Thursday, January 30, 2020

गांधी के कुछ अनसुने तथ्य

महात्मा गाँधी की हत्या के लगभग 6-7 प्रयास किये गए तब जाकर नाथूराम गोडसे की गोली से उनकी मौत हुई. बीबीसी पर इनमें से दो रोचक किस्से पढ़ने को मिले। एक बार गाँधी को एक समारोह में उनको जाना था, उनको लेने दो गाड़ियां आईं, एक में कार्यक्रम के आयोजक थे और दूसरे में कस्तूरबा के साथ गांधी. आयोजकों की कार थोड़ा सा आगे निकल गई और बीच में रेलवे फाटक पड़ता था तो महात्मा गांधी की कार वहां रुक गई. तभी एक धमाका हुआ, जो कार आगे निकली, उसके परखच्चे उड़ गए. महात्मा गांधी उस हमले से बच गए, क्योंकि ट्रेन आने में देरी हुई. और रेलवे फाटक न खुलने से उनकी कार पीछे रह गई.  ये 1934 की घटना है.
साल 1917 में महात्मा गांधी मोतिहारी में थे. मोतिहारी में सबसे बड़ी नील मिल के मैनेजर इरविन ने गांधी को बातचीत के लिए बुलाया. इरविन ने सोचा कि जिस आदमी ने उनकी नाक में दम कर रखा है, अगर इस बातचीत के दौरान उन्हें खाने-पीने की किसी चीज़ में ज़हर दे दिया जाए. ऐसा ज़हर जिसका असर थोड़ी देर बाद होता हो तो न उनके ऊपर आंच आएगी और गांधी की जान भी चली जाएगी. ये बात इरविन ने अपने खानसामे बत्तख मियां अंसारी को बताई गई. बत्तख मियां से कहा गया कि वो ट्रे लेकर गांधी के पास जाएंगे. बत्तख मियां एक छोटे- मोटे किसान थे. नौकरी करके परिवार चलाते थे, उन्होंने मना नहीं किया और वे ट्रे लेकर गांधी के पास चले गए. लेकिन जब वे गांधी जी के पास पहुंचे तो बत्तख मियां की हिम्मत नहीं हुई कि वे ट्रे गांधी के सामने रख देते. वो खड़े रहे ट्रे लेकर, गांधी ने उन्हें सिर उठाकर देखा, तो बत्तख मियां रोने लगे और सारी बात खुल गई. ये किस्सा महात्मा गांधी की जीवनी में कहीं नहीं है. किसी और हवाले से इसका जिक्र नहीं है. लेकिन ये कहा जाता है कि वो न होते तो इस देश का इतिहास क्या होता? उसके बाद बत्तख मियां का कोई नामलेवा  नहीं बचा, जेल हो गई, ज़मीनें नीलाम हो गईं.

गाँधी का जिक्र आते ही कई तरह के रंग उनके अंदर देखने को मिलते हैं. कभी वो मजाकिया, तो कभी जिद्दी आंदोलनकारी, कभी एकदम साधारण आदमी तो कभी संगीत के बड़े शौक़ीन नजर आते हैं. आजकल जैसे आंदोलनों में खूब नारे, संगीत और क्रिएटिविटी देखने को मिलती है वैसे ही गाँधी को भी ये सब पसंद था. मधुकर उपाध्याय के एक लेख में मैंने पढ़ा कि गांधी का हमेशा मानना था कि हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई तब तक मुक्कमल नहीं हो सकती जब तक उसमें संगीत न हो. बल्कि उनका कहना था कि संगीत नहीं है इसलिए ये लड़ाई उस ज़ोर से नहीं चल पा रही है जिससे उसे चलना चाहिए. वो सत्याग्रह से लोगों को जोड़ने का एक तरीका उसे मानते थे. वो नरसी मेहता का 'वैष्णवजन' अक्सर गाते थे. 'रघुपति राघव राजा राम' भी उनको पसंद था. लेकिन गांधी इतने पर ही नहीं रुक रहे थे. तमाम तरह के दूसरे गानों में भी उनकी दिलचस्पी थी. मसलन जब वो यरवडा जेल में थे और दलितों के पक्ष में आणरण अनशन करने जा रहे थे, तो अनशन पर बैठने से पहले उन्होंने सरदार पटेल को और महादेव देसाई को बुलाया और एक गीत 'उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है ' गाने लगे. उसके बाद सरदार पटेल और महादेव देसाई सबने गाना शुरू किया. फिर जेल में जितने और कैदी थे उन्होंने भी गाना शुरू कर दिया और एक पूरा माहौल बन गया.
एक किस्सा बहुत मज़ेदार है गांधी की संगीत में दिलचस्पी का और वो बताता है कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ़ हिंदुस्तानी संगीत में नहीं थी, विदेशी संगीत में भी थी. पाश्चात्य संगीत में थी. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए गांधी लंदन में थे और ठहरे थे मुरिएल लेस्टर के यहां. उनका एक आश्रम था जिसको किंग्सले हॉल कहा जाता था. पूर्वी लंदन का इलाका था. गांधी रोज शाम को जब भी फारिग होते बाकी काम करने से, बैठकें करने से तो किंग्सले हॉल के सभागार में चले जाते थे. क्योंकि वहां कुछ स्थानीय लोग इकट्ठा होकर एक गाना गाते थे. एक स्कॉटिश गीत. स्कॉटलैंड का एक लोकगीत था जिसको रॉबर्ट बर्न्स ने बाद में नए ढंग से लिखा. आउड लैंग साइन यानी गए ज़माने की बात. गांधी वो गीत सुनने के लिए कितनी बार गए, लोगों को अंदाज़ा नहीं हुआ और फिर गांधी को पता चला कि हर शनिवार को लोग इस गाने पर नाचते हैं. कांग्रेस के लोगों को जो उनके साथ गए थे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए उनको ये पसंद नहीं आता था कि गांधी इस तरह की चीजों में दिलचस्पी ले रहे हैं. उन्होंने मना करने की कोशिश की. गांधी नहीं माने और एक दिन शनिवार को जब वो वहां पहुंचे और गाना शुरू हुआ और अचानक एक महिला ने हाथ उठाकर कहा कि गाना रोक दो. फिर उसने गांधी की तरफ देखकर कहा कि आप हमारे साथ नाचना चाहेंगे? गांधी ने देखा कि वहां जितने लोग थे वो या तो पति पत्नी थे या दोस्त थे लेकिन एक लड़का, एक लड़की साथ में नाच रहे थे. गांधी ने कहा जरूर. मैं नाचूंगा लेकिन एक शर्त पर कि मेरा जोड़ीदार मेरी छड़ी होगी और गांधी अपनी छड़ी के साथ किंग्सले हॉल के उस सभागार में नाचे.
साल 1915 में हरिद्वार में कुंभ लगा था और गांधी कुंभ मेले में जा रहे थे. रास्ते में जब ट्रेन सहारनपुर रुकी तो उन्होंने देखा कि लोग पसीना-पसीना हैं, गला सूख रहा है, पानी नहीं है, लेकिन अगर पानी पिलाने वाला आता था और उन्हें पता चल जाए कि वो मुसलमान है तो वो पानी नहीं पीते थे. वो हिंदू पानी का इंतज़ार करते थे, मुसलमान पानी नहीं पी सकते थे, जान भले ही चली जाए. बहुत समय तक गांधी को ये बात सालती रही कि अगर डॉक्टर मुसलमान हो और वो आपको दवा दे तो ले लेंगे लेकिन उसके हाथ का पानी नहीं पिएंगे, इसका मतलब है कि समस्या समाज में है, बाहर है, आपके अंदर है, उससे इसका कोई मतलब नहीं है कि आप हिंदू हैं या मुसलमान हैं. आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग जब गिरफ़्तार हुए और उनपर मुकदमा चलने वाला था और सारे लोग लाल क़िले में बंद थे, तो गांधी उनसे मिलने गए. गांधी ने पाया कि उन्होंने कलकत्ता में वॉवेल से जो बात कही थी कि आपके रहते एकता नहीं हो सकती, वो कितनी सच थी.
आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों ने गांधी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान चाय अभी आने वाली है.
तो उन्होंने सिपाहियों से पूछा कि आप करते क्या हैं, उनका जवाब था कि 'ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग बने और मुसलमान चाय अलग बने.
तो गांधी ने पूछा कि 'आप क्या करते हैं अगर हिंदू चाय और मुसलमान चाय अलग अलग दी जाती है?'
उनका कहना था कि 'हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं.'
महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम करने के ढंग की, हिंसा पर जो उनका भरोसा था उस पर, फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी.
लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि 'सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं.'
गाँधी की एक बात और सबसे ख़ास थी, "उनकी बात रखने की कला", जिसके जरिये वो लोगों को अपने पक्ष में कर लेते थे. बात 1910 की है, उस वक्त गांधी जोहन्सबर्ग में थे. वहां सरकारें हर रोज़ नए फरमान जारी करती थी, उसी दौरान एक फरमान आ गया कि जिनकी शादियां दक्षिण अफ़्रीका में नहीं हुई हैं, वहां रजिस्टर्ड नहीं हैं. उनको पति पत्नी नहीं माना जाएगा. यह बात बहुत गंभीर थी क्योंकि इससे कई लाख भारतीय मूल के लोग प्रभावित होने वाले थे. गांधी घर लौटे और उन्होंने बा को यानी कस्तूरबा जी को आवाज़ दी और कहा, "तुम आज से मेरी रखैल हो गई." 
बा ने कहा, "क्या बात हुई? मेरी शादी हुई है, आप इस तरह की बात कैसे कह रहे हैं?"
गांधी ने कहा, "सरकार ने क़ानून बना दिया है अब हमारी शादी मान्य नहीं है. और अब अगर तुम मेरे साथ रहोगी तो मेरी रखैल रहोगी."
ये बात सिर्फ घर के अंदर नहीं रही, ये बात फैलने लगी. पूरे दक्षिण अफ़्रीका में जो भारतीय समाज था उसके बीच ये बात फैल गई और फिर बा ने वहां भारतीय लोगों को संगठित किया. पहली बार दक्षिण अफ़्रीका में आंदोलन के समय औरतें और बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर निकले. उन्होंने छह मील लंबा जुलूस निकाला और सरकार को ये क़ानून वापस लेना पड़ा.
एक किस्सा और है उनका. जब गांधी हिंदुस्तान लौट चुके थे तो लोगों ने उनसे कहा, "मुसलमान बहुत अड़ियल किस्म के लोग हैं, ये कोई बात ही नहीं सुनते. हम उनसे सुलह की बात करते हैं. हम उनसे कहते हैं कि आंदोलन में साथ आइए. लेकिन वो इसमें भाग लेने के लिए राजी ही नहीं है. हमने उन्हें बहुत समझाया, बहुत कहा कि हिंदुस्तान तुम्हारा भी मुल्क है. तुम यहीं पैदा हुए हो. इसके अलावा कहां जाओगे तुम. लेकिन कोई राजी नहीं है सुनने को."
तब गांधी ने उन लोगों से कहा, "आप डंडा लेकर किसी लड़की के पास जाएंगे और उससे पूछेंगे कि मुझसे इश्क करोगी. तो क्या करेगी वो, आपको भगा देगी. जब आप किसी से बात करें तो नरमी रखें- अपने स्वभाव में, अपने शब्दों में और अपनी आवाज़ में. कायदे से बात करिए. कोई इतना नामुनासिब हो ही नहीं सकता कि वो आपकी बात ही ना सुने. सब सुनेंगे, सब साथ होंगे, हिंदुस्तान आज़ाद होगा."
आगे चलकर यही हुआ, मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लिया और देश को आजाद कराने में बहुत अहम् भूमिका निभाई.
ये सिर्फ़ एक बात कहने का ढंग ही था जो आपको बताता है कि गांधी कैसे सोचते थे और कैसे चीज़ों को अपने हक़ में बदल देते थे.
महात्मा गांधी छुआछूत के सख्त ख़िलाफ़ थे. वो चाहते थे कि ऐसा समाज बने जिसमें सभी लोगों को बराबरी का दर्जा हासिल हो क्योंकि सभी को एक ही ईश्वर ने बनाया है. उनमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. दक्षिण भारत के दौरे में जब गांधी मायावरम पहुंचे तब उनका एक नए शब्द से सामना हुआ और वो शब्द था 'पंचम'. यह पंचम शब्द संगीत की भाषा में तो बहुत अच्छा माना जा सकता है लेकिन पंचम शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत में दलितों के लिए किया जाता था. यह कहा जाता था कि ये लोग हिंदू धर्म में चार वर्णों की व्यवस्था से बाहर के लोग हैं. दलित पांचवा वर्ण हैं और इन्हें इन चार वर्णों में शामिल नहीं किया जा सकता.
मायावरम में पंचमों से मुलाक़ात के बाद महात्मा गांधी को दक्षिण अफ़्रीका के अपने वो दिन याद आए जब वो दलितों को अपने घर खाने के लिए बुलाते थे और महसूस करते थे कि कोई उनका विरोध नहीं कर रहा है. लेकिन एक तरह का दबा हुआ विरोध ख़ुद कस्तूरबा गांधी की तरफ़ से होता था. कस्तूरबा को लगता था कि शायद भारत में पहुंचकर यह समस्या और बड़ी और विकराल होगी. दक्षिण अफ़्रीका में घर से ज़्यादा दूरी होने की वजह से शायद लोग एकसाथ आसानी से आ जाते हैं लेकिन भारत में यह काम कठिन होगा. कस्तूरबा गांधी का यह अनुमान ग़लत नहीं था. जब गांधी चंपारण जाने वाले थे और बांकीपुर स्टेशन उतरे जो पटना का पुराना नाम था. उन्हें कुछ लोग राजेंद्र प्रसाद के घर ले गए.
उस समय राजेंद्र प्रसाद घर पर नहीं थे और वहां मौजूद नौकर गांधी को पहचानते नहीं थे. इसलिए उन्हें बाहर वाले कमरे में ठहरा दिया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यह शख़्स पता नहीं किस जाती या धर्म से होगा. इस व्यवहार से गांधी बहुत ही खिन्न हो गए. बाद में गांधी ने जब अहमदाबाद के पास अपना आश्रम बनाया तब ठक्कर बापा का पत्र लेकर एक आदमी उनके पास आया.
उस पत्र में ठक्कर बापा ने लिखा था, ''आप कहते हैं कि सभी लोग बराबर हैं और अगर आश्रम के नियमों का पालन करेंगे तो उन्हें आश्रम में रहने की जगह दी जाएगी. इसलिए मैं एक आदमी को आपके आश्रम में रहने के लिए भेज रहा हूं. वो एक दलित हैं और आपको उन्हें आश्रम में रखने पर विचार करना है.''
गांधी ठक्कर बापा को मना नहीं कर सकते थे. मना ना करने एक वजह यह भी थी कि गांधी के प्रयोग का यह पहला चरण था और गांधी देखना चाहते थे कि उन्हें क्या हासिल होता है.
जो व्यक्ति आश्रम में रहने आए उनका नाम दूदा भाई था और साथ में उनकी पत्नी दानी बेन और एक छोटी बच्ची थी. इन तीनों को गांधी ने आश्रम में जगह दी तो अहमदाबाद में हंगामा हो गया. जुलूस निकला और नारे लगे.
जो सवर्ण आश्रम को चंदा देते थे उन्होंने चंदा देना बंद कर दिया. आश्रम बंद होने की नौबत आ गई. आसपास के लोगों ने गाली देना शुरू कर दिया और दूदा भाई का जीना हराम कर दिया. लेकिन गांधी अपने फ़ैसले से टस से मस नहीं हुए.
जब गांधी को यह पता चला कि कस्तूरबा जाने-अनजाने आश्रम की अन्य महिलाओं का केंद्र बन गई हैं और दूदा भाई को आश्रम में रखने का विरोध कर रही हैं तो उन्होंने कहा कि यह नहीं होगा. कहते हैं कि उन्होंने बहुत ऊंची आवाज़ में कस्तूरबा से कहा कि वो अपना फ़ैसला नहीं बदलेंगे.
उन्होंने कस्तूरबा से यहां तक कह दिया कि अगर वो चाहें तो अपना अलग रास्ता अपना सकती हैं. इसे झगड़ा नहीं माना जाएगा लेकिन अब वो दोनों एक साथ नहीं रह सकते. यह उनका तलाक़ होगा.
यह नाराज़गी ज़ाहिर करने के बाद गांधी ने दो चीज़ें कीं. एक तो उन्होंने ईश्वर से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी कि ग़ुस्सा उनकी एक समस्या है और वो इससे कैसे निपटेंगे नहीं जानते.
दूसरा, उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखकर पूरी घटना की जानकारी दी और कहा कि यह बात एक अछूत व्यक्ति को आश्रम में रखने की वजह से हुई है और उन्होंने कस्तूरबा से कह दिया है कि अब उनके रास्ते अलग हो चुके हैं. यह बात वो सार्वजनिक करते हैं.
बाद में कुछ नहीं हुआ. दूदा भाई आश्रम में रहे और उनकी पत्नी भी रहीं. सब कुछ ठीक ठाक हो गया. जो धन बंद हो गया था वो दूसरे स्रोत से आने लगा था लेकिन गांधी दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए जो कुछ भी कर सकते थे उन्होंने किया. इस हद तक किया कि अगर इससे उनका परिवार प्रभावित हो जाए या उनका वैवाहिक जीवन छिन्न भिन्न हो जाए उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता था.

Friday, January 3, 2020

क्या होगा मिडल-ईस्ट युद्ध?

ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की अमरीकी एयरस्ट्राइक में मौत हो गई है. सुलेमानी ईरान के लिए कितने अहम थे इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी मौत की ख़बर के आने के फ़ौरन बाद ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के राष्ट्रीय झंडे की तस्वीर ट्वीट की. वहीं ईरान में तीन दिन का शोक घोषित करते हुए देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई ने कहा कि 'इस हमले के अपराधियों से गंभीर बदला' लेने का इंतज़ार है.
ईरान सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा है कि कुछ घंटे के बाद देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियां इस आपराधिक हमले को लेकर बैठक करेंगी. वहीं ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने इसे 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' क़रार देते हुए अमरीका को इसका ख़ामियाज़ा भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है. इन सब के बीच मध्य-पूर्व में आए इस नए भूचाल के बाद वैश्विक तेल की क़ीमतों में भी चार फ़ीसदी इज़ाफ़ा हो गया. 
जनरल सुलेमानी भले ही ईरान के एक बड़े सैन्यकर्मी और उभरते हुए नेता थे, अमरीका ने उन्हें और उनकी क़ुद्स फ़ोर्स को सैकड़ों अमरीकी नागरिकों की मौत का ज़िम्मेदार क़रार देते हुए 'आतंकवादी' घोषित कर रखा था. सुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है. 1998 से सुलेमानी ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स का नेतृत्व कर रहे हैं. वे ईरान की एक ख़ास शख़्सियत थे जिनकी क़ुद्स फ़ोर्स सीधे देश के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई को रिपोर्ट करती है. सुलेमानी की पहचान देश के वीर के रूप में थी. ख़मेनेई ने उन्हें 'अमर शहीद' का ख़िताब दिया है. उनकी एक बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके.
सुलेमानी के नेतृत्व में ईरान की ख़ुफ़िया, आर्थिक और राजनीतिक पटल पर भी क़ुद्स फ़ोर्स का प्रभाव रहा है.
ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत किरमान के एक ग़रीब परिवार से आने वाले सुलेमानी ने 13 साल की आयु से अपने परिवार के भरण पोषण में लग गए. अपने ख़ाली समय में वे वेटलिफ्टिंग करते और ख़ामनेई की बातें सुनते थे. 23 अक्तूबर 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी और इसकी क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था. 
सद्दाम हुसैन के साम्राज्य के पतन के बाद 2005 में इराक़ की नई सरकार के गठन के बाद से प्रधानमंत्रियों इब्राहिम अल-जाफ़री और नूरी अल-मलिकी के कार्यकाल के दौरान वहां की राजनीति में सुलेमानी का प्रभाव बढ़ता गया. उसी दौरान वहां की शिया समर्थित बद्र गुट को सरकार का हिस्सा बना दिया गया. बद्र संगठन को इराक़ में ईरान की सबसे पुरानी प्रॉक्सी फ़ोर्स कहा जाता है. 2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ा तो सुलेमानी ने इराक़ के अपने इसी प्रॉक्सी फ़ोर्स को असद सरकार की मदद करने को कहा था जबकि अमरीका बशर अल-असद की सरकार को वहां से उखाड़ फेंकना चाहता था. ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध और सऊदी अरब, यूएई और इसराइल की तरफ़ से दबाव किसी से छुपा नहीं है. और इतने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपने देश का प्रभाव बढ़ाने या यूं कहें कि बरक़रार रखने में जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका बेहद अहम थी और यही वजह थी कि वो अमरीका, सऊदी अरबऔर इसराइल की तिकड़ी की नज़रों में चढ़ गए थे. अमरीका ने तो उन्हें आतंकवादी भी घोषित कर रखा था.
सुलेमानी का क़ुद्स फ़ोर्स इरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा हैं. 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उस वक़्त के ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह ख़ुमैनी के आदेश से रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का गठन हुआ था. इसका मक़सद देश की इस्लामिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त और नियमित सेना के साथ सत्ता का संतुलन बनाना था.
ईरान में शाह के पतन के बाद ईरान में नई हुकूमत आई तो सरकार को लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निज़ाम और क्रांति के मक़सद की हिफ़ाज़त कर सके. ईरान के मौलवियों ने एक नए क़ानून का मसौदा तैयार किया जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का ज़िम्मा दिया गया और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को निज़ाम की हिफ़ाज़त का काम दिया गया.
लेकिन ज़मीन पर दोनों सेनाएं एक दूसरे के रास्ते में आती रही हैं. उदाहरण के लिए रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद करती हैं और सेना, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है. माना जाता है कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है. ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है. इसके दम पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में अच्छी सैलेरी पर धार्मिक नौजवानों की नियुक्ति की जाती है. भले ही रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में सैनिकों की संख्या नियमित सेना के सैनिकों की संख्या के मामले में क़रीब तीन लाख कम है लेकिन इसे ईरान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के रूप में जाना जाता है. जनरल क़ासिम सुलेमानी का क़द ईरान के पावर- स्ट्रक्चर में बहुत बड़ा था. ईरान के सबसे ताक़तवर नेता - सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई - के बाद अगर ईरान में किसी को दूसरा सबसे ताक़तवर शख़्स समझा जाता था तो वो थे - जनरल क़ासिम सुलेमानी.
दूसरी तरफ़ सुलेमानी को अमरीका अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक मानता था. अमरीका ने क़ुद्स फ़ोर्स को 25 अक्तूबर 2007 को ही आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था और इस संगठन के साथ किसी भी अमरीकी के लेनदेन किए जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया. सद्दाम हुसैन के साम्राज्य के पतन के बाद 2005 में इराक़ की नई सरकार के गठन के बाद से प्रधानमंत्रियों इब्राहिम अल-जाफ़री और नूरी अल-मलिकी के कार्यकाल के दौरान वहां की राजनीति में सुलेमानी का प्रभाव बढ़ता गया. उसी दौरान वहां की शिया समर्थित बद्र गुट को सरकार का हिस्सा बना दिया गया. बद्र संगठन को इराक़ में ईरान की सबसे पुरानी प्रॉक्सी फ़ोर्स कहा जाता है. 2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ा तो सुलेमानी ने इराक़ के अपने इसी प्रॉक्सी फ़ोर्स को असद सरकार की मदद करने को कहा था जबकि अमरीका बशर अल-असद की सरकार को वहां से उखाड़ फेंकना चाहता था.
ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध और सऊदी अरब, यूएई और इसराइल की तरफ़ से दबाव किसी से छुपा नहीं है.
और इतने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपने देश का प्रभाव बढ़ाने या यूं कहें कि बरक़रार रखने में जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका बेहद अहम थी और यही वजह थी कि वो अमरीका, सऊदी अरब और इसराइल की तिकड़ी की नज़रों में चढ़ गए थे. अमरीका ने तो उन्हें आतंकवादी भी घोषित कर रखा था.
23 अक्तूबर 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी और इसकी क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था. और इसके बाद से ही जनरल सुलेमानी अमरीका के निशाने पर थे. 3 जनवरी को जब बग़दाद एयरपोर्ट पर उनके दो कारों के काफ़िले पर ड्रोन से निशाना लगाया गया, उस वक़्त वो जिन लोगों के साथ सफ़र कर रहे थे, उनमें कताइब हिज़्बुल्लाह के नेता अबु महदी अल-मुहांदिस भी थे.
2009 से ही अमरीका ने कताइब हिज़्बुल्लाह को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है. उसने इसके कमांडर अबु महदी अल-मुहांदिस को वैश्विक आतंकवादी भी क़रार दिया था.
अभी अगर बात की जाए तो सीधे युद्ध की स्थिति तो नहीं लगती है, पर ईरान ने बदला लेने की बात कही है. ऐसा माना जा रहा है कि ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान कुछ कार्रवाई कर सकता है. ईरान के समर्थक लड़ाकू, जो जनरल सुलेमानी के संरक्षण में थे, वे भी बदले के लिए सक्रिय हो सकते हैं. रूस, चीन और ईरान की बढ़ती साझेदारी के लिए भी यह घटनाक्रम परीक्षा की घड़ी है. ट्रंप ने दो दिन पहले ऐसे हमले की धमकी दी थी और अब वे चुनाव में इसका राजनीतिक फ़ायदा भी उठायेंगे. ईरानी हितों के लिए यह हत्या एक बहुत बड़ा झटका है. इसका सीधा असर दुनियाँ भर में तेल के दामों पर पडेगा।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...