आज कल बनारस का नाम पूरे मीडिया और समाज में बड़ी गंभीरता से लिया जा रहा है। इतना तो पहले कभी इस धर्मनगरी की चर्चा नहीं हुई थी। आज इस बहस या चर्चा का कारण है भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का चुनाव लड़ना। उसके बाद सबकी नजर तब से और यहीं लगी है जब से आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने भी मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। अब अगर बात करें कि यहाँ पर किसका पलड़ा भारी है तो केजरीवाल को भी पता है कि मोदी यहाँ से हावी हैं। लेकिन उन्होंने संघर्ष करने की ठान ली है। वो नामुमकिन को मुमकिन करना जानते हैं। तभी तो वो मोदी को हराने की भी बात कह रहे हैं। दरअसल केजरीवाल ने खुद के लिए बहुत उंची गाइडलाइन्स बना दी हैं। मीडिया और उनके दोस्तों ने इस मुद्दे को इतना उठा दिया कि अगर केजरीवाल कहीं और से लड़ते तो जनता में गलत संदेश जाता। यही बात कुमार विश्वाश के साथ भी हुई थी।
बनारस को लेकर भाजपा को निश्चिंत होना चाहिए था, लेकिन उन्हें पता नहीं क्या डर है कि मोदी बड़ोदरा से भी चुनाव लड रहे हैं। भाजपा को कुछ ना कुछ डर तो है ही। तभी तो अपने गढ में भी मोदी को सुरक्षित सीट नहीं लग रही है। उन्हें पता है कि अगर केजरीवाल ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो पिछले कई वर्षों का मुरली मनोहर जोशी, भाजपा विधायकों, नगर पार्षदों तक का हिसाब मोदी को ही देना पड़ेगा। केजरीवाल ने जिस तरह से नई दिल्ली में शीला दीक्षित को हराया था, उससे तो यही लगता है कि वो यहाँ भी यह करिश्मा कर सकते हैं। लेकिन यहाँ के हालात नई दिल्ली से बहुत अलग होने वाले हैं। यह वह जगह है जहाँ पिछले 2009 के लोकसभा चुनाव में भी सम्प्रदायिक ध्रवीकरण हुआ था। जबकि पहले पूरे यूपी में ऐसा नहीं हुआ था। यहाँ से एक बात और दिलचस्प हो गई है कि पूर्वांचल के बाहुबली मुख़्तार अन्सारी भी चुनाव लड रहे हैं। पिछली बार भी उन्होंने लगभग एक लाख 85 हजार वोट पाए थे, जो जोशी से 18 हजार कम थे। लेकिन पिछली बार वो बसपा से थे। इसबार उन्होने कौमी एकता दल से लड़ने का फैसला किया है। इसबार के कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय पिछली बार सपा से लड़े थे, जिन्हें सवा लाख के करीब वोट मिले थे। कांग्रेस और अपना दल के प्रत्याशी को भी 65-65 हजार वोट मिले थे। अगर इस हिसाब से गणित लगाया जाए तो कहना मुस्किल नहीं है कि इसबार भी भाजपा ही मजबूत होगी। उपर से केजरीवाल भी मोदी का वोट काटने में फिलहाल अभी तो सक्षम नहीं हैं। क्योंकि यहाँ इसबार भी हिन्दुत्व का एजेंडा हावी हो रहा है। यहाँ के मुस्लिम और ब्राम्हण मतदाता जो 2.5-2.5 लाख की संख्या में हैं, बहुत निर्णायक साबित होंगे। इसबार अति-पिछड़ी जातियों का किसी के साथ जाना तय नहीं है। इसमें कुछ जातियाँ बसपा और अपना दल के साथ भी जाएंगी। अगर अटकलों के अनुसार अपना दल से स्वयं अनुप्रिया पटेल चुनाव लडती हैं तो कुर्मी जाति के वोट (जो मोदी की लहर में हैं) उन्हें ही प्राप्त होंगे। फिर भी यह भाजपा का पिछली बार के मुकाबले घाटा नहीं होगा। अजय राय को इसबार यादव वोट नहीं मिलेगा, कांग्रेस का कोई ठोस वोट बैंक ना होने परअपनी दबंग छवि पर ही भरोसा है। सपा का भी इसबार यहाँ यादव वोट छोड़ कर कुछ नहीं बचा है। अगर बसपा की बात करें तो यहाँ का दलित वो उनके लिए पक्का है, जिसकी सँख्या एक लाख से ज्यादा है। पिछली बार उसे मुख़्तार अन्सारी की मुस्लिमों के बीच रॉबिन हुड टाइप छवि के बावजूद मुस्लिम वोट बहुत ज्यादा नहीं मिला था। लेकिन इसबार मुस्लिम किसके साथ जाएंगे यह कहना मुस्किल है। कांग्रेस जीतने की हैसियत में नहीं है, सपा की मुजफ़्फ़र नगर दंगों के बाद छवि अल्पसंख्यक विरोधी हुई है, लेकिन मुलायम का आजमगढ से लड़ना एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक है। बसपा को मुस्लिम धर्म गुरुओं के समर्थन के बाद उम्मीद है कि यह तबका उन्हें ही जिताएगा। लेकिन बीच में आ गए अरविन्द केजरीवाल। उनके पास केवल अपना बड़ा नाम छोड़कर कुछ नहीं है। वो किसका वोट कटेंगे यह कहना मुस्किल है। ईमानदारी और विकास के नाम पर मोदी का गैर-सम्प्रदायिक वोट भी वो खींच सकते हैं। (जैसा कि मैने पहले ही कहा कि मोदी का ब्राम्हण वोटबैंक मजबूत है। अगर सम्प्रदायिक ध्रवीकरण हुआ तो कुछ और भी इसमें जुड़ सकते हैं। ) गैर-यादव पिछड़ा वर्ग भी उन्हें मिल सकता है अगर निर्दलियों की संख्या ज्यादा ना हो तो। उन्हें अपना आधार अभी बनाना बाकी है। उन्हें सबसे अकेले लड़कर सबका वोट काटना पड़ेगा। मुस्लिम वोट का सब जगह जाना तितर-बितर होने का अंदेशा है, लेकिन पक्का कहना मुस्किल है कि मोदी को रोंकने के लिए यह किधर जाएगा। फिलहाल अभी तो लड़ाई केजरीवाल बनाम मोदी नहीं है, लेकिन बसपा भी बड़ी दावेदार होगी। यह कह सकते हैं कि इसमें कांग्रेस तो मोदी का ही फायदा कराएगी। मुझे तो यह भी अंदेशा है कि मुख़्तार अन्सारी का लड़ना भी कहीं भाजपा की ही चाल ना हो? हाँ एक बात मैं और कह सकता हूँ कि केजरीवाल के आने से यह फायदा जनता को होगा कि साम्प्रदायिकता के अलावा जनता के मुद्दों की भी बातें होंगी। क्योंकि उन्हें विकास के मुद्दे का ही सहारा है, वो भी गुजरात विकास मॉडल को को फेल करने का।
क्या होगा इसपर तो बहुत चर्चाएं और भविष्यवाणियाँ होती रहेंगी। लेकिन जो होगा वो किसी को पता नहीं है। फिलहाल मैने अपने यूपी के राजनैतिक अनुभव के आधार पर कुछ राय व्यक्त कर दी है। आगे की राजनीति पर नजर पूरे देश की रहेगी। कम से कम इसी बहाने काशी का कुछ भला हो जाए।