- दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने की डोनाल्ड ट्रंप की उम्मीदें लगातार हिचकोले खा रही हैं. एक ओर ताज़ा सर्वेक्षणों में डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार पूर्व उपराष्ट्रपति जो बाइडेन की बढ़त बढ़ती जा रही है, तो दूसरी तरफ़ अप्रैल, 2018 से सितंबर, 2019 तक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे जॉन बोल्टन अपनी किताब में ख़तरनाक दावे कर रहे हैं. यह किताब अगले सप्ताह प्रकाशित होने वाली है. उसके अंश विभिन्न अमेरिकी अख़बारों में छपे हैं. किताब को रोकने के लिए न्याय विभाग ने मुक़दमा दायर कर दिया है.सरकार का कहना है कि इस किताब में गोपनीय सूचनाएँ हैं.
Saturday, June 20, 2020
कोरोना संकट से यूरोप में दोस्तो की दुश्मनी
कोरोना के प्रकोप से भयभीत यूरोप के लगभग हर देश ने, मार्च का अंत आते-आते, अपनी कारोबारी और शैक्षिक, यातायात और पर्यटन गतिविधियां रोक दीं या बहुत सीमित कर दीं. केवल एक देश ऐसा था, जो यहां सबसे अलग चल रहा था - स्वीडन. वहां तालाबंदी नहीं हुई. संक्रमण से बचाव के आम नियमों के पालन के अलावा यहां कोई विशेष रोक-टोक नहीं थी. यूरोप की सभी सरकारें इसे विस्मय के साथ देख रही थीं और उनकी जनता ईर्ष्या के साथ. लोग कहा करते थे कि काश! हमारे यहां भी ऐसा ही होता! किंतु जिन्हें पहले ईर्ष्या हो रही थी, वे अब शायद सोच रहे होंगे कि अच्छा ही हुआ कि उनकी सरकारें स्वीडन की राह पर नहीं चलीं.
स्वीडन में कोरोना का संक्रमण राजधानी स्टॉकहोम में रहने वाले विदेशी प्रवासियों के द्वारा फैला था. 10 जून 2020 तक देश भर में कुल सवा तीन लाख लोगों के टेस्ट हुए थे. इनमें से 46,814 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई और इससे 4,795 लोगों की मृत्यु हुई. कोविड-19 का ग्राफ़ जून का महीना शुरू होने के साथ नये संक्रमणों में और भी तेज़ी होते दिखा रहा है. आठ प्रतिशत से भी अधिक की मृत्यु दर स्वीडन जैसे एक उच्चविकसित, लोक-कल्याणकारी और उत्तम स्वास्थ्य व्यवस्था वाले देश के लिए नितांत अशोभनीय है. तुलना के लिए मात्र एक करोड़ की जनसंख्या वाले स्वीडन के बदले उससे 134 गुना अधिक जनसंख्या वाले भारत में यही मृत्यु दर तीन प्रतिशत से भी कम है. जबकि भारत स्वीडन जैसा कोई उच्चविकसित या उत्तम स्वास्थ्य व्यवस्था वाला देश नहीं है.
स्वीडन की सरकार आशा कर रही थी कि तालाबंदी नहीं होने से वहां की अर्थव्यवस्था को आंच नहीं पहुंचेगी. यह आशा भी अब निराशा बनने जा रही है. वहां के आर्थिक शोध संस्थान ‘नीयर’ (एनआइईआर) का आकलन है कि देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) इस वर्ष सात प्रतिशत तक लुढ़क जायेगा और बेरोज़गारी भी 10 प्रतिशत बढ़ जायेगी. संस्थान ने इसके दो मुख्य कारण बताये. पहला यह कि स्वीडन निर्यात पर निर्भर देश होने से अपने माल-सामान के आयातक देशों में होने वाली घटनाओं से तुरंत प्रभावित होता है. आयातक देशों की मुख्य चिंता इस समय कारोना का कहर है. दूसरा बड़ा कारण है स्वीडन के परिवारों का बुरी तरह कर्ज से दबा होना. ऐसे में वे इस संकट के समय उपभोग या निवेश के लिए बहुत संकोच के साथ ही ख़र्च करेंगे. यहां 18 से 25 वर्ष तक के युवाओं के बीच बेरोज़गारी का स्तर 11 प्रतिशत से भी अधिक है. ऐसे में उनके हाथ सबसे अधिक बंधे होंगे.
स्वीडन में किसी वर्ष के आरंभिक चार महीनों में औसतन जितनी मौतें होतीं हैं, कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण उससे 30 प्रतिशत अधिक मौतें हुई हैं. अपनी एक करोड़ की जनसंख्या के साथ स्वीडन ही उत्तरी यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे) में सबसे बड़ा देश है. स्वीडन की आधी जनसंख्या के बराबर वाले उसके दक्षिणी सीमांत पड़ोसी डेनमार्क में, 10 जून 2020 तक, कोरोना के 12,216 मामलों की पुष्टि हुई थी और वहां इससे अब तक केवल 593 मौतें ही हुई हैं. उसके उत्तर-पश्चिमी सीमांत पड़ोसी नॉर्वे में ये आंकड़े क्रमशः 8,576 और 293 हैं.
नॉर्वे की जनसंख्या भी डेनमार्क जितनी ही, यानी स्वीडन की जनसंख्या के आधे के बराबर है. इन दोनों देशों ने अपने यहां तालाबंदी लगायी थी. किंतु उसे अब इस सीमा तक खोल चुके हैं कि 15 जून से अन्य देशों के पर्यटक भी वहां घूमने-फिरने आ सकते हैं. किंतु, दोनों देश स्वीडन के पर्यटक अपने यहां नहीं चाहते. ऐसा पहली बार हो रहा है कि स्वीडन के सीमांत पड़ोसी यह नहीं चाहते कि स्वीडिश नागरिक उनके यहां आयें. उन्हें डर है कि स्वीडन के लोग आयेंगे तो अपने साथ कोरोना वायरस भी लायेंगे. इससे उनके अब तक के सारे किये-धरे पर पानी फिर जायेगा. इसलिए स्वीडन के साथ वाली उनकी सीमाएं या तो बंद रहेंगी या वहां कड़ी जांच होगी. इस कारण कार या ट्रेन द्वारा इन देशों से होकर स्वीडन पहुंचने के इच्छुक या स्वीडन से होकर इन देशों में जाने की इच्छा रखने वाले दूसरे देशों के लोग फिलहाल ऐसा नहीं कर पायेंगे.
स्वीडन की विदेशमंत्री अन लिंदे ने नॉर्वे और डेनमार्क के निर्णय के प्रति नाराज़गी प्रकट करते हुए कहा कि नॉर्डिक देशों (डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड और आइसलैंड) के बीच की सीमाएं खोलने की प्रक्रिया से स्वीडन को बाहर रखना एक राजनैतिक निर्णय है, जिसका स्वास्थ्य संबंधी कोई औचित्य नहीं है. स्वीडन के टेलीविज़न पर अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए श्रीमती लिंदे ने यह भी कहा कि स्वीडन तो यही आशा कर रहा था सभी नॉर्डिक देश मिल कर कोई साझा रास्ता निकालेंगे, पर फिलहाल यह असंभव लग रहा है.
कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वीडन की जनता ही नहीं, सरकार भी अपने पड़ोसियों के निर्णय को अपने बहिष्कार के समान देख रही है. स्कैंडिनेवियाई देशों के बीच लंबी एकता और भाईचारे में इससे दरार पड़ने का डर है. स्वीडन की सरकार ने जब अपने यहां तालाबंदी नहीं करने का निर्णय किया, तब उसने यह सब कतई नहीं सोचा रहा होगा. कोरोना के विश्वव्यापी आकस्मिक हमले ने वास्तव में पूरी दुनिया की सरकारों को हक्का-बक्का कर दिया. इसने उन्हें ऐसे-ऐसे निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया, जिनके दूरगामी परिणाम सोच पाना बहुत ही कठिन था. जिन्होंने तालाबंदी की, वे भी परेशान हैं और जिन्होंने नहीं की, वे भी. दोनों निर्णय ‘आगे कुंआं, पीछे खाई’ के बीच चुनाव के समान थे.
स्वीडन की सरकार ने पू्र्ण तालाबंदी नहीं करने का अपना निर्णय देश के जाने-माने महामारी विशेषज्ञ अंदेर्स तेग्नेल की सलाह पर लिया था. स्वीडिश रेडियो के साथ अपने एक इंटरव्यू में इन्हीं दिनों उन्होंने स्वीकार किया कि उनसे भूल हुई है. उन्होंने कहा, ‘’स्पष्ट है कि हमने स्वीडन में जो कुछ किया है, उसमें निश्चित रूप से सुधार की गुंजाइश है. यदि हमें ठीक-ठीक पता रहा होता कि संक्रमण के फैलने को बेहतर ढंग से कैसे रोका जा सकता है, तो ऐसा नहीं हुआ होता.’’ तेग्नेल ने दुख प्रकट किया कि इस निर्णय के कारण ‘’बहुत अधिक स्वीडिश नागरिकों की बहुत जल्दी मृत्यु हो गयी.’’ सबसे अधिक मौतें स्वीडन के वृद्धावस्था आश्रमों में रहने वालों के बीच हुयीं.
स्वीडन की सरकार के परामर्शदाता अंदेर्स तेग्नेल का इस रेडियो इंटरव्यू में कहना था कि इस महामारी का यदि हमें फिर से सामना करना पड़े, तो आज की जानकारी के आधार पर हम स्वीडन और शेष दुनिया द्वारा अपनाये गये रास्ते के बीच वाला रास्ता चुनेंगे. स्वीडन में स्कूल, रेस्त्रां या दुकानों वगैरह को कभी बंद नहीं किया गया. 50 की संख्या तक लोग कही भी एकत्रित हो सकते हैं. वहां आने पर रोक केवल उन्हीं विदेशियों के लिए है, जो यूरोपीय संघ के बाहर के किसी देश के होंगे.
शुरू-शुरू में लोगों को यह उदारता बहुत अच्छी लग रही थी. लेकिन नये संक्रमितों और मृतकों की संख्या अन्य देशों की अपेक्षा तेज़ी से बढ़ती देख कर लोगों के हाथ-पैर फूलने लगे. सरकार की आलोचना होने लगी. किंतु सरकार अपने निर्णय पर अब भी अटल है. वह अब भी कोई कठोरता नहीं दिखाना चाहती. सरकार की इस समय सबसे बड़ी चिंता यही है कि वह स्वीडन वालों के लिए बंद नॉर्वे और डेनमार्क की सीमाओं को कैसे खुलवाये. उत्तरी यूरोप के स्कैंडिनेवियाई देशों के बीच की मधुर एकता में पड़ती उस खटास को कैसे टाले, जो नॉर्वे और डेनमार्क के निर्णयों के कारण 15 जून से देखने में आयेगी.
ट्रम्प पर नये आरोप
इससे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने कह दिया था कि प्रकाशन के बाद बोल्टन को बहुत मुश्किल हो सकती है. उनका कहना है कि राष्ट्रपति के रूप में उनसे हुई हर बातचीत को वे बहुत गोपनीय समझते हैं और उस बातचीत को प्रकाशित करना क़ानून तोड़ना है. इससे पहले जनवरी में ही राष्ट्रपति के कार्यालय ने बोल्टन से गोपनीय सूचनाओं को हटाने के लिए कहा था, जिसे उन्होंने मानने से इनकार कर दिया था. तब राष्ट्रपति ने एक ट्वीट में लिखा था कि उन्होंने बोल्टन को कभी नहीं बताया था कि यूक्रेन को दी जा रही सहायता का कोई संबंध डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े लोगों की हो रही जाँच से है. इस जाँचके दायरे में जो बाइडेन और उनके बेटे भी हैं. यूक्रेन का मसला ट्रंप के ख़िलाफ़ लाए गए महाभियोग के आरोपों में बहुत अहम था.
'द रूम व्हेयर इट हैपेंड’ शीर्षक किताब में बोल्टन ने कई बड़े ख़ुलासे किए हैं. ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ में छपे अंश में बताया गया है कि दुबारा चुनाव जीतने में मदद के लिए ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आग्रह किया था. आग्रह यह था कि चीन अमेरिकी गेहूँ और सोयाबीन की ख़रीद अधिक करे ताकि किसानों को फ़ायदा मिले और वे ट्रंप के पक्ष में मतदान करें.
उल्लेखनीय है कि उन राज्यों में, जो मुख्य रूप से चुनाव परिणाम को प्रभावित करते हैं, किसानों के वोट बहुत अहम हैं. चीन के साथ व्यापार युद्ध में किसानों को हुए घाटे की भरपाई के लिए ट्रंप उन्हें अनुदान दे रहे हैं, जिसे एक तरह की रिश्वत कही जा रही है. इसी अंश में यह भी बोल्टन ने लिखा है कि जिनपिंग ने ट्रंप के साथ और छह साल काम करने की इच्छा जतायी थी. इस पर ट्रंप ने कहा था कि लोग चाहते हैं कि उनके लिए दो कार्यकाल की मौजूदा संवैधानिक सीमा को हटा दिया जाए. उस बातचीत में शी जिनपिंग ने यह भी कहा था कि अमेरिका में बहुत चुनाव होते हैं.
‘द वाशिंगटन पोस्ट’ में प्रकाशित अंश के अनुसार तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ ने ट्रंप से कहा था कि अमेरिका में जाँच के दायरे में फंसी एक तुर्की कंपनी का कोई दोष नहीं है. इस पर ट्रंप ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे इस मसले का समाधान कर देंगे, लेकिन मुश्किल यह है कि जाँच कर रहे अधिकारी राष्ट्रपति ओबामा के लोग हैं. पर ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें हटाकर वे अपने लोग जाँच में बैठायेंगे. ट्रंप द्वारा उग्यूर मुस्लिम समुदाय के साथ चीनी सरकार के रवैए की प्रशंसा करने की बात भी बोल्टन ने लिखी है. सरकारी काम के लिए व्यक्तिगत ईमेल के इस्तेमाल के विवादों से घिरी अपनी बेटी इवांका ट्रंप से मीडिया का ध्यान हटाने के लिए ट्रंप ने पत्रकार जमाल ख़शोगी की हत्या के मामले में सऊदी अरब के शहज़ादे मोहम्मद बिन सलमान के समर्थन में बयान जारी किया था, ताकि वह सुर्खियों में आ जाए.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, बोल्टन ने यह भी लिखा है कि ट्रंप वेनेज़ुएला पर हमले के विचार को मज़ेदार मानते थे और उनका कहना था कि वह देश असल में अमेरिका का हिस्सा है. यहाँ यह उल्लेख करना ज़रूरी है कि बोल्टन ट्रंप प्रशासन के उन बड़े अधिकारियों में रहे हैं, जो किसी भी तरह से वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति मदुरो को अपदस्थ करने पर आमादा थे. बोलिविया में तख़्तापलट की योजना बनाने वालों में बोल्टन भी शामिल हो सकते हैं क्योंकि वे किसी भी अमेरिका विरोधी सरकार को हटाने की नीयत रखते हैं.
'द न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट भी कम दिलचस्प नहीं है. एक जगह बोल्टन बताते हैं कि 2018 में उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग उन से राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाक़ात के बाद विदेश सचिव माइक पॉम्पियो ने उन्हें पर्ची पर लिखकर दिया था कि यह आदमी बकवास (शिट) से भरा हुआ है. महीने भरबाद पॉम्पियो ने यह भी कहा था कि उत्तर कोरिया से कूटनीतिक बातचीत से कुछ भी नहीं निकलेगा. इन अंशों को देखकर लगता है कि बोल्टन ट्रंप से सारी खुन्नस निकाल लेना चाहते हैं. वे लिखते हैं कि ट्रंप को ब्रिटेन के बारे में सामान्य समझ भी नहीं है. उन्होंने एक दफ़ा तत्कालीन प्रधानमंत्री थेरेसा मे से पूछा था कि क्या ब्रिटेन एक परमाणु शक्ति है. इसी तरह से ट्रंप ने एक बार बोल्टन से पूछा था कि क्या फ़िनलैंड रूस का हिस्सा है. इतना ही नहीं, वे अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व और वर्तमान राष्ट्रपतियों के उल्लेख में भी गड़बड़ करते थे.
ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार पद से हटते हुए बोल्टन ने कहा था कि यह उनका निर्णय है, लेकिन राष्ट्रपति ने कहा था कि बहुत अधिक असहमत होने के कारण उन्होंने बोल्टन को पद से हटाया है. बोल्टन अमेरिकी विदेश नीति के गलियारों में एक आक्रामक सोच के व्यक्ति माने जाते हैं और कई लोग उन्हें हेनरी किसिंजर की परंपरा में देखते हैं, जिसका एक ही उद्देश्य होता है कि दुनिया में अमेरिकी चौधराहट चलती रहे. वे फ़ॉक्सन्यूज़ चैनल के टिप्पणीकार के रूप में भी कुख्यात रहे हैं तथा मुस्लिमविरोधी संगठनों से भी उनका जुड़ाव रहा है. ईरान और वेनेज़ुएला को पाबंदियों से परेशान कर वहाँ सत्ता में बदलाव की कोशिशों में बोल्टन की बड़ी भूमिका रही है.
बोल्टन जैसे कुछ लोग ट्रंप से इसलिए भी असहज हैं कि वे अमेरिकी राजनीति के व्याकरण से परे जाकर चीन, उत्तर कोरिया और रूस जैसे कुछ देशों से संबंधों को बेहतर करने की कोशिश करते हैं. बहरहाल, बोल्टन प्रकरण यह भी इंगित करता है कि अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था कितने तरह के अंतर्विरोधों से घिर चुकी है और इसका नतीजा यह है कि आज वह महाशक्ति आंतरिक और बाह्य स्तर पर तमाम संकटों से जूझते हुए अपने वर्चस्व की ढलान पर है.
Friday, June 19, 2020
क्या नेहरू की वजह से चीन सुरक्षा परिषद का सदस्य बना?
संयुक्त राष्ट्र
क्या वाकई जवाहर लाल नेहरू की वजह से सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट भारत के बजाय चीन को मिल गई थी?
भारत आठवीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुन लिया गया है और इसके साथ ही एक पुरानी भारत आठवीं बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य चुना गया है. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व समुदाय के प्रति आभार जताया है. एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि भारत सभी सदस्यों के साथ मिलकर दुनिया में शांति, सुरक्षा और बराबरी के लिए काम करेगा. सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए बुधवार को हुए मत परीक्षण मेें भारत के साथ मैक्सिको, आयरलैंड और नॉर्वे को भी चुना गया. ये सभी देश दो साल तक सुरक्षा परिषद में रहेंगे.
इस खबर के बाद एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी दावेदारी को लेकर सोशल मीडिया पर बहस गर्म हो गई. फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी और 10 अस्थायी सदस्य हैं. स्थायी सदस्य हैं अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन. हर साल संयुक्त राष्ट्र महासभा दो साल के कार्यकाल के लिए पांच अस्थायी सदस्यों को चुनती है. भारत काफी समय से स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है. अमेरिका और फ्रांस जैसे कई देश उसका समर्थन कर चुके हैं.
उधर, एक बड़ा वर्ग सुरक्षा परिषद में भारत के न होने को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की गलती मानता है. उसके मुताबिक अगर नेहरू ने खुद पीछे हटकर चीन को तरजीह नहीं दी होती तो भारत आज सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होता. तब उसका एक अलग रसूख तो होता ही, मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी बनाने में इतनी अड़चन भी नहीं आती.
सवाल उठता है कि यह बात कितनी सच है. जवाब जानने के लिए बात को शुरू से ही शुरू करते हैं.
भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है. जनवरी 1942 में बने पहले संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र (चार्टर) पर हस्ताक्षर करने वाले 26 देशों में उसका भी नाम था. 25 अप्रैल 1945 को सैन फ्रांसिस्को में शुरू हुए और दो महीनों तक चले 50 देशों के संयुक्त राष्ट्र स्थापना सम्मेलन में भारत के भी प्रतिनिधि भाग ले रहे थे. 30 अक्टूबर 1945 को भारत की ब्रिटिश सरकार ने इस सम्मेलन में पारित अंतिम घोषणापत्र की विधिवत औपचारिक पुष्टि भी की थी.
इस सारी प्रक्रिया के दौरान स्वतंत्रता के बाद भारत को भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिये जाने की चर्चा हुई थी. हवा का रुख भारत के अनुकूल ही था. लेकिन तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस संभावना पर पूर्णविराम लगा दिया. आइए, इस ऐतिहासिक चूक की कहानी जानते हैं.
चीन उस समय च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच चल रहे गृहयुद्ध से लहूलुहान था. कम्युनिस्टों से घृणा करने वाले अमेरिका और उसके साथी ब्रिटेन तथा फ्रांस, किसी साम्यवादी चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं चाहते थे. चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गयी. लेकिन, गृहयुद्ध में अंततः चीनी कम्युनिस्टों की विजय हुई. एक अक्टूबर 1949 को चीन की मुख्य भूमि पर उन्हीं की सरकार बनी. च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. वहां उन्होंने अपनी एक अलग सरकार बनायी. तभी से ताइवान, कम्युनिस्ट चीन के विरोधी चीनियों का ही एक अलग देश है.
इन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को भी सबसे पहले देश के बंटवारे वाली उथल-पुथल से निपटना पड़ा. नेहरू ही भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे. समाजवाद की रूसी और चीनी अवधारणाओं से काफ़ी प्रभावित उनके निजी आदर्श और विचार देश की विदेशनीति हुआ करते थे. यही कारण था कि चीन में माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनते ही उसे राजनयिक मान्यता देने वाले देशों की पहली पांत में भारत भी खड़ा था. जवाहरलाल ऩेहरू को आशा ही नहीं अटल विश्वास था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे.
चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने के एक ही साल के भीतर, 24 अगस्त 1950 को, नेहरूजी को अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित का एक पत्र मिला. कुछ समय पहले तक वह अज्ञात था. विजयलक्ष्मी पंडित उस समय अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.
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विजयलक्ष्मी पंडित का पत्र
इस पत्र में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने भाई को लिखा था, ‘अमेरिका के विदेश मंत्रालय में चल रही एक बात तुम्हें भी मालूम होनी चाहिये. वह है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाना. इस प्रश्न के बारे में तुम्हारे उत्तर की रिपोर्ट मैंने अभी-अभी रॉयटर्स (समाचार एजेंसी) में देखी है. पिछले सप्ताह मैंने (जॉन फ़ॉस्टर) डलेस और (फ़िलिप) जेसप से बात की थी... दोनों ने यह सवाल उठाया और डलेस कुछ अधिक ही व्यग्र लगे कि इस दिशा में कुछ किया जाना चाहिये. पिछली रात वॉशिंगटन के एक प्रभावशाली कॉलम-लेखक मार्क़िस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने के लिए कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया ओर सलाह दी कि वे इस मामले में धीमी गति से चलें, क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं किया जायेगा.’
जॉन फ़ॉस्टर डलेस 1950 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक शांतिवार्ता-प्रभारी हुआ करते थे. 1953 से 1959 तक वे अमेरिका के विदेशमंत्री भी रहे. फ़िलिप जेसप एक न्यायविद और अमेरिकी राजनयिक थे जो नेहरू से मिल चुके थे. विजयलक्ष्मी पंडित का यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ ही समय पहले नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) में मिले हैं.
प्रथम प्रधानमंत्री का उत्तर
अपने उत्तर में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, ‘तुमने लिखा है कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’
चीन उस समय च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच चल रहे गृहयुद्ध से लहूलुहान था. कम्युनिस्टों से घृणा करने वाले अमेरिका और उसके साथी ब्रिटेन तथा फ्रांस, किसी साम्यवादी चीन को सुरक्षा परिषद में नहीं चाहते थे. चीन के नाम की सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गयी. लेकिन, गृहयुद्ध में अंततः चीनी कम्युनिस्टों की विजय हुई. एक अक्टूबर 1949 को चीन की मुख्य भूमि पर उन्हीं की सरकार बनी. च्यांग काई शेक को अपने समर्थकों के साथ भाग कर ताइवान द्वीप पर शरण लेनी पड़ी. वहां उन्होंने अपनी एक अलग सरकार बनायी. तभी से ताइवान, कम्युनिस्ट चीन के विरोधी चीनियों का ही एक अलग देश है.
इन्हीं परिस्थितियों के बीच 15 अगस्त 1947 को भारत जब स्वतंत्र हुआ तो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार को भी सबसे पहले देश के बंटवारे वाली उथल-पुथल से निपटना पड़ा. नेहरू ही भारत के प्रथम विदेशमंत्री भी थे. समाजवाद की रूसी और चीनी अवधारणाओं से काफ़ी प्रभावित उनके निजी आदर्श और विचार देश की विदेशनीति हुआ करते थे. यही कारण था कि चीन में माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट सरकार बनते ही उसे राजनयिक मान्यता देने वाले देशों की पहली पांत में भारत भी खड़ा था. जवाहरलाल ऩेहरू को आशा ही नहीं अटल विश्वास था कि ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ बनेंगे.
चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने के एक ही साल के भीतर, 24 अगस्त 1950 को, नेहरूजी को अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित का एक पत्र मिला. कुछ समय पहले तक वह अज्ञात था. विजयलक्ष्मी पंडित उस समय अमेरिका में भारत की राजदूत थीं.
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विजयलक्ष्मी पंडित का पत्र
इस पत्र में विजयलक्ष्मी पंडित ने अपने भाई को लिखा था, ‘अमेरिका के विदेश मंत्रालय में चल रही एक बात तुम्हें भी मालूम होनी चाहिये. वह है, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से (ताइवान के राष्ट्रवादी) चीन को हटा कर उस पर भारत को बिठाना. इस प्रश्न के बारे में तुम्हारे उत्तर की रिपोर्ट मैंने अभी-अभी रॉयटर्स (समाचार एजेंसी) में देखी है. पिछले सप्ताह मैंने (जॉन फ़ॉस्टर) डलेस और (फ़िलिप) जेसप से बात की थी... दोनों ने यह सवाल उठाया और डलेस कुछ अधिक ही व्यग्र लगे कि इस दिशा में कुछ किया जाना चाहिये. पिछली रात वॉशिंगटन के एक प्रभावशाली कॉलम-लेखक मार्क़िस चाइल्ड्स से मैंने सुना कि डलेस ने विदेश मंत्रालय की ओर से उनसे इस नीति के पक्ष में जनमत बनाने के लिए कहा है. मैंने हम लोगों का उन्हें रुख बताया ओर सलाह दी कि वे इस मामले में धीमी गति से चलें, क्योंकि भारत में इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत नहीं किया जायेगा.’
जॉन फ़ॉस्टर डलेस 1950 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक शांतिवार्ता-प्रभारी हुआ करते थे. 1953 से 1959 तक वे अमेरिका के विदेशमंत्री भी रहे. फ़िलिप जेसप एक न्यायविद और अमेरिकी राजनयिक थे जो नेहरू से मिल चुके थे. विजयलक्ष्मी पंडित का यह पत्र और 30 अगस्त 1950 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा दिया गया उसका उत्तर कुछ ही समय पहले नयी दिल्ली के ‘नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ (एमएमएमएल) में मिले हैं.
प्रथम प्रधानमंत्री का उत्तर
अपने उत्तर में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा, ‘तुमने लिखा है कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय, सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली सीट पर से चीन को हटा कर भारत को उस पर बिठाने का प्रयास कर रहा है. जहां तक हमारा प्रश्न है, हम इसका अनुमोदन नहीं करेंगे. हमारी दृष्टि से यह एक बुरी बात होगी. चीन का साफ़-साफ़ अपमान होगा और चीन तथा हमारे बीच एक तरह का बिगाड़ भी होगा. मैं समझता हूं कि (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय इसे पसंद तो नहीं करेगा, किंतु इस रास्ते पर हम नहीं चलना चाहते. हम संयुक्त राष्ट्र में और सुरक्षा परिषद में चीन की सदस्यता पर बल देते रहेंगे. मेरा समझना है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा के अगले अधिवेशन में इस विषय को लेकर एक संकट पैदा होने वाला है. जनवादी चीन की सरकार अपना एक पूर्ण प्रतिनिधिमंडल वहां भेजने जा रही है. यदि उसे वहां जाने नहीं दिया गया, तब समस्या खड़ी हो जायेगी. यह भी हो सकता है कि सोवियत संघ और कुछ दूसरे देश भी संयुक्त राष्ट्र को अंततः त्याग दें. यह (अमेरिकी) विदेश मंत्रालय को मनभावन भले ही लगे, लेकिन उस संयुक्त राष्ट्र का अंत बन जायेगा, जिसे हम जानते हैं. इसका एक अर्थ युद्ध की तरफ और अधिक लुढ़कना भी होगा.’
स्वयं एक कम्युनिस्ट नेता बुल्गानिन ने जब देखा कि नेहरू अब भी चीन समर्थक राग ही अलाप रहे हैं, तो वे इसके सिवाय और क्या कहते कि ‘हमने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का प्रश्न इसलिए उठाया, ताकि हम आपके विचार जान सकें. हम भी सहमत है कि यह सही समय नहीं है, सही समय की हमें प्रतीक्षा करनी होगी.’
नेहरू के उत्तर से अमेरिकी प्रस्ताव की पुष्टि हुई
बुल्गानिन को दिये गये नेहरू के उत्तर से इस बात की फिर पुष्टि होती है कि अमेरिका ने कुछ समय पहले सचमुच यह सुझाव दिया था कि सुरक्षा परिषद में चीन वाली सीट, जिस पर उस समय ताइवान बैठा हुआ था, भारत को दी जानी चाहिये. पुष्टि इस बात की भी होती है कि पहले अमेरिकी सुझाव और बाद में सोवियत सुझाव को भी साफ़-साफ़ ठुकरा कर नेहरू ने उस देशहितकारी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा तब वे स्वयं ही करते, जब देश का प्रधानमंत्री उनके बदले कोई दूसरा व्यक्ति रहा होता.
भारत में जो गिने-चुने लोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के बारे में अमेरिका और सोवियत संघ के इन दोनों सुझावों को जानते हैं, वे उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू की प्रतिक्रिया को सही ठहराते हैं. पर देखा जाए तो नेहरू के जीवनकाल में ही घटी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने चीन के प्रति उनके मोह या उसके साथ टकराव से बचने की उनकी भयातुरता को अतिरंजित ही नहीं, अनावश्यक भी ठहरा दिया. चीन ने नेहरू के सामने ही न केवल तिब्बत को हथिया लिया और वहां भीषण दमनचक्र चलाया, खुद अपने यहां भी ‘लंबी छलांग’ और उनके निधन के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे सिरफिरे अभियान छेड़ कर अपने ही करोड़ों देशवासियों की अनावश्यक बलि ले ली.
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चीन ने भारत को कड़वा सबक सिखाया
नेहरू तो चीन की महानता का गुणगान करते रहे जबकि1962 में उसने भारत पर हमला कर भारत को करारी हार का कड़वा ‘सबक सिखाया.’ इस सबक का आघात डेढ़ साल के भीतर ही नेहरू की मृत्यु का भी संभवतः मुख्य कारण बना. लद्दाख का स्विट्ज़रलैंड जितना बड़ा एक हिस्सा तभी से चीन के क़ब्ज़े में है. अरुणाचल प्रदेश को भी वह अपना भूभाग बताता है. क्षेत्रीय दावे ठोक कर सोवियत संघ और वियतनाम जैसे अपने कम्युनिस्ट बिरादरों से युद्ध लड़ने में भी चीन ने कभी संकोच नहीं किया और अब तो वह ताइवान को भी बलपूर्वक निगल जाने की धमकी दे रहा है.
जो लोग यह कहते हैं कि 1955 में सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन का यह सुझाव हवाबाज़ी था कि भारत के लिए सुरक्षा परिषद में छठीं सीट भी बनाई जा सकती है, वे भूल जाते हैं या नहीं जानते कि चीन में माओ त्से तुंग की तानशाही शुरू होते ही उस समय के सोवियत तानाशाह स्टालिन के साथ भी चीन के संबंधों में खटास आने लगी थी.
रूस और चीन के सैद्धांतिक मतभेद
माओ और स्टालिन कभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हुआ करते थे. स्टालिन की पांच मार्च 1953 को मृत्यु होते ही माओ त्से तुंग अपने आप को कम्युनिस्टों की दुनिया का ‘सबसे वरिष्ठ नेता’ मानने और सोवियत संघ को ही उपदेश देने लगे. दूसरी ओर सोवियत संघ के नये सर्वोच्च नेता निकिता ख़्रुश्चेव, स्टालिन के नृशंस अत्याचारों का कच्चा चिठ्ठा खोलते हुए उस स्टालिनवाद का अंत कर रहे थे जो अब चीन में माओ की कार्यशैली बन चुका था.
1955 आने तक माओ और ख्रुश्चेव के बीच दूरी इतनी बढ़ चुकी थी कि चीन उस समय के पूर्वी और पश्चिमी देशों वाले गुटों के बीच ख्रुश्चेव की ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ वाली नीति को आड़े हाथों लेने लगा था. चीन इसे मार्क्स के सिद्धान्तों को भ्रष्ट करने वाला ‘संशोधनवाद’ बता रहा था. दोनों पक्ष एक-दूसरे की निंदा-आलोचना के नए-नए शब्द और मुहावरे गढ़ रहे थे. एक-दूसरे को ‘पथभ्रष्ट,’ ‘विस्तारवादी’ और ‘साम्राज्यवादी’ तक कहने लगे थे.
भारत में सोवियत संघ को अपना भला दिखा
इस कारण सोवियत नेताओं को इस बात में विशेष रुचि नहीं रह गयी थी कि सुरक्षा परिषद में चीन के नाम वाली स्थायी सीट भविष्य में माओ त्से तुंग के चीन को ही मिलनी चाहिये. वे चीन वाली सीट पर से ताइवान को हटा कर भारत को बिठाने के अमेरिकी प्रयास का या तो विरोध नहीं करते या कुछ समय के लिए विरोध का केवल दिखावा करते.
ताइवान को मिली हुई सीट भारत को देने पर संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना भी नहीं पड़ता. संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत ही इसके लिए काफ़ी होता. चार्टर में संशोधन की बात तभी आती, जब सीटों की संख्या बढ़ानी होती. बुल्गानिन के कहने के अनुसार, सोवियत संघ 1955 में इसके लिए भी तैयार था. यह संशोधन क्योंकि भारत के लिए होता, जिसे अमेरिका खुद ही 1953 तक सुरक्षा परिषद में देखना चाहता था, इसलिए बहुत संभव था कि वह भी संशोधन का ख़ास विरोध नहीं करता.
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1950 वाले दशक में संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन भी, आज की अपेक्षा, आसान ही रहा होता. उस समय आज के क़रीब 200 की तुलना में आधे से भी कहीं कम देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य थे. उन्हें मनाना-पटाना आज जितना मुश्किल नहीं रहा होता. सोवियत नेता भी ज़रूर जानते रहे होंगे– जैसा कि नेहरू ने 1955 में बुल्गानिन से स्वयं कहा भी– कि अमेरिका और उसके छुटभैये ब्रिटेन व फ्रांस भी कुछ ही साल पहले ताइवान को हटा कर उसकी सीट भारत को देना चाहते थे. अतः यह मानने के पूरे कारण हैं कि सोवियत नेता भारत की सदस्य़ता को लेकर गंभीर थे, न कि हवाबाज़ी कर रहे थे.
हेनरी किसिंजर की गुप्त यात्रा
ताइवान 1971 तक चीन वाली सीट पर बैठा रहा. उस साल अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान होते हुए नौ जुलाई को गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे. घोषित यह किया गया कि वे अगले वर्ष राष्ट्रपति निक्सन की चीन यात्रा की तैयारी करने गये हैं. बीजिंग में वार्ताओं के समय तय हुआ कि निक्सन की यात्रा से पहले ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट से हटा कर उसकी सीट कम्युनिस्ट चीन को दी जायेगी. इस निर्णय से यह भी सिद्ध होता है कि अमेरिका 1970 वाले दशक में भी सुरक्षा परिषद को अपनी पसंद के अनुसार उलट-पलट सकता था.
चीन को लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में 25 अक्टूबर 1971 को मतदान हुआ. संयुक्त राष्ट्र के उस समय के 128 सदस्य देशों में से 76 ने चीन के पक्ष में और 35 ने विपक्ष में वोट डाले. 17 ने मतदान नहीं किया. दो-तिहाई के अवश्यक बहुमत वाले नियम से प्रस्ताव पास हो गया. ताइवान से न केवल सुरक्षा परिषद में उसकी सीट छीन ली गयी, संयुक्त राष्ट्र की उसकी सदस्यता भी छिन गयी. उसकी सीट पर 15 नवंबर 1971 से चीन का प्रतिनिधि बैठने लगा.
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नेहरू ने देशहित की चिंता की होती, तो कम से कम 60 वर्षों से भारत का प्रतिनिधि भी वीटो-अधिकार के साथ वहां बैठ रहा होता. कश्मीर समस्या भी शायद कब की हल हो चुकी होती. सोवियत संघ को भारत की लाज बचाने के लिए दर्जनों बार अपने वीटो-अधिकार का प्रयोग नहीं करना पड़ता.
सुनहरा अवसर हाथ से निकला
आज स्थिति यह है कि भारत चाहे जितनी एड़ी रगड़ ले, वह तब तक सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, जब तक इस परिषद का विस्तार नहीं होता और चीन भी उसके विस्तार तथा भारत की स्थायी सदस्यता की राह में अपने किसी वीटो द्वारा रोड़े नहीं अटकाता. चीन भला क्यों चाहेगा कि वह एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी भारत के लिए सुरक्षा परिषद में अपनी बराबरी में बैठने का मार्ग प्रशस्त करे? 1950 के दशक जैसा सुनहरा मौका अब शायद ही दोबारा आए.
भारत चीन विवाद
इंडियन डिफेन्स रिव्यू’ में सात मार्च, 2015 को एक लेख छपा. यह लेख मेजर जनरल अफसिर करीम द्वारा लिखा गया था. इसमें उन्होंने भारत को चीन से होने वाले संभावित खतरों की ओर इशारा किया था. उन्होंने लिखा था, ‘अब समय आ गया है जब भारत को अपनी सैन्य क्षमताओं और नीतियों में सुधार करते हुए चीन को जवाब देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए.’
15 जून की रात को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में जो हुआ उसे देखते हुए लगता है कि मेजर करीम ने खतरे को भांप लिया था. उस दिन भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई एक मुठभेड़ में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए. चीन के भी 43 सैनिकों के मारे जाने या गंभीर रूप से घायल होने की खबरें आईं. हालात फिलहाल तनावपूर्ण बने हुए हैं.
लेकिन यदि भारत और चीन के राजनीतिक संबंधों को देखें तो स्थिति कुछ अलग नजर आती है. अपने छह साल के कार्यकाल के दौरान अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ 18 बार मुलाकात कर चुके हैं. इनमें से कुछ तो बेहद गर्मजोशी भरे माहौल में हुई हैं.
ऐसा ही कुछ 1962 में भी हुआ था. उस वक्त भी हालात कमोबेश आज जैसे ही थे. सीमा पर जो क्षेत्र तब विवादास्पद थे वे आज भी वैसे ही हैं. तब भी कुछ सैन्य विशेषज्ञ चीन से संभावित खतरों के लिए चेतावनी दे रहे थे, जिन्हें तब भी नजरअंदाज किया जा रहा था. राजनीतिक यात्राएं और वार्ताएं तब भी जारी थीं. बल्कि उस दौर में तो ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ जैसे नारे भी खूब गूंजा करते थे. लेकिन तभी चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया. इसीलिए 1962 का वह युद्ध आज तक एक रहस्य ही बनकर रह गया है.
बीते पचास सालों में आई कई रिपोर्टों और किताबों के जरिये 1962 के युद्ध को समझने में थोड़ी बहुत मदद जरूर मिलती है. लेकिन पक्के तौर पर आज भी नहीं कहा जा सकता कि चीनी हमले की वजह क्या थी. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी प्रसिद्ध किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में काफी विस्तार से उन परिस्तिथियों का जिक्र किया है जिनके चलते पंडित जवाहरलाल नेहरु और तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन-लाइ की दोस्ती धीरे-धीरे फीकी पड़ी और अंततः दोनों देश युद्ध में उलझ गए. भारत और चीन के बीच तिब्बत का मसला कैसे आया
तिब्बत के धर्म गुरू 1956 में भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए थे और माना जाता है इस यात्रा ने उनके और नेहरू के बीच समझ बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
इन परिस्थितियों की शुरुआत गुहा ने 1950 के दशक के तिब्बत से की है. तिब्बत में चीनी सैनिकों का हस्तक्षेप लगातार बढ़ रहा था. इसके विरोध में 1958 में पूर्वी तिब्बत के खम्पा लोगों ने सशत्र विद्रोह छेड़ दिया. शुरुआत में खम्पा लोगों को कुछ सफलता भी मिली लेकिन अंततः चीनी सैनिकों ने विद्रोहियों को समाप्त कर दिया. इसके बाद दलाई लामा को भी धमकियां मिलने लगीं. उन पर खतरा बढ़ गया था. ऐसे में उन्होंने भारत में शरण लेने का मन बनाया. भारत उन्हें शरण देने को तैयार हो गया. प्रधानमंत्री नेहरू से मिलकर दलाई लामा ने उन्हें खम्पा विद्रोह के बारे में जानकारी दी. नेहरू ने दलाई लामा को बताया कि भारत तिब्बत की आज़ादी के लिए चीन से युद्ध नहीं कर सकता. साथ ही नेहरू ने यह भी कहा कि ‘सारी दुनिया मिलकर भी तिब्बत को आज़ाद नहीं करवा सकती जब तक कि चीन ही पूरी तरह से नष्ट न हो जाए.’
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इस वक्त तक भारत और चीन के संबंध और कारणों से भी बिगड़ने लगे थे. इसी समय भारत सरकार को सूचनाएं मिलने लगीं कि चीन सीमा के नजदीक बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण कर रहा है. जुलाई, 1958 में चीन की एक सरकारी पत्रिका ‘चाइना पिक्टोरिअल’ में कुछ विवादास्पद नक़्शे छापे गए. इन नक्शों में नेफा (नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी यानी आज का अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख के बड़े इलाके को चीन का हिस्सा दिखाया गया था. दिसंबर 1958 में जवाहरलाल नेहरू ने चीनी प्रधानमंत्री को इस संबंध में एक पत्र लिखा. इन नक्शों में जिस तरह से भारतीय इलाकों को चीन का हिस्सा दिखाया गया था उस पर नेहरू ने अपना विरोध दर्ज करते हुए लिखा था जब 1956 में उन दोनों की मुलाकात हुई थी तो चीनी प्रधानमंत्री ने मैकमोहन लाइन को स्वीकारते हुए मान्यता देने की बात कही थी. तब दोनों इस बात पर भी सहमत थे कि भारत और चीन के बीच कोई भी बड़ा सीमा विवाद नहीं है.
भारत के प्रधानमंत्री को एक महीने बाद ही जवाबी पत्र मिल गया. जवाब में चाऊ इन लाइ ने कहा कि मैकमोहन लाइन ब्रितानी हुकूमत की विरासत है जिसे चीन कभी भी मान्यता नहीं दे सकता. साथ ही उन्होंने कहा कि भारत और चीन के बीच हमेशा से रहे सीमा विवाद को कभी सुलझाया नहीं गया था. 22 मार्च, 1959 को नेहरू ने एक और पत्र लिखकर इस बात के कई प्रमाण दिए कि चीनी नक्शों में दर्शाए गए इलाके दरअसल भारत के अभिन्न अंग हैं. साथ ही उन्होंने अपने इस पत्र में यह भी उम्मीद जताई कि जल्द ही दोनों देशों इन मसलों पर किसी सहमति पर पहुंच जाएंगे. नेहरू के इस पत्र का जवाब आ पाता उससे पहले ही दलाई लामा भारत आ गए.
यहां से भारत और चीन के रिश्ते और भी ज्यादा बिगड़ने लगे. चीन ने आरोप लगाया कि भारत-चीन संबंधों को बिगाड़ने की पहल भारत की ओर से की जा रही है. भारतीय जनता का चीन के खिलाफ होना और सेना का असमंजस इसी दौरान मुंबई में भी एक घटना हुई जिसके कारण चीन को भारत पर निशाना साधने के कुछ और कारण मिल गए. मुंबई स्थित चीनी महावाणिज्य दूतावास के कार्यालय की दीवार पर कुछ प्रदर्शनकारियों ने माओ त्से तुंग की तस्वीर टांगकर उस पर अंडे और टमाटर फेंके. चीन ने इस घटना पर नाराजगी जताते हुए चेतावनी दी कि यदि भारत इस घटना पर उचित कार्रवाई नहीं करता तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं.
सेना के अधिकारियों के साथ जवाहरलाल नेहरू
भारत-चीन सम्बन्ध जिस तेजी से सीमा पर बिगड़ रहे थे लगभग उसी गति से भारतीय जनता में भी चीन के खिलाफ माहौल बन रहा था. विपक्षी पार्टियों के दबाव में भारत सरकार ने सितंबर, 1959 को एक श्वेत पत्र जारी किया. इसमें पिछले पांच वर्षों में चीन से हुए पत्राचार का पूरा ब्यौरा था. इस श्वेतपत्र के सार्वजनिक होने से भारतीय जनता को चीन द्वारा सीमा पर की जा रही गतिविधियों की पूरी जानकारी मिल गई. रामचंद्र गुहा अपनी किताब में लिखते हैं, ‘यदि यह श्वेतपत्र जारी नहीं हुआ होता तो भारत-चीन सीमा विवाद को राजनीतिक या कूटनीतिक स्तर पर भी सुलझाया जा सकता था. लेकिन इनके सार्वजनिक होने के बाद जनता में चीन के प्रति आक्रोश था और तब राजनीतिक हल ढूंढना चीन के सामने घुटने टेकने जैसा हो गया था.’
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उस दौर में वीके कृष्णा मेनन केन्द्रीय रक्षा मंत्री थे. वे प्रधानमंत्री के काफी करीबी माने जाते थे. लेकिन तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल केएस थिमैया से उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं थे. जनरल थिमैया का मानना था कि उनकी सेना को चीन से होने वाले हमले के लिए तैयार रहना चाहिए. लेकिन रक्षामंत्री मेनन उनकी बात को नज़रंदाज़ करते रहे. मेनन को लगता था कि भारत को असल खतरा चीन से नहीं बल्कि पकिस्तान से है इसीलिए सेना का बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी सीमाओं पर ही तैनात था. रक्षामंत्री और सेनाध्यक्ष के बीच यह तनाव आगे जा कर और बढ़ गया. अगस्त, 1959 में मेनन ने बीएम कौल नाम के एक अधिकारी को लेफ्टिनेंट जनरल नियुक्त कर दिया. कौल को इस पद पर लाने के लिए उनसे वरिष्ठ 12 अधिकारियों को नज़रंदाज़ किया गया था. जनरल थिमैया ने इसके विरोध में प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफ़ा भेज दिया. हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू ने जनरल थिमैया को इस्तीफ़ा देने से तो रोक लिया लेकिन इस घटना से सारे देश में रक्षामंत्री के खिलाफ माहौल बन गया. उन पर पहले से भी वामपंथी समर्थक होने के कारण चीन के प्रति सहानुभूति रखने के आरोप लगते रहते थे.
1959 में भी भारत-चीन सीमा पर दोनों सेनाओं के बीच झड़प की कई घटनाएं हुईं. इस समय दोनों देशों के बीच पत्राचार भी लगातार चल रहा था. 1960 में नेहरू ने चाऊ एन लाई को भारत आने का न्योता दिया. इससे पहले जब 1956 में चीनी प्रधानमंत्री भारत आ चुके थे. तब उनका बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया गया था. लेकिन 1960 में हालात बिलकुल अलग थे. हिन्दू महासभा ने चाऊ एन लाई के विरोध में काले झंडे दिखाए. जहां 1956 में उनकी भारत यात्रा के दौरान ‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ जैसे नारे दिए गए थे वहीं इस बार यह नारे बदलकर ‘हिंदी-चीनी बाय बाय’ हो चुके थे. चाऊ एन लाई की इस यात्रा के बाद भी भारत-चीन सीमा विवाद जस का तस ही बना रहा. दोनों देश इस यात्रा और बातचीत के बाद भी किसी सहमति तक नहीं पहुंच पाए. युद्ध की शुरुआत और अंत 1962 के मई-जून में अचानक सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं बढ़ गईं. चीनी सेना की कई टुकड़ियां भारतीय सीमा के भीतर घुस आईं. भारतीय सेना के पास इनका मुकाबला करने के लिए न तो पर्याप्त हथियार थे और न ही सैनिक. युद्ध के बीच में ही जनरल कौल छाती में दर्द होने के कारण सीमा से लौट कर दिल्ली आ गए. बिना किसी नेतृत्व के सेना के जवान पांच दिनों तक लड़ते रहे जिसके बाद नेफा के तवांग के इलाके पर भी चीन कब्ज़ा हो गया.
रक्षामंत्री मेनन को आखिरकार मंत्रिमंडल से निकाल दिया गया और भारत अब अमरीकी मदद लेने की दिशा में बढ़ने लगा.
अब तक चीनी सैनिक नेफा में इतना आगे बढ़ चुके थे कि जल्द ही असम के भी उनके हाथ में जाने का खतरा पैदा हो गया. उधर दिल्ली और मुंबई के भर्ती केन्द्रों पर हजारों युवा सेना में भर्ती होने को तैयार थे. लेकिन 22 नवंबर को अचानक ही चीन ने युद्धविराम की घोषणा कर दी. इस युद्ध का अंत भी इसकी शुरुआत की ही तरह एक रहस्य था. नेफा में चीन ने अपने सैनिकों को मैकमोहन लाइन से पीछे कर लिया और लद्दाख क्षेत्र में भी वह उस स्थिति में वापस लौट गए जो युद्ध से पहले थी.
चीन ने अचानक ही अपने सैनिकों को वापस बुलाकर युद्धविराम की घोषणा क्यों की? इस सवाल के जवाब में भी सिर्फ कयास ही लगाए जाते रहे हैं. कुछ लोगों का मानना है कि चीन इसलिए घबरा गया था कि अब वामपंथी पार्टियों समेत भारत की सभी विपक्षी पार्टियां सरकार के साथ एकजुट होकर चीन का विरोध कर रहीं थी. अमरीका और ब्रिटेन का भारत को समर्थन करना और हथियार भेजना भी एक कारण माना जाता है जिसने चीन को युद्धविराम पर मजबूर कर दिया था. वहीं एक तर्क यह भी दिया जाता रहा है कि सर्दियों में वह सारा इलाका बर्फ से ढक जाता है. ऐसे में चीन ज्यादा समय तक अपने सैनिकों को मदद नहीं पहुंचा सकता था इसलिए उसके पास लौट जाने का ही विकल्प बचा था.
रामचंद्र गुहा के अनुसार, ‘इस युद्ध के अंत को तो फिर भी कुछ हद तक समझा जा सकता है लेकिन इसकी शुरुआत को समझना बेहद जटिल है. चीन की तरफ से कभी-भी कोई श्वेतपत्र जारी नहीं किया गया. लेकिन इस युद्ध के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि इतने सुनियोजित आक्रमण के पीछे कई साल का अभ्यास रहा होगा. इस युद्ध का समय भी चीन के लिए बिलकुल सटीक था. उस वक्त विश्व की दोनों महाशक्तियां - सोवियत संघ व अमेरिका और इनके साथ ही संयुक्त राष्ट्र, क्यूबा के मिसाइल संकट में उलझे हुए थे. इस कारण चीन को बिना किसी डर के कुछ दुस्साहसिक करने की छूट मिल गई थी.’
Thursday, June 18, 2020
क्या फिर से जीतेंगे ट्रम्प?
पिछले कुछ सप्ताह डोनाल्ड ट्रंप के लिए मुश्किल भरे साबित हुए हैं. बुरी
खबरों के बीच उन्हें अपने चुनाव प्रचार में उतरना पड़ रहा है, इससे उनका
चुनावी अभियान भी प्रभावित हो रहा है. ऐसा लग रहा है कि बतौर राष्ट्रपति वे
लगातार संकटों से घिरते जा रहे है. ऐसे समय में उनके दोबारा राष्ट्रपति
चुने जाने की उम्मीदें गंभीर संकट में दिख रही हैं.
डोनाल्ड ट्रंप
एक सहज राजनेता है. चार साल पहले वे चुनावी समर में कूदे और सभी अनुमानों
और भविष्यवाणियों को किनारे करते हुए पहले उन्होंने अपनी पार्टी की ओर से
राष्ट्रपति पद के नामांकन वाली रेस जीती और इसके बाद अमरीका के राष्ट्रपति
का चुनाव भी जीत लिया.
कहने की जरूरत नहीं है, ऐसी उपलब्धि से किसी
भी शख्स को अपने फ़ैसले पर फख्ऱ होगा. उन पलों को जब ट्रंप याद करते होंगे
तो उन्हें सहज जुलाई, 2015 का वक्त याद आता होगा जहां वे विवादों, लोगों के
नाम लेकर उन पर आरोप लगाने, विवादों, असंयमित ट्वीटों और उससे जुड़े
विवादों को लेकर वे राष्ट्रपति पद से दूर दिखने लगे थे लेकिन वहां से वापसी
करते हुए वे शीर्ष पद तक पहुंच गए.
तब सारे के सारे विशेषज्ञ ग़लत साबित हुए थे और डोनाल्ड ट्रंप सही.
बड़े
फ़ैसलों को लेकर ट्रंप निश्चित तौर पर सही थी. वे चुनाव के दौरान एक बाहरी
शख़्स के तौर पर रेस में शामिल हुए थे जबकि अमरीका के आम लोगों का मूड
राजनीतिक प्रतिष्ठानों के ख़िलाफ़ दिख रहा था. ट्रंप ने इस मूड को भांप
लिया और इसको भुनाया भी. हालांकि हो सकता है कि उस दौरान की उनकी ग़लतियों
और गलत फैसलों को उनकी कामयाबी ने ढक दिया हो.
इसके चार साल बाद, राष्ट्रपति की अपनी सहज प्रवृति
उनको धोखा दे सकती है. ट्रंप 2016 की अपनी जीत को दोहराना चाहते हैं- वे
खुद को एक फिर बार फिर से सत्ता प्रतिष्ठानों के ख़िलाफ़ संघर्ष करते हुए
उम्मीदवार के तौर पर पेश करना चाहते हैं जो वाशिंगटनीय दलदल यानी विपक्षी
उम्मीदवार से लड़ रहा है.
उनकी इस रणनीति ने तो पिछले चुनाव में
उन्हें फ़ायदा पहुंचाया था, इससे उन्हें अहम राज्यों में निर्णायक बढ़त
मिले. वहीं फ्लोटिंग मतदाताओं और परंपरागत तौर पर कंजरवेटिव मतदाताओं ने भी
उन्हें संदेह का लाभ दिया था. वैसे मतदाता जो अंतिम समय तक अपना पक्ष तय
नहीं कर पाए थे, वे जब मतदान करने पहुंचे तो उन्होंने ट्रंप को वोट दिया.
लेकिन
इस बार ट्रंप कोई अनजाने उम्मीदवार नहीं हैं, लोगों ने उनके चार साल के
कार्यकाल को देख लिया है. हालांकि अभी भी मतदाताओं का 30 से 40 प्रतिशत
हिस्सा उन पर भरोसा कर रहे हैं. लेकिन सर्वेक्षणों के मुताबिक अगर वे
बुर्जुगों, शहरी इलाक़ों के शिक्षित मतदाताओं और धार्मिक मतदाताओं का
समर्थन खोते रहेंगे तो यह पर्याप्त नहीं होगा.
डोनाल्ड
ट्रंप ने अब तक जो क़दम उठाए हैं, वह 2016 के प्ले बुक से ही प्रभावित लग
रहे हैं- वे विवादों को हवा दे रहे हैं, समाजिक मुद्दों पर संघर्ष को
उकसावा दे रहे हैं, षड्यंत्रकारी सिद्धांतों को बढ़ा रहे हैं और किसी भी
तरह की आलोचना का जवाब आलोचना से ही दे रहे हैं.
इन
सबके बाद भी सर्वेक्षणों से यह ज़ाहिर हो रहा है कि वे जो बाइडन से पिछड़
गए हैं. कुछ सर्वे में तो वे दहाई अंकों से पिछड़ रहे हैं. हाल ही में इकानामिस्ट मैग्जीन में छपे विश्लेषण में बाइडन को छह में से पांच प्वाइंट मिले हैं, इसके मुताबिक बाइडन 2008 में बराक ओबामा की सहज जीत जैसी स्थिति को दोहरा सकते हैं.
ट्रंप 2016 की रणनीति को ही अपना रहे है लेकिन उनकी मुश्किलें बता रही हैं कि इस बार देश का राष्ट्रीय मूड अलग हो सकता है.
अमरीका
के आम लोग कोरोना वायरस की चपेट में है, जिसके चलते एक लाख से ज़्यादा
लोगों की मौत हो चुकी है. इस महामारी के चलते अमरीकी अर्थव्यवस्था में
गिरावट देखन को मिल रहा है. इसके साथ ही अब नस्लभेद और पुलिस व्यवस्था को
लेकर देश भर में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहा है. इसके अलावा अब दूसरे
टकराव के लिए गुंजाइश नहीं हैं. जिस युद्धधर्मिता और अक्खड़पन ने अमरीकी
राष्ट्रपति को अतीत में फ़ायदा पहुंचाया है, लेकिन मौजूदा वक्त में यह
तरीका उस जनता से मेल नहीं खा रहा है जिसे सहानुभूति, चिकित्सा और सामंजस्य
की दरकार है.
अमरीकी राष्ट्रपति उस वक्त क़ानून और व्यवस्था की
दुहाई दे रहे है जबिक लोगों की धारना नाटकीय तौर पर ब्लैक लाइव्स मैटर
आंदोलन के साथ दिखाई दे रही है. आम लोगों के रूझान से यह साफ़ दिख रहा है
कि वे जब नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डालेंगे तब उनकी
प्राथमिकताओं में नस्लीय भेदभाव वास्तविक समस्या के तौर पर शामिल होगा.
कानून और व्यवस्था का अभियान 1960 के अंतिम और 1970 के
शुरुआती सालों में नागरिकों के विद्रोह पर क़ाबू पाने में मदद कर रिचर्ड
निक्सन को राष्ट्रपति चुनाव में जीत दिला सकता है लेकिन अमरीका अब वह देश
नहीं रहा जो 50 साल पहले हुआ करता था.
पिछले
कुछ सप्ताह सामने आए मामलों से अमरीका की मौजूदा राजनीतिक स्थिति का पता
चल जाता है. गुरुवार को ट्रंप ने दक्षिण के 10 सैन्य ठिकानों के नाम से
कंफेडरेट जेनरल के नाम हटाने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करना यहां
प्रशिक्षित सैनिकों का अपमान होगा.
लेकिन
उसी वक्त दक्षिण में शुरू हुए और बेहद लोकप्रिय नेस्कर कार रेसिंग सर्किट
ने अपने सभी आयोजनों से कंफेडरेट झंडे को फहराने पर पाबंदी लगा दी. स्थानीय
और प्रांतीय नेता अपने इलाकों में कंफेडरेट जेनरलों की प्रतिमा हटाना शुरू
कर दिया है. और तो और इन जेनरलों के नाम सैन्य ठिकाने के नाम से हटाने की
मांग अमरीकी सेना के अंदर से आने लगी है. अटलांटिक मैग्जीन में सेना के रिटायर्ड जेनरल डेविड पेट्रेएस ने अपने आलेख में इसकी मांग की है.
अमरीका
में इन दिनों एक सांस्कृतिक संघर्ष देखने को मिला है, जिसका पहले ट्रंप
आनंद उठा चुके हैं. पुलिस के अन्यायपूर्ण तौर तरीकों के ख़िलाफ़ पेशेवर
एथलीटों ने राष्ट्रीय गान के वक्त घुटने टेक कर विरोध जताया है. नेशनल
फुटबाल लीग ने आधाकारिक तौर पर खेद जताते हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल
खिलाड़ियों का साथ नहीं देने की घोषणा की है. इन खिलाड़ियों में पूर्व
क्वार्टरबैक कोलीन केपरनिक भी शामिल हैं.
अमरीकी सॉकर फे़डरेशन ने बुधवार को इस बात आवश्यकता को
दोहराने के लिए मतदान किया है कि राष्ट्रीय गान के सभी खिलाड़ी
सम्मानपूर्वक खड़े रहें. विवादों से दूर रहने वाले डेमोक्रेट्स अब एकजुटता
प्रदर्शित करने के लिए अपने घुटने टेक रहे हैं. इस बीच, ट्रंप ने इस अभ्यास
की निंदा जारी करते हुए नेशनल फुटबॉल लीग और लीग के क्वार्टर बैक ड्रीउ
ब्रीस पर निशाना साधा. ब्रीस ने घुटने टेकने को राष्ट्रविरोधी मानने वाले
अपने बयान के लिए हाल ही में माफ़ी मांगी है.
दो सप्ताह पहले,
डोनाल्ड ट्रंप के एक चर्च में जाने से पहले क़ानून प्रवर्तन एजेंसी और
नेशनल गार्ड के सैनिकों ने बलपूर्वक नजदीक के पार्क खाली करा लिया था. यहां
ट्रंप ने बाइबिल हाथ में लेकर फोटोग्राफरों से तस्वीरें खिंचवाई थी. इसके
बाद से वे लगातार अपने इस क़दम का बचाव कर रहे हैं, इस दौरान वे ये बताते
हैं कि सुरक्षा बलों के लिए पार्क खाली कराना कितना आसान था. उन्होंने
ट्वीट किया था, "पार्क में सैर."
वहीं
अमरीकी नेताओं और अमरीकी सेना के सादे कपड़े वाले सदस्यों ने इस घटना से
खुद को अलग करना शुरू कर दिया है. पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस सहित कई
सेवानिवृत्त जनरलों ने इस कार्रवाई को लापरवाही भरा बताया था. लेकिन मौजूदा
रक्षा मंत्री मार्क एस्पर और ज्वाइंट चीफ ऑफ़ स्टॉफ मार्क मिले ने ट्रंप
के साथ चर्च जाने को लेकर खे़द जताया है.
पिछले सप्ताह वाशिंगटन डीसी में सुरक्षा मुहैया कराने के लिए भेजे गए नेशनल गार्ड के सदस्यों के बीच व्यापाक बेचैनी पर न्यूयार्क टाइम्स ने रिपोर्ट प्रकाशित की है.
इसमें
सबसे विवादास्पद प्रकरण ट्रंप का वो ट्वीट था जिसमें एक 75 साल का वीडियो
प्रदर्शनकारी ज़मीन पर गिरा दिख रहा है और न्यूयार्क पुलिस ने उसे शख़्स को
लहूलुहान कर रखा है. ट्रंप ने आरोप लगाया थ कि यह कट्टर वामपंथी देशद्रोही
शख़्स क़ानून प्रवर्तन करने वाली एजेंसियों की इलेक्ट्रानिक निगरानी कर
रहा था. इस आरोप को दक्षिण पंथी मीडिया ने खूब हवा दी लेकिन राष्ट्रपति
ट्रंप के कई रिपब्लिकन समर्थनों ने इस ट्वीट का समर्थन नहीं किया.
इन
सबने लोगों के मन में राष्ट्रपति के फ़ैसलों पर सवाल उत्पन्न किया है.
खासकर संकट के समय में वे जिस तरह के फ़ैसले ले रहे हैं, उसने उनके फिर से
राष्ट्रपति चुने जाने की राह में मुश्किलें पैदा कर दी हैं.
पॉलिटिको मैग्जीन
के कंजरवेटिव नेशनल रिव्यू के एडिटर रिक लॉरी ने लिखा है, "अगर वे नवंबर
में हार जाते हैं तो ऐसा इसलिए नहीं होगा कि वे बड़े विधायी सुधार करना
चाहते थे जो राजनीतिक रूप में बहुत दूर की बात थी."
"ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे उन्होंने कोई क्रिएटिव
और अपरंपरागत नीति को अपना लिया था. ऐसा इसलिए भी नहीं होगा कि वे
चुनौतीपूर्ण घटनाओं के घिरे हुए थे. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि उन्होंने अपने
राष्ट्रपति पद को अनावश्यक तौर पर मैदान में उतार दिया है, एक वक्त में 280
शब्द के मैदान में."
हालांकि अभी भी अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में
साढ़े चार महीने से ज़्यादा का वक्त बचा है. अभी भी संभव है कि ट्रंप अपनी
स्थिति मजबूत कर लें और बाइडन अपनी स्थिति को कमजोर कर सकते हैं.
हालांकि
अब तक ट्रंप के ऊपर डेमोक्रेट्स की बढ़त टिकाऊ दिख रही है. यह 2016 के
हिलेरी क्लिंटन से ज़्यादा टिकाऊ दिख रही है. पिछले कुछ सप्ताह से डोनाल्ड
ट्रंप मुश्किलों में ज़रूर दिख रहे हैं और इस बार उनकी ख़ासियतें उन्हें
फेवरिट उम्मीदवार बनाने के लिए पर्याप्त नहीं लग रही हैं.
डोनाल्ड
ट्रंप अगर 2016 की कामयाबी को दोहराना चाहते हैं तो उन्होंने 2016 के अपने
नज़रिए को त्यागना होगा. उन्हें अमरीकी जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे
मौजूदा राष्ट्रपति से बेहतर साबित हो सकते हैं और इसके लिए उन्हें चार साल
का वक्त और चाहिए.
Tuesday, June 9, 2020
कौन हैं ट्रम्प के सामने जो बाइडन?
जो बाइडन को दुनिया के सबसे तजुर्बेकार राजनेताओं में से एक माना जाता है. लेकिन, वो अपने भाषणों में भयंकर ग़लतियां करने के लिए भी कुख्यात हैं.
हालांकि, डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार चुने गए बाइडन के बारे में आपके लिए बस इतना जानना पर्याप्त है कि वो इस साल नवंबर में होने वाले चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी डोनाल्ड ट्रंप को चुनौती देंगे.
जो बाइडन वो इंसान हैं, जो अमरीका की सत्ता के केंद्र व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के अगले चार बरस बिताने के ख़्वाब की राह में खड़ी इकलौती बाधा हैं.
बराक ओबामा के शासन काल में उप-राष्ट्रपति रहे बाइडन को औपचारिक रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का प्रत्याशी चुन लिया गया है.
अपने समर्थकों के बीच में जो बाइडन, विदेश नीति के विशेषज्ञ के तौर पर मशहर हैं. उनके पास वॉशिंगटन डी. सी. में राजनीति करने का कई दशकों का तजुर्बा है. वो मीठी ज़ुबान बोलने वाले नेता के तौर पर मशहूर हैं, जो बड़ी आसानी से लोगों का दिल जीत लेते हैं. बाइडन की सबसे बड़ी ख़ासियत ये है कि वो बड़ी सहजता से आम आदमी से नाता जोड़ लेते हैं. अपनी निजी ज़िंदगी में बाइडन ने बहुत से उतार चढ़ाव देखे हैं और बहुत सी त्रासदियां झेली हैं.
वहीं, विरोधियों की नज़र में जो बाइडन ऐसी शख़्सियत हैं, वो अमरीकी सत्ता में गहरे रचे बसे इंसान हैं, जिनमें कमियां ही कमियां हैं. बाइडन के बारे में उनके विरोधी कहते हैं कि वो अपने भाषणों में झूठे दावे करते हैं. साथ ही उनकी एक और आदत को लेकर भी अक्सर चिंता जताई जाती है कि उन्हें महिलाओं के बाल सूंघने की बुरी लत है.
बड़ा सवाल ये है कि क्या बाइडन में वो ख़ासियत है कि वो नवंबर के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस से बाहर का रास्ता दिखा सकें?
जो बाइडन का चुनाव प्रचार से बड़ा पुराना नाता रहा है. अमरीका की संघीय राजनीति में उनके करियर की शुरुआत, आज से 47 बरस पहले यानी 1973 में सीनेट के चुनाव से हुई थी. और उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में भागीदारी के लिए पहला दांव आज से 33 साल पहले चला था.
ऐसे में अगर ये कहें कि बाइडन के पास वोटर को लुभाने का क़ुदरती हुनर है, तो ग़लत नहीं होगा. मगर, बाइडन के साथ सबसे बड़ा जोखिम ये है कि वो कभी भी कुछ भी ग़लत बयानी कर सकते हैं, जिससे उनके सारे किए कराए पर पानी फिर जाए.
जनता से रूबरू होने पर जो बाइडन अक्सर जज़्बात में बह जाते हैं. और इसी कारण से राष्ट्रपति चुनाव का उनका पहला अभियान शुरू होने से पहले ही अचानक ही ख़त्म हो गया था (बाइडन तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का प्रयास कर रहे हैं).
जब 1987 में बाइडन ने राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी बनने के लिए पहली बार कोशिश करनी शुरू की थी, तो उन्होंने रैलियों में ये दावा करना शुरू कर दिया था कि, 'मेरे पुरखे उत्तरी पश्चिमी पेन्सिल्वेनिया में स्थित कोयले की खानों में काम करते थे.' और बाइडन ने भाषण में ये कहना शुरू कर दिया कि उनके पुरखों को ज़िंदगी में आगे बढ़ने के वो मौक़े नहीं मिले जिसके वो हक़दार थे. और बाइडन ये कहा करते थे कि वो इस बात से बेहद ख़फ़ा हैं.
मगर, हक़ीक़त ये है कि बाइडन के पूर्वजों में से किसी ने भी कभी कोयले की खदान में काम नहीं किया था. सच तो ये था कि बाइडन ने ये जुमला, ब्रिटिश राजनेता नील किनॉक की नक़ल करते हुए अदा किया था (इसी तरह बाइडन ने कई अन्य नेताओं के बयान अपने बना कर पेश किए थे). जबकि नील किनॉक के पुरखे तो वाक़ई कोयला खदान में काम करने वाले मज़दूर थे.
और ये तो बाइडन के तमाम झूठे जुमलों में से महज़ एक था. उनके ऐसे बयान अमरीकी राजनीति में 'जो बॉम्ब' के नाम से मशहूर या यूं कहें कि बदनाम हैं.
2012 में अपने राजनीतिक तजुर्बे का बखान करते हुए बाइडन ने जनता को ये कह कर ग़फ़लत में डाल दिया था कि, 'दोस्तो, मैं आपको बता सकता हूं कि मैंने आठ राष्ट्रपतियों के साथ काम किया है. इनमें से तीन के साथ तो मेरा बड़ा नज़दीकी ताल्लुक़ रहा है.' उनके इस जुमले का असल अर्थ तो ये था कि वो तीन राष्ट्रपतियों के साथ क़रीब से काम कर चुके हैं. मगर इसी बात को उन्होंने जिन लफ़्ज़ों में बयां किया, उसका मतलब ये निकलता था कि उनके तीन राष्ट्रपतियों के साथ यौन संबंध रहे थे.
जब बराक ओबामा ने जो बाइडन को अपने साथ उप-राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाया, तो बाइडन ने ये कह कर लोगों को डरा दिया था कि इस बात की तीस फ़ीसद संभावना है कि ओबामा और वो मिलकर अर्थव्यवस्था सुधारने में ग़लतियां कर सकते हैं.
जो बाइडन को क़िस्मत का धनी ही कहा जा सकता है कि उन्हें अमरीका के पहले काले राष्ट्रपति ने अपना उप-राष्ट्रपति बनाया था. क्योंकि, इससे पहले बाइडन ने ओबामा के बारे में ये कह कर हलचल मचा दी थी कि, 'ओबामा ऐसे पहले अफ्रीकी मूल के अमरीकी नागरिक हैं, जो अच्छा बोलते हैं. समझदार हैं. भ्रष्ट नहीं है और दिखने में भी अच्छे हैं.'
अपने इस बयान के बावजूद, इस बार के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान, जोसेफ बाइडन अमरीका के अफ्रीकी-अमरीकी समुदाय के बीच बहुत लोकप्रिय हैं. लेकिन, हाल ही में एक काले होस्ट के साथ चैट शो के दौरान जो बाइडन ने ऐसा कुछ कह दिया था जिससे बहुत बड़ा हंगामा खड़ा हो गया था. काले अमरीकी होस्ट शार्मलेन था गॉड के साथ बातचीत में बाइडन ने दावा किया था कि, 'अगर आपको ट्रंप और मेरे बीच चुनाव करने में समस्या है, तो फिर आप काले हैं ही नहीं.'
बाइडन के इस इकलौते मुंहफट बयान से अमरीकी मीडिया में तूफ़ान सा आ गया था. जिसके बाद बाइडन के प्रचार अभियान की कमान संभाल रही टीम को लोगों तक ये संदेश पहुंचाने में बड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी कि बाइडन, अफ्रीकी-अमरीकी मतदाता को हल्के में बिल्कुल नहीं ले रहे हैं.
जो बाइडन के ऐसे बेलगाम बयानों के कारण ही न्यूयॉर्क मैग़ज़ीन के एक पत्रकार ने लिखा था कि, 'बाइडन की पूरी प्रचार टीम बस इसी बात पर ज़ोर दिए रहती है कि कहीं वो कोई अंट-शंट बयान न दे बैठें.'
यूं तो बाइडन एक अच्छे वक्ता हैं. मगर, उनकी भाषण कला का एक पहलू और भी है. आज जब दुनिया में रोबोट जैसे नेताओं की भरमार है, जो सधे हुए बयान देते हैं. बस लिखा हुआ पढ़ देते हैं. लेकिन, बाइडन ऐसे वक्ता हैं जिन्हें सुन कर ऐसा लगता है कि वो दिल से बोल रहे हैं. बाइडन कहते हैं कि बचपन में हकलाने की आदत की वजह से उन्हें टेलिप्रॉम्पटर की मदद से पढ़ना नहीं आता है. वो जो भी बोलते हैं, दिल से बोलते हैं.
जो बाइडन के भाषण में वो दिलकशी है कि वो अमरीका के ब्लू-कॉलर कामकाजी लोगों की भीड़ में अचानक अपने भाषण से जोश भर देते हैं. इसके बाद वो बड़ी सहजता से उस भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं. लोगों से मिलते हैं. हाथ मिलाते हैं उन्हें गले लगाते हैं. लोगों के साथ सेल्फ़ी लेते है. ठीक उसी तरह जैसे कोई बुज़ुर्ग फ़िल्म स्टार हो, जो अचानक अपने फ़ैन्स के बीच पहुंच गया हो.
अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री और राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवार रहे जॉन केरी ने न्यूयॉर्कर मैगज़ीन से बातचीत में बाइडन के बारे में कहा था कि, 'वो लोगों को अपनी ओर खींच कर उन्हें गले लगा लेते हैं. कई बार तो लोग उनकी बातों से ही उनकी ओर खिंचे चले आते हैं और कई बार वो लोगों को ख़ुद ही अपने आगोश में भींच लेते हैं. वो दिल को छू लेने वाले राजनेता हैं. और उनमें कोई बनावट नहीं है. वो कोई ढोंग नहीं करते. बड़े सहज भाव से लोगों में घुल मिल जाते हैं.'
पिछले साल आठ महिलाओं ने सामने आकर ये आरोप लगाया था कि जो बाइडन ने उन्हें आपत्तिजनक तरीक़े से छुआ था, गले लगाया था या किस किया था. इन महिलाओं के आरोप लगाने के बाद कई अमरीकी न्यूज़ चैनलों ने बाइडन के सार्वजनिक समारोहों में महिलाओं से अभिवादन करने की नज़दीकी तस्वीरें दिखाई थीं. इनमें कई बार बाइडन को महिलाओं के बाल सूंघते हुए भी देखा गया था. इन आरोपों के जवाब में बाइडन ने कहा था कि, 'भविष्य में मैं महिलाओं से अभिवादन के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतूंगा.'
लेकिन, अभी इसी साल मार्च महीने में अमरीकी अभिनेत्री तारा रीड ने इल्ज़ाम लगाया था कि जो बाइडन ने तीस साल पहले उनके साथ यौन हिंसा की थी. उन्हें दीवार की ओर धकेल कर उनसे ज़बरदस्ती करने की कोशिश की थी. उस वक़्त तारा रीड, बाइडन के ऑफ़िस में एक सहायक कर्मचारी के तौर पर काम कर रही थीं.
कौन-कौन सुनते हैं राष्ट्रपति के फ़ोन कॉल्स
भले ही आम लोगों से बाइडन की ये नज़दीकी पहले उनके लिए मुसीबत बनती रही हो. लेकिन, इस बार उनके समर्थक ये उम्मीद कर रहे हैं कि उनका जो लोगों से नज़दीकी बनाने का ख़ास स्टाइल है, आम लोगों से जो गर्मजोशी है, उसकी मदद से वो अपनी पुरानी ग़लतियों के भंवर में दोबारा नहीं फंसेंगे. वो डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों जैसी ग़लती नहीं दोहराएंगे. इस बार सावधानी बरतेंगे.
जो बाइडन को अमरीका की संघीय राजनीति में काम करने का लंबा अनुभव रहा है. वो वॉशिंगटन में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं. अमरीकी संसद के ऊपरी सदन यानी सीनेट में बाइडन ने तीन दशक से अधिक समय गुज़ारा है. इसके अलावा वो बराक ओबामा के राज में आठ साल तक उप-राष्ट्रपति रहे हैं. सियासत में इतना लंबा अनुभव काफ़ी काम आता है. मगर, हालिया इतिहास बताता है कि ऐसा हमेशा हो, ये भी ज़रूरी नहीं.
अल गोर (अमरीकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स में आठ साल का अनुभव, सीनेट में आठ साल का तजुर्बा और उप-राष्ट्रपति के तौर पर आठ साल का वक़्त) हों, जॉन केरी हों (सीनेट में 28 साल का अनुभव) या फिर हिलेरी क्लिंटन (देश की प्रथम महिला के तौर पर आठ वर्ष का तजुर्बा और सीनेट में आठ साल का अनुभव, विदेश मंत्री के तौर पर चार बरस का तजुर्बा), डेमोक्रेटिक पार्टी के ये सभी अनुभवी राजनेता, अपने से कम तजुर्बा रखने वाले रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी के हाथों शिकस्त खाने को मजबूर हुए.
जो बाइडन के समर्थक ये मानते हैं कि एक ज़मीनी नेता के तौर पर उनका अनुभव, उन्हें कम अनुभवी ट्रंप के हाथों परास्त होने से बचा लेगा.
अमरीका के वोटरों ने कई बार ये साबित किया है कि वो ऐसे नेताओं को राष्ट्रपति चुनने को तरजीह देते हैं, जो ये दावा करता है कि वो वॉशिंगटन की राजनीति का हिस्सा नहीं है. बल्कि, वो इसलिए राष्ट्रपति बनना चाहते हैं ताकि वो वॉशिंगटन की मौजूदा व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकें. उसमें आमूल चूल बदलाव ले आएं. अक्सर ऐसे नेता अमरीकी जनता को पसंद आते हैं, जो ख़ुद को 'आउटसाइडर' यानी वॉशिंगटन से बाहर वाला कहते हैं.
लेकिन ये एक ऐसा दावा है जो जो बाइडन क़त्तई नहीं कर सकते. क्योंकि उन्होंने अमरीका की शीर्ष राजनीति में लगभग पचास साल का वक़्त गुज़ारा है.
और, वॉशिंगटन की राजनीति में उनके लंबे तजुर्बे को बाइडन के ख़िलाफ़ चुनाव में भुनाया जा सकता है.
अमरीका के राजनीतिक इतिहास में पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी बड़ा उतार चढ़ाव देखने को मिला है, उसमें बाइडन किसी न किसी रूप में ज़रूर शामिल रहे हैं. और बाइडन ने इस दौरान जो भी फ़ैसले लिए हैं, वो शायद राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान उनके हक़ में काम न आएं.
1970 के दशक में उन्होंने अमरीकी बच्चों के बीच नस्लीय भेदभाव कम करने के लिए उन्हें एक साथ पढ़ाने का विरोध करने वालों का साथ दिया था. तब दक्षिण के अमरीकी राज्य इस बात के ख़िलाफ़ थे कि गोरे अमरीकी बच्चों को बसों में भर कर काले बहुल इलाक़ों में ले जाया जाए. इस बार के चुनाव अभियान के दौरान, बाइडन को उनके इस स्टैंड के लिए बार-बार निशाना बनाया गया है.
रिपब्लिकन पार्टी के उनके विरोधी अक्सर, ओबामा प्रशासन में रक्षा मंत्री रहे रॉबर्ट गेट्स के उस बयान का हवाला देत हैं, जिसमें गेट्स ने कहा था कि, 'जो बाइडन को नापसंद करना क़रीब क़रीब नामुमकिन है. मगर दिकक़्त ये है कि पिछले चार दशकों में अमरीका की विदेश नीति हो या फिर घरेलू सुरक्षा से जुड़े मसले, इन सभी मामलों में बाइडन हमेशा ग़लत पक्ष के साथ ही खड़े रहे हैं.'
अब जैसे-जैसे चुनाव का प्रचार अभियान तेज़ होगा, तो तय है कि बाइडन को ऐसे सियासी बयानों के ज़रिए निशाना बनाया जाएगा.
ये बाइडन के लिए अफ़सोस की बात है. मगर, एक ऐसा मसला है जिस मामले में वो किसी अन्य राजनेता के मुक़ाबले अमरीकी जनता के ज़्यादा क़रीब दिखाई देते हैं. और वो है मौत. जब, जो बाइडन, पहली बार अमरीकी सीनेट का चुनाव जीत कर शपथ लेने की तैयारी कर रहे थे, तभी उनकी पत्नी नीलिया और बेटी नाओमी एक कार हादसे में मारी गई थीं. इस दुर्घटना में उनके दोनों बेटे ब्यू और हंटर भी ज़ख़्मी हो गए थे. बाद में ब्यू की 46 साल की उम्र में 2015 में ब्रेन ट्यूमर से मौत हो गई थी.
इतनी युवावस्था में इतने क़रीबी लोगों को गंवा देने के कारण, आज जो बाइडन से बहुत से आम अमरीकी लोग जुड़ाव महसूस करते हैं. लोगों को लगता है कि इतनी बड़ी सियासी हस्ती होने और सत्ता के इतने क़रीब होने के बावजूद, बाइडन ने वो दर्द भी अपनी ज़िंदगी में झेले हैं, जिनसे किसी आम इंसान का वास्ता पड़ता है.
लेकिन, बाइडन के परिवार के एक हिस्से की कहानी बिल्कुल अलग है. ख़ास तौर से उनके दूसरे बेटे हंटर की.
सत्ता, भ्रष्टाचार और झूठ?
जो बाइडन के दूसरे बेटे हंटर ने वकालत की पढ़ाई पूरी करके लॉबिइंग का काम शुरू किया था. इसके बाद उनकी ज़िंदगी बेलगाम हो गई. हंटर की पहली पत्नी ने उन पर शराब और ड्ग्स की लत के साथ-साथ, नियमित रूप से स्ट्रिप क्लब जाने का हवाला देते हुए तलाक़ के काग़ज़ात अदालत में दाख़िल किए थे. कोकीन के सेवन का दोषी पाए जाने के बाद हंटर को अमरीकी नौसेना ने नौकरी से निकाल दिया था.
एक बार हंटर ने न्यूयॉर्कर पत्रिका के साथ बातचीत में माना था कि एक चीनी ऊर्जा कारोबारी ने उन्हें तोहफ़े में हीरा दिया था. बाद में चीन की सरकार ने इस कारोबारी के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच की थी.
अपनी निजी ज़िंदगी का हंटर ने जैसा तमाशा बनाया उससे बाइडन को काफ़ी सियासी झटके झेलने पड़े हैं. अभी पिछले ही साल हंटर ने दूसरी शादी एक ऐसी लड़की से की थी, जिससे वो महज़ एक हफ़्ते पहले मिले थे. इसके अलावा हंटर की भारी कमाई को लेकर भी बाइडन पर निशाना साधा जाता रहा है.
हंटर का नशे का आदी होना एक ऐसी बात है, जिससे बहुत से अमरीकी लोगों को हमदर्दी हो सकती है. लेकिन, जिस तरह हंटर ने अक्सर मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियों पर हाथ साफ़ किया है. उससे ये बात भी उजागर होती है कि अगर कोई जो बाइडन जैसे किसी बड़े सियासी नेता की औलाद है, तो नशेड़ी होने के बावजूद उन्हें मोटी तनख़्वाहों वाली नौकरियां आसानी से मिल जाती हैं. उनकी ज़िंदगी नशे के शिकार किसी आम अमरीकी नागरिक की तरह मुश्किल भरी नहीं होती.
महाभियोग का भय
हंटर ने मोटी सैलेरी वाली जो नौकरियां कीं, उनमें से एक यूक्रेन में भी थी. बाइडन के बेटे की इसी नौकरी के चलते अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति पर इस बात का दबाव बनाया था कि हंटर के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करें.
यूक्रेन के राष्ट्रपति को की गई इसी फ़ोन कॉल के कारण हाल ही में ट्रंप के ख़िलाफ़ महाभियोग की शुरुआत हुई थी. हालांकि, ये सियासी मुहिम ट्रंप को राष्ट्रपति पद से हटाने में नाकाम रही थी. हालांकि, ये एक ऐसा सियासी दलदल था, जिसे लेकर शायद बाइडन ये सोच रखते हों कि काश वो इस झंझट में न पड़े होते.
कूटनीति का लंभाव अनुभव, जो बाइडन की बड़ी सियासी ताक़त है. ऐसे में विदेश से जुड़ा हुआ कोई भी सियासी स्कैंडल उन्हें ख़ास तौर से सियासी नुक़सान पहुंचाने वाला हो सकता है. जो बाइडन, पहले सीनेट की विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं. और वो ये दावा बढ़ चढ़कर करते रहे हैं कि-'मैं पिछले 45 बरस में कम-ओ-बेश दुनिया के हर बड़े राजनेता से मिल चुका हूं.' भले ही, अमरीकी मतदाताओं को बाइडन के इस दावे से तसल्ली होती हो कि उनके पास राष्ट्रपति बनने का पर्याप्त अनुभव है. लेकिन, ये कहना मुश्किल है कि उनके इस अनुभव के आधार पर कितने लोग बाइडन को राष्ट्रपति पद के लिए चुनना चाहेंगे.
उनके लंबे सियासी अनुभव की तरह ही इस मामले में भी यही कहा जा सकता है कि इस मामले में उनका मिला जुला अनुभव ही रहेगा.
जो बाइडन ने 1991 के खाड़ी युद्ध के ख़िलाफ़ वोट दिया था. लेकिन, 2003 में उन्होंने इराक़ पर हमले के समर्थन में वोट दिया था. हालांकि, बाद में वो इराक़ में अमरीकी दख़ल के मुखर आलोचक भी बन गए थे.
ऐसे मामलों में बाइडन अक्सर संभलकर चलते हैं. अमरीकी कमांडो के जिस हमले में पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन को मार गिराया गया था, बाइडन ने ओबामा को ये हमला न करने की सलाह दी थी.
मज़े की बात ये है कि अल-क़ायदा के नेता ओसामा बिन लादेन को जो बाइडन की कोई ख़ास परवाह नहीं थी. सीआईए द्वारा ज़ब्त किए गए जो दस्तावेज़ जारी किए गए हैं, उनके मुताबिक़, ओसामा बिन लादेन ने अपने लड़ाकों को निर्देश दिया था कि वो राष्ट्रपति बराक ओबामा को निशाना बनाएं. लेकिन, लादेन ने बाइडन की हत्या का कोई फ़रमान नहीं जारी किया था.
जबकि उस वक़्त बाइडन, अमरीका के उप-राष्ट्रपति थे. ओसामा बिन लादेन को लगता था कि, ओबामा की हत्या के बाद बाइडन को ही अमरीका की कमान मिलेगी. मगर लादेन के मुताबिक़, 'बाइडन राष्ट्रपति पद की ज़िम्मेदारियां उठाने के लिए क़त्तई तैयार नहीं थे. और अगर वो राष्ट्रपति बनते हैं तो अमरीका में सियासी संकट पैदा हो जाएगा.'
कई मामलों में जो बाइडन के ख़यालात ऐसे हैं, जो डेमोक्रेटिक पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं से मेल नहीं खाते. डेमोक्रेटिक पार्टी के इन युवा समर्थकों को बर्नी सैंडर्स या एलिज़ाबेथ वॉरेन जैसे नेताओं के कट्टर युद्ध विरोधी विचार अधिक पसंद आते हैं. मगर, बहुत से अमरीकी नागरिकों को ये भी लगता है कि जो बाइडन कुछ ज़्यादा ही शांति दूत बनते हैं.
ये वही अमरीकी नागरिक हैं, जिन्होंने इस साल जनवरी में एक ड्रोन हमले में, ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या करने का आदेश देने पर राष्ट्रपति ट्रंप का खुल कर समर्थन किया था.
विदेश नीति से जुड़े ज़्यादातर मामलों में बाइडन का रवैया मध्यमार्गी रहा है. इससे हो सकता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के बहुत से कार्यकर्ताओं में जोश न भरे. लेकिन, बाइडन को लगता है कि बीच का ये रवैया अपना कर वो उन मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकते हैं, जो अभी ये फ़ैसला नहीं कर पाए हैं कि ट्रंप और उनके बीच, वो किसे चुनें.
और नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान, उन्हें पसंद करने वालों को बहुत ज़ोर शोर से उनका साथ देने की ज़रूरत नहीं होगी. उन्हें बस बाइडन के हक़ में बिना कोई शोर गुल किए हुए, वोट डालना होगा.
चुनाव से पहले के तमाम सर्वे, व्हाइट हाउस की इस होड़ में जो बाइडन को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पाँच से दस अंक आगे बताते रहे हैं. लेकिन, नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अभी भी कई महीने दूर हैं. और तय है कि अभी आगे बाइडन के लिए कई सख़्त इम्तिहान बाक़ी हैं. दोनों ही पार्टियों के प्रत्याशी पहले ही काले लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस की हिंसा के विरोध में अमरीका में हो रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर टकरा चुके हैं. इसके अलावा जिस तरह से अमरीकी सरकार ने कोरोना वायरस के संकट से निपटने की कोशिश की है, उसे लेकर भी ट्रंप और बाइडन में भिड़ंत हो चुकी है.
यहां तक कि फ़ेस मास्क भी ट्रंप और बाइडन के बीच सियासी झड़प का कारण बन चुके हैं. ऐसा लगता है कि जो बाइडन कई बार सार्वजनिक रूप से मास्क पहन कर दिखने के लिए ज़रूरत से ज़्यादा प्रयास करते हैं, वहीं, राष्ट्रपति ट्रंप, मास्क पहनने से बार-बार परहेज़ करते आए हैं.
लेकिन, कई बार इमेज चमकाने की इन छोटी मोटी कोशिशों से इतर राजनीतिक चुनाव प्रचार के प्रबंधन में कई बड़ी चीज़ें दांव पर लगी होती हैं.
अगर, जो बाइडन राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतते हैं, तो वो अपने लंबे और उतार चढ़ाव भरे राजनीतिक करियर के शिखर पर पहुंच जाएंगे. लेकिन, अगर वो चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो इससे वो व्यक्ति चार और वर्षों के लिए अमरीका का राष्ट्रपति बन जाएगा, जिसके बारे में बाइडन का कहना है कि, 'उसमें अमरीका का राष्ट्रपति बनने की बिल्कुल भी क़ाबिलियत नहीं है. वो एक ऐसा इंसान है, जिस पर क़त्तई भरोसा नहीं किया जा सकता है.'
आज से चार साल पहले, 2016 में जब जो बाइडन इस बात की दुविधा में थे कि राष्ट्रपति चुनाव की रेस में दाख़िल हों या नहीं, तब उन्होंने कहा था कि, 'मैं इस बात की तसल्ली लेकर ख़ुशी से मर सकता हूं कि मैं राष्ट्रपति नहीं बन सका.'
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