Tuesday, September 27, 2022

इटली के चुनाव पर एक नजर


जब कभी फासीवाद और तानाशाही के उदाहरण देने पड़ते हैं तो सबसे पहले हिटलर और मुसोलिनी का ही नाम आता है. जब से इन दोनों का अंत हुआ तब से कभी इनके देशों जर्मनी और इटली ने इस विचारधारा के नेता को पसंद नहीं किया.
लेकिन इस बार हो रहे चुनावों में वहां की एक राइट विंग ब्रेनितो मुसोलिनी को आदर्श मानने वाली ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी को एक्सिट पोल्स में बढ़त मिलती दिख रही है.
इटली में भी भारत की तरह ही राजनितिक सिस्टम है. इसकी संसद में दो सदन होते हैं, अपर हाउस सेनेट में 200 और लोअर हाउस चेम्बर ऑफ़ डेपुटीस में 400 संसद होते हैं, जो पांच साल के लिए चुने जाते हैं. इस बार दोनों सदनों के लिए चुनाव हुआ, वोटर्स ने दोनों के लिए एक साथ ही वोट किया. इसमें 35% संसद सीधे तौर पर और बाकी के मेंबर पार्टिस को मिले टोटल वोट % के हिसाब से नॉमिनेट करना होता है. किसी पार्टी को संसद में एंट्री के लिए कम से कम 3% और अलायन्स को 10% वोट मिलना जरुरी है. (यहाँ अभी तक बैलेट पेपर से चुनाव होते हैं, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन अभी तक नहीं आई है.)
पार्टियों की बात करें तो पहले यहाँ केवल दो पार्टियां क्रिश्चियन डेमोक्रेसी और इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी थी, लेकिन एक समय कई बड़ी घटनाएं होने पर वहां की राजनीति बदली। बर्लिन की दीवार गिरी, यूरोप में कम्युनिस्ट सरकारों के गिरने का सिलिसिला चालू हुआ तो सोवियत संघ तक टूट गया.
इसके बाद 1992 मिलान के कुछ अधिकारीयों ने कुछ घूसखोरी के कुछ स्कैंडल की जांच चालू हुई. यहाँ प्रधानमंत्री से लेकर उद्योगपति और 200 से अधिक सांसदों को सजा हुई. इसको ऑपरेशन क्लीन हंट कहा जाता है. इसके बाद राजनितिक सुधारों के तौर पर सभी राजनितिक पार्टियां ख़तम कर दी गई और फिर इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी नए नाम डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ लेफ्ट फिर 2008 में डेमोक्रेटिक पार्टी नाम से आई, इसको सेन्ट्रल लेफ्ट से मिलाकर बनाया गया था. क्रिश्चियन डेमोक्रेसी कभी वापस नहीं हुई तो उसकी जगह कई पार्टियां आईं.
2017 में बनी लीग राइट विंग पार्टी जो पिछली सरकार में थी, ये पार्टी प्रवासियों का खुलकर विरोध करती है. दूसरी पार्टी फोर्जा इटालिया सिल्विओ बर्लुस्कोनी की पार्टी है जो चार बार इटली के प्रधानमंत्री रहे. 1993 में बनी, 2009 में इसको ख़तम कर दिया गया लेकिन 2013 में इसने फिर से काम करना चालू कर दिया.फिर एक पार्टी है फाइव स्टार मोमेंट। 2009 में इसको एक कॉमेडियन और और वेब डेवेलपर ने मिलकर चालू किया था. 2017 के चुनाव में ये सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, तब से ये राइट और लेफ्ट दोनों तरफ की पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चला रही थी. पांचवी बड़ी पार्टी का नाम है ब्रदर्स ऑफ़ इटली। ये 2012 में बनी. अब इसका मुसोलिनी से सम्बन्ध बताता हूँ.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब मुसोलिनी की फासिस्ट पार्टी को बैन कर दिया गया तो इसके लोगों ने बनाई मोवीमेंटो सोसिओ इटालियना (MSI) पार्टी. इसने नेशनल अलायन्स के साथ में कई साल सरकार भी चलाई. 2009 में नेशनल अलायन्स ख़त्म हुआ तो पहले कुछ नेता बर्लुस्कोनी की पार्टी में गए फिर वहां भी झगड़ा हुआ तो नई पार्टी बनाई ब्रदर्स ऑफ़ इटली. इसका सिंबल, कलर और झंडे का निशान भी MSI से लिया गया है. 2014 में ब्रदर्स ऑफ़ इटली पार्टी की कमान जॉर्जिया मेलोनी के हाथ आई. इस पार्टी के सिद्धांतों में व्यक्तिगत आजादी का विरोध, समलैंगिकों के अधिकारों को ख़त्म करना, यूरोपियन यूनियन से इटली को बाहर निकलना मुख्य है. वैसे तो जॉर्जिया मिलोनी यंग लीडर हैं. वो शुरु से ही MSI के यूथ विंग में काम करती रही हैं. वो शुरू से ही मुसोलिनी की तारीफ़ करती रही हैं. इस चुनाव में भी जब कभी मीडिया ने उनसे मुसोलिनी के बारे में पूछा तो यही कहती हैं कि वो अच्छे नेता थे, हमारी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी है लेकिन फासिज़्म तो बीते दिनों की बात हो गई है. मतलब खुलकर कभी नकारा नहीं। 
इनका गठबंधन बर्लुस्कोनी और प्रवासी विरोधी द लीग के साथ गठबंधन भी बनाया है. अब चुनाव के बाद इनकी जीत की सम्भावना है. अगर ऐसा हुआ तो जॉर्जिया मेलोनी इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं. ये एक इतिहास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है कि कोई पहली महिला प्रधानमंत्री बनेगी लेकिन मेलोनी की पार्टी की नीतिओं और विचारधारा की वजह से इटली ही नहीं पूरे यूरोप की लिबरल आबादी की चिंता बढ़ गई है. सबसे ज्यादा ये कि पूरा यूरोप बाढ़, भूकंप, आतंकवाद, युद्ध और भुखमरी से प्रभावित अफ़्रीकी, अफगानी, सीरियन या मिडल ईस्ट के प्रवासियों के लिए दरवाजे खोले रखता है, लेकिन ये पार्टी सत्ता में आई तो इटली में प्रवासियों पर रोक के साथ साथ उनको निकालने की भी प्रक्रिया चालू हो जाएगी. मेलोनी खुद सिविल और समलैंगिग अधिकारों के खिलाफ बात करती हैं, यहाँ तक की जनसँख्या बढ़ाने की भी बात करती हैं.
सबसे मुख्य बात है कि ब्रदर्स ऑफ़ इटली को पिछले चुनाव में सिर्फ 4% वोट मिले थे जो इसबार 26% हो गए हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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