Sunday, June 26, 2022

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का तख्तापलट


आजकल महाराष्ट्र की राजनीति में बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है. जिस शिवसेना को बालासाहेब ठाकरे ने बनाया और अपनी मेहनत से खड़ा किया वो अब शिंदेसेना में बदल गई है. उद्धव ठाकरे की विधायकों और राजनीतिक राजधानी पर पकड़ कमजोर होती जा रही है. इस पूरे तख़्तापलट की कहानी के अपने अपने मायने निकाले जा रहे हैं. लेकिन मुझे जो समझ में आया उसके दो कारण हैं. पहला कि जब 2014 में शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी तब उस सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने जमकर लूट की. शिवसेना के विधायकों और उनके रिश्तेदारों ने भी अपनी जेबें भरने में कोई कमी नहीं रखी. उद्धव ठाकरे के करीबियों और रिश्तेदारों ने भी खूब पैसा जमा किया। यही कारण है कि 2019 में महाविकास अघाड़ी बनाने के बाद इनपर एकदम से इनकम टैक्स और ईडी के छापे चालू हो गए. क्योंकि अगर इन्होने इस सरकार में ही सब घपले किये होते तो उसकी तो ठीक से असेसमेंट भी नहीं हुई होगी. दूसरी बात अगर इसी सरकार में किये हुए घोटाले होते तो सबसे अधिक छापे तो एनसीपी और कांग्रेस के विधायक और मंत्रियों पर होती और वो पार्टी छोड़कर भाग जाते क्योंकि वो तो भ्रष्टाचार के लिए बदनाम हैं. इससे जाहिर है कि ये सब पहले का होगा.
आपको याद होगा कि जब अजित पवार ने सुबह 4 बजे फडणवीस को मुख्यमंत्री बनवाया था तब उनके 70000 करोड़ के घोटाले की फ़ाइल बंद कर दी गई थी. आज भी सभी मंत्री विधायक इसी उम्मीद में बीजेपी के पास गए हैं, क्योंकि जब उद्धव ठाकरे के पास ये सब जाते थे तो वो इसमें इनका बहुत साथ नहीं देते थे. इस वजह से इन विधायकों में नाराजगी बहुत थी.
इस एपिसोड का दूसरा कारण जो मुझे समझ में आया वो ये कि उद्धव ठाकरे की सरकार ने बहुत से कॉर्पोरेट्स को नाराज किया या फिर कहें कि उनको खुश नहीं किया. पहले आरे जंगल की कटाई को रोक दिया. फिर इसी साल मार्च के आसपास महाराष्ट्र के रूरल इलाकों में लोगों के बिजली के कनेक्शन अडानी पवार ने काटने शुरू कर दिए जिन्होंने बिल नहीं भरे थे. यहाँ बिजली मंत्री थे कांग्रस के नितिन राउत। उनके ऊपर राहुल गाँधी ने दबाव डाला तो ये कनेक्शन काटने बंद हुए. ऐसे ही बहुत से कॉर्पोरेट्स के हितों को उद्धव सरकार ने रोका. इन्ही कॉर्पोरेट्स ने इस पूरे दल बदल की फंडिंग की है. कोई पार्टी बनाएगा, किसी की सदस्यता जाएगी, अब इस सबके बाद जो कानूनी पेंच हैं, वकील सुप्रीम कोर्ट में लड़ेंगे, नेता टीवी पर लड़ेंगे और फ्लोर टेस्ट होगा. राज्यपाल अपनी भूमिका निभाएंगे जिसमें ज्यादातर चांस यही हैं कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिरेगी और फडवणीस साहब CM बनकर इन सभी बागियों को सर्फ़ एक्सल में धुलकर नीट एन्ड क्लीन कर देंगे. इसलिए इसपर ज्यादा बात करके कोई फायदा नहीं.अब सवाल ये कि इतना सब हो गया और उद्धव ठाकरे को खबर नहीं लगी? असल में इस बात का उनको एक महीने पहले ही पता चला था और उन्होंने एकनाथ शिंदे को घर बुलाकर पूछा भी था तो उन्होंने कहा कि विधायक तो मेरे पास वैसे भी आते जाते रहते हैं लेकिन आपको जो खबरें मिल रही हैं वो एकदम गलत हैं. मैं ठाकरे परिवार का सदस्य हूँ. पत्रकार अशोक वानखेड़े बताते हैं कि ये कहते हुए वो रोने लगे तो उद्धव ठाकरे को उनपर भरोसा हो गया. वो बोले कि चलो ठीक है जो भी ख़बरें आ रही हैं उनको ख़तम करो और राज्यसभा और विधान परिषद् के चुनावों में विधायकों के वोट कराने की जिम्मेदारी आपकी है. इसी बहाने उनको और मौका मिल गया इन सबसे मिलकर मीटिंग और डील करने की. फिर जब विधान परिषद् में क्रॉस वोटिंग हुई तो आदित्य ठाकरे और एकनाथ शिंदे में खूब बहस हुई जिसके बाद एकनाथ शिंदे को मौका मिल गया. बीजेपी की मदद से खेल करने का. क्योंकि एकनाथ शिंदे अकेले इतने विधायक साथ ले आएंगे ये कोई नहीं कह सकता। उनको ठाणे के बाहर अभी भी कोई बहुत वर्चस्व वाले नेता नहीं हैं. हाँ ये है कि उद्धव ठाकरे की तरफ से भी कुछ गलतियां हुईं जो विधायकों और नेताओं के बीच कम्युनिकेशन गैप रहा. वो लोगों से मिलने का ज्यादा समय नहीं देते थे, कई फैसले उनके किचेन कैबिनेट (पत्नी, बेटे और परिवार) में होते थे. उनके ज्यादा समय नहीं देने के दो कारण हो सकते हैं एक तो उनकी लगातार तबियत का ख़राब रहना और दूसरा एक ठाकरे ब्रांड का होना कि ऐसे ही सबको कैसे रोज रोज समय दिया जा सकता है.
अब सवाल ये कि अभी तक शिवसेना मतलब ठाकरे परिवार और ठाकरे मतलब शिवसेना समझा जाता था. पहली बार किसी ने हिम्मत की है ठाकरे परिवार को चुनौती देने की. तो क्या इससे ये समझा जाए कि मातोश्री का वर्चस्व शिवसेना से ख़तम हो जाएगा? क्या उद्धव ठाकरे की राजनीति अब ख़त्म हो जायेगी? तो इसकी संभावनाएं भी बहुत कम हैं. भारतीय राजनीती में खासकर क्षेत्रीय दलों में एक फर्स्ट फॅमिली के लोगों को लेकर कार्यकर्ताओं का बड़ा भरोसा होता है. बालासाहब ठाकरे से जुड़े लोगों को उद्धव ठाकरे ही पसंद आएंगे एकनाथ शिंदे नहीं. अगर शिंदे कोई पार्टी बना लें या शिवसेना पर कब्ज़ा कर लें और उद्धव कोई पार्टी बना लें तो भी उनके सफल होने की सम्भावना बहुत कम है. इसका रेकॉर्ड रहा है, पहले छगन भुजबल, राज ठाकरे, नारायण राणे जैसे बहुत से नेता जो शिवसेना से अलग होकर राजनीती करने निकले लेकिन पब्लिक ने उनको पसंद नहीं किया, इसलिए अगर ये सभी विधायक या एकनाथ शिंदे भाजपा में भी शामिल हो जाएँ तो बहुत कम सम्भावना है उनके सफल होने की. थोड़े दिन में ठाणे की सीट जीतना भी मुश्किल हो जायेगा.
शिवसेना की राजनीति को अबतक मैंने जितना समझा है वो किसी जातीय समीकरण से नहीं चलती है, उसके चलने का एक बेस है बालासाहब ठाकरे का चेहरा और मराठी मानुष या शिवाजी महाराज और उनके हिंदुत्व पर उनकी क्लियर विचारधारा. इसमें ओबीसी और सोसल रिफार्म को भी बहुत आसानी से मिक्स करके रखा है. वो जब किसी को टिकट देते हैं तो इस वजह से नहीं देते हैं कि उसकी जाति क्या है? वो टिकट देते हैं उस आदमी की क्रेडिबिलिटी पर और उसकी पार्टी या परिवार में आस्था पर. अधिकतर पब्लिक भी वोट उस आदमी को नहीं शिवसेना को देती है.
ये बात तो हुई जो साफ साफ नजर आ रही हैं. लेकिन इसकी और भी संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है. राजनीति में कई बार जो दिखता है वो होता नहीं है. कई लोगों का स्पेकुलेशन ये भी है हो सकता है ये सब उद्धव ठाकरे की जानकारी में हुआ होगा, लेकिन इसकी सम्भावना बहुत कम है. दूसरी सम्भावना ये है कि हो सकता है ये पूरा खेल एनसीपी से अजित दादा पवार की मदद हुआ हो. थोड़े दिन में जैसे जैसे परतें निकलेंगी वैसे वैसे चीजें सामने आएँगी.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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