Saturday, October 31, 2020

बिहार चुनाव में चिराग फैक्टर

बिहार चुनाव के पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुआ है, उन जगहों से मिल रहे फ़ीडबैक के मुताबिक़ चिराग की पार्टी भले ही बहुत बड़ा करिश्मा नहीं करने जा रही हो लेकिन उनके उम्मीदवारों ने जनता दल यूनाइटेड खेमे की नींद उड़ा दी है. इन उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर ही चिराग पासवान दावा कर रहे हैं कि नीतीश कुमार किसी भी हाल में 10 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे, हालांकि वे यह दावा भी करते हैं कि बीजेपी-एलजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने की स्थिति में होगी. पहले चरण में जिन 71 सीटों पर चुनाव हुए हैं, उनमें से 42 सीटों पर चिराग पासवान ने अपने उम्मीदवार उतारे थे. इनमें से 18-20 सीटों पर उनके उम्मीदवार जितने वोट जुटाने का दावा कर रहे हैं, उससे जनता दल यूनाइडेट के उम्मीदवारों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. चिराग को उम्मीद है कि आने वाले दो चरणों में भी उनके उम्मीदवार यही करने जा रहे हैं.  एनडीए के समर्थकों और ख़ासकर जनता दल यूनाइटेड के समर्थकों का कहना है कि चिराग पासवान के चलते कुछ जगहों पर समीकरण प्रभावित हो रहा है. जनता दल यूनाइटेड के प्रवक्ता प्रगति मेहता कहते हैं कि चिराग पासवान के दावों की हक़ीक़त 10 नवंबर को सामने आ जाएगी, क्योंकि बिहार में नीतीश कुमार से बड़ा चेहरा कोई नहीं है और लोगों का भरोसा उन पर बना हुआ है. 
वहीं, दूसरी ओर चिराग पासवान की सारी रणनीति नीतीश कुमार की सीटों को कम से कम करने पर फोकस दिखती है. उनकी बातों से ज़ाहिर होता है कि वे इस चुनाव को रणनीतिक स्तर पर कम और भावनात्मक स्तर पर ज़्यादा लड़ रहे हैं और उनकी इस लड़ाई के चलते ही तीन महीने पहले तक सुनिश्चित दिख रही बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की जीत अब आसान नहीं लग रही है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि वो वजहें क्या रहीं जिसके चलते चिराग़ पासवान उस स्तर तक पहुँच गए जहां से वे नीतीश कुमार के लिए ख़तरे की घंटी बन गए हैं. इसकी भूमिका कोई एक-दो महीने में नहीं बनी है. चिराग के पिता रामविलास पासवान की राजनीति का शत-प्रतिशत हिस्सा केंद्र में गुजरा था और वे बिहार पर उस तरह से फ़ोकस नहीं कर पाए थे जिसकी महत्वाकांक्षा हर नेता को होती है. पार्टी की कमान थमाने के साथ-साथ उन्होंने यह दायित्व भी चिराग को सौंपा था. बिहार की राजनीति को गंभीरता से लेते हुए नवंबर, 2019 में लोक जनशक्ति पार्टी ने एक सर्वे कराया. सर्वे का सैंपल साइज़ महज़ 10 हज़ार था लेकिन उससे चिराग और उनकी टीम को एक आइडिया लगा कि बिहार की जनता क्या चाहती है. उस सर्वे में शामिल क़रीब 70 प्रतिशत लोगों ने नीतीश कुमार को लेकर नाराज़गी ज़ाहिर की थी. इस सर्वे के आकलन के बाद चिराग ने यह भांप लिया कि बिहार की राजनीति में स्पेस है जिसको भरने की कोशिश होनी चाहिए और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष स्तर के लोगों तक यह फ़ीडबैक पहुँचाया कि बिहार में नीतीश कुमार को लेकर भारी नाराज़गी है. NDA में रहते हुए चिराग पासवान की टीम ने यह रणनीति बनाई कि नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ आक्रोश को काउंटर करने के लिए उनके ख़िलाफ़ सवाल पूछे जाने चाहिए. फ़रवरी आते-आते उन्होंने बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट का कॉन्सेप्ट तैयार कर लिया. जिसमें बिहार के आम लोगों की ज़रूरतों को देखते हुए कई पहलूओं को शामिल किया गया. चिराग़ इस डॉक्यूमेंट को लेकर कितने गंभीर थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसकी प्रति को समाज के विभिन्न तबके के हज़ारों लोगों को पढ़वाया और उनकी राय को जोड़ते हुए इसे सार्वजनिक किया गया. चिराग़ ने इसके बाद नीतीश कुमार के सात निश्चय और दूसरे मुद्दों पर सवाल पूछना शुरू किया. उन्हें लगा कि नीतीश कुमार की तरफ़ से उनके सवालों के जवाब आएँगे लेकिन यह नहीं हुआ. इन सब मुद्दों पर बात करने के लिए चिराग पासवान ने नीतीश कुमार से फ़रवरी, 2020 में वक़्त माँगा. तीन दिन तक वे पटना में इंतज़ार करते रहे लेकिन नीतीश कुमार के दफ़्तर से उन्हें मिलने का वक़्त नहीं मिला. अभी बिहार चुनाव के दौरान चिराग की रणनीति के पीछे प्रशांत किशोर का दिमाग़ होने की बता कहने वाले लोगों की भी कमी नहीं है. लेकिन, यह जानना दिलचस्प है कि फ़रवरी, 2020 में नीतीश कुमार से समय नहीं मिलने के बाद चिराग पासवान की टीम आगे की रणनीति के लिए प्रशांत किशोर से भी मिली थी. चिराग पासवान की टीम के एक सदस्य के मुताबिक़, उस बैठक में प्रशांत किशोर ने हमारे आइडिया में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई थी. अगर वे साथ आ जाते तो हमारी स्थिति और भी बेहतर होती क्योंकि उनके पास एक पूरी टीम है जो इस काम को आसानी से मैनेज कर सकती थी. 
यहाँ यह भी देखना होगा कि प्रशांत किशोर ने बिहार की बात का एलान मार्च, 2020 में किया था, जिससे एक महीना पहले चिराग बिहार फ़र्स्ट, बिहारी फ़र्स्ट का विजन जारी कर चुके थे. इस बीच में लॉकडाउन के चलते बिहार में नीतीश कुमार के तौर-तरीक़ों की खासी आलोचना हुई और उनके प्रति नाराज़गी बढ़ी. एक और बात ये हुई कि तत्कालीन खाद्य आपूर्ति मंत्री के तौर पर रामविलास पासवान और बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के बीच तल्खियाँ बढ़ गईं. लॉकडाउन के दौरान आम लोगों को मुफ़्त में अनाज वितरित करने के मुद्दे पर दोनों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी. लेकिन अगस्त, 2020 तक चिराग अलग रास्ता ले लेंगे यह तय नहीं हो पाया था. इसी दौरान किसी इंटरव्यू में उनसे पूछ लिया गया कि बिहार का अग़ला मुख्यमंत्री कौन होगा, तो उन्होंने कहा कि बीजेपी जिसे बनाएगी, वे उनके साथ हैं. इन बयानों से भी यह झलकने लगा था कि चिराग़ पासवान अपनी राह अलग लेने वाले हैं, वैसे भी उनकी पार्टी ने बिहार में कभी जनता दल यूनाइडेट के साथ चुनाव नहीं लड़ा था. इसके अलावा चिराग की अपनी पार्टी का विस्तार करने की महत्वाकांक्षा ने भी जन्म ले लिया और उन्हें लगा कि उनके पास खोने को कुछ भी नहीं है. आख़िर बिहार की 2015 की विधानसभा चुनाव में उनके महज़ दो विधायक ही चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे. इस दौरान बिहार में एनडीए की रूपरेखा की एक मीटिंग में बिहार बीजेपी के एक प्रभावी नेता ने ये कहा कि चिराग पासवान की पार्टी के गठबंधन में शामिल होने से 20 सीटें ज़्यादा आएंगी लेकिन उनके बिना भी 160 से ज़्यादा सीटें आ जाएंगी. चिराग को यहां भी लगा कि गठबंधन के साथ रहने पर उनकी उतनी अहमियत नहीं रहेगी जितनी अकेले जाने से हो सकती है. सीटों के बँटवारे की चर्चाओं के बीच तीन अक्टूबर को चिराग पासवान ने बिहार में अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर दिया. बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की तरफ़ से कभी उन्हें यह नहीं कहा गया कि वे चुनाव में अकेले ना लड़ें. वे लगातार बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बने रहने की बात करते रहे.

बिहार के पहले चरण के चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तारीख़ 12 अक्टूबर थी, आठ अक्टूबर को राम विलास पासवान का निधन हो गया, नौ को उनका अंतिम संस्कार करने के बाद चिराग ने आख़िरी 48 घटों में उम्मीदवारों के नाम फाइनल किए. वो दुख के इन पलों में रणनीतिक तौर पर नहीं डगमगाए. इसमें दिनारा से राजेंद्र सिंह पालीगंज से बीजेपी की पूर्व विधायक रहीं उषा विद्यार्थी और सासाराम से रामेश्वर चौरसिया जैसे बीजेपी के बड़े नेताओं को टिकट दिया गया, जिससे यह संदेश भी लोगों तक गया है कि एलजेपी बीजेपी के साथ मिलकर जनता दल यूनाइटेड को साइडलाइन करने जा रही है.

ऐसी ही एक सीट शेखपुरा की बरबीघा भी है, जहां से महागठबंधन के उम्मीदवार कांग्रेस नेता गजानंद शाही हैं और उनकी स्थिति इस वजह से मज़बूत हो गई है क्योंकि चिराग़ पासवान ने पिछली विधानसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार डॉ. मधुकर को टिकट दे दिया. जिसके चलते जेडीयू उम्मीदवार सुदर्शन कुमार की मुश्किलें बढ़ गई हैं.

लेकिन, चिराग की मौजूदा रणनीति इसलिए ज़्यादा मुफ़ीद दिख रही है क्योंकि अगर वे कम से कम 15-20 सीट ले आते हैं तो उनके बिना कोई सरकार नहीं बन पाएगी. लेकिन, चिराग इन दिनों इस बात पर ज़्यादा तरजीह दे रहे हैं कि उनका कौन-सा उम्मीदवार नीतीश कुमार के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है. इस लड़ाई में उनका एक फ़ायदा तो यह हुआ है कि बिहार फ़र्स्ट की बात कह कर वे बिहार के युवाओं के बीच जगह बनाने में कामयाब हुए हैं, यही वजह है कि उनकी सभाओं में ठीक-ठाक भीड़ आ रही है. इतना ही नहीं उन्होंने एक झटके में 143 विधानसभा सीटों पर पार्टी का ढाँचा, संगठन और उम्मीदवार खड़े कर लिये हैं. अब उनकी नज़र विधानसभा सीटों से ज़्यादा वोट प्रतिशत बढ़ाने की है, इसमें वो कामयाब होते दिख रहे हैं. दरअसल, चिराग जिस रणनीति के ज़रिए मैदान में उतरे हैं, उससे उनका अपना और बीजेपी का फ़ायदा तो दिख रहा है लेकिन, जेडीयू का नुक़सान तय है. यही वजह है कि जब तीन अक्टूबर को उन्होंने अलग चुनाव लड़ने की घोषणा की तो नीतीश कैंप की ओर से उन्हें एक दिन में दर्जनों बार फ़ोन किए गए. लेकिन, तेजस्वी यादव की सभा में उमड़ती भीड़ ने बीजेपी को आशंकित किया है कि कहीं चिराग के चलते गठबंधन का इतना नुक़सान ना हो जाए जिससे सरकार के गठन में ही मुश्किलें आ जाएं. ऐसी सूरत में भी चिराग पासवान अपनी अहमियत साबित कर देंगे कि उनके पास एक ट्रांसफर होने लायक वोटबैंक है.

Tuesday, October 6, 2020

आर्मेनिया अजरबैजान युद्ध


इस विवाद के केंद्र में नागोर्नो-काराबाख का पहाड़ी इलाक़ा है जिसे अज़रबैजान अपना कहता है, हालांकि 1994 में ख़त्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाक़े पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है. 1980 के दशक से अंत से 1990 के दशक तक चले युद्ध के दौरान 30 हज़ार से अधिक लोगों को मार डाल गया और 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए थे. उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया, हालांकि 1994 में युद्धविराम के बाद भी यहां गतिरोध जारी है. कल रात नागोर्नो-काराबाख के अधिकारियों ने कहा कि लड़ाई में उनकी सेना के 26 और लोग मारे गए हैं जिसके बाद मरने वालों की कुल संख्या 80 तक पहुंच गई है.

इस विवाद को लेकर अब चिंता जताई जा रही है कि इसमें तुर्की, रूस और ईरान भी कूद सकते हैं. इस इलाक़े से गैस और कच्चे तेल की पाइपलाइनें गुज़रती है इस कारण इस इलाक़े के स्थायित्व को लेकर जानकार चिंता जता रहे हैं. एक दूसरे पर तनाव बढ़ाने का आरोप लगाने के बाद रविवार को आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया. इसके बाद दोनों पक्षों ने कहा कि उन्होंने सीमा पर सैनिकों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया है और कई इलाक़ों में मार्शल लॉ लगा दिया है. इससे पहले यहां साल 2016 में भी भीषण लड़ाई हुई थी जिसमें 200 लोगों की मौत हुई थी. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों के अनुसार रविवार को यहां 16 लोगों की मौत हुई थी जबकि सौ से अधिक लोग घायल हुए थे.

वहीं समाचार एजेंसी इंटरफैक्स ने अर्मीनियाई अधिकारियों को ये कहते बताया है कि वहाँ अब तक दो सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं. और अज़रबैजान में अधिकारियों का कहना है कि रविवार को कुछ लोगों की मौत हुई है जबकि तीस से अधिक घायल हुए हैं. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों ने दावा किया है कि रविवार को जिन इलाक़ों पर अज़रबैजान के सैनिकों ने कब्ज़ा किया था उन्हें फिर छुड़ा लिया गया है.  वहीं अज़रबैजान सरकार ने सोमवार को कहा है कि विवादित इलाक़े में रणनीतिक तौर पर अहम कुछ जगहों को उनकी सेना ने कब्ज़े में ले लिया है. जुलाई में सीमा पर हुई हिंसा में 16 लोगों की मौत के बाद अज़रबैजान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस इलाक़े को देश अपने कब्ज़े में ले.

पूर्व सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके आर्मीनिया और अज़रबैजान नागोर्नो-काराबाख के इलाक़े को लेकर 1980 के दशक में और 1990 के दशक के शुरूआती दौर में संघर्ष कर चुके हैं. दोनों ने युद्धविराम की घोषणा भी की लेकिन सही मायनों में शांति समझौते पर दोनों कभी सहमत नहीं हो पाए. दक्षिणपूर्वी यूरोप में पड़ने वाली कॉकेशस के इलाक़े की पहाड़ियां रणनीतिक तौर पर बेहद अहम मानी जाती हैं. सदियों से इलाक़े की मुसलमान और ईसाई ताकतें इन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती रही हैं. 1920 के दशक में जब सोवियत संघ बना तो अभी के ये दोनों देश - आर्मीनिया और अज़रबैज़ान - उसका हिस्सा बन गए. ये सोवियत गणतंत्र कहलाते थे.

नागोर्नो-काराबाख की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है लेकिन सोवियत अधिकारियों ने उसे अज़रबैजान के हाथों सौंप दिया. इसके बाद दशकों तक नागोर्नो-काराबाख के लोगों ने कई बार ये इलाक़ा आर्मीनिया को सौंपने की अपील की. लेकिन असल विवाद 1980 के दशक में शुरू हुआ जब सोवियत संघ का विघटन शुरू हुआ और नागोर्नो-काराबाख की संसद ने आधिकारिक तौर पर खुद को आर्मीनिया का हिस्सा बनाने के लिए वोट किया.

इसके बाद यहां शुरू हुए अलगाववादी आंदोलन को अज़रबैजान ने ख़त्म करने की कोशिश की. हालांकि, इस आंदोलन को लगातार आर्मीनिया का समर्थन मिलता रहा. नतीजा ये हुआ कि यहां जातीय संघर्ष होने लगे और सोवियत संघ से पूरी तरह आज़ाद होने के बाद एक तरह का युद्ध शुरू हो गया.

यहां हुए संघर्ष के कारण लाखों लोगों को अपना घर छोड़ कर पलायन करना पड़ा. दोनों पक्षों की तरफ़ से जातीय नरसंहार की ख़बरें भी आईं. साल 1994 में रूस की मध्यस्थता में युद्धविराम की घोषणा से पहले नागोर्नो-काराबाख पर आर्मीनियाई सेना का क़ब्ज़ा हो गया. इस डील के बाद नागोर्नो-काराबाख अज़रबैजान का हिस्सा तो रहा लेकिन इस इलाक़े पर अलगाववादियों की हूकूमत रही जिन्होंने इसे गणतंत्र घोषित कर दिया. यहां आर्मीनिया के समर्थन वाली सरकार चलने लगी जिसमें आर्मीनियाई जातीय समूह से जुड़े लोग थे.

इस डील के तहत नागोर्नो-काराबाख लाइन ऑफ़ कॉन्टैक्ट भी बना, जो आर्मीनिया और अज़रबैजान के सैनिकों को अलग करता है. इस इलाक़े में शांति बनाए रखते के लिए 1929 में फ्रांस, रूस और अमरीका की अध्यक्षता में बनी ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप मिंस्क ग्रुप की मध्यस्थता में शांति वार्ता जारी है लेकिन अब तक किसी समझौते तक पहुंचा नहीं जा सका है. भौगोलिक और रणनीतिक तौर पर अहम होने के कारण भी ये विवाद जटिल हो गया है. अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नैटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कह दिया. आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी. ताज़ा विवाद गहराया तो तुर्की एक बार फिर अपने मित्र के समर्थन में आ गया. वहीं आर्मीनिया के रूस के साथ गहरे संबंध हैं. यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं.

हालांकि, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अज़रबैजान के साथ भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं और उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम की अपील की है. साल 2018 में आर्मीनिया में लंबे वक्त से गद्दी पर रहे शेर्ज़ सार्गिसान के ख़िलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रद्रर्शन हुए. इसके बाद इसी साल हुए निष्पक्ष चुनाव में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व कर रहे निकोल पाशिन्यान को प्रधानमंत्री चुन लिया गया. इसके बाद हुई बातचीत में पाशिन्यान और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इलहाम अलीव के बीच सीमा पर तनाव कम करने और दोनों देशों के बीच पहली मिलिटरी हॉटलाइन शुरू करने पर सहमति बनी. साल 2019 में दोनों देशों ने एक बयान जारी कर कहा कि इस इलाक़े में शांति स्थापित करने के लिए दोनों देशों को कारगर कदम उठाने की ज़रूरत है.

हालांकि अब तक ऐसा कुछ होता नज़र नहीं आया है. अब तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि ताज़ा तनाव की शुरूआत किसने की है, हालांकि जुलाई के बाद के महीनों से लगातार इस इलाक़े में तनाव अपने चरम पर था. तुर्की के राष्ट्रपति के मुख्य सलाहकार इलनूर चेविक ने आर्मीनिया के आरापों का खंडन किया है कि तुर्की इस लड़ाई में सीधे तौर पर शामिल है. हालांकि उन्होंने कहा कि नागोर्नो-काराबाख में अज़रबैजान जितना संभव हो सके आगे बढ़े और इस इलाक़े से आर्मीनिया तुरंत पीछे हटे. उन्होंने कहा, "ये बात सभी तो मालूम होनी चाहिए कि तुर्की और अज़रबैजान 'दो देश एक राष्ट्र' की तरह हैं. अच्छा वक्त हो या बुरा हम दोनों साथ हैं. और आज भी हम उन अज़रबैजानी भाइयों के साथ हैं जो अपनी मातृभूमि को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आर्मीनिया तुरंत हमले बंद करे और विदेश से लाए सैनिकों को इस इलाक़े से पीछे हटाए. अज़रबैजान के जिस इलाक़े पर उसने कब्ज़ा किया है, वो वहां से पीछे हटे."

आर्मीनिया के विदेश मंत्री ज़ोहराब एमनासाकयान ने बीबीसी से कहा कि अज़रबैजान दशकों पुराने विवाद का शांतिपूर्ण हल खोजने से पीछे हट रहा है और अब नागोर्नो-काराबाख के पास अपनी रक्षा खुद करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है, और आर्मीनिया के पास भी नागोर्नो-काराबाख का समर्थन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. उन्होंने कहा, "हमारी प्राथमिकता है कि हम अज़रबैजान के हमले का जवाब दें और उसे बातचीत के लिए कदम बढ़ाने के लिए कहें."

वहीं संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने आर्मीनिया और अज़रबैजान से लड़ाई जल्द रोकने की अपील की है और कहा है कि मौजूदा हालातों से "वो काफी चिंतित हैं". अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हिंसा रोकने के लिए अपील की है. फ्रांस ने भी दोनों देशों से तुरंत लड़ाई बंद कर बातचीत का रास्ता तलाशने की अपील की है. फ्रांस में बड़ी संख्या में आर्मीनियाई लोग रहते हैं. ईरान विवाद में फंसे दोनों देशों के साथ अपनी सीमा साझा करता है. उसने कहा है कि दोनों देश बातचीत की मेज़ पर आएं तो वो मध्यस्थता करने के लिए तैयार है. नागोर्नो-काराबाख में अधिकारियों ने दावा किया है कि रविवार को जिन इलाक़ों पर अज़रबैजान के सैनिकों ने कब्ज़ा किया था उन्हें फिर छुड़ा लिया गया है.

वहीं अज़रबैजान सरकार ने सोमवार को कहा है कि विवादित इलाक़े में रणनीतिक तौर पर अहम कुछ जगहों को उनकी सेना ने कब्ज़े में ले लिया है. जुलाई में सीमा पर हुई हिंसा में 16 लोगों की मौत के बाद अज़रबैजान में व्यापक प्रदर्शन हुए थे. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि इस इलाक़े को देश अपने कब्ज़े में ले.

अज़रबैजान में बड़ी संख्या में तुर्क मूल के लोग रहते हैं. ऐसे में नैटो के सदस्य देश तुर्की ने साल 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में अज़रबैजान के अस्तित्व को स्वीकार किया. अज़रबैजान के पूर्व राष्ट्रपति ने तो दोनों देशों के रिश्तों को 'दो देश एक राष्ट्र' तक कह दिया. आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं. 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी.

वहीं आर्मीनिया के रूस के साथ गहरे संबंध हैं. यहां रूस का एक सैन्य ठिकाना भी है और दोनों देश सैन्य गुट कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन के सदस्य हैं.हालांकि, रूस के मौजूदा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अज़रबैजान के साथ भी सौहार्दपूर्ण रिश्ते हैं और उन्होंने दोनों देशों से युद्धविराम की अपील की है.

अज़रबैजान और आर्मीनिया ने सोमवार को एक-दूसरे पर रिहाइशी इलाक़ों में हमले करने का आरोप लगाया है. दोनों देशों का कहना है कि दक्षिण कॉकेशस इलाक़े में पिछले 25 सालों में हो रही सबसे घातक लड़ाई में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. पश्चिमी मीडिया से मिल रही ख़बरों के अनुसार पर नागोर्नो-काराबाख़ के रिहाइशी इलाक़ों में अज़रबैजानी सैना क्लस्टर बम गिरा रही है. अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अनुसार क्लस्टर बम का इस्तेमाल प्रतिबंधित है. हालांकि न तो अज़रबैजान ने और न ही आर्मीनिया ने इससे जुड़े अंतरराष्ट्रीय कन्वेन्शन पर हस्ताक्षर किए हैं. 

तुर्की में सोमवार को दिखाए गए एक इंटरव्यू में अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हमा अलीयेव ने कहा कि इस लड़ाई को रोकने के लिए आर्मीनिया को नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों से अपनी सेना हटानी होगी. उन्होंने रविवार को राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा था, "हम किसी और देश की ज़मीन पर नज़र नहीं डाल रहे हैं लेकिन जो हमारा है उसे हमारा होना चाहिए."

वहीं, आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने भी पीछे हटने के कोई संकेत नहीं दिए हैं. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ उन्होंने सोमवार को फ़ेसबुक पर पिछले साल सेना से अलग होने वाले सैन्यकर्मियों से लड़ाई में शामिल होने की अपील की. नाटो प्रमुख जेंस स्टोलनबर्ग ने दोनों पक्षों से नागोर्नो-काराबाख़ में जारी तुरंत लड़ाई ख़त्म करने के लिए कहा है. उन्होंने तुर्की के दौरे के दौरान कहा कि इसका कोई सैन्य समाधान नहीं है. वहीं अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने भी कहा है कि युद्ध तो तुरंत रोका जाना चाहिए. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "ओएससीई मिंस्क समूह के सह-अध्यक्ष देशों के विदेश मंत्रियों ने नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों में हिंसा बढ़ने की निंदा की है. साथ ही तुरंत और बिना शर्त युद्धविराम की मांग की है." ओएससीई यानी ऑर्गेनाइजे़शन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कॉर्पोरेशन इन यूरोप एक क्षेत्रीय सुरक्षा संगठन है.
इस बीच कनाडा ने सोमवार को तुर्की को हथियार देने से मना कर दिया है. सामाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार सोमवार को कनाडा ने नैटो के सदस्य तुर्की को हथियार देने से मना कर दिया है. कनाडा का कहना है कि आर्मीनिया-अज़रबैजान की लड़ाई में इन सैन्य उपकरणों के कथित इस्तेमाल की जांच होने तक इस तरह के समझौतों को निलंबित किया जा रहा है. मौजूदा हालातों के मद्देनज़र रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान से लड़ाई में हुए गंभीर नुक़सानों को लेकर चर्चा की है और जल्द युद्धविराम की घोषणा करने की अपील की है. आर्मीनिया की राजधानी येरेवान में लोगों ने काराबाख़ में लड़ रही अपनी सेना के लिए समर्थन जताया है. यहां के टाउन हॉल में एक बड़ी स्क्रीन लगाई गई है जिसमें देशभक्ति गाने बज रहे हैं और वहां रहने वाले लोगों ने गलियों में झंडे फहराने शुरू कर दिए हैं. दशकों से चले आ रहे दोनों देशों के विवाद में किसने पहले गोली चलाई, इस तरह के आरोप एक दूसरे पर मढ़ना आम बात है.

अज़रबैजान का दावा है कि उसने आर्मीनियाई नियंत्रण वाले इलाके को मुक्त करवा दिया है, तो आर्मीनियाई अधिकारी इसे ख़ारिज करते हैं. इसी तरह आर्मीनिया दावा करता है कि अज़रबैजान को काफी नुकसान पहुंचा है तो अज़रबैजान की तरफ से इसका खंडन किया जाता है. इसके अलावा अज़रबैजान ने देश में इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है, ख़ास कर सोशल मीडिया पर.
रूस पारंपरिक रूप से आर्मीनिया का मित्र राष्ट्र रहा है, लिहाज़ा तुर्की का समर्थन अज़रबैजान को साहस दे सकता है क्योंकि अगस्त में ही अज़रबैजान के रक्षा मंत्री ने कहा था कि तुर्की की सेना की मदद से अज़रबैजान अपने 'पवित्र धर्म' को पूरा करेगा- दूसरे शब्दों में वो अपने गंवाए हुए क्षेत्रों को वापस ले सकेगा.







Monday, October 5, 2020

अमेरिकी चुनाव का गणित


उनके अनेक नज़दीकी सलाहकार और सहयोगी या तो जेल में हैं या मुक़दमों का सामना कर रहे हैं. कुछ उनके ख़िलाफ़ गवाह भी बने हैं. ताज़ा उदाहरण स्टीव बैनन का है, जो पिछले चुनाव के आख़िरी दौर में ट्रंप अभियान के मुखिया थे और राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप ने उन्हें अपने प्रशासन का प्रमुख रणनीतिक सलाहकार बनाया था. धोखाधड़ी के मामले में बैनन की गिरफ़्तारी अनेक वजहों से अहम है. एक तो यह है कि यह मसला सीमा पर दीवार बनाने से जो जुड़ा हुआ है, जो ट्रंप अभियान का सबसे बड़ा मुद्दा था. दूसरी वजह है कि फ़ेसबुक के डेटा को आपराधिक रूप से कैंब्रिज़ एनालाइटिका द्वारा इस्तेमाल करने और ऑनलाइन वेबसाइट ब्रीटबार्ट के प्लेटफ़ॉर्म से नफ़रत व झूठ से भरीं ख़बरें व लेख छापने तथा सोशल मीडिया के माध्यम से भ्रामक विज्ञापन देने जैसी गतिविधियों के आरोप स्टीव बैनन पर लगे.

पिछले चुनाव में राजनीतिक नैतिकता और भद्रता की सीमाओं को जिस तरह से ट्रंप अभियान ने लांघा था, वह सब बैनन की ही रणनीति थी. बैनन यूरोप, एशिया और लातिन अमेरिका में धुर दक्षिणपंथी, संकीर्ण राष्ट्रवादी, नव-फ़ासीवादी राजनीति के न केवल समर्थक हैं, बल्कि उन्हें मदद करने और एक वैचारिक मंच पर लाने की कोशिश भी करते रहे हैं.

तीसरा कारण यह है कि पहले मानाफ़ोर्ट, कोहेन, रॉजर स्टोन जैसे ट्रंप के सहयोगियों के अपराधी साबित होने के बाद बैनन का गिरफ़्तार होना धुर दक्षिणपंथी राजनीति के लिए बड़ा झटका है तथा उनकी रही सही साख को इससे बहुत नुक़सान होगा. शायद ही उनकी कीचड़ उछालने और नफ़रत फैलाने की कोशिशों के लिए इस बार मौक़ा बन सकेगा. धुर दक्षिणपंथी पैंतरा इस दफ़ा काठ की हांडी साबित हो सकता है.

बहरहाल, तीन नवंबर में अभी कई दिन बाक़ी हैं. कई लोग कह रहे हैं कि अभी ट्रंप की हार और बाइडेन की जीत की भविष्यवाणी करना जल्दबाज़ी होगी. ऐसा कहने का बड़ा कारण यह है कि लोगों के ज़ेहन में 2016 की याद ताज़ा है, जब मतदान के दिन तक हिलेरी क्लिंटन तमाम सर्वेक्षणों में आगे थीं और बड़े-बड़े पॉलिटिकल पंडित मानकर बैठे थे कि बड़बोले डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस पहुंचने की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लेकिन, आठ नवंबर को 304 डेलिगेट वोटों के साथ डोनाल्ड ट्रंप को जीत हासिल हुई. यह जुमला भी उछाला जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संभावनाएं भी संदर्भ और पृष्ठभूमि में ही घटित होती हैं.

पिछले चुनाव में हिलेरी क्लिंटन को ट्रंप से तीस लाख वोट ज़्यादा मिले थे और वे अमेरिकी चुनावी इतिहास में सबसे अधिक वोट पानेवाले उम्मीदवारों में दूसरे पायदान पर हैं. उन्हें 48 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि ट्रंप के खाते में 46 फ़ीसदी वोट गए थे. लेकिन अमेरिका में राष्ट्रपति वह व्यक्ति चुना जाता है, जिसे इलेक्टोरल कॉलेज के डेलीगेट वोट अधिक मिलते हैं.

साल 2016 में कुल 538 वोटों में से ट्रंप को 304 (306) वोट मिले थे और क्लिंटन को 227 (232) डेलीगेट वोटों से संतोष करना पड़ा था. अब तक हुए 54 चुनावों के डेलीगेट वोटों के आंकड़े देखें, तो उसमें ट्रंप के वोट 44वें स्थान पर हैं. आम तौर पर नतीजों में वही राष्ट्रपति बनता आया है, जिसे दोनों ही श्रेणियों में अधिक वोट मिलते हैं. लेकिन 2016 के अलावा 2000 में भी जॉर्ज डब्ल्यू बुश डेमोक्रेटिक उम्मीदवार अल गोर से 5.44 लाख वोट कम पाकर भी डेलीगेट वोटिंग सिस्टम की वजह से राष्ट्रपति बन गए थे.

इससे पहले ऐसा संयोग 1888 के चुनाव में हुआ था. इस सिस्टम में हर राज्य के सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव के सदस्यों की संख्या के बराबर डेलीगेट होते हैं. माना जाता है कि अमेरिकी संविधान में इसकी व्यवस्था सीधे मतदान और कांग्रेस में प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन साधने के लिए की गयी थी.

तो 2016 की स्थिति फिर बन सकती है, लेकिन इस साल के अमेरिकी चुनाव की तुलना 2016 से करना बहुत हद तक ठीक नहीं है. हालांकि डेमोक्रेटिक पार्टी के सम्मेलन में ख़ुद हिलेरी क्लिंटन ने वोट डालने की अहमियत पर ज़ोर देते हुए कहा है कि जो बाइडेन और कमला हैरिस की जोड़ी तीस लाख वोट अधिक लाकर भी चुनाव हार सकती है. एक तो यह है कि ओबामा और क्लिंटन से जुड़ी शिकायतों तथा ट्रंप से जुड़ी उम्मीदों का समीकरण बदला है. पिछले चुनाव में डेमोक्रेटिक सम्मेलन के बाद हिलेरी क्लिंटन ने सर्वेक्षणों में जो ऊंची छलांग लगायी थी, उस स्तर को बाइडेन सम्मेलन से पहले ही पार कर चुके हैं. फ़ाइव थर्टी एट ने विभिन्न सर्वेक्षणों का जो औसत निकाला है, उसके मुताबिक 19 अगस्त तक राष्ट्रीय स्तर पर बाइडेन 51.1 फ़ीसदी के साथ ट्रंप से 8.6 फ़ीसदी आगे थे.

इस साल बाइडेन को कुछ महत्वपूर्ण रिपब्लिकन नेताओं का समर्थन भी हासिल है. ओहायो के पूर्व गवर्नर और 2016 में पार्टी की ओर से राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के इच्छुक जॉन कसिच, न्यू जर्सी की पूर्व गवर्नर क्रिस्टीन व्हिटमैन, न्यूयॉर्क से पूर्व हाउस सदस्य सुज़न मोलिनरी, ट्रंप प्रशासन के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी माइल्स टेलर, पेंसिलवेनिया से पूर्व हाउस सदस्य चार्ली डेंट तथा राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में विदेश सचिव रहे कॉलिन पॉवेल ने कहा है कि देश को आज बाइडेन जैसे राष्ट्रपति की आवश्यकता है.

डेमोक्रेटिक सम्मेलन में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति उम्मीदवार रहे जॉन मैक्केन के परिवार ने दोनों नेताओं व परिवारों की दशकों की घनिष्ठता का हवाला देते हुए बाइडेन का समर्थन किया है. ट्रंप के चुनाव के बाद से बुश परिवार के सदस्य, पॉल रेयान और मिट रोमनी जैसे कई प्रभावशाली रिपब्लिकन दूरी बनाकर चल रहे हैं. वरिष्ठ रिपब्लिकनों द्वारा संचालित मंच ‘द लिंकन प्रोजेक्ट’ भी बाइडेन के समर्थन में है. यह मंच लगातार ट्रंप को निशाना बनाता रहता है और वे भी इसकी आलोचना करते रहते है.

गणित का हिसाब लगाने से पहले यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रंप द्वारा जीते गए राज्यों- विस्कोंसिन, मिशिगन और पेंसिलवेनिया- में 2018 के चुनावों में डेमोक्रेट पार्टी ने भारी जीत हासिल की थी. इन राज्यों के महत्व को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि इनमें मिले 77,744 वोटों की बदौलत ही ट्रंप राष्ट्रपति बन सके थे. इन राज्यों से उन्हें कुल 46 डेलीगेट वोट हासिल हुए थे, जबकि इनमें हिलेरी क्लिंटन से उनकी जीत का अंतर एक फ़ीसदी से भी कम था.

ट्रंप पेंसिलवेनिया में 0.7 फ़ीसदी (44,292 वोट), विस्कोंसिन में 0.7 फ़ीसदी (22,748 वोट) तथा मिशिगन में 0.2 फ़ीसदी (10,704 वोट) से जीते थे. वाशिंगटन एक्ज़ामिनर के विश्लेषण में 2016 में बदलाव को रेखांकित करते हुए बताया गया था कि 2012 में इन तीन राज्यों में बराक ओबामा अच्छे अंतर से जीते थे, लेकिन 2016 में जहां राष्ट्रीय स्तर पर रिपब्लिकन पार्टी की तरफ तीन फ़ीसदी का झुकाव बढ़ा था, वहीं इन राज्यों में यह झुकाव छह से 10 फ़ीसदी बढ़ गया था. लेकिन 2018 में इन राज्यों में सीनेट की तीन सीटों और गवर्नरों के चुनाव में सभी सीटें डेमोक्रेट पार्टी ने अच्छे अंतर से जीत लीं. स्थानीय चुनाव में भी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया था और राष्ट्रीय स्तर पर भी हाउस में बहुमत हासिल किया था. सर्वेक्षणों में इन तीन राज्यों में और कुछ अन्य बैटलग्राउंड/स्विंग राज्यों में बाइडेन बहुत बढ़त बनाये हुए हैं और 2016 का चमत्कार इस बार घटित होने की आशा बहुत क्षीण है. बैटलग्राउंड/स्विंग राज्य उनको कहा जाता है, जहां पलड़ा कभी रिपब्लिकन, तो कभी डेमोक्रेट के पाले में झुकता रहता है.

ऊपर के विवरण के साथ अगर आप बैटलग्राउंड/स्विंग राज्यों का विस्तार से हिसाब लगाएं, तो लड़ाई राज्यों में भी नहीं, बल्कि उनके कुछ काउंटी यानी इलाकों में तय होगी. द हिल ने कई विशेषज्ञों से चर्चा के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि ऐसे 10 इलाकें हैं, जहां के मतदाता अमेरिका के अगले राष्ट्रपति का निर्णय करेंगे और इनमें से ज़्यादातर जगहों में अभी बाइडेन आगे चल रहे हैं. द हिल की एक अन्य रिपोर्ट में रेखांकित किया है कि इस चुनाव में ट्रंप के पाले में 126 सुरक्षित और 78 ठोस झुकाव के वोटों के साथ 204 डेलीगेट वोट हैं और बाइडेन के पास 183 सुरक्षित और 18 ठोस झुकाव के वोटों के साथ 201 डेलीगेट वोट हैं. जीतने के लिए 538 में से कम-से-कम 270 वोटों की दरकार होगी.

तीन नवंबर को राष्ट्रपति के साथ हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव की सभी सीटों तथा सीनेट की 35 सीटों के लिए भी चुनाव होंगे. साल 2018 में 435 में से 235 सीटें जीतकर डेमोक्रेट ख़ेमे ने हाउस में बहुमत हासिल किया था. उसे बेदख़ल करने के लिए रिपब्लिकन पार्टी को अभी की सीटों के अलावा 20 और सीटों को जीतना होगा. सीनेट में रिपब्लिकन का बहुमत है. वहां अब बहुमत के लिए डेमोक्रेट को तीन-चार सीटें जीतनी होंगी. इस बार रिपब्लिकन पार्टी अपनी 23 सीटें और डेमोक्रेटिक पार्टी अपनी 12 सीटें बचाने के लिए मैदान में है. जिस तरह के सर्वेक्षण आ रहे हैं और जैसा विशेषज्ञ बता रहे हैं, सीनेट में भी कड़ा मुक़ाबला हो सकता है तथा हाउस में डेमोक्रेटिक पार्टी अपना बहुमत बचा लेगी. कुल मिलाकर, अभी यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रपति ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए मुसीबत बड़ी है.

Thursday, October 1, 2020

ट्रम्प v/s जो बाइडन (पहली डिबेट कौन जीता?)


अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली बहस में मंगलवार को बहुत ही तीख़ी ज़ुबानी जंग देखने को मिली.
बहस के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जो बाइडन के बीच काफ़ी तू-तू मैं-मैं हुई और दोनों नेताओं ने विभिन्न मुद्दों को लेकर एक-दूसरे पर छींटाकशी की.
यह एक ऐसी बहस थी, जिसका लाखों अमरीकियों को काफ़ी समय से इंतज़ार था, और बहस इतनी गर्मा-गर्म रहेगी, ऐसी भी बहुत से लोगों ने पहले ही उम्मीद की थी.
लेकिन सवाल ये है कि इस बहस का सुननेवालों पर क्या असर हुआ होगा? और डोनाल्ड ट्रंप-जो बाइडन के बीच हुई इस पहली बहस में किसे जीता हुआ समझा जाए?
पहली बहस में जो बाइडन का मक़सद अमरीकियों को यह दिखाना था कि वे दबाव की स्थिति का आसानी से सामना कर सकते हैं, बढ़ती उम्र कहीं से भी उनकी कमज़ोरी नहीं है और बहुत ही शांत ढंग से अपनी सारी बातें रख सकते हैं. बहस को देखकर ऐसा लगता है कि वे अपने इस मक़सद को पूरा करने में सफल रहे. हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप लगातार उन्हें टोकते रहे और ट्रंप ने बाइडन को कम ही मौक़े दिए कि वे कुछ ऐसा कह पाएँ, जिससे ट्रंप के चुनावी अभियान को भारी चोट पहुँचे.
वहीं डोनाल्ड 'ट्विटर' ट्रंप ने भी क़रीब डेढ़ घंटे लंबी इस डिबेट में पूरा प्रदर्शन किया. लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि बहुत से अमरीकी, यहाँ तक कि उनके समर्थक भी, ट्रंप के सोशल मीडिया स्टाइल को उनके ऐसे गुणों में से एक मानते हैं, जो आकर्षक नहीं हैं.
ट्रंप को चाहिए था कि वे पहली ही बहस के ज़रिए चुनावी दौड़ को हिलाकर रख दें जो अब तक उनके ख़िलाफ़ जाती दिखी है. लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस उन 10 अमरीकी मतदाताओं में से सिर्फ़ एक मतदाता के नज़रिए को बदलने में सफल रही होगी, जो अभी भी यह तय नहीं कर पाए हैं कि वो किसे वोट करने वाले हैं.
यह स्पष्ट था कि ये बहस किस तरह की होगी. डोनाल्ड ट्रंप का उद्देश्य जो बाइडन को परेशान करना था और इसके लिए उन्होंने पूर्व उप-राष्ट्रपति को लगातार टोकने की योजना बनाई.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने बाइडन को कुल 73 बार बीच में टोका, जिसकी वजह से तीख़ी नोकझोंक भी हुई. ट्रंप ने बाइडन की बुद्धिमत्ता पर सवाल उठाया, तो बाइडन ने ट्रंप को जोकर कहा, उन्हें चुप कराया और यह तक कहा कि "क्या आप थोड़ा चुप रहोगे?" कई बार ऐसा हुआ कि जब ट्रंप ने जो बाइडन पर हमला किया, तो डेमोक्रेट नेता धीमे-धीमे मुस्कुराते रहे.
जब बहस के संचालक क्रिस वैलेस ने घोषणा की कि अगला विषय कोरोना वायरस है और राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवारों के पास अपना-अपना पक्ष रखने के लिए ढाई-ढाई मिनट होंगे, तो बाइडन ने ट्रंप को ताना मारा: "इस विषय के लिए शुभकामनाएँ." लोग कह रहे हैं कि इस प्रतिष्ठित बहस का संचालन मंगलवार की रात अमरीका में 'सबसे ख़राब काम' रहा होगा.
कोरोना वायरस महामारी हमेशा से ही राष्ट्रपति ट्रंप के बोलने के लिए मुश्किल विषय रहा है. मंगलवार की बहस में यह विषय काफ़ी शुरुआत में ही आ गया और डोनाल्ड ट्रंप को यह बताना था कि उन्होंने उस महामारी से लड़ने के लिए क्या किया, जिससे अमरीका में अब तक दो लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐसा किया भी. उन्होंने दलील दी कि उनके प्रशासन ने महामारी को रोकने के लिए कई क़दम उठाए, लोगों के बचाव के लिए फ़लां चीज़ें कीं, लेकिन जो बाइडन ने अपनी बातों से उनके लिए मुश्किलें पैदा कीं.
ट्रंप की दलीलों के जवाब में जो बाइडन ने कैमरे से नज़र मिलाते हुए, दर्शकों से पूछा कि 'क्या वो ट्रंप की इन बातों पर विश्वास करेंगे?' जो बाइडन ने कहा, "बहुत सारे लोग महामारी के कारण मारे जा चुके हैं, और अगर ट्रंप ने अपने काम करने की रफ़्तार नहीं बढ़ाई और वे पहले से ज़्यादा स्मार्ट नहीं बने, आगे भी बहुत सारे लोग इस महामारी से मारे जाएँगे."
ट्रंप ने बहस के दौरान इस बात पर ज़ोर दिया कि जो बाइडन की रैलियों में बिल्कुल भीड़ नहीं दिखाई देती.
इसी दौरान उन्होंने कहा कि 'लोग चाहते हैं कि उनके काम-धंधों को खुलने दिया जाए.'
जिसके जवाब में जो बाइडन ने कहा, "लोग सुरक्षित भी रहना चाहते हैं."
इस बहस ने यह भी साफ़ किया कि दोनों नेताओं के बीच कोरोना वायरस महामारी और उससे लड़ने को लेकर कितना मतभेद है.
नस्लभेद के मुद्दे और शहरी हिंसा के मामलों पर बात करने को लेकर जो बाइडन तो सहज दिखे, लेकिन ट्रंप को देखकर ऐसा लगा कि वे इन विषयों पर ज़्यादा बात नहीं करना चाहते.
जो बाइडन ने राष्ट्रपति ट्रंप पर नस्ल आधारित विभाजन भड़काने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि अमरीकी शहरों में अब नस्लवाद काम नहीं करता. ज़्यादातर बड़े शहर एकजुट हैं. इनके लिए वास्तविक ख़तरा कोविड-19 और जलवायु परिवर्तन रहा है. बहस के दौरान डोनाल्ड ट्रंप को एक मौक़ा दिया गया कि 'वे गोरे कट्टरपंथियों और दक्षिणपंथी लोगों की हिंसा को अस्वीवार कर सकते हैं', जिसपर ट्रंप ने कहा कि 'वे ऐसा करेंगे, लेकिन फिर उन्होंने ऐसा करने की बजाय- सिर्फ़ एक दक्षिणपंथी संगठन 'द प्राउड बॉयज़' से ही कहा कि वो पीछे रहें.' इसके बाद उन्होंने फ़ासीवाद-विरोधी कार्यकर्ताओं और एंटीफ़ा समर्थकों पर हमला करने की कोशिश की.
जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत, अमरीका में संस्थागत नस्लवाद और पुलिस द्वारा की जाने वाली हिंसा पर सवाल उठना और उसके बाद पूरे देश में हुए विशाल प्रदर्शन - अमरीका में दशकों से ऐसा नहीं देखा गया. लेकिन मंगलवार की बहस में इतिहास के उन क्षणों पर बहुत ही कम प्रकाश डाला गया.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डिबेट के दौरान यह दलील दी कि उन्होंने अपने कार्यकाल में कम से कम चीज़ों को आगे बढ़ाया, बल्कि डेमोक्रेट लंबे वक़्त तक चीज़ों को लेकर बैठे रहे.
उन्होंने जो बाइडन को ताना मारा कि "मैंने अपने कार्यकाल के 47 महीने में जितना काम किया है, वो आपने 47 साल में भी नहीं किया."
जिसके जवाब में जो बाइडन ने कहा, "ट्रंप के कार्यकाल में अमरीका कमज़ोर हुआ है, बीमार हुआ है, ग़रीब हुआ है, पहले से ज़्यादा विभाजित दिखता है और पहले से ज़्यादा हिंसक भी."
साल 2016 में सारे अनुमानों के विपरीत डोनाल्ड ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बने. पिछले साढ़े तीन सालों में उनका इस पद पर होना हर तरीक़े से चुनौतीपूर्ण रहा है. अपनी उस जीत को दोहराने के लिए ट्रंप के पास एक तरीक़ा यह है कि वो जो बाइडन के लंबे सार्वजनिक जीवन का इस्तेमाल, उन्हीं के ख़िलाफ़ करें.
बहस के दौरान ट्रंप के अन्य लक्ष्यों में से एक था बाइडन को उनकी पार्टी के लेफ़्ट विंग के रूप में चित्रित करना. लेकिन बाइडन ने इस मामले में बखूबी अपना बचाव किया.
जो बाइडन ने कुछ नीतियों पर खुलकर अपनी राय पेश की. ख़ासकर उन नीतियों के बारे में, जिन्हें उनकी पार्टी की ओर से पहले समर्थन मिला था, लेकिन अब बाइडन ने कहा है कि वो इन पर विचार कर रहे हैं.
बाइडन ने यह भी कहा कि जैसे-जैसे मतदान की तारीख़ नज़दीक आएगी, तब तक उनकी पार्टी का लेफ़्ट विंग भी उनके साथ मज़बूती से खड़ा होगा.
रविवार को जब न्यूयॉर्क टाइम्स अख़बार ने रिपोर्ट लिखी कि 'राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने कार्यकाल में बहुत कम टैक्स दिया या टैक्स की चोरी की', तो उस रिपोर्ट को एक बड़े धमाके की तरह देखा गया.
अख़बार ने कुछ दस्तावेज़ों के हवाले से लिखा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने वाले वर्ष और उसके अगले साल व्हाइट हाउस में जाने के बाद केवल 750 अमरीकी डॉलर का आयकर अदा किया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ट्रंप ने पिछले 15 में से 10 सालों में कोई आयकर नहीं चुकाया.
राजनीतिक विश्लेषकों ने सोचा कि ट्रंप पहली डिबेट के दौरान इस मुद्दे को आख़िर कैसे संभालेंगे. लेकिन जो बाइडन बहस के दौरान इस मुद्दे को उम्मीद के अनुसार बड़ा बना पाने में असमफल रहे.
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सफ़ाई में वही दलील दी जो उन्होंने 2016 में दी थी कि 'वे पिछले किसी भी राष्ट्रपति की तुलना में अमरीकी टैक्स सिस्टम के बारे में ज़्यादा बेहतर समझ रखते हैं, इसी वजह से वे टैक्स बचा पाते हैं.' ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अपने अनुभव के दम पर टैक्स अधिनियमों का फ़ायदा उठाया.
बहरहाल, आने वाले वक़्त में अगर टैक्स से जुड़ा यह मुद्दा थोड़ा बहुत उछलता है और चुनाव पर इसका ज़रा भी असर दिखता है, तो ऐसा कम से कम इस बहस की वजह से नहीं होगा.
बहस का आख़िरी हिस्सा चुनाव की सुरक्षा और उससे जुड़ी चिंताओं पर केंद्रित था, जिसमें दोनों ही पक्षों ने यह चिंता ज़ाहिर की कि यह चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होगा. अगर इस बहस के मुद्दों पर जाया जाए तो आप कह सकते हैं कि बहस के ज़्यादातर हिस्सों में डोनाल्ड ट्रंप भ्रामक बातें कर रहे थे.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि 'इस चुनाव का अंत अच्छा नहीं होगा'... और उनके इस बयान से दोनों ही पक्ष सहमति रख सकते हैं, हालांकि इस सहमति की वजहें अलग-अलग होंगी.
जो बाइडन ने इस बहस में अपना क़द बड़ा बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि "वो उम्मीद करते हैं कि वोटों को गिनने और विजेता की घोषणा करने की पूरी प्रक्रिया निष्पक्षता और सम्मान के साथ निभाई जाए." 
ऐसा लग रहा था कि उन्हें निष्कर्ष में कुछ और बातें भी कहनी हैं, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें बीच में ही टोक दिया. इसके बाद क्रिस वैलेस ने बहस समाप्ति की घोषणा कर दी.
इस अव्यवस्थित शाम का अंत भी अचानक ही हो गया, और जो बातें हुईं उन्हें एक सार्थक बहस के रूप में नहीं देखा जा सकता. ऐसे कार्यक्रमों का असर चुनावों पर कम ही पड़ता है और ये बहस इतनी अव्यवस्थित थी कि इसने शायद ही मतदाताओं के निर्णय पर कोई असर डाला होगा.
ट्रंप के लिए शायद यह बुरी ख़बर है, क्योंकि उपनगरीय महिला मतदाता उनकी कमज़ोरी हैं, जिनका कहना है कि वो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तौर-तरीक़ों को ही नापसंद करती हैं.
लेकिन अगर ट्रंप का लक्ष्य यह था कि वो इस चुनाव अभियान को एक ऐसी शक़्ल दे दें जिसे कोई पहचान ही ना पाए और मतदाता इस कशमकश में ही रहें कि उन्हें इस चुनाव से क्या चाहिए और उनका इस चुनाव में क्या योगदान हो सकता है, तो उनकी इस शाम की मेहनत बेकार नहीं गई.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...