉर्थ और साउथ कोरिया के बीच एक लंबी अभेद्य दीवार लंबे समय से मौजूद है. हमारे यहां भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के बहाने असम में अदृश्य दीवार खड़ी की जा रही है और फिर 1947 का विभाजन तो है ही, जिसने हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच दृश्य-अदृश्य दोनों तरह की दीवारें खड़ी की हुई हैं.


वजहें कितनी भी अलग क्यों न नजर आती हों, हमारे समय का सच यही है कि दुनिया भर के कई मुल्क अपनी-अपनी सीमाओं पर नए सिरे से दीवारें खड़ी करना चाहते हैं. खुद की नस्ल से प्यार करने और दूसरों से नफरत करने की ग्रैफिटी इन दीवारों पर सजा देना चाहते हैं.

ऐसे सनकी समय में विश्व सिनेमा की उन फिल्मों की महत्ता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, जो लोगों को बांटने के लिए खड़ी की गईं दीवारों से प्रभावित जिंदगियों का दस्तावेज बनी थीं. कुछ अभी भी बन रही हैं, जैसे कि हाल ही में एचबीओ द्वारा ब्रेक्जिट के पीछे की राजनीति पर टेलीविजन के लिए बनाई गई ब्रेक्जिट : द अनसिविल वॉर (2019) नाम की फिल्म. इसमें बेनेडिक्ट कम्बरबैच जैसे असाधारण अभिनेता ने ब्रिटिश राजनीतिक रणनीतिकार डोमिनिक कमिंग्स की मुख्य भूमिका अदा की है. डोमिनिक को उस विवादास्पद ‘वोट लीव’ कैंपेन का कर्ता-धर्ता माना जाता है जिसके द्वारा इंग्लैंड के बाशिंदों को मैन्युपुलेट करके यूरोपीय संघ छोड़ने के लिए उकसाया गया था. यह फिल्म सिलसिलेवार परदे के पीछे का राजनीतिक खेल दिखाती है और जो बात नोम चोम्स्की अपनी किताब ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’(1988) में अमेरिका के लिए कह चुके हैं वही बात यहां नयी तकनीकों से लैस ब्रिटेन के लिए भी लागू मालूम होती है.


ऐसी एक दीवार बर्लिन वॉल के नाम से भी मशहूर है. साम्यवाद और पूंजीवाद के वैचारिक मतभेदों की वजह से खड़ी हुई इस ऐतिहासिक बर्लिन की दीवार (1961-1989) पर कई असाधारण फिल्में बन चुकी हैं. 2015 में आई टॉम हैंक्स अभिनीत हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्म ‘ब्रिज ऑफ स्पाइज’ ने बर्लिन की दीवार के निर्माण के दौरान (1961) अमेरिका, जर्मनी और सोवियत संघ के बीच के राजनीतिक तनाव का बेहतरीन चित्रण किया था.

2012 में आई जर्मन फिल्म ‘बारबरा’ ने 1980 के दौर के कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन में दमन का शिकार एक युवती की धीमी गति की उम्दा कैरेक्टर स्टडी परदे पर रची थी. 2000 में आई ‘द लेजेंड ऑफ रीटा’, 2001 की ‘द टनल’, और 1987 की अद्भुत ‘विंग्स ऑफ डिजायर’ भी बर्लिन की दीवार के बैकड्रॉप पर बनी खासी मशहूर फिल्में हैं. हॉलीवुड की कई मसाला स्पाई फिल्में विभाजित बर्लिन के बैकड्रॉप की तरफ आकर्षित रही हैं और बॉन्ड व बॉर्न फिल्मों से लेकर हाल के वर्ष की ‘द मैन फ्रॉम अंकल’ (2015) जैसी स्पाई थ्रिलर फिल्में चंद उदाहरण भर हैं.

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फिर, 2006 में रिलीज हुई जर्मन फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ अदर्स’ तो अलग ही स्तर की उत्कृष्टता लिए है. बेहद कुशलता से यह फिल्म दिखा चुकी है कि 80 के दशक के साम्यवादी पूर्वी जर्मनी में किस तरह सरकार विरोधी कलाकारों का दमन होता था और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (जीडीआर) का जासूसी विभाग ‘स्टाजी’ किस तरह छिप-छिपकर विरोधियों की बातें सुनता था. सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म का ऑस्कर जीतने वाली इस ब्रिलियंट फिल्म पर हम किसी दिन अलग से लिखेंगे.


उपरोक्त सभी गंभीर व डार्क फिल्में हैं, जिनमें से ज्यादातर कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन को अलोकतांत्रिक खलनायक के तौर पर पेश करती हैं. वेस्ट बर्लिन के लोकतंत्र और पूंजीवाद से छिटकने वाला कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन, सोवियत संघ की मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा पर चलकर 28 सालों तक एक ‘क्लोज्ड सोसाइटी’ के रूप में सांस लेता रहा था. इन जर्मन व अमेरिकी फिल्मों के अनुसार यह एक ऐसी जेल थी जिसमें से पूर्वी बर्लिन के नागरिकों को पश्चिम बर्लिन और पश्चिमी यूरोप तक में जाने की इजाजत नहीं थी. सीमित संसाधनों के साथ जीवन-यापन करना नियम था और पश्चिम बर्लिन की उभार पर रहने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विपरीत साम्यवाद के सिद्धांतों पर चलने वाली इसकी सादी अर्थव्यवस्था में ‘विकास’ अपने तड़क-भड़क वाले मशहूर रूप में मौजूद नहीं था. साथ ही कम्युनिस्ट सरकार की दमनकारी नीतियां भी वजह रहीं कि दुनियाभर में पूर्वी बर्लिन को लेकर नकारात्मकता हमेशा बनी रही.

इन दस्तावेज रूपी बेहतरीन फिल्मों के इतर ‘गुड बाय लेनिन!’ का दृष्टिकोण बेहद अलहदा है. 2003 में बनी यह ट्रैजिकॉमेडी बर्लिन की दीवार पर बनी शायद सबसे चर्चित जर्मन फिल्म भी है जो कि विश्वभर में सफर कर चुकी है और हर पृष्ठभूमि, हर विचारधारा के सिनेप्रेमी द्वारा सराही जा चुकी है.

जर्मन फिल्मकार वुल्फगंग बेकर (Wolfgang Becker) द्वारा निर्देशित ये फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ अदर्स’ और ‘बारबरा’ जैसी जर्मन फिल्मों की तरह साम्यवादी पूर्वी बर्लिन को दमनकारी स्टेट की तरह चित्रित नहीं करती. बल्कि दो विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं के बीच फंसे बर्लिन के नागरिकों का कॉमेडी की टेक लेकर चित्रण करती है और ऐसे करती है कि ट्रैजेडी उभरकर सामने आती है.

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यह उन दुर्लभ फिल्मों में से भी एक है जो कि पूर्वी बर्लिन के उन नागरिकों का नजरिया सामने रखती है जो कि अपनी साम्यवादी सरकार और विचारधारा के समर्थक थे. इस फिल्म को समझने तथा एप्रीशिएट करने के लिए आपको बर्लिन की दीवार से जुड़ा इतिहास तफ्सील से मालूम होना चाहिए क्योंकि निर्देशक ने इसे जर्मन दर्शकों को ध्यान में रखकर ही बनाया है. विश्वभर में उनकी फिल्म को प्रसिद्धि मिल सकती है, शायद इसका गुमान उन्हें पहले से नहीं था.

इस यूनिवर्सल प्रसिद्धि की वजह ‘गुड बाय लेनिन!’ की बेहद दिलचस्प कहानी है. साम्यवादी सरकार के तौर-तरीकों में कुछ खास विश्वास नहीं रखने वाला पूर्वी बर्लिन का युवा नायक एलेक्स 1989 में एक सरकार विरोधी आंदोलन में शिरकत करता है. यह वही शांतिप्रिय और ऐतिहासिक मार्च है जिसके बाद आग की तरह भड़की चेतना आम नागरिकों को साथ लायी थी और आखिर में बर्लिन की दीवार को गिरना पड़ा था.
लेकिन इस ऐतिहासिक घटना से पहले इस आंदोलन में नायक को शिरकत करते देख उसकी मां को हार्ट अटैक आ जाता है और वह आठ महीने के लिए कोमा में चली जाती है. नायक की मां पक्की सोशलिस्ट है और अपने देश पूर्वी बर्लिन की साम्यवादी विचारधारा में बेहद यकीन रखती है. इतना, कि पश्चिम बर्लिन की पूंजीवादी सरकार और वहां के जिंदगी जीने के तौर-तरीकों से नफरत करती है.

नायक की मां को जब होश आता है तब बर्लिन की दीवार गिर चुकी होती है और उसका प्यारा कम्युनिस्ट बर्लिन खत्म हो चुका होता है (1990). लेकिन डॉक्टर कह देते हैं कि मां को किसी तरह का सदमा नहीं लगना चाहिए नहीं तो अगला हृदयाघात प्राणघातक होगा. इसके बाद नायक अपनी मां के लिए गुजर चुके वक्त को ‘रीक्रिएट’ करता है और साम्यवादी पूर्वी बर्लिन को कॉमेडी की टेक लेकर वापस जिंदा किया जाता है. फिल्म दिखाती है कि किस तरह दीवार के गिरने के बाद पूंजीवाद के हुए आगमन के चलते पहले की उनकी जिंदगी पूरी तरह बदलने लगती है, और पश्चिमी प्रॉडक्ट्स के बाजार में फैल जाने से लेकर रहने के तौर-तरीकों तक में तेजी से अमेरिका प्रवेश कर जाता है!

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फिल्म की यह थीम खासकर दुनियाभर के वामपंथी रुझान रखने वाले दर्शकों को बेहद रास आती रही है. पश्चिम की जिन बाजारू चीजों का विरोध वामपंथी विचारधारा करती आई है – कोका-कोला से लेकर बर्गर किंग, डिश टीवी और पश्चिमी मिजाज के फर्नीचर तक – और लेनिनवाद से जुड़ी जिन चीजों को खूब रोमेंटिसाइज किया करती है, उसका सिलसिलेवार चित्रण इस फिल्म ने बखूबी किया था.


‘गुड बाय लेनिन!’ की खासियत इसके वे जतन हैं जो कि अपने दोस्त की मदद लेकर इसका नायक पूर्वी बर्लिन को दोबारा जिंदा करने के लिए करता है. इससे हास्य पैदा होता है लेकिन यह पुरानी यूरोपियन फिल्मों के उस मिजाज का हास्य है जो ऑन योर फेस न होकर ड्रामा फिल्मों की शक्ल में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. मां जब बर्लिन की दीवार गिरने से जुड़ा कोई सच गलती से जान भी लेती है तब भी नायक अपने दोस्त की मदद लेकर फेक न्यूज तैयार करता है जिसमें सच्ची घटना को ऐसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है जैसे कि वह पूर्वी बर्लिन और साम्यवाद का गुणगान करती हुई प्रतीक हो (‘अच्छा, कोका-कोला एक सोशलिस्ट ड्रिंक है!’). ऐसा करना छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मां की खुशी के लिए नायक कई ऐतिहासिक घटनाओं को पूर्वी बर्लिन के पक्ष में सर के बल पलट देता है. इसलिए, इतिहास में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए हास्य-व्यंग्य की काफी खुराक फिल्म में मौजूद मिलती है!

‘गुड बाय लेनिन!’ को ‘ऑस्टेल्जिया’ (Ostalgie) के बोल्ड चित्रण के लिए भी याद किया जाता है. यह वो नॉस्टेल्जिया होता है जिसमें एकीकृत जर्मनी में रहने वाले कई नागरिक कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन में बिताए पुराने वक्त को खुशनुमा दौर की तरह याद करते हैं. जर्मन साहित्य से लेकर फिल्मों तक में इस ऑस्टेल्जिया को देखा-पढ़ा जा सकता है और ऐसा होने की मुख्य वजह पूंजीवादी मानसिकता के चलते दीवार गिरने के बाद एकीकृत जर्मनी में पनपी असमानता, बेरोजगारी और महंगाई को माना जाता है.

निर्देशक व सह-लेखक वुल्फगंग बेकर ने ऑस्टेल्जिया के इस जटिल व्यवहार की एक अलग व्याख्या करने की कोशिश अपनी फिल्म में की है. उन्होंने पूर्वी बर्लिन के साम्यवादी होने के फैसले को ट्रैजेडी और कॉमेडी की टेक लेकर सही तो बताया है, लेकिन अपने नायक के सहारे ही यह खासतौर पर रेखांकित किया है कि जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (जीडीआर) पूर्वी बर्लिन में सही साम्यवाद कभी लागू नहीं कर पाया था. दोनों विचारधाराएं साथ पनप सकती थीं, ईस्ट और वेस्ट बर्लिन मिल-जुलकर साथ रह सकते थे, लेकिन आत्ममुग्ध लीडरों की दमनकारी नीतियों ने दीवार खड़ी कर शहर बांट दिया. देश बांट दिया. यूरोप को बांट दिया.

आज खड़ी हो रही दीवारें भी यही करेंगीं. राजनीतिक विचारधाराएं और परिस्थितियां कितनी भी अलग क्यों न हों आखिर में इन दीवारों के बनने से लोग ही बंटेंगे, छंटेंगे और मरेंगे. आने वाले भविष्य में ‘गुड बाय लेनिन!’ जैसी कई और ट्रैजिकॉमेडी फिल्में बनेंगीं और विश्व-सिनेमा की धरोहर कहलाई जाने के लिए विवश होती रहेंगीं.

भारत और ईरान के बीच आया चीन

ईरान से आई यह खबर भी निश्चित तौर पर अच्छी नहीं कि उसने भारत को चाबहार-ज़ाहिदान रेल मार्ग निर्माण समझौते से बाहर कर दिया है. चार साल पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 और 23 मई 2016 को दो दिवसीय ईरान यात्रा पर गए जहां उन्होंने ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई, राष्ट्रपति हसन रूहानी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मुलाक़ात की. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें से सबसे महत्वपूर्ण समझौता आईपीजीपीएल [इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड] और ईरान के आर्या बनादर निगम के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास और संचालन का था.

इसी अनुबंध से जुड़ा एक अन्य समझौता भारतीय सरकारी उपक्रम इंडियन रेलवेज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) और ईरान के सड़क एवं रेल मार्ग विकास निगम (सीडीटीआईसी) के बीच हुआ. इस समझौते के तहत चाबहार से 628 किलोमीटर उत्तर में स्थित ज़ाहिदान तक और फिर वहां से होते हुए करीब 1000 किलोमीटर उत्तर-पूर्व ईरान-तुर्कमेनिस्तान के बार्डर पर स्थित सरख्स तक रेल मार्ग का निर्माण किया जाना था.

भारत के लिए इस रेलमार्ग के सामरिक महत्व का अंदाज़ा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि सामान से लदे एक ट्रक को बेंगलुरु से दिल्ली पहुंचने में तीन से चार दिन लगते हैं जबकि गुजरात के पोर्ट से भेजा सामान नौ घंटे में चाबहार और वहां से तकरीबन 11 घंटों में काबुल पहुंच सकता था. इस लिहाज से यह समझौता तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और इस क्षेत्र के अन्य देशों में भारत के लिए व्यापार के सुनहरा द्वार खोलने जैसा था.

बीती सात जुलाई को ईरानी परिवहन और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने इस रेलमार्ग पर ट्रैक बिछाने की प्रक्रिया का उद्घाटन किया. द हिंदू अख़बार ने ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि यह परियोजना मार्च 2022 तक पूरी हो जाएगी, और यह रेल मार्ग भारत की सहायता के बिना ही आगे बढ़ेगा. ईरान ने इसके पीछे की वजह परियोजना के लिए भारत से मिलने वाले फंड में हो रही देरी को बताया है.

यह सच है कि चार साल की इस अवधि में ईरान ने भारत से अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए लगातार आग्रह किया लेकिन भारत ने उसके आग्रह पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये. भारत ने अपने वित्तीय वादों को पूरा न करके ईरान को इस समझौते को तोड़ने का एक बड़ा कारण तो दिया लेकिन ईरान के इस कदम के पीछे उसकी चीन के साथ बढ़ती निकटता और दोनों के बीच हुआ 25 साला संयुक्त आर्थिक और सुरक्षा समझौता भी है.

जून 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ईरान यात्रा की थी. इस दौरान उन्होंने ईरान के समक्ष एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत तेल, गैस एवं रक्षा क्षेत्र में निवेश का मसौदा रखा. इस निवेश की राशि इतनी आकर्षक थी कि ईरान के लिए चीन की पेशकश को ठुकरा पाना मुश्किल था. दोनों देशों ने इस मसौदे की शर्तों पर तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया. अगस्त 2019 के अंत में ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने अपनी चीन यात्रा के दौरान वहां के विदेश मंत्री वांग ली के साथ इस व्यापक साझेदारी का रोडमैप पेश किया.

इस समझौते के प्रारूप को दोनों देशों ने दुनिया से कभी भी छुपाकर नहीं रखा. पेट्रोलियम इकोनॉमिस्ट नामक ब्रिटिश थिंक-टैंक ने इस समझौते की जानकारी 2016 में प्रकाशित की तथा 11 जुलाई 2020 को अमरीकी समाचार पत्र न्यूयोर्क टाइम्स ने ईरान-चीन समझौते से सम्बंधित विस्तृत जानकारी छापी.

इस प्रस्तावित समझौते के तहत चीन ईरान में करीब 400 बिलियन डॉलर (करीब 32 लाख करोड़ रूपये) का निवेश करेगा जिसमे से 280 बिलियन डॉलर का निवेश ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में किया जायेगा. इसके अलावा 120 बिलियन डॉलर सड़क, रेल-मार्ग, बंदरगाह तथा रक्षा सम्बन्धी क्षेत्रों में किया जायेगा.

इसके अलावा चीन ईरान में एयरपोर्ट, बुलेट ट्रेन जैसी हाई-स्पीड रेलवे और 5-जी दूरसंचार नेटवर्क के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगा. चीन ईरान में अपने इस भारी भरकम निवेश को सुरक्षित रखने के लिए अपने 5,000 सैनिकों को भी तैनात करेगा.
पहले डोकलाम में तनातनी और फिर लद्दाख सीमा पर आक्रामक सैन्य गतिविधियों के चलते यह तो स्थापित हो गया है कि चीन भारत का मित्र राष्ट्र नहीं है. दक्षिण एशिया में भारत का कद चीन को जरा भी नहीं भाता. इसलिए वह पश्चिम और उत्तर में पाकिस्तान द्वारा, पूरब में नेपाल और दक्षिण में श्रीलंका के जरिये भारत की घेराबंदी को अंजाम देना चाहता है. ईरान के साथ होने वाले समझौते के जरिये चीन अब भारत के प्रभुत्व और आर्थिक गतिविधियों को और भी हानि पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.


चीन-ईरान के प्रस्तावित समझौते के एक अनुच्छेद के मुताबिक चीन को ईरान की हर रुकी या अधूरी पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने का प्रथम अधिकार होगा. यदि चीन इस विकल्प को चुनता है तो चाबहार बंदरगाह का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है. इस बंदरगाह के नियंत्रण को यदि भारत चीन के हाथों खो देता है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह बहुत ही अशुभ संकेत होगा. ऐसा होने पर भारत को पश्चिम एशिया से कच्चा तेल उन समुद्री मार्गों से लाना होगा जिनका नियंत्रण चीन के पास होगा.

चाबहार-ज़ाहिदान रेल-मार्ग निर्माण से भारत को हटाया जाना एक झटके में अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों को भारत की पहुंच से वंचित कर देना है. और यदि चीन चाबहार बंदरगाह को भी अपने नियंत्रण में लेता है तो इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है.

पश्चिम एशिया में ईरान, सऊदी अरब और इजराइल ही वे तीन देश हैं जिनका प्रभाव न सिर्फ इस क्षेत्र पर असर डालता है बल्कि इन तीनों के बीच के नाज़ुक संतुलन में रत्ती भर अंतर आने से समूचा विश्व अछूता नहीं रहता.

ईरान में इतने बड़े पैमाने पर चीनी निवेश के कारण सऊदी अरब और इजराइल की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है. ऊर्जा के क्षेत्र में 280 बिलियन डॉलर का चीनी निवेश निश्चित ही ईरान को तेल उत्पादन में सऊदी अरब से आगे ले जाने की क्षमता रखता है. साथ ही चीन और ईरान का सैन्य सहयोग क्षेत्र के संतुलन को ईरान के पक्ष में कर सकता है. पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते वर्चस्व से इजराइल की चिंता और भी बढ़ सकती है. आर्थिक रूप से संपन्न और सैन्य शक्ति से लैस ईरान इस क्षेत्र में सऊदी अरब एवं इजराइल के प्रभुत्व को निश्चित तौर पर कमज़ोर कर सकता है.

1979 के शुरुआत में हुई शिया इस्लामी क्रांति ने ईरान को यूरोप और अमेरिका से दूर कर दिया और तब से ही यह नया ईरान और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका एक दूसरे के दुश्मन बन गए. 2015 में इन दोनों देशों की दुश्मनी थोड़ी थम गई जब अमेरिका समेत सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पांचों देश और जर्मनी ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया. इसे जॉइंट कॉम्प्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है. लेकिन 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एकतरफा तौर पर अमेरिका को इस समझौते से अलग कर दिया और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए. इन प्रतिबंधों ने ईरान के अर्थतंत्र को तब बुरी तरह से प्रभावित किया जब ईरानी बैंकों को स्विफ्ट नाम के बैंकिंग प्रोटोकॉल से अलग कर दिया जिसके कारण दूसरे देशों से ईरान का व्यापार लगभग ठप्प हो गया.

अब ईरान-चीन के प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के देशों में अपने बैंकों की शाखाएं खोलेंगे. इस समझौते में इस तरह के अनुबंधों को शामिल किया गया है जो अमेरिकी मुद्रा के वर्चस्व के लिए खतरा बन सकता है. क्योंकि चीन और ईरान स्विफ्ट को दरकिनार करते हुए एक नए बैंकिंग प्रोटोकॉल के तहत पैसे का लेनदेन करेंगे जिसमे डॉलर नदारद होगा. यानी कि पश्चिम एशिया में चीन का आगमन अमेरिका के लिए नयी चुनौतियां लेकर आएगा. ईरान वह देश है जहां सरकार और नागरिक चरित्र एक-दूसरे के विपरीत रहा करते हैं. चाहे वह तब का ईरान हो जब वहां राजशाही थी या अब जब देश की शासन प्रणाली इस्लामी हो चली है.

ऐसे में इस समझौते को लेकर जहां ईरानी सत्ता खुश है कि देश की ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था दोबारा परवान चढ़ेगी, वहीं ईरानी जनता इस समझौते में चीनी गुलामी की आहट सुनती है.

ईरानी सरकार और जनता दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं. नज़दीक भविष्य में यह समझौता भले ही ईरान के लिए हितकारी हो लेकिन मित्रता के मुखौटे में छिपी चीनी सहायता उस शहद की तरह है जो मीठा तो है लेकिन कालांतर में वही मिठास हलाहल में तब्दील हो जाती है. क्या ईरानी शासक वर्ग चीनी निवेश से अफ़्रीकी देशों में उपजे संकट को नज़रअंदाज़ कर रहा है और सिर्फ नज़दीकी भविष्य की रौशनी को ही सूरज का अमर उजाला समझ बैठा है.
इस समझौते में किसका कितना नुकसान होता है यह तो आने वाला भविष्य बताएगा लेकिन निश्चित तौर पर चीन अपने धनबल से बदलते विश्व में अपना वर्चस्व बनाने की और अग्रसर है.
समझौते के तहत निवेश के एवज में चीन को ईरानी तेल 30 फीसदी रियायती दरों पर मिलेगा जिसका भुगतान वह दो साल की अवधि के बाद करेगा जो विश्व में अब तक अनदेखा और अनसुना तेल समझौता है. और इस पैसे का भुगतान वह डॉलर में नहीं बल्कि अपनी मुद्रा युआन में करेगा जिसका उसके पास अथाह भण्डार है. यानी हर दृष्टि से लाभ ही लाभ.

चीन जिस अंदाज़ में मदद के नाम पर दूसरे देशों को अपना आर्थिक गुलाम बना रहा है उसका नज़दीकी उदाहरण हमारा पडोसी देश पाकिस्तान है. पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रान्त बलूचिस्तान में चीनी प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वहां ज़मीन की खरीद-फरोख्त बिना चीनी इजाज़त के नहीं हो सकती. अप्रैल 2020 में तंजानियाई राष्ट्रपति जॉन मागुफुली ने चीन के 10 बिलियन डॉलर के ऋण को ठुकराते हुए कहा था कि चीनी ऋण की शर्तें अफ्रीका में नव उपनिवेशवाद को जन्म देती हैं. उन्होंने कहा कि “कोई नशे में मदमस्त शराबी ही मदद के एवज में चीनी शर्तों को स्वीकारेगा.”

Saturday, June 20, 2020

कोरोना संकट से यूरोप में दोस्तो की दुश्मनी


कोरोना के प्रकोप से भयभीत यूरोप के लगभग हर देश ने, मार्च का अंत आते-आते, अपनी कारोबारी और शैक्षिक, यातायात और पर्यटन गतिविधियां रोक दीं या बहुत सीमित कर दीं. केवल एक देश ऐसा था, जो यहां सबसे अलग चल रहा था - स्वीडन. वहां तालाबंदी नहीं हुई. संक्रमण से बचाव के आम नियमों के पालन के अलावा यहां कोई विशेष रोक-टोक नहीं थी. यूरोप की सभी सरकारें इसे विस्मय के साथ देख रही थीं और उनकी जनता ईर्ष्या के साथ. लोग कहा करते थे कि काश! हमारे यहां भी ऐसा ही होता! किंतु जिन्हें पहले ईर्ष्या हो रही थी, वे अब शायद सोच रहे होंगे कि अच्छा ही हुआ कि उनकी सरकारें स्वीडन की राह पर नहीं चलीं.
स्वीडन में कोरोना का संक्रमण राजधानी स्टॉकहोम में रहने वाले विदेशी प्रवासियों के द्वारा फैला था. 10 जून 2020 तक देश भर में कुल सवा तीन लाख लोगों के टेस्ट हुए थे. इनमें से 46,814 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई और इससे 4,795 लोगों की मृत्यु हुई. कोविड-19 का ग्राफ़ जून का महीना शुरू होने के साथ नये संक्रमणों में और भी तेज़ी होते दिखा रहा है. आठ प्रतिशत से भी अधिक की मृत्यु दर स्वीडन जैसे एक उच्चविकसित, लोक-कल्याणकारी और उत्तम स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देश के लिए नितांत अशोभनीय है. तुलना के लिए मात्र एक करोड़ की जनसंख्या वाले स्वीडन के बदले उससे 134 गुना अधिक जनसंख्या वाले भारत में यही मृत्यु दर तीन प्रतिशत से भी कम है. जबकि भारत स्वीडन जैसा कोई उच्चविकसित या उत्तम स्वास्थ्य व्यवस्था वाला देश नहीं है.
स्वीडन की सरकार आशा कर रही थी कि तालाबंदी नहीं होने से वहां की अर्थव्यवस्था को आंच नहीं पहुंचेगी. यह आशा भी अब निराशा बनने जा रही है. वहां के आर्थिक शोध संस्थान ‘नीयर’ (एनआइईआर) का आकलन है कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) इस वर्ष सात प्रतिशत तक लुढ़क जायेगा और बेरोज़गारी भी 10 प्रतिशत बढ़ जायेगी. संस्थान ने इसके दो मुख्य कारण बताये. पहला यह कि स्वीडन निर्यात पर निर्भर देश होने से अपने माल-सामान के आयातक देशों में होने वाली घटनाओं से तुरंत प्रभावित होता है. आयातक देशों की मुख्य चिंता इस समय कारोना का कहर है. दूसरा बड़ा कारण है स्वीडन के परिवारों का बुरी तरह कर्ज से दबा होना. ऐसे में वे इस संकट के समय उपभोग या निवेश के लिए बहुत संकोच के साथ ही ख़र्च करेंगे. यहां 18 से 25 वर्ष तक के युवाओं के बीच बेरोज़गारी का स्तर 11 प्रतिशत से भी अधिक है. ऐसे में उनके हाथ सबसे अधिक बंधे होंगे.
स्वीडन में किसी वर्ष के आरंभिक चार महीनों में औसतन जितनी मौतें होतीं हैं, कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण उससे 30 प्रतिशत अधिक मौतें हुई हैं. अपनी एक करोड़ की जनसंख्या के साथ स्वीडन ही उत्तरी यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे) में सबसे बड़ा देश है. स्वीडन की आधी जनसंख्या के बराबर वाले उसके दक्षिणी सीमांत पड़ोसी डेनमार्क में, 10 जून 2020 तक, कोरोना के 12,216 मामलों की पुष्टि हुई थी और वहां इससे अब तक केवल 593 मौतें ही हुई हैं. उसके उत्तर-पश्चिमी सीमांत पड़ोसी नॉर्वे में ये आंकड़े क्रमशः 8,576 और 293 हैं.
नॉर्वे की जनसंख्या भी डेनमार्क जितनी ही, यानी स्वीडन की जनसंख्या के आधे के बराबर है. इन दोनों देशों ने अपने यहां तालाबंदी लगायी थी. किंतु उसे अब इस सीमा तक खोल चुके हैं कि 15 जून से अन्य देशों के पर्यटक भी वहां घूमने-फिरने आ सकते हैं. किंतु, दोनों देश स्वीडन के पर्यटक अपने यहां नहीं चाहते. ऐसा पहली बार हो रहा है कि स्वीडन के सीमांत पड़ोसी यह नहीं चाहते कि स्वीडिश नागरिक उनके यहां आयें. उन्हें डर है कि स्वीडन के लोग आयेंगे तो अपने साथ कोरोना वायरस भी लायेंगे. इससे उनके अब तक के सारे किये-धरे पर पानी फिर जायेगा. इसलिए स्वीडन के साथ वाली उनकी सीमाएं या तो बंद रहेंगी या वहां कड़ी जांच होगी. इस कारण कार या ट्रेन द्वारा इन देशों से होकर स्वीडन पहुंचने के इच्छुक या स्वीडन से होकर इन देशों में जाने की इच्छा रखने वाले दूसरे देशों के लोग फिलहाल ऐसा नहीं कर पायेंगे.
स्वीडन की विदेशमंत्री अन लिंदे ने नॉर्वे और डेनमार्क के निर्णय के प्रति नाराज़गी प्रकट करते हुए कहा कि नॉर्डिक देशों (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और आइसलैंड) के बीच की सीमाएं खोलने की प्रक्रिया से स्वीडन को बाहर रखना एक राजनैतिक निर्णय है, जिसका स्वास्थ्य संबंधी कोई औचित्य नहीं है. स्वीडन के टेलीविज़न पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए श्रीमती लिंदे ने यह भी कहा कि स्वीडन तो यही आशा कर रहा था सभी नॉर्डिक देश मिल कर कोई साझा रास्ता निकालेंगे, पर फिलहाल यह असंभव लग रहा है.
कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वीडन की जनता ही नहीं, सरकार भी अपने पड़ोसियों के निर्णय को अपने बहिष्कार के समान देख रही है. स्कैंडिनेवियाई देशों के बीच लंबी एकता और भाईचारे में इससे दरार पड़ने का डर है. स्वीडन की सरकार ने जब अपने यहां तालाबंदी नहीं करने का निर्णय किया, तब उसने यह सब कतई नहीं सोचा रहा होगा. कोरोना के विश्वव्यापी आकस्मिक हमले ने वास्तव में पूरी दुनिया की सरकारों को हक्का-बक्का कर दिया. इसने उन्हें ऐसे-ऐसे निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया, जिनके दूरगामी परिणाम सोच पाना बहुत ही कठिन था. जिन्होंने तालाबंदी की, वे भी परेशान हैं और जिन्होंने नहीं की, वे भी. दोनों निर्णय ‘आगे कुंआं, पीछे खाई’ के बीच चुनाव के समान थे.
स्वीडन की सरकार ने पू्र्ण तालाबंदी नहीं करने का अपना निर्णय देश के जाने-माने महामारी विशेषज्ञ अंदेर्स तेग्नेल की सलाह पर लिया था. स्वीडिश रेडियो के साथ अपने एक इंटरव्यू में इन्हीं दिनों उन्होंने स्वीकार किया कि उनसे भूल हुई है. उन्होंने कहा, ‘’स्पष्ट है कि हमने स्वीडन में जो कुछ किया है, उसमें निश्चित रूप से सुधार की गुंजाइश है. यदि हमें ठीक-ठीक पता रहा होता कि संक्रमण के फैलने को बेहतर ढंग से कैसे रोका जा सकता है, तो ऐसा नहीं हुआ होता.’’ तेग्नेल ने दुख प्रकट किया कि इस निर्णय के कारण ‘’बहुत अधिक स्वीडिश नागरिकों की बहुत जल्दी मृत्यु हो गयी.’’ सबसे अधिक मौतें स्वीडन के वृद्धावस्था आश्रमों में रहने वालों के बीच हुयीं.
स्वीडन की सरकार के परामर्शदाता अंदेर्स तेग्नेल का इस रेडियो इंटरव्यू में कहना था कि इस महामारी का यदि हमें फिर से सामना करना पड़े, तो आज की जानकारी के आधार पर हम स्वीडन और शेष दुनिया द्वारा अपनाये गये रास्ते के बीच वाला रास्ता चुनेंगे. स्वीडन में स्कूल, रेस्त्रां या दुकानों वगैरह को कभी बंद नहीं किया गया. 50 की संख्या तक लोग कही भी एकत्रित हो सकते हैं. वहां आने पर रोक केवल उन्हीं विदेशियों के लिए है, जो यूरोपीय संघ के बाहर के किसी देश के होंगे.

शुरू-शुरू में लोगों को यह उदारता बहुत अच्छी लग रही थी. लेकिन नये संक्रमितों और मृतकों की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा तेज़ी से बढ़ती देख कर लोगों के हाथ-पैर फूलने लगे. सरकार की आलोचना होने लगी. किंतु सरकार अपने निर्णय पर अब भी अटल है. वह अब भी कोई कठोरता नहीं दिखाना चाहती. सरकार की इस समय सबसे बड़ी चिंता यही है कि वह स्वीडन वालों के लिए बंद नॉर्वे और डेनमार्क की सीमाओं को कैसे खुलवाये. उत्तरी यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों के बीच की मधुर एकता में पड़ती उस खटास को कैसे टाले, जो नॉर्वे और डेनमार्क के निर्णयों के कारण 15 जून से देखने में आयेगी.

ट्रम्प पर नये आरोप

इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कह दिया था कि प्रकाशन के बाद बोल्टन को बहुत मुश्किल हो सकती है. उनका कहना है कि राष्ट्रपति के रूप में उनसे हुई हर बातचीत को वे बहुत गोपनीय समझते हैं और उस बातचीत को प्रकाशित करना क़ानून तोड़ना है. इससे पहले जनवरी में ही राष्ट्रपति के कार्यालय ने बोल्टन से गोपनीय सूचनाओं को हटाने के लिए कहा था, जिसे उन्होंने मानने से इनकार कर दिया था. तब राष्ट्रपति ने एक ट्वीट में लिखा था कि उन्होंने बोल्टन को कभी नहीं बताया था कि यूक्रेन को दी जा रही सहायता का कोई संबंध डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े लोगों की हो रही जाँच से है. इस जाँचके दायरे में जो बाइडेन और उनके बेटे भी हैं. यूक्रेन का मसला ट्रंप के ख़िलाफ़ लाए गए महाभियोग के आरोपों में बहुत अहम था.

'द रूम व्हेयर इट हैपेंड’ शीर्षक किताब में बोल्टन ने कई बड़े ख़ुलासे किए हैं. ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में छपे अंश में बताया गया है कि दुबारा चुनाव जीतने में मदद के लिए ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आग्रह किया था. आग्रह यह था कि चीन अमेरिकी गेहूँ और सोयाबीन की ख़रीद अधिक करे ताकि किसानों को फ़ायदा मिले और वे ट्रंप के पक्ष में मतदान करें.

उल्लेखनीय है कि उन राज्यों में, जो मुख्य रूप से चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं, किसानों के वोट बहुत अहम हैं. चीन के साथ व्यापार युद्ध में किसानों को हुए घाटे की भरपाई के लिए ट्रंप उन्हें अनुदान दे रहे हैं, जिसे एक तरह की रिश्वत कही जा रही है. इसी अंश में यह भी बोल्टन ने लिखा है कि जिनपिंग ने ट्रंप के साथ और छह साल काम करने की इच्छा जतायी थी. इस पर ट्रंप ने कहा था कि लोग चाहते हैं कि उनके लिए दो कार्यकाल की मौजूदा संवैधानिक सीमा को हटा दिया जाए. उस बातचीत में शी जिनपिंग ने यह भी कहा था कि अमेरिका में बहुत चुनाव होते हैं.

‘द वाशिंगटन पोस्ट’ में प्रकाशित अंश के अनुसार तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ ने ट्रंप से कहा था कि अमेरिका में जाँच के दायरे में फंसी एक तुर्की कंपनी का कोई दोष नहीं है. इस पर ट्रंप ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे इस मसले का समाधान कर देंगे, लेकिन मुश्किल यह है कि जाँच कर रहे अधिकारी राष्ट्रपति ओबामा के लोग हैं. पर ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें हटाकर वे अपने लोग जाँच में बैठायेंगे. ट्रंप द्वारा उग्यूर मुस्लिम समुदाय के साथ चीनी सरकार के रवैए की प्रशंसा करने की बात भी बोल्टन ने लिखी है. सरकारी काम के लिए व्यक्तिगत ईमेल के इस्तेमाल के विवादों से घिरी अपनी बेटी इवांका ट्रंप से मीडिया का ध्यान हटाने के लिए ट्रंप ने पत्रकार जमाल ख़शोगी की हत्या के मामले में सऊदी अरब के शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान के समर्थन में बयान जारी किया था, ताकि वह सुर्खियों में आ जाए.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, बोल्टन ने यह भी लिखा है कि ट्रंप वेनेज़ुएला पर हमले के विचार को मज़ेदार मानते थे और उनका कहना था कि वह देश असल में अमेरिका का हिस्सा है. यहाँ यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि बोल्टन ट्रंप प्रशासन के उन बड़े अधिकारियों में रहे हैं, जो किसी भी तरह से वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति मदुरो को अपदस्थ करने पर आमादा थे. बोलिविया में तख़्तापलट की योजना बनाने वालों में बोल्टन भी शामिल हो सकते हैं क्योंकि वे किसी भी अमेरिका विरोधी सरकार को हटाने की नीयत रखते हैं.

'द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट भी कम दिलचस्प नहीं है. एक जगह बोल्टन बताते हैं कि 2018 में उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन से राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात के बाद विदेश सचिव माइक पॉम्पियो ने उन्हें पर्ची पर लिखकर दिया था कि यह आदमी बकवास (शिट) से भरा हुआ है. महीने भरबाद पॉम्पियो ने यह भी कहा था कि उत्तर कोरिया से कूटनीतिक बातचीत से कुछ भी नहीं निकलेगा. इन अंशों को देखकर लगता है कि बोल्टन ट्रंप से सारी खुन्नस निकाल लेना चाहते हैं. वे लिखते हैं कि ट्रंप को ब्रिटेन के बारे में सामान्य समझ भी नहीं है. उन्होंने एक दफ़ा तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे से पूछा था कि क्या ब्रिटेन एक परमाणु शक्ति है. इसी तरह से ट्रंप ने एक बार बोल्टन से पूछा था कि क्या फ़िनलैंड रूस का हिस्सा है. इतना ही नहीं, वे अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व और वर्तमान राष्ट्रपतियों के उल्लेख में भी गड़बड़ करते थे.

ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटते हुए बोल्टन ने कहा था कि यह उनका निर्णय है, लेकिन राष्ट्रपति ने कहा था कि बहुत अधिक असहमत होने के कारण उन्होंने बोल्टन को पद से हटाया है. बोल्टन अमेरिकी विदेश नीति के गलियारों में एक आक्रामक सोच के व्यक्ति माने जाते हैं और कई लोग उन्हें हेनरी किसिंजर की परंपरा में देखते हैं, जिसका एक ही उद्देश्य होता है कि दुनिया में अमेरिकी चौधराहट चलती रहे. वे फ़ॉक्सन्यूज़ चैनल के टिप्पणीकार के रूप में भी कुख्यात रहे हैं तथा मुस्लिमविरोधी संगठनों से भी उनका जुड़ाव रहा है. ईरान और वेनेज़ुएला को पाबंदियों से परेशान कर वहाँ सत्ता में बदलाव की कोशिशों में बोल्टन की बड़ी भूमिका रही है.

बोल्टन जैसे कुछ लोग ट्रंप से इसलिए भी असहज हैं कि वे अमेरिकी राजनीति के व्याकरण से परे जाकर चीन, उत्तर कोरिया और रूस जैसे कुछ देशों से संबंधों को बेहतर करने की कोशिश करते हैं. बहरहाल, बोल्टन प्रकरण यह भी इंगित करता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था कितने तरह के अंतर्विरोधों से घिर चुकी है और इसका नतीजा यह है कि आज वह महाशक्ति आंतरिक और बाह्य स्तर पर तमाम संकटों से जूझते हुए अपने वर्चस्व की ढलान पर है.

Friday, June 19, 2020

क्या नेहरू की वजह से चीन सुरक्षा परिषद का सदस्य बना?

संयुक्त राष्ट्र
क्या वाकई जवाहर लाल नेहरू की वजह से सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट भारत के बजाय चीन को मिल गई थी?
भारत आठवीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुन लिया गया है और इसके साथ ही एक पुरानी भारत आठवीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना गया है. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व समुदाय के प्रति आभार जताया है. एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि भारत सभी सदस्यों के साथ मिलकर दुनिया में शांति, सुरक्षा और बराबरी के लिए काम करेगा. सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए बुधवार को हुए मत परीक्षण मेें भारत के साथ मैक्सिको, आयरलैंड और नॉर्वे को भी चुना गया. ये सभी देश दो साल तक सुरक्षा परिषद में रहेंगे.

इस खबर के बाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी दावेदारी को लेकर सोशल मीडिया पर बहस गर्म हो गई. फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य हैं. स्थायी सदस्य हैं अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन. हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा दो साल के कार्यकाल के लिए पांच अस्थायी सदस्यों को चुनती है. भारत काफी समय से स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है. अमेरिका और फ्रांस जैसे कई देश उसका समर्थन कर चुके हैं.

उधर, एक बड़ा वर्ग सुरक्षा परिषद में भारत के न होने को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की गलती मानता है. उसके मुताबिक अगर नेहरू ने खुद पीछे हटकर चीन को तरजीह नहीं दी होती तो भारत आज सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होता. तब उसका एक अलग रसूख तो होता ही, मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी बनाने में इतनी अड़चन भी नहीं आती.

सवाल उठता है कि यह बात कितनी सच है. जवाब जानने के लिए बात को शुरू से ही शुरू करते हैं.

भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है. जनवरी 1942 में बने पहले संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र (चार्टर) पर हस्ताक्षर करने वाले 26 देशों में उसका भी नाम था. 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में शुरू हुए और दो महीनों तक चले 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भारत के भी प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. 30 अक्टूबर 1945 को भारत की ब्रिटिश सरकार ने इस सम्मेलन में पारित अंतिम घोषणापत्र की विधिवत औपचारिक पुष्टि भी की थी.

इस सारी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्रता के बाद भारत को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिये जाने की चर्चा हुई थी. हवा का रुख भारत के अनुकूल ही था. लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस संभावना पर पूर्णविराम लगा दिया. आइए, इस ऐतिहासिक चूक की कहानी जानते हैं.
चीन उस समय च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच चल रहे गृहयुद्ध से लहूलुहान था. कम्युनिस्टों से घृणा करने वाले अमेरिका और उसके साथी ब्रिटेन तथा फ्रांस, किसी साम्यवादी चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं चाहते थे. चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गयी. लेकिन, गृहयुद्ध में अंततः चीनी कम्युनिस्टों की विजय हुई. एक अक्टूबर 1949 को चीन की मुख्य भूमि पर उन्हीं की सरकार बनी. च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. वहां उन्होंने अपनी एक अलग सरकार बनायी. तभी से ताइवान, कम्युनिस्ट चीन के विरोधी चीनियों का ही एक अलग देश है.

इन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को भी सबसे पहले देश के बंटवारे वाली उथल-पुथल से निपटना पड़ा. नेहरू ही भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे. समाजवाद की रूसी और चीनी अवधारणाओं से काफ़ी प्रभावित उनके निजी आदर्श और विचार देश की विदेशनीति हुआ करते थे. यही कारण था कि चीन में माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनते ही उसे राजनयिक मान्यता देने वाले देशों की पहली पांत में भारत भी खड़ा था. जवाहरलाल ऩेहरू को आशा ही नहीं अटल विश्वास था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे.

चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने के एक ही साल के भीतर, 24 अगस्त 1950 को, नेहरूजी को अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित का एक पत्र मिला. कुछ समय पहले तक वह अज्ञात था. विजयलक्ष्मी पंडित उस समय अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.

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विजयलक्ष्मी पंडित का पत्र

इस पत्र में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने भाई को लिखा था, ‘अमेरिका के विदेश मंत्रालय में चल रही एक बात तुम्हें भी मालूम होनी चाहिये. वह है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाना. इस प्रश्न के बारे में तुम्हारे उत्तर की रिपोर्ट मैंने अभी-अभी रॉयटर्स (समाचार एजेंसी) में देखी है. पिछले सप्ताह मैंने (जॉन फ़ॉस्टर) डलेस और (फ़िलिप) जेसप से बात की थी... दोनों ने यह सवाल उठाया और डलेस कुछ अधिक ही व्यग्र लगे कि इस दिशा में कुछ किया जाना चाहिये. पिछली रात वॉशिंगटन के एक प्रभावशाली कॉलम-लेखक मार्क़िस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने के लिए कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया ओर सलाह दी कि वे इस मामले में धीमी गति से चलें, क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं किया जायेगा.’

जॉन फ़ॉस्टर डलेस 1950 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक शांतिवार्ता-प्रभारी हुआ करते थे. 1953 से 1959 तक वे अमेरिका के विदेशमंत्री भी रहे. फ़िलिप जेसप एक न्यायविद और अमेरिकी राजनयिक थे जो नेहरू से मिल चुके थे. विजयलक्ष्मी पंडित का यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ ही समय पहले नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) में मिले हैं.

प्रथम प्रधानमंत्री का उत्तर

अपने उत्तर में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, ‘तुमने लिखा है कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’
चीन उस समय च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच चल रहे गृहयुद्ध से लहूलुहान था. कम्युनिस्टों से घृणा करने वाले अमेरिका और उसके साथी ब्रिटेन तथा फ्रांस, किसी साम्यवादी चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं चाहते थे. चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गयी. लेकिन, गृहयुद्ध में अंततः चीनी कम्युनिस्टों की विजय हुई. एक अक्टूबर 1949 को चीन की मुख्य भूमि पर उन्हीं की सरकार बनी. च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. वहां उन्होंने अपनी एक अलग सरकार बनायी. तभी से ताइवान, कम्युनिस्ट चीन के विरोधी चीनियों का ही एक अलग देश है.

इन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को भी सबसे पहले देश के बंटवारे वाली उथल-पुथल से निपटना पड़ा. नेहरू ही भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे. समाजवाद की रूसी और चीनी अवधारणाओं से काफ़ी प्रभावित उनके निजी आदर्श और विचार देश की विदेशनीति हुआ करते थे. यही कारण था कि चीन में माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनते ही उसे राजनयिक मान्यता देने वाले देशों की पहली पांत में भारत भी खड़ा था. जवाहरलाल ऩेहरू को आशा ही नहीं अटल विश्वास था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे.

चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने के एक ही साल के भीतर, 24 अगस्त 1950 को, नेहरूजी को अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित का एक पत्र मिला. कुछ समय पहले तक वह अज्ञात था. विजयलक्ष्मी पंडित उस समय अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.

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विजयलक्ष्मी पंडित का पत्र

इस पत्र में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने भाई को लिखा था, ‘अमेरिका के विदेश मंत्रालय में चल रही एक बात तुम्हें भी मालूम होनी चाहिये. वह है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाना. इस प्रश्न के बारे में तुम्हारे उत्तर की रिपोर्ट मैंने अभी-अभी रॉयटर्स (समाचार एजेंसी) में देखी है. पिछले सप्ताह मैंने (जॉन फ़ॉस्टर) डलेस और (फ़िलिप) जेसप से बात की थी... दोनों ने यह सवाल उठाया और डलेस कुछ अधिक ही व्यग्र लगे कि इस दिशा में कुछ किया जाना चाहिये. पिछली रात वॉशिंगटन के एक प्रभावशाली कॉलम-लेखक मार्क़िस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने के लिए कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया ओर सलाह दी कि वे इस मामले में धीमी गति से चलें, क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं किया जायेगा.’

जॉन फ़ॉस्टर डलेस 1950 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक शांतिवार्ता-प्रभारी हुआ करते थे. 1953 से 1959 तक वे अमेरिका के विदेशमंत्री भी रहे. फ़िलिप जेसप एक न्यायविद और अमेरिकी राजनयिक थे जो नेहरू से मिल चुके थे. विजयलक्ष्मी पंडित का यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ ही समय पहले नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) में मिले हैं.

प्रथम प्रधानमंत्री का उत्तर

अपने उत्तर में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, ‘तुमने लिखा है कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’
स्वयं एक कम्युनिस्ट नेता बुल्गानिन ने जब देखा कि नेहरू अब भी चीन समर्थक राग ही अलाप रहे हैं, तो वे इसके सिवाय और क्या कहते कि ‘हमने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का प्रश्न इसलिए उठाया, ताकि हम आपके विचार जान सकें. हम भी सहमत है कि यह सही समय नहीं है, सही समय की हमें प्रतीक्षा करनी होगी.’

नेहरू के उत्तर से अमेरिकी प्रस्ताव की पुष्टि हुई

बुल्गानिन को दिये गये नेहरू के उत्तर से इस बात की फिर पुष्टि होती है कि अमेरिका ने कुछ समय पहले सचमुच यह सुझाव दिया था कि सुरक्षा परिषद में चीन वाली सीट, जिस पर उस समय ताइवान बैठा हुआ था, भारत को दी जानी चाहिये. पुष्टि इस बात की भी होती है कि पहले अमेरिकी सुझाव और बाद में सोवियत सुझाव को भी साफ़-साफ़ ठुकरा कर नेहरू ने उस देशहितकारी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा तब वे स्वयं ही करते, जब देश का प्रधानमंत्री उनके बदले कोई दूसरा व्यक्ति रहा होता.

भारत में जो गिने-चुने लोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के बारे में अमेरिका और सोवियत संघ के इन दोनों सुझावों को जानते हैं, वे उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू की प्रतिक्रिया को सही ठहराते हैं. पर देखा जाए तो नेहरू के जीवनकाल में ही घटी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने चीन के प्रति उनके मोह या उसके साथ टकराव से बचने की उनकी भयातुरता को अतिरंजित ही नहीं, अनावश्यक भी ठहरा दिया. चीन ने नेहरू के सामने ही न केवल तिब्बत को हथिया लिया और वहां भीषण दमनचक्र चलाया, खुद अपने यहां भी ‘लंबी छलांग’ और उनके निधन के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे सिरफिरे अभियान छेड़ कर अपने ही करोड़ों देशवासियों की अनावश्यक बलि ले ली.

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चीन ने भारत को कड़वा सबक सिखाया

नेहरू तो चीन की महानता का गुणगान करते रहे जबकि1962 में उसने भारत पर हमला कर भारत को करारी हार का कड़वा ‘सबक सिखाया.’ इस सबक का आघात डेढ़ साल के भीतर ही नेहरू की मृत्यु का भी संभवतः मुख्य कारण बना. लद्दाख का स्विट्ज़रलैंड जितना बड़ा एक हिस्सा तभी से चीन के क़ब्ज़े में है. अरुणाचल प्रदेश को भी वह अपना भूभाग बताता है. क्षेत्रीय दावे ठोक कर सोवियत संघ और वियतनाम जैसे अपने कम्युनिस्ट बिरादरों से युद्ध लड़ने में भी चीन ने कभी संकोच नहीं किया और अब तो वह ताइवान को भी बलपूर्वक निगल जाने की धमकी दे रहा है.

जो लोग यह कहते हैं कि 1955 में सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन का यह सुझाव हवाबाज़ी था कि भारत के लिए सुरक्षा परिषद में छठीं सीट भी बनाई जा सकती है, वे भूल जाते हैं या नहीं जानते कि चीन में माओ त्से तुंग की तानशाही शुरू होते ही उस समय के सोवियत तानाशाह स्टालिन के साथ भी चीन के संबंधों में खटास आने लगी थी.

रूस और चीन के सैद्धांतिक मतभेद

माओ और स्टालिन कभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हुआ करते थे. स्टालिन की पांच मार्च 1953 को मृत्यु होते ही माओ त्से तुंग अपने आप को कम्युनिस्टों की दुनिया का ‘सबसे वरिष्ठ नेता’ मानने और सोवियत संघ को ही उपदेश देने लगे. दूसरी ओर सोवियत संघ के नये सर्वोच्च नेता निकिता ख़्रुश्चेव, स्टालिन के नृशंस अत्याचारों का कच्चा चिठ्ठा खोलते हुए उस स्टालिनवाद का अंत कर रहे थे जो अब चीन में माओ की कार्यशैली बन चुका था.
 1955 आने तक माओ और ख्रुश्चेव के बीच दूरी इतनी बढ़ चुकी थी कि चीन उस समय के पूर्वी और पश्चिमी देशों वाले गुटों के बीच ख्रुश्चेव की ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ वाली नीति को आड़े हाथों लेने लगा था. चीन इसे मार्क्स के सिद्धान्तों को भ्रष्ट करने वाला ‘संशोधनवाद’ बता रहा था. दोनों पक्ष एक-दूसरे की निंदा-आलोचना के नए-नए शब्द और मुहावरे गढ़ रहे थे. एक-दूसरे को ‘पथभ्रष्ट,’ ‘विस्तारवादी’ और ‘साम्राज्यवादी’ तक कहने लगे थे.

भारत में सोवियत संघ को अपना भला दिखा

इस कारण सोवियत नेताओं को इस बात में विशेष रुचि नहीं रह गयी थी कि सुरक्षा परिषद में चीन के नाम वाली स्थायी सीट भविष्य में माओ त्से तुंग के चीन को ही मिलनी चाहिये. वे चीन वाली सीट पर से ताइवान को हटा कर भारत को बिठाने के अमेरिकी प्रयास का या तो विरोध नहीं करते या कुछ समय के लिए विरोध का केवल दिखावा करते.

ताइवान को मिली हुई सीट भारत को देने पर संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना भी नहीं पड़ता. संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत ही इसके लिए काफ़ी होता. चार्टर में संशोधन की बात तभी आती, जब सीटों की संख्या बढ़ानी होती. बुल्गानिन के कहने के अनुसार, सोवियत संघ 1955 में इसके लिए भी तैयार था. यह संशोधन क्योंकि भारत के लिए होता, जिसे अमेरिका खुद ही 1953 तक सुरक्षा परिषद में देखना चाहता था, इसलिए बहुत संभव था कि वह भी संशोधन का ख़ास विरोध नहीं करता.

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1950 वाले दशक में संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन भी, आज की अपेक्षा, आसान ही रहा होता. उस समय आज के क़रीब 200 की तुलना में आधे से भी कहीं कम देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य थे. उन्हें मनाना-पटाना आज जितना मुश्किल नहीं रहा होता. सोवियत नेता भी ज़रूर जानते रहे होंगे– जैसा कि नेहरू ने 1955 में बुल्गानिन से स्वयं कहा भी– कि अमेरिका और उसके छुटभैये ब्रिटेन व फ्रांस भी कुछ ही साल पहले ताइवान को हटा कर उसकी सीट भारत को देना चाहते थे. अतः यह मानने के पूरे कारण हैं कि सोवियत नेता भारत की सदस्य़ता को लेकर गंभीर थे, न कि हवाबाज़ी कर रहे थे.

हेनरी किसिंजर की गुप्त यात्रा

ताइवान 1971 तक चीन वाली सीट पर बैठा रहा. उस साल अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान होते हुए नौ जुलाई को गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे. घोषित यह किया गया कि वे अगले वर्ष राष्ट्रपति निक्सन की चीन यात्रा की तैयारी करने गये हैं. बीजिंग में वार्ताओं के समय तय हुआ कि निक्सन की यात्रा से पहले ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट से हटा कर उसकी सीट कम्युनिस्ट चीन को दी जायेगी. इस निर्णय से यह भी सिद्ध होता है कि अमेरिका 1970 वाले दशक में भी सुरक्षा परिषद को अपनी पसंद के अनुसार उलट-पलट सकता था.

चीन को लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में 25 अक्टूबर 1971 को मतदान हुआ. संयुक्त राष्ट्र के उस समय के 128 सदस्य देशों में से 76 ने चीन के पक्ष में और 35 ने विपक्ष में वोट डाले. 17 ने मतदान नहीं किया. दो-तिहाई के अवश्यक बहुमत वाले नियम से प्रस्ताव पास हो गया. ताइवान से न केवल सुरक्षा परिषद में उसकी सीट छीन ली गयी, संयुक्त राष्ट्र की उसकी सदस्यता भी छिन गयी. उसकी सीट पर 15 नवंबर 1971 से चीन का प्रतिनिधि बैठने लगा.

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नेहरू ने देशहित की चिंता की होती, तो कम से कम 60 वर्षों से भारत का प्रतिनिधि भी वीटो-अधिकार के साथ वहां बैठ रहा होता. कश्मीर समस्या भी शायद कब की हल हो चुकी होती. सोवियत संघ को भारत की लाज बचाने के लिए दर्जनों बार अपने वीटो-अधिकार का प्रयोग नहीं करना पड़ता.

सुनहरा अवसर हाथ से निकला

आज स्थिति यह है कि भारत चाहे जितनी एड़ी रगड़ ले, वह तब तक सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, जब तक इस परिषद का विस्तार नहीं होता और चीन भी उसके विस्तार तथा भारत की स्थायी सदस्यता की राह में अपने किसी वीटो द्वारा रोड़े नहीं अटकाता. चीन भला क्यों चाहेगा कि वह एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी भारत के लिए सुरक्षा परिषद में अपनी बराबरी में बैठने का मार्ग प्रशस्त करे? 1950 के दशक जैसा सुनहरा मौका अब शायद ही दोबारा आए.

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