आजकल पूरे देश में उत्तर प्रदेश की ही बातें हो रही हैं। कारण है देश में होने वाले लोकसभा चुनाव। यह बात बहुत पहले से कही जाती रही है कि दिल्ली का रास्ता उत्तरप्रदेश से होकर ही जाता है। अब सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश किसको प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाएगा? इसमें सबसे पहले नंबर आता है नरेन्द्र मोदी का जो इस समय दिल्ली तक जाने के लिए यूपी के क़िले में अपने खास सिपाहसलार अमित शाह को भेज चुके हैं। और खुद यहाँ की धर्म नगरी बनारस से चुनाव भी लड रहे हैं। मैं हर दो तीन महीने में उत्तरप्रदेश जाता रहता हूँ। नवम्बर या दिसंबर के समय सच में पूरे यूपी में मोदी की चर्चा हो रही थी, जो फरवरी-मार्च आते-आते धीमी पड गई है। मोदी की लहर को कम करने के लिए केजरीवाल का हाथ शहरों में तो हो सकता है लेकिन उत्तरप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में नहीं। इसके और भी अन्य कारण हैं। आज प्रदेश भर में राजनीतिक माहोल गर्म है। हर बड़ा नेता-अभिनेता यहाँ से चुनाव लड रहा है। अगर यूपी की राजनीति का मैं निष्पक्ष रूप से विश्लेषण करूं तो पाता हूँ। कि यहाँ का मुकाबला चतुष्कोणीय होने वाला है। यहाँ पर यह अनुमान लगा पाना कि किसको कितनी सीटें मिलेंगी? असंभव है। मुझे लगता है सभी सर्वे वाले भी सीटों के मामले में भी तुक्का मार रहे हैं। अगर पार्टीवार हम देखें तो सबसे पहले समाजवादी पार्टी को 2012 के विधानसभा चुनाव के हिसाब से बहुत बड़ा नुकसान होने वाला है। हाँ यह मान सकता हूँ कि 2009 लोकसभा के आस-पास उसका प्रदर्शन रह सकता है। समाजवादी पार्टी अपने MY वोट बैंक को बचना चाहती है लेकिन मुज़फ़्फरनगर दंगों का डैमेजकण्ट्रोल करना बहुत मुस्किल होता जा रहा है। मुलायम सिंह यादव के पास मुस्लिम धर्म गुरुओं की एक पूरी फ़ौज है जो इसबार सपा के लिए प्रचार कर रही है, लेकिन सफलता दूर है। यादव वोट कुछ हद तक बचा हुआ है लेकिन पिछले दो सालों में छुटभैये यादव नेताओं पर अखिलेश द्वारा लगाई गई लगाम उन्हें नाराज कर गई। एक बार को यादवों ने सोंचा भी था कि मोदी को देख लिया जाए। लेकिन अंततः उन्हें यही लगा कि भाजपा सरकार में ब्राम्हणों के अलावा किसी की नहीं चलेगी। अभी तो अपने 3 साल और हैं। मुलायम के पाले में फिर से यादव जा चुके हैं। मुलायम सिंह यादव को सबसे बड़ा नुकसान हुआ है गैर-यादव पिछड़े वोटों का जिनकों अखिलेश नें स्वयम् इकत्र किया था। मीडिया द्वारा बनाई गई छवि नें अखिलेश को मध्यवर्ग में हीरो से विलन बना दिया है।
अगर बात कांग्रेस की करें तो वो यहाँ के रण से पहले ही बाहर हो चुकी है। उसका अभेद क़िला "अमेठी" जहां के बारे में मैने खुद कई बार ट्वीट किया था कि राहुल को केवल यह बताना है कि वो राजीव गाँधी के पुत्र हैं, बस वो जीत जाएंगे। लेकिन अब कुमार विश्वास भी इस बाजी को पलटने की तरफ बढ गए हैं। कांग्रेस का कोई भी ठोस वोट बैंक बचा नहीं है। मुस्लिम भी इस बार कांग्रेस को वोट देगा इसकी गारण्टी कम है। कांग्रेस की सीटों की संख्या दहाई तक पहुंचना ही बहुत बड़ी बात होगी।
नई नवेली आम आदमी पार्टी को उत्तर प्रदेश में गाज़ियाबाद या एक दो और सीटों के अलावा कोई उम्मीद नहीं है। कुछ शहरों में उसको वोट तो अच्छा खासा मिल सकता है लेकिन जीत अभी दूर की बात होगी। आम आदमी पार्टी सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा का करती दिख रही है। भाजपा के सेकुलर वोटर जो विकास के नाम पर मोदी से जुड़े थे, उनमें से कुछ प्रतिशत का आम आदमी पार्टी के पक्ष में जाना तय है।
अगर मीडिया के अनुसार देखें तो बहुजन समाज पार्टी सबसे पिछड़ी नजर आ रही है। लेकिन इस समय बहुजन समाज पार्टी की जमीनी हकीकत, जो मैने देखी है वो सबसे मजबूत है। मायावती ने इस बार अपनी बेजोड़ सोसल इंजीनियरिंग से एक नया प्रयोग किया है। अपने दलित+ब्राम्हण(30%) वोटबैंक के बजाय वो इस बार दलित+मुस्लिम(40%) गठजोड़ बनाने पर लगी हैं। इसमें उनको बहुत हद तक सफलता भी मिल चुकी है। मायावती को आज ही बरेली के मुस्लिम धर्म गुरु तौकीर रजा का समर्थन मिल गया है। जिनका केजरीवाल से सम्बंध रहा है। उन्होंने इस बार मोदी के रथ को रोकने का सबसे बड़ा हथियार हाथी को ही बनाया है। इसके पहले बसपा को दिल्ली की जामा मस्जिद के साही इमाम बुखारी, जमियत-ए-उलेमा हिन्द के मुखिया महमूद मदनी और अन्य मुस्लिम संगठनो का साथ मिल चुका है। सभी ने मोदी को रोंकने के लिए बसपा को वोट देने की बात कह दी है। बसपा को सफलता के लिए दो-तीन बातों को संभालना होगा। जैसे अपने को भाजपा का नंबर एक दुश्मन बताना, जो 15 जनवरी की रैली में मायावती ने कहा भी था। और भाजपा से पिछले रिश्तों को याद ना आने देना। दूसरी बात अपने जागरूक दलित वोट को उदिटराज जैसे लोगों के झांसे में ना आने देना। तीसरी और महत्वपूर्ण बात उसे मुलायम पर छोड़ देनी है। मतलब मुलायम मोदी को मुसलमानों का कट्टर दुश्मन बताते रहें और खुद कांग्रेस और सपा की पिछली नाकामियों को गिनाती रहें। हालांकि इसमें कुछ रिस्क भी है। जैसे हिन्दुत्व का हावी होना भाजपा को फायदा पहुँचा सकता है। या इस दौर में मुस्लिम कांग्रेस को अपना साथी ना मान बैठे। वहीं अगर बसपा के पुराने गणित दलित+ब्राम्हण की बात की जाए, तो वो इस बार नहीं चलेगा।
इस बात का अहसास बसपा को भी है। क्योंकि ब्राम्हण वोट इसबार मोदी की लहर में आ गया है। इसीलिए बसपा ने टिकट बंटवारे में सबसे सफल प्रयोग कर दिया है। 18-18 मुस्लिम और ब्राम्हण उम्मीदवार उतार दिए हैं। इस सोसल इंजीनियरिंग में अगर बसपा को उसके प्रत्याशी के नाम पर कुछ ब्राम्हण वोट मिल गए तो यह उसके लिए बोनस जैसा होगा। उसने इसी को ध्यान में रखते हुए अति-पिछड़ा वर्ग के कांशीराम के पुराने साथियों रामसमुझ पासी और किशनपाल को अपने साथ लाने का प्रयास भी कर लिया है। उसका कैडर और कार्यकर्ता पूरी तरह से तैयार हैं। कमलेश दिवाकर और रामप्रकाश कुशवाहा जैसे पूर्व विधायकों ने पूरी तरह से तैयारी शुरु कर दी है। अगर बहन जी के दांव पूरी तरह से सही बैठ गए तो तहलका की उस स्टोरी को मैं भी जमीन पर महसूस कर रहा हूँ, कि मोदी के सपनों पर बसपा ही पानी फेर देगी।
अब अगर मैं मोदी या भाजपा की बात करूं तो यह निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि भाजपा इसबार अपने पिछले प्रदर्शन के मुकाबले बहुत सुधार करने जा रही है। अमित शाह के आने केबाद से भाजपा में एक नई जान आ गई है। लेकिन मोदी लहर को अभी पिछले हफ्ते ही तब एक बड़ा झटका लगा जब टिकट बंटवारा हुआ। यूपी में टिकट बंटवारे में कलराज मिश्र, जोशी और लालजी टंडन सरीखे नेता झंखार की तरह उलझे हैं। हर सीट पर कई दावेदार होने की वजह से भाजपा ने कुछ को असंतुष्ट तो किया ही है। सब अपने-अपने लिए सुरक्षित सीट भी मांग रहे थे। कानपुर में ही जोशी को श्रीप्रकाश जायसवाल से ज्यादा सतीश महाना से लड़ना पड़ेगा। राजनाथ को लालजी से, भोले(अकबरपुर, कानपुर देहात) को अरुण तिवारी बाबा से। इसी तरह भाजपा को बाहर से लाए हुए नेताओं पर की गई मेहरबानी महगी पड़ेगी। जमीनी स्तर पर भाजपा अब पहले के मुकाबले कमजोर पड रही है। इस तरह से देखा जाए तो इस बार यूपी के चुनाव सबसे मजेदार और दिलचस्प होने वाले हैं। हर दल और नेता अपनी ताकत झोंके हुए हैं, लेकिन जनता अपना वोट किसे देगी? यह तो भविष्य के गर्भ में छुपा है। लेकिन इसबार यूपी पर होने वाला हर सर्वे गलत साबित होगा। भाजपा और बसपा में टक्कर हो रही है। लेकिन मीडिया इसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं। वो कहीं और ही अपनी नजर लगाए बैठा है।
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