Monday, July 27, 2020

दुनिया में लोकतंत्र की हालत

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 की तरह एक बार फिर संकेत दिया है कि इस बात की गारंटी नहीं है कि वे नवंबर के चुनाव परिणामों को स्वीकार कर लेंगे। उन्होंने संदेहास्पद अंदाज में कहा है कि `मैं देखूंगा।’ फॉक्स न्यूज़ के मॉडरेटर क्रिस वैलेस से एक इंटरव्यू के दौरान यह पूछे जाने पर कि क्या वे चुनाव परिणाम को स्वीकार कर लेंगे तो उन्होंने कहा, “ मैं देखूंगा। ….मैं न तो हां कहने जा रहा हूं और न ही न कहने जा रहा हूं। मैंने पिछली बार भी हां या न कुछ नहीं कहा था।’’

उधर तुर्की में सोफिया स्मारक को मस्जिद घोषित करने जा रहे राष्ट्रपति तैयब एर्दोगन ने एक सेक्युलर देश को इस्लामी राष्ट्र घोषित करने की तैयारी कर ली है। भारत में भी अगले महीने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर का शिलान्यास करेंगे तब संभव है कि उन्हें राष्ट्रपिता घोषित कर दिया जाए और उनके समर्थक यह मान लें कि अगले कार्यकाल के लिए भी वे ही चुनाव जीतेंगे। उसके बाद भारत को हिंदू राष्ट्र न घोषित किया जाएगा इस बात की क्या गारंटी है? उधर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आजीवन पद पर रहने के लिए संविधान में संशोधन कर लिया है और रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी ऐसा ही इंतजाम किया है।

ऊपर अमेरिका और भारत के साथ चीन और रूस के उदाहरण देने का अर्थ यह है कि जो लोकतांत्रिक देश हैं वहां खेल के नियम बदले जा रहे हैं और अधिनायकवाद स्थापित होता जा रहा है और जो अधिनायकवादी देश हैं उनकी लोकतंत्र की ओर यात्रा होती नहीं दिखाई दे रही है। बल्कि वे अपनी व्यवस्था में और मजबूत हो रहे हैं। ऐसे माहौल में जब यूरोप के भी लोकतांत्रिक देश तानाशाही की ओर जा रहे हैं तब कहां से उम्मीद की जाए। उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ का सदस्य हंगरी अब कहने के लिए लोकतांत्रिक बचा है। उसके प्रधानमंत्री विक्टर ओरबन ने विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया पर एक तरह से कब्जा जमा लिया है और विपक्ष को बेअसर कर दिया है। इसी तरह आर्थिक संकट से गुजर रहे अन्य यूरोपीय देशों में शरणार्थियों की समस्या से पैदा हुआ राष्ट्रवाद और मजबूत होगा जो एक प्रकार से लोकतंत्र को कमजोर ही करने वाला है।

यहां एक अमेरिकी लेखक डैनियल एलेन की एक उक्ति का विशेष महत्व बन जाता है जिसमें वे कहते हैं, “इस पूरे मामले का साधारण तथ्य यह है कि दुनिया आज तक ऐसा बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र नहीं स्थापित कर सकी है जिसमें कोई भी जातीय समूह बहुसंख्यक न हो। न ही ऐसा देश बन सका है जहां पर सामाजिक समता, राजनीतिक समता और सभी को सबल बनाने वाली अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल किया जा सका हो।’’ एलेन की तरफ से कल्पित यह लोकतंत्र की ऐसी शर्त है जिसे शायद ही कभी हासिल किया जा सके। हां इतना जरूर है कि भारत और अमेरिका जैसे लोकतंत्र यूरोप की तुलना में ज्यादा बहुलता लिए हुए हैं। वहां की विविधतापूर्ण संरचना और लोगों में लोकतंत्र के लिए आकर्षण देखते हुए यह यकीन किया जाता था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था लंबे समय तक चलने वाली है या यह तब तक चलेगी जब तक उससे बेहतर व्यवस्था न ढूंढ ली जाए।

लेकिन भारत और अमेरिका दोनों देशों में ऐसे राजनेता और उन्हीं के साथ ऐसे राजनीतिक दलों का उभार हो चुका है जो हर हाल में सत्ता हासिल करने और कायम करने में यकीन करते हैं और उसके लिए लोकतांत्रिक खेल के नियमों को बदलने से भी गुरेज नहीं करते। अमेरिका में वीजा के नियम, प्रवासियों और उनके बच्चों की देखभाल के नियम, मतदाता बनाने के नियम और वोट देने के नियमों में तरह-तरह के बदलावों के प्रस्ताव लोकतंत्र को एक संकीर्ण और बहुसंख्यकवादी व्यवस्था बनाने के लिए चल रहे हैं। इस मामले में अमेरिका और भारत में कौन आगे है कहा नहीं जा सकता। अगर अमेरिका के उत्तरी कैरिलोना जैसे विविधता वाले प्रांत में इस तरह के तमाम बदलाव पिछले दिनों किए गए हैं तो भारत में सीएए और एनआरसी के बहाने अल्पसंख्यकों को दरकिनार करने के नए नियम बन रहे हैं।

सवाल उठता है कि लोकतंत्र के प्रति विकर्षण का यह दौर आया कैसे? सन 1990 में सोवियत संघ के पतन के बाद जिस लोकतंत्र की तूती पूरी दुनिया में बोलती थी अचानक ऐसा क्या हुआ कि लोकतांत्रिक संस्थाएं पस्त हो गईं और लोकतांत्रिक समाज का सपना टूटने लगा? निश्चित तौर पर इसके पीछे वह स्थितियां तो हैं ही जिसकी ओर डैनियल एलेन संकेत करते हैं। यानी समाज में बढ़ती असमानता लोकतंत्र के प्रति घटते विश्वास का एक प्रमुख कारण है। लोकतंत्र जो बराबरी का एक सपना है और जिसे पूरा करने का दावा उदारीकरण ने किया था वह टूट गया है।

अविश्वास के साथ बढ़ती है हिंसा और उससे राज्य को दमनकारी होने का बहाना मिलता है। इस तरह एक दुष्चक्र निर्मित होता है जिसके भीतर लोकतांत्रिक संस्थाएं न तो मूल्यों के लिए दृढ़ता दिखा पाती हैं और न ही मानवाधिकारों की रक्षा कर पाती हैं। बढ़ती असमानता के बारे में बढ़-चढ़ कर चिंता जताने वाले फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थामस पिकेटी अपनी नई पुस्तक- कैपिटल एंड आइडियोलाजी— में कहते हैं कि वर्ग आधारित राजनीति के कमजोर पड़ने के साथ असमानता तेजी से बढ़ी है। जाहिर सी बात है कि उसकी जगह धर्म, जाति और जातीयता की राजनीति ने ले ली है और वे अपने ढंग से जो काम कर रहे हैं उससे असमानता के साथ नए किस्म का द्वेष भी बढ़ रहा है।

भले ही ऐसी राजनीति बहुसंख्यक एकता का दावा कर रही है और अपनी चुनावी संभावनाओं को प्रबल बना रही है। इसीलिए पिकेटी कहते हैं कि अगर धन के वितरण की नई और कारगर व्यवस्था नहीं की गई तो बहुत कुछ ध्वस्त हो जाएगा। हालांकि वे इस मामले में यूरोपीय परिदृश्य पर ही ध्यान केंद्रित करते हुए अपने उदाहरण प्रस्तुत करते हैं लेकिन उनकी एक बात गौर करने लायक है कि विश्ववादी और राष्ट्रवादी जनमत के भीतर समतावादी और समता विरोधी लोगों का खेमा है। जरूरत इन दोनों खेमों को तोड़कर समतावादियों की एकता कायम करने की है।


मिस्र लीबिया और तुर्की की नई लडाई


कुछ दिन पहले मिस्र की संसद ने लीबिया में सेना तैनात करने के एक प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी जिसके बाद इस छोटे से मध्यपूर्व के देश को लेकर मिस्र और तुर्की के बीच सशस्त्र संघर्ष की संभावना बनने लगी.
तुर्की, संयुक्त राष्ट्र की मदद से बनी लीबिया की त्रिपोली में मौजूद सरकार (गवर्नमेन्ट ऑफ़ नेशनल अकॉर्ड, जीएनए) का समर्थन करता है जिसका मिस्र लगातार विरोध करता रहा है.
मिस्र के विदेश मंत्री सामेह शुक्रे ने लीबिया की स्थिति को लेकर यूरोपीय संघ के विदेशी मामलों से प्रतिनिधि और संघ के कुछ और सदस्यों से फ़ोन पर चर्चा की है. उनका कहना है कि "ग़ैर-ज़िम्मेदार तरीके से लड़ाकों और आतकंवादियों को लीबिया भेजा जा रहा है जिससे वहां स्थिति गंभीर होती जा रही है."
लीबिया को लेकर मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अल सिसि और यूनान के प्रधानमंत्री किर्याकोस मित्सोताकिस ने भी आपस में चर्चा की है और दोनों नेता इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि लीबिया में किसी तरह के बाहरी हस्तक्षेप का विरोध किया जाना चाहिए.
गुरुवार को मिस्र के राष्ट्रपति के प्रवक्ता ने एक बयान जारी कर कहा कि फ़ोन पर हुई इस चर्चा के दौरान सिसि और मित्सोताकिस ने लीबियाई संकट के मद्देनज़र मिस्र की स्थिति पर चर्चा की और दोनों पक्षों ने कहा कि वो लीबियाई मामलों में "अवैध विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करते हैं."
मिस्र का कहना है कि इसके साथ जुड़े सशस्त्र विद्रोहियों के कारण मिस्र और अरब के पूरे इलाक़े के लिए ख़तरा पैदा हो गया है. लेकिन तुर्की का कहना है कि वो लीबिया में स्थायी सरकार की उम्मीद करता है.
लेकिन तुर्की और मिस्र के बीच तनाव केवल लीबिया के कारण नहीं. भूमध्यसागर में तेल के लिए तुर्की की ड्रिलिंग की योजना को लेकर भी दोनों के बीच तनाव है.
तुर्की ने मंगलवार में अपने दक्षिण में मौजूद एक द्वीप के पास ड्रिलिंग सर्वे करने के लिए जहाज़ भेजने का ऐलान किया था. ये द्वीप मिस्र के नज़दीक है.
तुर्की ने कहा है कि ये जहाज़ समंदर में उसके इलाक़े में ड्रिलिंग का काम करेंगे लेकिन तुर्की की इस घोषणा के बाद मिस्र ने मंगलवार को चेतावनी जारी की और कहा कि इस इलाक़े में उसके जहाज़ भी लगातार निगरानी करेंगे. यहीं से विवाद शुरू हुआ है जिसने अब गंभीर रूप अख्तियार कर लिया है.
तुर्की की चेतावनी के विरोध में यूरोपीय संघ भी सामने आया है जिसने कहा कि "उसकी घोषणा से ग़लत संदेश गया है."
बुधवार को मिली जानकारी के अनुसार तुर्की का जहाज़ ओरुक रीज़ बंदरगाह अंताल्या पर खड़ा है. लेकिन नैवटेक्स (चेतावनी देने की एक तकनीक) पर दिए गए तुर्की के अलर्ट से मिस्र की सेना में हलचल शुरू हो गई. मिस्र ने तुर्की के इस कदम को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया.
कैसे बिगड़ते गए आपसी संबंध?
तुर्की अपना ये ड्रिलिंग सर्वे भूमध्यसागर में साइप्रस और क्रेट के इलाक़ों के बीच करना चाहता है.
मिस्र से मिल रही अपुष्ट ख़बरों के अनुसार तुर्की और यूनान के नेवी के जहाज़ यूनानी द्वीप कास्टेलोरिज़्ज़ो की तरफ जाते देखे गए हैं. ये द्वीप तुर्की के नज़दीक है.
यूनान और तुर्की के बीच हाल के दौर तक रिश्ते बेहतर नहीं थे. भूमध्यसागर पार कर यूनान आ रहे प्रवासियों को लेकर दोनों देश पहले भी कई बार आपस में भिड़ चुके हैं.
इस महीने की शुरुआत में तुर्की ने कहा था कि वो इस्तांबुल में मौजूद ऐतिहासिक हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलेगा. ये मस्जिद सालों पहले ऑर्थोडॉक्स परंपरा को मानने वाले ईसाइयों का अहम केंद्र था. तुर्की के इस फ़ैसले को यूनान ने ग़ैर-ज़रूरी बताया था.
अब भूमध्यसागर में तुर्की की ड्रिलिंग की योजना योजना के बारे में उसका कहना है कि इसके ख़िलाफ़ यूरोपीय संघ को भी कदम उठाने की ज़रूरत है.
तुर्की और यूनान दोनों देश नैटो देशों के समूह के सदस्य हैं लेकिन भूमध्यसागर से कच्चा तेल लेने की होड़ में दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं.
हाल के सालों में साइप्रस के नज़दीक समंदर में कच्चे तेल के बड़े भंडारों का पता चला है, जिसके बाद इसके इस्तेमाल को लेकर साइप्रस, इसराइल, यूनान और मिस्र के बीच अहम सहमति बनी है.
इस समझौते के तहत यहां से मिलने वाले कच्चे तेल को भूमध्यसागर से गुज़रने वाली 2,000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन के ज़रिए यूरोप भेजा जाएगा.
लेकिन बीते साल तुर्की ने साइप्रस से पश्चिम में ड्रिलिंग का काम बढ़ा दिया. इस द्वीप के इलाक़े पर साल 1974 से ही विवाद है. तुर्की के नियंत्रण वाले पूर्वी साइप्रेस को केवल तुर्की ही मान्यता देता है. तुर्की ने इस सप्ताह इस विवाद को एक तरह से स्वीकार करते हुए कहा कि इस द्वीप के संसाधनों का साझा इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
नवंबर 2019 में तुर्की ने लीबिया के साथ एक करार किया था जिसके बारे में तुर्की का कहना था कि उसके दक्षिणी तट से लेकर लीबिया के उत्तर पूर्वी तट तक एक एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन बनाया गया था.
मिस्र ने इसका विरोध किया था और कहा था कि इस पूरी प्रक्रिया में इस जगह के बीच में पड़ने वाले यूनान के क्रेट द्वीप को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया था.
मई के आख़िर तक तुर्की ने ऐलान कर दिया कि वो आने वाले महीनों में दूर पश्चिम तक ड्रिल करने की योजना बना रहा है. उसके इस ऐलान से यूरोपीय संघ के सदस्य, यूनान और साइप्रस ने नाराज़गी जताई.
यूनान के रोड्स और क्रीट द्वीपों समेत भूमध्यसागर के पूर्वी इलाक़े में ड्रिलिंग का काम करने के लिए तुर्की पेट्रोलियम को कई लाइसेंस भी जारी किए गए हैं.
तुर्की के उप राष्ट्रपति का कहना है कि "सभी को तुर्की और उत्तरी साइप्रस के तुर्की गणराज्य को स्वीकार करना चाहिए और उसे इस इलाक़े के संसाधनों के इस्तेमाल की आज़ादी होनी चाहिए."
ईजियन में कई यूनानी द्वीप और पूर्वी भूमध्यसागर का इलाक़ा तुर्की तट से क़रीब है और इसलिए यहां क्षेत्रीय जल के मुद्दे जटिल हैं. इन मुद्दों को लेकर दोनों देश अतीत में युद्ध की कगार तक भी पहुंच गए हैं.
अगर यूनान अपने समुद्रतट से लगी समुद्री सीमा को छह मील से बढ़ाकर अधिकतम 12 तक कर देता है (जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है) तो तुर्की का कहना है कि उसके समुद्री मार्ग बुरी तरह प्रभावित होंगे.
समुद्री सीमा के अलावा तुर्की और लीबिया के बीच, साइप्रस और लेबनान के बीच और मिस्र और इसराइल के बीच एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन हैं जिनकी सीमाओं का भी करीब 200 नॉटिकल मील तक विस्तार किया जा सकता है.
तो ऐसे में यूनानी द्वीप कास्टेलोरिज़्ज़ो का क्या होगा, जो तुर्की से केवल दो किलोमीटर की दूरी पर है?
यूनान का कहना है तुर्की की चेतावनी कास्टेलोरिज़्ज़ो के एक बड़े कॉन्टिनेल्टल शेल्फ़ तक पहुंचती है. हालांकि तुर्की के विदेश मंत्री मेव्लुत चोवाशुग्लू का कहना है कि जो द्वीप तुर्की के बेहद करीब हैं उनका अपना कॉन्टिनेल्टल शेल्फ़ नहीं हो सकता.
जर्मनी के विदेश मंत्री हेइको मास ने हाल में यूनान का दौरा किया था. उन्होंने कहा था कि तुर्की से "पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उकसावे" को रोकने की अपील की थी.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भी गुरुवार को इस इलाके के दौरे पर थे. उन्होंने साइप्रस और यूनान को अपना पूरा समर्थन दिया और कहा कि तुर्की ने "उनकी संप्रभुता का उल्लंघन" किया है और जो कोई "यूरोपीय संघ के सदस्य के समुद्री मार्गों को लेकर आक्रामक होगा उन पर प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए."
फ्रांस और तुर्की के बीच हाल में संबंध तनावपूर्ण रहे हैं, ख़ास कर लीबिया को लेकर दोनों में तनाव बढ़ा है.
बुधवार को, यूरोपीय संघ के एक प्रवक्ता ने कहा कि तुर्की का ये कदम "दूसरे देशों के ग़लत संदेश दे रहा है."
यूरोपीय संघ ने बार-बार एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन की सीमित शक्तियों का हवाला देते हुए कहा है कि कॉन्टनेन्टल शेल्फ़ के मुद्दे को देशों को आपसी बातचीत से सुलझाना चाहिए.

तुर्की को राष्ट्रवाद में झोकते आर्दोआन


तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इस्तांबुल के ऐतिहासिक हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को दोबारा मस्जिद में बदलने के आदेश दे दिए हैं. इससे पहले शुक्रवार को ही तुर्की की एक अदालत ने हागिया सोफ़िया म्यूज़ियम को मस्जिद में बदलने का रास्ता साफ़ कर दिया था. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि हागिया सोफ़िया अब म्यूज़ियम नहीं रहेगा और 1934 के कैबिनेट के फ़ैसले को रद्द कर दिया.
1500 साल पुरानी यूनेस्को की ये विश्व विरासत मूल रूप से मस्जिद बनने से पहले चर्च था और 1930 के दशक में म्यूज़ियम बना दिया गया था. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने पिछले साल चुनाव में इसे मस्जिद बनाने का वादा किया था.
डेढ़ हज़ार साल पुराने चर्च को पहले मस्जिद, फिर म्यूज़ियम बनाया गया, अब फिर मस्जिद बनाने का फ़ैसला किया गया है. तुर्की का हागिया सोफ़िया दुनिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक रहा है. इसे छठी सदी में बाइज़ेंटाइन सम्राट जस्टिनियन के हुक्म से बनाया गया था. यह संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक मामलों की संस्था यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में आता है. जब उस्मानिया सल्तनत ने 1453 में क़ुस्तुनतुनिया (जिसे बाद में इस्तांबुल का नाम दिया गया) शहर पर क़ब्ज़ा किया तो इस चर्च को मस्जिद बना दिया गया था.
इस्तांबूल में बने ग्रीक शैली के इस चर्च को स्थापत्य कला का अनूठा नमूना माना जाता है जिसने दुनिया भर में बड़ी इमारतों के डिज़ाइन पर अपनी छाप छोड़ी है.
पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार और फिर वहां उस्मानिया सल्तनत के ख़ात्मे के बाद मुस्तफ़ा कमाल पाशा का शासन आया. उन्हीं के शासन में 1934 में इस मस्जिद (मूल रूप से हागिया सोफ़िया चर्च) को म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला किया गया.
आधुनिका काल में तुर्की के इस्लामवादी राजनीतिक दल इसे मस्जिद बनाने की माँग लंबे समय से करते रहे हैं जबकि धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ पुराने चर्च को मस्जिद बनाने का विरोध करती रही हैं. इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ भी आई हैं जो धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष आधार पर बँटी हुई हैं.
ग्रीस ने इस फ़ैसले का विरोध किया है और कहा है कि यह चर्च ऑर्थोडॉक्स ईसाइयत को मानने वाले लाखों लाख लोगों की आस्था का केंद्र है. ग्रीस की सांस्कृतिक मामलों की मंत्री ने इसे 'धार्मिक भावनाएँ भड़काकर राजनीतिक लाभ लेने की राजनीति' क़रार दिया है.
यूनेस्को के उप-प्रमुख ने ग्रीक अख़बार को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा है कि इस चर्च के भविष्य का फ़ैसला एक बड़े स्तर पर होना चाहिए जिसमें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की बात भी सुनी जानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के इस प्रतिनिधि का कहना है कि तुर्की को इस बारे में एक पत्र लिखा गया था लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया.
अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा है कि इस इमारत की स्थिति में बदलाव ठीक नहीं होगा क्योंकि 'यह अलग-अलग धार्मिक आस्थाओं के बीच एक पुल का काम करता रहा है.
गुम्बदों वाली ऐतिहासिक इमारत इस्तांबूल में बॉस्फ़ोरस नदी के पश्चिमी किनारे पर है, बॉस्फ़ोरस वह नदी है जो एशिया और यूरोप की सीमा तय करती है, इस नदी के पूर्व की तरफ़ एशिया और पश्चिम की ओर यूरोप है.
सम्राट जस्टिनियन ने सन 532 में एक भव्य चर्च के निर्माण का आदेश दिया था, उन दिनों इस्तांबूल को कॉन्सटेनटिनोपोल या क़ुस्तुनतुनिया के नाम से जाना जाता था, यह बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य की राजधानी थी जिसे पूरब का रोमन साम्राज्य भी कहा जाता था.
इस शानदार इमारत को बनाने के लिए दूर-दूर से निर्माण सामग्री और इंजीनियर लगाए गए थे.
यह तुर्की के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है.
यह चर्च पाँच साल में बनकर 537 में पूरा हुआ, यह ऑर्थोडॉक्स इसाइयत को मानने वालों का अहम केंद्र तो बन ही गया, बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य की ताक़त का भी प्रतीक बन गया, राज्यभिषेक जैसे अहम समारोह इसी चर्च में होते रहे.
हागिया सोफ़िया जिसका मतलब है 'पवित्र विवेक', यह इमारत क़रीब 900 साल तक ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का मुख्यालय रही.
लेकिन इसे लेकर विवाद सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाइयों में ही नहीं है, 13वीं सदी में इसे यूरोपीय ईसाई हमलावरों ने बुरी तरह तबाह करके कुछ समय के लिए कैथोलिक चर्च बना दिया था.
1453 में इस्लाम को मानने वाले ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमद द्वितीय ने क़ुस्तुनतुनिया पर क़ब्ज़ा कर लिया, उसका नाम बदलकर इस्तांबूल कर दिया और इस तरह बाइज़ेन्टाइन साम्राज्य का ख़ात्मा हमेशा के लिए हो गया. सुल्तान मेहमद ने आदेश दिया कि हागिया सोफ़िया की मरम्मत की जाए और उसे एक मस्जिद में तब्दली कर दिया जाए. इसमें पहले जुमे की नमाज़ में सुल्तान ख़ुद शामिल हुए. ऑटोमन साम्राज्य को सल्तनत-ए-उस्मानिया भी कहा जाता है.
इस्लामी वास्तुकारों ने ईसायत की ज़्यादातर निशानियों को तोड़ दिया या फिर उनके ऊपर प्लास्टर की परत चढ़ा दी. पहले यह सिर्फ़ एक गुंबद वाली इमारत थी लेकिन इस्लामी शैली की छह मीनारें भी इसके बाहर खड़ी कर दी गईं.
17वीं सदी में बनी तुर्की की मशहूर नीली मस्जिद सहित दुनिया की कई मशहूर इमारतों के डिज़ाइन की प्रेरणा हागिया सोफ़िया को ही बताया जाता है.
पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, साम्राज्य को विजेताओं ने कई टुकड़ों में बाँट दिया. मौजूदा तुर्की उसी ध्वस्त ऑटोमन साम्राज्य की नींव पर खड़ा है.
आधुनिक तुर्की के निर्माता कहे जाने वाले मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और इसी सिलसिले में हागिया सोफ़िया को मस्जिद से म्यूज़ियम में बदल दिया.
1935 में इसे आम जनता के लिए खोल दिया गया तब से यह दुनिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में एक रहा है.
क़रीब डेढ़ हज़ार साल के इतिहास की वजह से तुर्की ही नहीं, उसके बाहर के लोगों के लिए भी बहुत अहमियत रखता है, ख़ास तौर पर ग्रीस के ईसाइयों और दुनिया भर के मुसलमानो के लिए.
तुर्की में 1934 बने क़ानून के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन होते रहे हैं जिसके तहत हागिया सोफ़िया में नमाज़ पढ़ने या किसी अन्य धार्मिक आयोजन पर पाबंदी है.
राष्ट्रपति एर्दोआन इन इस्लामी भावनाओं का समर्थन करते रहे हैं और हागिया सोफ़िया को म्यूज़ियम बनाने के फ़ैसले को ऐतिहासिक ग़लती बताते रहे हैं, वे लगातार कोशिशें करते रहे हैं कि इसे दोबारा मस्जिद बना दिया जाए.

Wednesday, July 22, 2020

बर्लिन की दीवार पर सिनेमा


दुनिया में इन दिनों हर तरफ दृश्य-अदृश्य दीवारें खड़ी करने के सपने पल रहे हैं. इस सनकी दौर में नफरत इस कदर कहर बरसा रही है कि केवल हिंदुस्तान में ही लोगों को जात-पात-नस्ल के नाम पर नहीं बांटा जा रहा. ट्रंप साहब शिद्दत से चाह रहे हैं कि उनके पड़ोसी देश मैक्सिको की सीमा पर मौजूदा दीवार से भी लंबी-चौड़ी एक दीवार खड़ी कर दी जाए, ताकि वहां से अमेरिका की तरफ होने वाला पलायन रोका जा सके. ब्रिटेन के कई नेतागण और नागरिक चाहते हैं कि उनका देश यूरोपीय संघ से अलग हो जाए और सिमटकर एक ताकतवर मुल्क बनने का सपना देखे.

चीन में इंटरनेट पर अदृश्य दीवारें पहले से तैनात हैं (फायरवॉल) और हर सूचना सरकार से छनकर नागरिकों तक पहुंचती है. नॉर्थ और साउथ कोरिया के बीच एक लंबी अभेद्य दीवार लंबे समय से मौजूद है. हमारे यहां भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के बहाने असम में अदृश्य दीवार खड़ी की जा रही है और फिर 1947 का विभाजन तो है ही, जिसने हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच दृश्य-अदृश्य दोनों तरह की दीवारें खड़ी की हुई हैं.


वजहें कितनी भी अलग क्यों न नजर आती हों, हमारे समय का सच यही है कि दुनिया भर के कई मुल्क अपनी-अपनी सीमाओं पर नए सिरे से दीवारें खड़ी करना चाहते हैं. खुद की नस्ल से प्यार करने और दूसरों से नफरत करने की ग्रैफिटी इन दीवारों पर सजा देना चाहते हैं.

ऐसे सनकी समय में विश्व सिनेमा की उन फिल्मों की महत्ता बहुत ज्यादा बढ़ जाती है, जो लोगों को बांटने के लिए खड़ी की गईं दीवारों से प्रभावित जिंदगियों का दस्तावेज बनी थीं. कुछ अभी भी बन रही हैं, जैसे कि हाल ही में एचबीओ द्वारा ब्रेक्जिट के पीछे की राजनीति पर टेलीविजन के लिए बनाई गई ब्रेक्जिट : द अनसिविल वॉर (2019) नाम की फिल्म. इसमें बेनेडिक्ट कम्बरबैच जैसे असाधारण अभिनेता ने ब्रिटिश राजनीतिक रणनीतिकार डोमिनिक कमिंग्स की मुख्य भूमिका अदा की है. डोमिनिक को उस विवादास्पद ‘वोट लीव’ कैंपेन का कर्ता-धर्ता माना जाता है जिसके द्वारा इंग्लैंड के बाशिंदों को मैन्युपुलेट करके यूरोपीय संघ छोड़ने के लिए उकसाया गया था. यह फिल्म सिलसिलेवार परदे के पीछे का राजनीतिक खेल दिखाती है और जो बात नोम चोम्स्की अपनी किताब ‘मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट’(1988) में अमेरिका के लिए कह चुके हैं वही बात यहां नयी तकनीकों से लैस ब्रिटेन के लिए भी लागू मालूम होती है.


ऐसी एक दीवार बर्लिन वॉल के नाम से भी मशहूर है. साम्यवाद और पूंजीवाद के वैचारिक मतभेदों की वजह से खड़ी हुई इस ऐतिहासिक बर्लिन की दीवार (1961-1989) पर कई असाधारण फिल्में बन चुकी हैं. 2015 में आई टॉम हैंक्स अभिनीत हिस्टॉरिकल ड्रामा फिल्म ‘ब्रिज ऑफ स्पाइज’ ने बर्लिन की दीवार के निर्माण के दौरान (1961) अमेरिका, जर्मनी और सोवियत संघ के बीच के राजनीतिक तनाव का बेहतरीन चित्रण किया था.

2012 में आई जर्मन फिल्म ‘बारबरा’ ने 1980 के दौर के कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन में दमन का शिकार एक युवती की धीमी गति की उम्दा कैरेक्टर स्टडी परदे पर रची थी. 2000 में आई ‘द लेजेंड ऑफ रीटा’, 2001 की ‘द टनल’, और 1987 की अद्भुत ‘विंग्स ऑफ डिजायर’ भी बर्लिन की दीवार के बैकड्रॉप पर बनी खासी मशहूर फिल्में हैं. हॉलीवुड की कई मसाला स्पाई फिल्में विभाजित बर्लिन के बैकड्रॉप की तरफ आकर्षित रही हैं और बॉन्ड व बॉर्न फिल्मों से लेकर हाल के वर्ष की ‘द मैन फ्रॉम अंकल’ (2015) जैसी स्पाई थ्रिलर फिल्में चंद उदाहरण भर हैं.

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फिर, 2006 में रिलीज हुई जर्मन फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ अदर्स’ तो अलग ही स्तर की उत्कृष्टता लिए है. बेहद कुशलता से यह फिल्म दिखा चुकी है कि 80 के दशक के साम्यवादी पूर्वी जर्मनी में किस तरह सरकार विरोधी कलाकारों का दमन होता था और जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (जीडीआर) का जासूसी विभाग ‘स्टाजी’ किस तरह छिप-छिपकर विरोधियों की बातें सुनता था. सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फिल्म का ऑस्कर जीतने वाली इस ब्रिलियंट फिल्म पर हम किसी दिन अलग से लिखेंगे.


उपरोक्त सभी गंभीर व डार्क फिल्में हैं, जिनमें से ज्यादातर कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन को अलोकतांत्रिक खलनायक के तौर पर पेश करती हैं. वेस्ट बर्लिन के लोकतंत्र और पूंजीवाद से छिटकने वाला कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन, सोवियत संघ की मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा पर चलकर 28 सालों तक एक ‘क्लोज्ड सोसाइटी’ के रूप में सांस लेता रहा था. इन जर्मन व अमेरिकी फिल्मों के अनुसार यह एक ऐसी जेल थी जिसमें से पूर्वी बर्लिन के नागरिकों को पश्चिम बर्लिन और पश्चिमी यूरोप तक में जाने की इजाजत नहीं थी. सीमित संसाधनों के साथ जीवन-यापन करना नियम था और पश्चिम बर्लिन की उभार पर रहने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विपरीत साम्यवाद के सिद्धांतों पर चलने वाली इसकी सादी अर्थव्यवस्था में ‘विकास’ अपने तड़क-भड़क वाले मशहूर रूप में मौजूद नहीं था. साथ ही कम्युनिस्ट सरकार की दमनकारी नीतियां भी वजह रहीं कि दुनियाभर में पूर्वी बर्लिन को लेकर नकारात्मकता हमेशा बनी रही.

इन दस्तावेज रूपी बेहतरीन फिल्मों के इतर ‘गुड बाय लेनिन!’ का दृष्टिकोण बेहद अलहदा है. 2003 में बनी यह ट्रैजिकॉमेडी बर्लिन की दीवार पर बनी शायद सबसे चर्चित जर्मन फिल्म भी है जो कि विश्वभर में सफर कर चुकी है और हर पृष्ठभूमि, हर विचारधारा के सिनेप्रेमी द्वारा सराही जा चुकी है.

जर्मन फिल्मकार वुल्फगंग बेकर (Wolfgang Becker) द्वारा निर्देशित ये फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ अदर्स’ और ‘बारबरा’ जैसी जर्मन फिल्मों की तरह साम्यवादी पूर्वी बर्लिन को दमनकारी स्टेट की तरह चित्रित नहीं करती. बल्कि दो विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं के बीच फंसे बर्लिन के नागरिकों का कॉमेडी की टेक लेकर चित्रण करती है और ऐसे करती है कि ट्रैजेडी उभरकर सामने आती है.

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यह उन दुर्लभ फिल्मों में से भी एक है जो कि पूर्वी बर्लिन के उन नागरिकों का नजरिया सामने रखती है जो कि अपनी साम्यवादी सरकार और विचारधारा के समर्थक थे. इस फिल्म को समझने तथा एप्रीशिएट करने के लिए आपको बर्लिन की दीवार से जुड़ा इतिहास तफ्सील से मालूम होना चाहिए क्योंकि निर्देशक ने इसे जर्मन दर्शकों को ध्यान में रखकर ही बनाया है. विश्वभर में उनकी फिल्म को प्रसिद्धि मिल सकती है, शायद इसका गुमान उन्हें पहले से नहीं था.

इस यूनिवर्सल प्रसिद्धि की वजह ‘गुड बाय लेनिन!’ की बेहद दिलचस्प कहानी है. साम्यवादी सरकार के तौर-तरीकों में कुछ खास विश्वास नहीं रखने वाला पूर्वी बर्लिन का युवा नायक एलेक्स 1989 में एक सरकार विरोधी आंदोलन में शिरकत करता है. यह वही शांतिप्रिय और ऐतिहासिक मार्च है जिसके बाद आग की तरह भड़की चेतना आम नागरिकों को साथ लायी थी और आखिर में बर्लिन की दीवार को गिरना पड़ा था.
लेकिन इस ऐतिहासिक घटना से पहले इस आंदोलन में नायक को शिरकत करते देख उसकी मां को हार्ट अटैक आ जाता है और वह आठ महीने के लिए कोमा में चली जाती है. नायक की मां पक्की सोशलिस्ट है और अपने देश पूर्वी बर्लिन की साम्यवादी विचारधारा में बेहद यकीन रखती है. इतना, कि पश्चिम बर्लिन की पूंजीवादी सरकार और वहां के जिंदगी जीने के तौर-तरीकों से नफरत करती है.

नायक की मां को जब होश आता है तब बर्लिन की दीवार गिर चुकी होती है और उसका प्यारा कम्युनिस्ट बर्लिन खत्म हो चुका होता है (1990). लेकिन डॉक्टर कह देते हैं कि मां को किसी तरह का सदमा नहीं लगना चाहिए नहीं तो अगला हृदयाघात प्राणघातक होगा. इसके बाद नायक अपनी मां के लिए गुजर चुके वक्त को ‘रीक्रिएट’ करता है और साम्यवादी पूर्वी बर्लिन को कॉमेडी की टेक लेकर वापस जिंदा किया जाता है. फिल्म दिखाती है कि किस तरह दीवार के गिरने के बाद पूंजीवाद के हुए आगमन के चलते पहले की उनकी जिंदगी पूरी तरह बदलने लगती है, और पश्चिमी प्रॉडक्ट्स के बाजार में फैल जाने से लेकर रहने के तौर-तरीकों तक में तेजी से अमेरिका प्रवेश कर जाता है!

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फिल्म की यह थीम खासकर दुनियाभर के वामपंथी रुझान रखने वाले दर्शकों को बेहद रास आती रही है. पश्चिम की जिन बाजारू चीजों का विरोध वामपंथी विचारधारा करती आई है – कोका-कोला से लेकर बर्गर किंग, डिश टीवी और पश्चिमी मिजाज के फर्नीचर तक – और लेनिनवाद से जुड़ी जिन चीजों को खूब रोमेंटिसाइज किया करती है, उसका सिलसिलेवार चित्रण इस फिल्म ने बखूबी किया था.


‘गुड बाय लेनिन!’ की खासियत इसके वे जतन हैं जो कि अपने दोस्त की मदद लेकर इसका नायक पूर्वी बर्लिन को दोबारा जिंदा करने के लिए करता है. इससे हास्य पैदा होता है लेकिन यह पुरानी यूरोपियन फिल्मों के उस मिजाज का हास्य है जो ऑन योर फेस न होकर ड्रामा फिल्मों की शक्ल में धीरे-धीरे आगे बढ़ता है. मां जब बर्लिन की दीवार गिरने से जुड़ा कोई सच गलती से जान भी लेती है तब भी नायक अपने दोस्त की मदद लेकर फेक न्यूज तैयार करता है जिसमें सच्ची घटना को ऐसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है जैसे कि वह पूर्वी बर्लिन और साम्यवाद का गुणगान करती हुई प्रतीक हो (‘अच्छा, कोका-कोला एक सोशलिस्ट ड्रिंक है!’). ऐसा करना छोटी-मोटी घटनाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मां की खुशी के लिए नायक कई ऐतिहासिक घटनाओं को पूर्वी बर्लिन के पक्ष में सर के बल पलट देता है. इसलिए, इतिहास में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए हास्य-व्यंग्य की काफी खुराक फिल्म में मौजूद मिलती है!

‘गुड बाय लेनिन!’ को ‘ऑस्टेल्जिया’ (Ostalgie) के बोल्ड चित्रण के लिए भी याद किया जाता है. यह वो नॉस्टेल्जिया होता है जिसमें एकीकृत जर्मनी में रहने वाले कई नागरिक कम्युनिस्ट ईस्ट बर्लिन में बिताए पुराने वक्त को खुशनुमा दौर की तरह याद करते हैं. जर्मन साहित्य से लेकर फिल्मों तक में इस ऑस्टेल्जिया को देखा-पढ़ा जा सकता है और ऐसा होने की मुख्य वजह पूंजीवादी मानसिकता के चलते दीवार गिरने के बाद एकीकृत जर्मनी में पनपी असमानता, बेरोजगारी और महंगाई को माना जाता है.

निर्देशक व सह-लेखक वुल्फगंग बेकर ने ऑस्टेल्जिया के इस जटिल व्यवहार की एक अलग व्याख्या करने की कोशिश अपनी फिल्म में की है. उन्होंने पूर्वी बर्लिन के साम्यवादी होने के फैसले को ट्रैजेडी और कॉमेडी की टेक लेकर सही तो बताया है, लेकिन अपने नायक के सहारे ही यह खासतौर पर रेखांकित किया है कि जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य (जीडीआर) पूर्वी बर्लिन में सही साम्यवाद कभी लागू नहीं कर पाया था. दोनों विचारधाराएं साथ पनप सकती थीं, ईस्ट और वेस्ट बर्लिन मिल-जुलकर साथ रह सकते थे, लेकिन आत्ममुग्ध लीडरों की दमनकारी नीतियों ने दीवार खड़ी कर शहर बांट दिया. देश बांट दिया. यूरोप को बांट दिया.

आज खड़ी हो रही दीवारें भी यही करेंगीं. राजनीतिक विचारधाराएं और परिस्थितियां कितनी भी अलग क्यों न हों आखिर में इन दीवारों के बनने से लोग ही बंटेंगे, छंटेंगे और मरेंगे. आने वाले भविष्य में ‘गुड बाय लेनिन!’ जैसी कई और ट्रैजिकॉमेडी फिल्में बनेंगीं और विश्व-सिनेमा की धरोहर कहलाई जाने के लिए विवश होती रहेंगीं.

भारत और ईरान के बीच आया चीन

ईरान से आई यह खबर भी निश्चित तौर पर अच्छी नहीं कि उसने भारत को चाबहार-ज़ाहिदान रेल मार्ग निर्माण समझौते से बाहर कर दिया है. चार साल पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 और 23 मई 2016 को दो दिवसीय ईरान यात्रा पर गए जहां उन्होंने ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई, राष्ट्रपति हसन रूहानी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मुलाक़ात की. इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच 12 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें से सबसे महत्वपूर्ण समझौता आईपीजीपीएल [इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड] और ईरान के आर्या बनादर निगम के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास और संचालन का था.

इसी अनुबंध से जुड़ा एक अन्य समझौता भारतीय सरकारी उपक्रम इंडियन रेलवेज कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (इरकॉन) और ईरान के सड़क एवं रेल मार्ग विकास निगम (सीडीटीआईसी) के बीच हुआ. इस समझौते के तहत चाबहार से 628 किलोमीटर उत्तर में स्थित ज़ाहिदान तक और फिर वहां से होते हुए करीब 1000 किलोमीटर उत्तर-पूर्व ईरान-तुर्कमेनिस्तान के बार्डर पर स्थित सरख्स तक रेल मार्ग का निर्माण किया जाना था.

भारत के लिए इस रेलमार्ग के सामरिक महत्व का अंदाज़ा सिर्फ इस बात से ही लगाया जा सकता है कि सामान से लदे एक ट्रक को बेंगलुरु से दिल्ली पहुंचने में तीन से चार दिन लगते हैं जबकि गुजरात के पोर्ट से भेजा सामान नौ घंटे में चाबहार और वहां से तकरीबन 11 घंटों में काबुल पहुंच सकता था. इस लिहाज से यह समझौता तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और इस क्षेत्र के अन्य देशों में भारत के लिए व्यापार के सुनहरा द्वार खोलने जैसा था.

बीती सात जुलाई को ईरानी परिवहन और शहरी विकास मंत्री मोहम्मद इस्लामी ने इस रेलमार्ग पर ट्रैक बिछाने की प्रक्रिया का उद्घाटन किया. द हिंदू अख़बार ने ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि यह परियोजना मार्च 2022 तक पूरी हो जाएगी, और यह रेल मार्ग भारत की सहायता के बिना ही आगे बढ़ेगा. ईरान ने इसके पीछे की वजह परियोजना के लिए भारत से मिलने वाले फंड में हो रही देरी को बताया है.

यह सच है कि चार साल की इस अवधि में ईरान ने भारत से अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए लगातार आग्रह किया लेकिन भारत ने उसके आग्रह पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये. भारत ने अपने वित्तीय वादों को पूरा न करके ईरान को इस समझौते को तोड़ने का एक बड़ा कारण तो दिया लेकिन ईरान के इस कदम के पीछे उसकी चीन के साथ बढ़ती निकटता और दोनों के बीच हुआ 25 साला संयुक्त आर्थिक और सुरक्षा समझौता भी है.

जून 2016 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ईरान यात्रा की थी. इस दौरान उन्होंने ईरान के समक्ष एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत तेल, गैस एवं रक्षा क्षेत्र में निवेश का मसौदा रखा. इस निवेश की राशि इतनी आकर्षक थी कि ईरान के लिए चीन की पेशकश को ठुकरा पाना मुश्किल था. दोनों देशों ने इस मसौदे की शर्तों पर तेज़ी से काम करना शुरू कर दिया. अगस्त 2019 के अंत में ईरानी विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने अपनी चीन यात्रा के दौरान वहां के विदेश मंत्री वांग ली के साथ इस व्यापक साझेदारी का रोडमैप पेश किया.

इस समझौते के प्रारूप को दोनों देशों ने दुनिया से कभी भी छुपाकर नहीं रखा. पेट्रोलियम इकोनॉमिस्ट नामक ब्रिटिश थिंक-टैंक ने इस समझौते की जानकारी 2016 में प्रकाशित की तथा 11 जुलाई 2020 को अमरीकी समाचार पत्र न्यूयोर्क टाइम्स ने ईरान-चीन समझौते से सम्बंधित विस्तृत जानकारी छापी.

इस प्रस्तावित समझौते के तहत चीन ईरान में करीब 400 बिलियन डॉलर (करीब 32 लाख करोड़ रूपये) का निवेश करेगा जिसमे से 280 बिलियन डॉलर का निवेश ईरान के तेल और गैस क्षेत्र में किया जायेगा. इसके अलावा 120 बिलियन डॉलर सड़क, रेल-मार्ग, बंदरगाह तथा रक्षा सम्बन्धी क्षेत्रों में किया जायेगा.

इसके अलावा चीन ईरान में एयरपोर्ट, बुलेट ट्रेन जैसी हाई-स्पीड रेलवे और 5-जी दूरसंचार नेटवर्क के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण करेगा. चीन ईरान में अपने इस भारी भरकम निवेश को सुरक्षित रखने के लिए अपने 5,000 सैनिकों को भी तैनात करेगा.
पहले डोकलाम में तनातनी और फिर लद्दाख सीमा पर आक्रामक सैन्य गतिविधियों के चलते यह तो स्थापित हो गया है कि चीन भारत का मित्र राष्ट्र नहीं है. दक्षिण एशिया में भारत का कद चीन को जरा भी नहीं भाता. इसलिए वह पश्चिम और उत्तर में पाकिस्तान द्वारा, पूरब में नेपाल और दक्षिण में श्रीलंका के जरिये भारत की घेराबंदी को अंजाम देना चाहता है. ईरान के साथ होने वाले समझौते के जरिये चीन अब भारत के प्रभुत्व और आर्थिक गतिविधियों को और भी हानि पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा.


चीन-ईरान के प्रस्तावित समझौते के एक अनुच्छेद के मुताबिक चीन को ईरान की हर रुकी या अधूरी पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने का प्रथम अधिकार होगा. यदि चीन इस विकल्प को चुनता है तो चाबहार बंदरगाह का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले सकता है. इस बंदरगाह के नियंत्रण को यदि भारत चीन के हाथों खो देता है तो भारत की ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह बहुत ही अशुभ संकेत होगा. ऐसा होने पर भारत को पश्चिम एशिया से कच्चा तेल उन समुद्री मार्गों से लाना होगा जिनका नियंत्रण चीन के पास होगा.

चाबहार-ज़ाहिदान रेल-मार्ग निर्माण से भारत को हटाया जाना एक झटके में अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों को भारत की पहुंच से वंचित कर देना है. और यदि चीन चाबहार बंदरगाह को भी अपने नियंत्रण में लेता है तो इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है.

पश्चिम एशिया में ईरान, सऊदी अरब और इजराइल ही वे तीन देश हैं जिनका प्रभाव न सिर्फ इस क्षेत्र पर असर डालता है बल्कि इन तीनों के बीच के नाज़ुक संतुलन में रत्ती भर अंतर आने से समूचा विश्व अछूता नहीं रहता.

ईरान में इतने बड़े पैमाने पर चीनी निवेश के कारण सऊदी अरब और इजराइल की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक है. ऊर्जा के क्षेत्र में 280 बिलियन डॉलर का चीनी निवेश निश्चित ही ईरान को तेल उत्पादन में सऊदी अरब से आगे ले जाने की क्षमता रखता है. साथ ही चीन और ईरान का सैन्य सहयोग क्षेत्र के संतुलन को ईरान के पक्ष में कर सकता है. पश्चिम एशिया में ईरान के बढ़ते वर्चस्व से इजराइल की चिंता और भी बढ़ सकती है. आर्थिक रूप से संपन्न और सैन्य शक्ति से लैस ईरान इस क्षेत्र में सऊदी अरब एवं इजराइल के प्रभुत्व को निश्चित तौर पर कमज़ोर कर सकता है.

1979 के शुरुआत में हुई शिया इस्लामी क्रांति ने ईरान को यूरोप और अमेरिका से दूर कर दिया और तब से ही यह नया ईरान और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका एक दूसरे के दुश्मन बन गए. 2015 में इन दोनों देशों की दुश्मनी थोड़ी थम गई जब अमेरिका समेत सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के पांचों देश और जर्मनी ने ईरान के साथ परमाणु समझौता किया. इसे जॉइंट कॉम्प्रेहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) के नाम से जाना जाता है. लेकिन 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एकतरफा तौर पर अमेरिका को इस समझौते से अलग कर दिया और ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए. इन प्रतिबंधों ने ईरान के अर्थतंत्र को तब बुरी तरह से प्रभावित किया जब ईरानी बैंकों को स्विफ्ट नाम के बैंकिंग प्रोटोकॉल से अलग कर दिया जिसके कारण दूसरे देशों से ईरान का व्यापार लगभग ठप्प हो गया.

अब ईरान-चीन के प्रस्तावित समझौते के तहत दोनों देश एक-दूसरे के देशों में अपने बैंकों की शाखाएं खोलेंगे. इस समझौते में इस तरह के अनुबंधों को शामिल किया गया है जो अमेरिकी मुद्रा के वर्चस्व के लिए खतरा बन सकता है. क्योंकि चीन और ईरान स्विफ्ट को दरकिनार करते हुए एक नए बैंकिंग प्रोटोकॉल के तहत पैसे का लेनदेन करेंगे जिसमे डॉलर नदारद होगा. यानी कि पश्चिम एशिया में चीन का आगमन अमेरिका के लिए नयी चुनौतियां लेकर आएगा. ईरान वह देश है जहां सरकार और नागरिक चरित्र एक-दूसरे के विपरीत रहा करते हैं. चाहे वह तब का ईरान हो जब वहां राजशाही थी या अब जब देश की शासन प्रणाली इस्लामी हो चली है.

ऐसे में इस समझौते को लेकर जहां ईरानी सत्ता खुश है कि देश की ध्वस्त होती अर्थव्यवस्था दोबारा परवान चढ़ेगी, वहीं ईरानी जनता इस समझौते में चीनी गुलामी की आहट सुनती है.

ईरानी सरकार और जनता दोनों ही अपनी-अपनी जगह सही हैं. नज़दीक भविष्य में यह समझौता भले ही ईरान के लिए हितकारी हो लेकिन मित्रता के मुखौटे में छिपी चीनी सहायता उस शहद की तरह है जो मीठा तो है लेकिन कालांतर में वही मिठास हलाहल में तब्दील हो जाती है. क्या ईरानी शासक वर्ग चीनी निवेश से अफ़्रीकी देशों में उपजे संकट को नज़रअंदाज़ कर रहा है और सिर्फ नज़दीकी भविष्य की रौशनी को ही सूरज का अमर उजाला समझ बैठा है.
इस समझौते में किसका कितना नुकसान होता है यह तो आने वाला भविष्य बताएगा लेकिन निश्चित तौर पर चीन अपने धनबल से बदलते विश्व में अपना वर्चस्व बनाने की और अग्रसर है.
समझौते के तहत निवेश के एवज में चीन को ईरानी तेल 30 फीसदी रियायती दरों पर मिलेगा जिसका भुगतान वह दो साल की अवधि के बाद करेगा जो विश्व में अब तक अनदेखा और अनसुना तेल समझौता है. और इस पैसे का भुगतान वह डॉलर में नहीं बल्कि अपनी मुद्रा युआन में करेगा जिसका उसके पास अथाह भण्डार है. यानी हर दृष्टि से लाभ ही लाभ.

चीन जिस अंदाज़ में मदद के नाम पर दूसरे देशों को अपना आर्थिक गुलाम बना रहा है उसका नज़दीकी उदाहरण हमारा पडोसी देश पाकिस्तान है. पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रान्त बलूचिस्तान में चीनी प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वहां ज़मीन की खरीद-फरोख्त बिना चीनी इजाज़त के नहीं हो सकती. अप्रैल 2020 में तंजानियाई राष्ट्रपति जॉन मागुफुली ने चीन के 10 बिलियन डॉलर के ऋण को ठुकराते हुए कहा था कि चीनी ऋण की शर्तें अफ्रीका में नव उपनिवेशवाद को जन्म देती हैं. उन्होंने कहा कि “कोई नशे में मदमस्त शराबी ही मदद के एवज में चीनी शर्तों को स्वीकारेगा.”

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...