Wednesday, August 19, 2015

बिहार को हक मिला या चैरिटी?

पिछले 2-3 महीने से मैने व्यस्तता के कारण राजनीतिक ब्लॉग बंद कर रखे थे, पहले तो 15 अगस्त को उनके भाषण को काउनटर करने के लिए मन बनाया लेकिन सोंचा कि आज का दिन जाने देते हैं, फिर कभी राजनीति कर ली  जाएगी, एक दिन तो प्रधानमंत्री का सम्मान हर हाल में करना ही पड़ेगा। लेकिन जब कल उनका बिहार में भाषण सुना तो रहा नहीं गया। कल प्रधानमंत्री की जिस तरह की भाषा थी, उससे तो लग रहा था कि यह लोकतंत्र नहीं है। यहाँ के लोगों ने प्रधानमंत्री(तथाकथित प्रधान सेवक) तो नहीं चूना है, लेकिन एक शासक चूना है। शासक की ही भाषा में प्रधानमंत्री बोलते हुए दिखे। दिल्ली को सल्तनत कहना और फिर खुद को उसका बादशाह समझते हुए एक सरकारी कार्यक्रम में जनता से पूंछना,"कितना चाहिए आपको? 50 हजार करोड़, 60 हजार करोड़, 90 हजार करोड़ या 100 हजार करोड़।।।।।।।।।।चलो कोई बात नहीं मैं  सवा सौ लाख करोड़ देता हूँ। कम से कम बिहार को बीमारु राज्य तो नहीं कहना चाहिए था। बीमारु राज्य की जगह पिछड़ा कहा जाता तो ठीक था। जिस तरह से खैरात बांटने के अंदाज में भाषण दिया जा रहा था उससे तो लगता है कि यह बिहार को भीख दी जा रही थी। प्रधानमंत्री को यह समझना पड़ेगा कि नीतीश कुमार और बिहार अपना हक मांग रहे थे, भीख नहीं। उनको हक और चैरिटी में अंतर समझना पड़ेगा। वो देश के प्रधान मंत्री हैं, उनको भाषा की सालीन्ता तो रखनी ही पड़ेगी। क्यों वो नीतीश के स्पेशल स्टेटस की मांग को एक चैरिटी की मांग की तरह पेश कर रहे थे? क्या प्रधान मंत्री को अपने कथित फ़ेडरल स्ट्रक्चर को नहीं ध्यान में रखना चाहिए। राज्य केन्द्र से माँगता है इसका मतलब यह नहीं है क़ि वो चैरिटी मांग रहा है। संविधान के अनुसार वो अपना हक मांग रहा है। मोदी जी की इस भाषा को उनके तथाकथिक भक्त यह कहकर बचाव कर रहे हैं क़ि लोकतंत्र में जनता ही सबकुछ है, जनता नें तो उनके भाषण पर खूब तालियाँ बजाईं। तो मेरा जवाब यह है कि पहले और आज भी थिएटर में जनता ऐसी दृश्यों पर खूब तालियाँ और सीटी बजाती है, जो कानून और समाज के हिसाब से बिल्कुल जायज नहीं होता है। जैसे कोई बहुत रोमांटिक किस या हिंसात्मक लड़ाई झगड़े का दृश्य। इसलिए त्वरित प्रतिक्रिया के तौर पर आप इसको सही नहीं मान सकते हैं। जाहिर सी बात है उस रैली या कार्यक्रम में उनके या भाजपा के समर्थक ही ज्यादा होंगे। तो क्या भाजपायों की तालियों पर ही पूरे देश की राय मान ली जाए?
अब भाषा पर टिप्पणी के बाद मैं आना चाहता हूँ इस ऐलान के आंकडो पर। पहली बात तो यह कि असल में बिहार को जो चाहिए था, वो तो मिला ही नहीं है। विशेष राज्य का दर्जा मिलने का अर्थ है कि हर क्षेत्र में उस राज्य को आगे बढ़ने के लिए प्रयास किया जाएगा। और जब तक वह राज्य आंकड़ों के  हिसाब से सबके बराबर ना आज जाए तब तक यह प्रयास जारी रहेगा। लेकिन कल जो प्रधान मंत्री ने घोषणा की वो तो एक बजट का प्रारूप था, जो कि आने वाले वर्षों ने बिहार को दिया जाएगा। किसी वादे को जनता ऐसे कैसे पक्का मान ले, जो असलियत में अमल करने के लायक है भी या नहीं? यह राशि जो प्रधान मंत्री ने बिहार के लिए घोषित की वो उसी तरह का वादा है जो उन्होने लोकसभा चुनाव के समय 15 लाख प्रति व्यक्ति के हिसाब से देने की बात कही थी, जो बाद में एक जुमला साबित हुई। इसमें से कई ऐसे वादे हैं जो पूरे होने बहुत ही मुस्किल हैं, जैसे बिहार में सडकें बनाने के लिए सरकार ने लगभग 13 हजार करोड़ देने की बात की, जबकि बजट के अनुसार तो पूरे देश को 14 हजार करोड़ ही दिए गए थे। यह आंकड़ा आगे की 2-3 पंचवर्षीय योजनाओं के लिए हो सकता है। इसी तरह से कई ऐसी बातों को भी बजट बनाकर पेश कर दिया गया, जो योजनाएँ पिछले कई सालों से चल रही थी। प्रधान मंत्री ने इस पैकेज को पैकेजिंग के साथ पेश किया जो उनकी मार्केटिंग क्षमता को दर्शाता है।  
कल रवीश कुमार ने प्राइम टाइम में कुछ आंकड़े पेश किए उन्ही को कोर्ट करते हुए मैं अपनी बात को आगे बढाना चाहता हूँ। 
प्रधानमंत्री बिहार पर दिल खोल कर खजाना न्यौछावर कर रहे थे। उनके बोलने के अंदाज से लग रहा था कि केंद्र के लिए किसी राज्य को पैसे देना बाएं हाथ का खेल है। जिस अंदाज़ और दरियादिली से बिहार के लिए ऐलान हुआ है उससे कई राज्यों को ईर्ष्या हो सकती है। पीएम ने कहा कि सवा लाख करोड़ के अलावा चालीस हज़ार करोड़ भी है। कहा कि पुरानी सरकार ने 12,000 करोड़ का पैकेज दिया था जिसका 8282 करोड़ रुपया बाकी पड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने में 12,000 करोड़ के काम चल रहे हैं। बांका में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप का बिजली का कारखाना लगने वाला है 20 हज़ार करोड़। ये भी जोड़कर एक लाख पैंसठ करोड़ हो जाता है।
- पत्र सूचना कार्यालय की साइट पर सवा लाख करोड़ किस-किस सेक्टर में खर्च होंगे या हो रहे हैं उसका ब्यौरा दिया गया है। एक लाख करोड़ के डिजिटल इंडिया के अज्ञात बजट से डिजिटल बिहार के लिए 449 करोड़ का प्रावधान किया गया है। पर्यटन के लिए 600 करोड़।
- राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय, मछली पालऩ, फार्म वाटर मैनेजमेंट, खेती के मशीनीकरण, बीज उत्पादन सिस्टम, अनाज रखने के नए गोदामों के लिए 3094 करोड़ रुपये दिये गए हैं।
- भागलपुर के नज़दीक केद्रीय विश्वविद्यालय और बोधगया में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट के लिए 1000 करोड़।
- मेगा स्कि यूनिवर्सिटी बनाने के लिए 1550 करोड़।
- पटना, भागलपुर, गया के मेडिकल कॉलेजों को बेहतर करने के लिए 600 करोड़।
- बिजली की कई योजनाओं के लिए 16,130 करोड़।
- नेशनल हाईवे, 12 रेल ओवरब्रीज बनाने, गंगा, सोन और कोसी पर पुल बनाने के लिए 54,713 करोड़।
- रेलवे लाइनों के विद्युतीकरण के लिए 8,870 करोड़।
- पटना, में नया हवाई अड्डा बनाने और गया, रक्सौल और पूर्णिया के हवाई अड्डों में सुधार के लिए 2700 करोड़।
- बरौनी रिफाइनरी के विस्तार, नया पेट्रोकेमिकल प्लांट, गैस पाइपलाइन बिछाने के लिए 21,479 करोड़।


इसी तरह बिहार को ग्रामीण सड़कों के लिए जो पैकेज दिये जाने की बात कही गई है उसे जब हमने इस साल के बजट पेपर से मिलाया तो हिसाब कुछ और निकला। ग्रामीण सड़कों के लिए 13,820 करोड़ दिये जाने की बात कही गई है। केंद्रीय बजट में पूरे भारत की ग्रामीण सड़कों के लिए 14,291 करोड़ का प्रावधान है। इसमें से 1155 करोड़ नॉर्थ ईस्ट और सिक्किम के लिए है। यानी शेष भारत के लिए बचता है 13,136 करोड़ तो आप बताइये बिहार को कैसे मिल गया 13,820 करोड़। 684 करोड़ ओवरड्राफ्ट हो गया। नीतीश कुमार का दावा है कि प्रधानमंत्री के ऐलान में कई योजनाएं ऐसी हैं जो पहले से मंज़ूर हैं या पहले से केंद्रीय योजनाओं के तहत चली रही हैं। कृषि के लिए बिहार ने 41,587 करोड़ मांगा था, मिला है 3094 करोड़। कौशल विकास के लिए 12580 करोड़ और मिला है 1550 करोड़। शिक्षा के लिए 1000 करोड़ दिया है। नीतीश ने कहा कि 1000 करोड़ में क्या होगा। इसमें आईआईएम और केंद्रीय विश्वविद्यालय भी बन जाएगा। नीतीश ने कहा कि ये उसी टाइप का है जैसे लोकसभा में कहा गया कि चुनाव के बाद सबको 15 से 20 लाख रुपया मिलेगा।
कुछ ही दिन पहले दिल्ली में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री ने बाढ़ पीड़ितों की सहायता और पुनर्वास के लिए 21000 करोड़ की मांग की थी जो नहीं मिली है। इसी फरवरी में केंद्र ने आंध्र प्रदेश को 350 करोड़ का विशेष पैकेज दिया है जबकि मांग थी 24,500 करोड़ की।
जम्मू कश्मीर सरकार ने भी बाढ़ राहत और पुनर्वास के लिए 44,000 करोड़ की विशेष पैकेज मांगा है। अभी तक उसे 5039 करोड़ मिले हैं। वसुंधरा राजे ने भी राजस्थान के किसानों के लिए 11,886 करोड़ की मांग की है। मोदी सरकार ने जिस 14वें वित्त आयोग के सुझावों को स्वीकार किया है उसके अनुसार केंद्रीय करों का 42 फीसदी हिस्सा राज्यों को दिया जाएगा। लेकिन इसकी भरपाई केंद्रीय वित्त मंत्री ने कई केंद्रीय योजनाओं का बजट काट के कर ली। 14वें वित्त आयोग ने 11 कमज़ोर राज्यों के लिए ग्रांट की बात की है। इसके अनुसार जम्मू कश्मीर को 2019 से 20 तक 1,94,821 करोड़ मिलेगा। तो बिहार को एक लाख पैंसठ हज़ार करोड़ कितने साल में मिलेगा।


Sunday, July 12, 2015

उत्तर प्रदेश की वीर रस गायनशैली आल्हा....

हमारे गांव में बारिश के मौसम में आल्हा बहुत सुना जाता है। यह एक बुंदेलखण्डी भाषा में गाया जाने वाला वीर रस का काव्य है। 
"नदिया बही खून की धार"
"भुजा फडकि रहि है ऊदल की"
जैसी पंक्तियाँ बताती हैं इसका जोश। हमारे यहां तो एक ठाकुर लडके ने आल्हा की एक लाइन सुनकर जोश में आकर अपने पिता के कातिल को मार दिया था।
वो लाइन थी, "जिनके लडिका समरथ हुइ गए, उनका कौन पडी परवाय।"
पौराणिक कथाओं के अनुसार जालौन जिले में ऐतिहासिक स्थलों का अलग महत्व है। कभी दिल्ली, कन्नौज और महोबा की रियासतों के केंद्र रहे एट थाना क्षेत्र का बैरागढ़ अकोढ़ी में दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान और महोबा के आल्हा, ऊदल की आखिरी लड़ाई हुई थी। मान्यता है कि आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था। लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) यहीं मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी। जिसे आज तक कोई साधा नहीं कर पाया है। मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं। 
एट से आठ किलोमीटर दूर मां शारदा में श्रद्धालुओं का तांता लगा था। साधक तंत्र साधना में लीन थे। पुजारी शारदा शरण ने मंदिर बताया कि उनके पूर्वज 1433 ईसवी से मंदिर की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। मां शारदा शक्ति पीठ का उल्लेख दुर्गा सप्तसती में भी है। मान्यता है कि पृथ्वी की मध्य धुरी बैरागढ़ में है। कहते हैं कि मां शारदा की मूर्ति की किसी ने स्थापना नहीं की है। यह जमीन से अपने आप ही उदय हुई है। जब महोबा के राजा परमाल के ऊपर पृथ्वीराज चौहान की सेना ने हमला किया तो उनके वीर योद्धा आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान से युद्ध के लिए बैरागढ़ में ही डेरा डाल रखा था। यहीं वह पूजा अर्चना करने आए तो मां ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें युद्ध के लिए सांग दी। काफी खून खराबे के बाद पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध से खिन्न होकर आल्हा ने मंदिर पर सांग चढ़ाकर उसकी नोक टेढ़ी कर वैराग्य धारण कर लिया। मान्यता है कि मां ने आल्हा को अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की माने तो आज भी कपाट बंद होने के बावजूद कोई मूर्ति की पूजा कर जाता है। बहरहाल आस्था व शक्ति की प्रतीक मां शारदा के हर नवरात्रि पर लाखों लोग दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं। 
शारदा शक्ति पीठ के ठीक पीछे बने कुंड के बारे में मान्यता है कि इसमें एक बार स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। यह कुंड कभी खाली नहीं हुआ है और न ही कोई उसे खाली कर पाया है। इस कुंड में अब तक न जाने कितने चर्मरोगी स्वास्थ्य लाभ ले चुके हैं। कई बार पंप से कुंड को खाली करवाने का प्रयास किया गया है लेकिन कभी भी कुंड खाली नहीं हुआ। आज तक कोई भी कुंड की गहराई नहीं नाप सका है। पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल के बीच 52 बार युद्ध हुआ और हर बार पृथ्वीराज की सेना को भारी क्षति हुई। बुंदेली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही आदर भाव से लिया जाता है। बुंदेली कवियों ने आल्हा का गीत भी बनाया है। जो सावन के महीने में बुंदेलखंड के हर गांव गली में गाया जाता है। जैसे पानी दार यहां का पानी आग, यहां के पानी में शौर्य गाथ के रूप से गाया जाता है। यही नहीं बड़े लड़ैया महोबे वाले खनक-खनक बाजी तलवार आज भी हर बुंदेलों की जुबान पर है। राजा परमाल की बेटी बेला का पृथ्वीराज की सेना ने अपहरण करने की धमकी दी थी। जिस पर कीरत सागर के मैदान में महोबा व दिल्ली की सेना के बीच युद्ध हुआ। इसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और आल्हा ऊदल की सुरक्षा में बेला ने सावन के बाद पड़ने वाले त्योहार भुजरियां सागर में विसर्जित की।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...