Sunday, April 15, 2018

अंबेडकर पर सामान्य ज्ञान

भारत में जातिवाद आज नहीं हजारों साल से है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। मतलब उनकी जाति के आधार पर उनके काम मिलना। ब्राह्मणों का काम पढने पढ़ाने, क्षत्रिय का लड़ने, वैश्य मतलब बनिया जो बिजनेस मैन थे। बाकी सब शूद्र। ये तो बडा गलत था क्योकि अगर कोई टैलेंटेड आदमी शूद्र जाति में पैदा हुआ तो वो पढ लिख नहीं सकता था। यहाँ तक कि ये नियम था कि अगर वो पढते लिखते मिल जाए तो उसके कानों गरम तेल डलवा दो। रामायण में एक कहानी छुपाई गई जब शंभूक नाम का एक शूद्र आदमी वेद पढ रहा था और उसकी शिकायत किसी ब्राह्मण ने भगवान राम से कर दी  और राम ने उसे मार दिया। तुमने एकलव्य की कहानी सुनी होगी जिसमे शूद्र धनुषधारी को शिक्षा न देकर अन्याय किया गया जबकि उसमें इतना टैलेंट था कि मूर्ति देखकर अभ्यास करते हुए अर्जुन को पीछे छोड़ दिया था। शिवाजी महाराज का राजतिलक करने से पूना के ब्राह्मणों ने क्यों मना कर दिया था? क्योंकि वो मराठी (ओबीसी) थे जिन्हे ब्राह्मण शूद्र कहते थे। नीची जाति के लोगों पर बडी जाति जैसे ठाकुर और पापियों ने खूब अन्याय किए। ये नियम थे कि उनकी परछाई तक बडी जाति के इलाके में न पडे। जब वो रास्ते पर चलेंगे तो अपनी कमर में एक झाडू बांध लेंगे क्योंकि उनके चलने से अछूत हुई जगह साफ करते जाएँ। यहाँ तक कि तालाब से जानवर पानी पी सकते थे लेकिन नीची जाति का इंसान नहीं।
उसी समय पैदा हुए अंबेडकर ये सब झेल रहे थे। उसको तांगे वाला नहीं बिठाता था, नाई बाल नहीं काटता था क्योंकि वो शूद्र था। न स्कूल में पढ़ने देते थे। फिर भी वो अपमान सहकर जैसे तैसे ग्रेजुएट हुआ। जो सबसे पहला किसी दलित न किया। स्काॅलरशिप मिली तो लंदन जाकर पढने लगे। फिर उन्होंने जितनी मेहनत की शायद ही इतिहास में किसी ने की। एक छात्र के संघर्ष के लिए उनको अपना आदर्श मानना चाहिए। क्योंकि वो बेचारा लडका जिसके पास पैसे नहीं है वो सडक पर लाइट में पढकर, मजदूरी करके विदेश में पढा। जितनी डिग्री उसके पास हैं एमफिल, लाॅ, पीएचडी लगभग 26-27 डिग्री। आज तक किसी के पास नहीं है।  इकोनोमिक्स पर उनकी रिसर्च और लिखी किताबें आज भी ऑक्सफोर्ड में पढाई जाती हैं।फिर एकदम से उनका मन जगा कि चलो अपने देश के लिए कुछ करते  हैं, और जब यहाँ आकर देखा तो जातिवाद से बेहाल। इतने पढे लिखे आदमी को चपरासी पानी और फाइल हाथ में नहीं देता था। तो उन्होंने जातिवाद खतम करने के लिए और उनके हक के लिए कई आंदोलन किए। ब्राह्मण मानने को नहीं तैयार थे कि वो खतम हो। क्योंकि ये खत्म तो वो अपना राज किस पर करेंगे? इस कारण दुखी होकर अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोडकर बौद्ध अपना लिया। क्योंकि गौतम बुद्ध के धर्म में सबकी बराबरी थी पुरूष हो या महिला। छोटा हो या बडा।
फिर जब इतने बडे देश का कानून लिखने की बारी आई तो सबसे पढे लिखे अंबेडकर ही मिले। अब वो इस मौके को कैसे छोड देते? उन्होने कानून में एक नियम रखा कि आप नीची जाति के लोगों पर भेदभाव करते हैं तो ये क्राइम होगा। ये अमेरीका और अफ्रीका के ब्लैक लोगों के साथ भी होता था। फिर एक नियम रखा कि जो शूद्र लोग हैं उनकी क्या गलती है कि वो वहाँ पैदा हुए? तो उन्होंने उनके लिए जगह रिजर्व कर दी। मतलब 100 टीचर चाहिए तो सब ब्राह्मण वो भी पुरुष होते थे। अंबेडकर ने 18 दलित, 27 ओबीसी और 33 महिलाओं के आरक्षित कर दिया। अगर ऐसा न होता तो सब ब्राह्मण ही टीचर होते न ओबीसी होता न महिला। ये नैचुरल नियम है कि जिस समाज की जितनी आबादी हो उसका रिप्रजेंटेशन उसी रेशियो में होना चाहिए। दूसरा राज कयो करे?
दलित की डिफिनेशन है समाज के दबे हुए लोग। जिसमे महिला भी है। उसके साथ हमेशा अन्याय हुआ है। पहले महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार नहीं था। आदमी ले तो तलाक। उनको न वोट देने का अधिकार, न पढने लिखने और न शादी के बाद सेक्सुअल रिलेशन में अपनी मर्जी या अधिकार दिखाने का। वो किसी भी समस्या और दर्द में हो पति अपने मन की करता था। उसे बिस्तर तक ही समझते थे। आदमी जितनी मन हो शादी करे। न नौकरी का अधिकार न पारलियामेंट जाने का। अंबेडकर ने हर जगह महिलाओं को कानूनी हक दिला रहे थे। उनकी अंतिम इच्छा थी हिंदू कोड बिल जो पास हो जाता तो आज यहाँ की महिलाओं को अमेरिका जैसे शक्तिशाली बना देते। लेकिन ब्राह्मणों ने कहा कि उनको घर में ही खाना बनाने दो। और पास नहीं हुआ वो बिल। नेहरू गांधी पटेल सब विरोध में आ गए तो इस बात से दुखी होकर अंबेडकर ने अपने मंत्री पद और पारलियामेंट की मेंबरशिप से रिजाइन कर दिया। आज भी जो आरक्षण है वो समानता के लिए है। अगर हटा दिया जाए तो बैंक में निकलने वाली सब नौकरी बडे लोग ले जाएगे। न लड़कियों को मौका मिलेगा न गरीबों को। यही हाल स्कूल, काॅलेज, पारलियामेंट में होगा। कोई महिला या शूद्र न जा सकता। अगर बस या ट्रेन से महिला आरक्षण हटा दिया जाए तो लड़कियों को चढने भी न मिलेगा मजबूत लोग (पुरुषों) के आगे। इसलिए आरक्षण न्याय है कि सबको हिस्सा मिले केवल ताकतवर को नहीं। हालांकि मैं ओबीसी में भी नहीं आता फिर भी कानूनी हकीकत समझता हूँ। सच को सच कहता हूँ। शायद सबको इतनी जानकारी नहीं क्योकि जिन बडी जाति के लोगों की सत्ता चली गई है उनको डर लगता है और अफवाह फैलाने लगते हैं। आरक्षण खतम होगा तो केवल जाति के आधार पर क्यो? महिलाओं का भी करेंगे क्योंकि कुछ लोग तो कहते हैं कि इससे जेंडर डिस्क्रिमनेशन  होता है।

उन्नाव रेप में सिस्टम की नाकामी

उन्नाव कांड की खबर देश भर में फैल रही है. बलात्कार कांड में पीड़ित लड़की के पिता की बेरहम पिटाई से मौत के बाद तो कोई कितनी भी कोशिश कर लेता, इस कांड की चर्चा को दबाया ही नहीं जा सकता था. वैसे आमतौर पर ऐसे मामलों की चर्चा जिले स्तर पर ही निपट जाती है. लेकिन यह कांड जल्द ही पूरे प्रदेश में फैला और देखते ही देखते इसने पूरे देश में सनसनी फैला दी. मुख्यधारा की मीडिया में रोज़ कई-कई घंटे इसी कांड पर बहस हुई. मौजूदा हालात ये हैं कि इस मामले से निपटने के लिए न पुलिस को कुछ सूझ रहा है और न सरकार को. आमतौर पर देखा गया है कि जांच बैठाने के ऐलान से ऐसे कांडों की चर्चा फौरी तौर पर रुक जाया करती थी. लेकिन इस मामले में जांच का ऐलान भी बेअसर हो गया. मीडिया में इस कांड की चर्चा फिर भी नहीं रुकी. हालात इतने बदतर हो गए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट को स्वत संज्ञान लेने का ऐलान करना पड़ा. इसका मतलब है कि उन्नाव में कुछ बड़ा ही हो गया है. 

क्या हुआ?
सिर्फ बलात्कार का अपराध ही नहीं हुआ. बल्कि पीड़ित लड़की ने उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के एक विधायक पर बलात्कार का आरोप लगाया है., यह बात भी इस कांड की चर्चा को देशव्यापी बनाने के लिए काफी नहीं थी. सनसनी तब फैली जब पीड़ित लड़की के पिता की बेरहमी से पिटाई के कारण मौत हो गई और मौत भी जेल में हुई. सो देश में सबको यह पता चला कि पीड़ित के पिता पर ही दबिश के लिए मामले बनाए गए थे और लड़की के पिता को जेल तक पहुंचा दिया गया था. वैसे बिगड़ी कानून व्यवस्था के लिए कुख्यात किसी प्रदेश में जेल में मौतें भी अनसुनी नहीं हैं लेकिन इस  कांड ने जोर तब पकड़ा जब इतना सब कुछ होने के बावजूद आरोपी विधायक के खिलाफ एफआईआर लिखने की प्रकिया ही अंजाम तक नहीं पहूंच पाई. यानी उन्नाव कांड अपराधिक न्याय प्रणाली की मौजूदा हालात पर सवाल उठाते हुए चैतरफा चर्चा में जरूर है लेकिन यह कांड हद से ज्यादा बड़ा बना है कथित राजनीतिक दखल के कारण. 

कानून व्यवस्था का राजनीतिक पहलू
कोई भी राजनेता कितना भी कहता रहे कि कानून अपना काम करेगा, लेकिन हम ऐसा इंतजाम कर नहीं पाए हैं कि कानून का पालन कराने वाली एजेंसियां राजनीतिक दबाव से मुक्त हो सकें. कौन नहीं जानता कि पुलिस के अधिकारी की तैनाती और  जब चाहे तब उनके तबादले राजनीतिक इच्छा से ही होते हैं, और फिर देश का सबसे कारगर समझे जाने वाली जांच एजेंसी सीबीआई तक को जब सरकार का तोता कहा जा चुका हो तो एक प्रदेश के दरोगा की हैसियत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. यानी उन्नाव कांड के इस राजनीतिक पहलू को समझने के लिए किसी को अपराधशास्त्र का अध्ययन करने की जरूरत नहीं है. 
इस कांड को सोच-विचार के लिए अगर किसी प्रशिक्षित अपराधशास्त्री को पकड़ा दिया जाए तो वह अपनी किताबी ज्ञान के आधार पर इसे श्वेतपोश अपराध कहेगा. अपराधशास्त्र में श्वेतपोश अपराध की परिभाषा कभी यह थी कि उच्च सामाजिक, उच्च आर्थिक और उच्च राजनीतिक हैसियत वाले लोगों द्वारा किया गया वह अपराध जिसे पकड़ा न जा सके. सन 1939 में अपराधशास्त्री एडविन सदरलैंड ने अपने अघ्ययन में श्वेतपोश अपराध को उच्च सामाजिक वर्ग तक सीमित माना था. चालीस साल पहले तक श्वेतपोश अपराध के अकादमिक अध्ययन में यह विमर्श भी शामिल रहा है कि श्वेतपोश अपराधी पकड़े क्यों नहीं जा पाते. और जब श्वेतपोश अपराधी को पकड़ने में ही अड़चन दिखाई दी तो आधुनिक अपराधशास्त्र में इसके निराकरण पर शोध की गुंजाइश ही नहीं बनी. बहरहाल आधुनिक अपराधशास्त्र में इस प्रकार के अपराध की परिभाषा बदलकर इसे उच्च आर्थिक स्थिति के अपराधियों द्वारा किए जाने वाले आर्थिक अपराधों तक ही सीमित कर दिया गया. आज के अपराधशास्त्री बड़ी माली हैसियत वाले आर्थिक अपराध को ही श्वेतपोश अपराध समझते हैं. बहरहाल श्वेत पोश अपराध को परिभाषित करने में जैसी अड़चन है लगभग वही स्थिति आज राजनीतिक अपराधों और युद्ध अपराधों को परिभाषित करने में है. खैर, ये दोनों प्रकार के अपराध फिलहाल हमारे आलेख के विषय नहीं हैं. लिहाजा इसका जिक्र किसी उपयुक्त अवसर पर ही ठीक होगा. 

इस समय उन्नाव कांड की स्थिति
इस कांड में उलझाव और गंभीरता का अदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हाईकोर्ट को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना पड़ा. जाहिर है कि अब यह मामला बाकायदा आपराधिक न्याय प्रणाली में पहुंच गया है. ऐसा होना एक तरह से सब पक्षों के लिए अच्छा रहा. क्योंकि पुलिस, सरकार और आरोपी सभी को यही दिक्कत थी कि इसकी चर्चा देशभर में हो रही है और तीनों की फजीहत हो रही है. अब यह कहते हुए कि मामला अदालत में है, तीनों को जवाब देने से छुटकारा मिल गया. मीडिया को भी ज्यादा चर्चा रोकने में सहूलियत हो जाएगी. उधर पीड़ित पक्ष की चिंता थी कि उन्हें दबाने के लिए अब और हमले होंगे. लेकिन अब अदालत की तरफ से पीड़ित की सुरक्षा के इंतजाम के निर्देश जारी हाने की संभावना बन गई है. यानी एक दो रोज़ में मीडिया भी इस कांड की अदालती सुनवाई की अगली तारीखों को बताने तक सीमित हो जाएगा. हालांकि यह मानना ठीक नहीं होगा कि हालात बहाल हो जाएंगे. क्योंकि इस कांड से बहुत से लोगों को स्थायी नुकसान भी पहुंचा है. 

क्या कर गया यह कांड
यूपी की कानून व्यवस्था काबू में होने का जो ताबड़तोड़ प्रचार किया जा रहा था उस पर पलीता लग गया. बहुत दिनों के लिए प्रदेश सरकार और उसकी पुलिस की छवि चैपट हो गई. सबसे बड़ा नुकसान यह कि 2019 के आमचुनाव के लिए हो रही तैयारियों में कुछ दिन की अड़चन आ गई. उप्र में सत्तारूढ़ दल के नेता और प्रवक्ताओं को तब तक आक्रामक चुनाव प्रचार करने में दिक्कत आएगी, जब तक यह उन्नाव कांड जनता के दिमाग में धुंधला नहीं पड़ जाता.  
बलात्कार के खिलाफ कड़े कानून का असर?
तीन-चार साल से बलात्कार के मामलों में कड़ाई की बातें ज्यादा हो रही थीं. सन 2012 के निर्भया कांड के बाद जो भी कानूनी उपाय किए गए थे उनके बेअसर होने का सबूत बन गया यह कांड. तब ही तो यह इंतजाम किया गया था कि पीड़ित पर फौरन ध्यान दिया जाएगा, आरोपी से कड़ाई से निपटा जाएगा. लेकिन इस कांड से लग रहा है कि कड़ाई बरतना या कानून को सख्ती से लागू करना अभी भी आसान नहीं बना है. नए सिरे से सोचना पड़ेगा. 

Saturday, April 14, 2018

आसिफा को न्याय

साल 2012 का दिसबंर था. एक अंग्रेज़ी अख़बार में निर्भया के साथ बलात्कार और फिर हत्या की ख़बर विस्तार से छपी थी. उसी शाम या उसके अगले दिन वो ख़बर टीवी पर सवार होती है और देखते देखते दो तीन दिनों के भीतर जैसे जैसे उस कांड की एक एक कहानी लोगों तक पहुंचनी शुरू होती है, लोग घरों से बाहर आने लगते हैं. शुरूआत लेफ्ट से जुड़े महिला संगठनों ने की थी मगर बाद में वो आंदोलन पहले दिल्ली का हुआ है, फिर देश का हो गया. 
जंतर मंतर से लेकर रायसीना हिल्स और राजपथ पर हज़ारों लोगों का हुजूम उतर आया. दिल्ली की बहुत सी लड़कियां जो कभी किसी धरने में नहीं गईं थीं, पहली बार इस धरने में गईं. करनाल से एक अधिकारी ने अपनी बेटी को भेजा क्योंकि उनकी बेटी इस आंदोलन में जाना चाहती थी. कोई लड़की अपने आप को रोक नहीं सकी. लाजपत नगर से आई वो लड़कियां मुझे आज भी याद हैं. उन्होंने अपने पैसे से पोस्टर छपवाए थे, बलात्कार और स्त्री हिंसा के खिलाफ स्लोगन लिखे थे, वो अंतिम बार के लिए इस ज़ुल्म से आज़ाद होने के लिए उस हुजूम में आई थीं. उनके मां बाप भी नहीं रोक सके थे. किसी ने सोचा नहीं था कि लोगों का जत्था उस रायसीना हिल्स पर कब्ज़ा कर लेगा जिस पर अब तक वीआईपी कारें चला करती थीं या फिर 26 जनवरी के दिन टैंक चला करते थे. दिन हो या रात हो, बलात्कार के ख़िलाफ़ मज़बूत कानून, बलात्कार की मानसिकता, पुलिस की लापरवाही इन सब को लेकर आवाज़ उठ रही थी. उस वक्त की सरकार की ज़ुबान लड़खड़ाने लगी थी. जस्टिस वर्मा के नेतृत्व में कमेटी बनी, गिरफ्तारी हुई, सज़ा हुई सब हुआ. 
12 अप्रैल का यह सूरज रायसीना हिल्स पर न जाने किससे मुंह छिपा कर डूब रहा है. यही रायसीना हिल्स थी जिस पर हज़ारों लोगों ने पहुंच कर सोती सरकार को जगा दिया था. नीता का कैमरा जब राजपथ की तरफ घूमता है तब सड़कें ख़ाली हैं. इक्का दुक्का कारें चुप चाप नज़रें छुपा कर उतर रही हैं. क्या लोगों ने निर्भया और आसिफा के मामले में मज़हब का कोई हिसाब किया है. क्या लोग अब अपने ही उस आंदोलन से भागने लगे हैं कि कहीं उन्हें आसिफा के लिए बाहर न निकलना पड़े या फिर उन्हें बलात्कार की घटनाओं से फर्क पड़ना बंद हो गया है. छह साल बाद दिल्ली की इन सड़कों पर पत्थर चल रहे हैं, इस सड़क पर गाड़ियां दिख रही हैं, मगर निर्भया के लिए निकले लोगों से ये जगह ख़ाली हैं. क्या हमारा देश इतना बदल गया है कि उसके लिए आसिफा बेटी भी नहीं रही. 

जंतर मंतर तो अब लोगों के लिए नहीं रहा इसलिए संसद मार्ग पर सीपीएम की महिला संगठन एडवा के सदस्यों ने यहां प्रदर्शन किया. पर सवाल है कि इस प्रदर्शन के लिए एडवा के ही लोग क्यों आए, क्या बाकी दलों के भीतर महिला संगठनों में आसिफा को लेकर कोई चर्चा नहीं है. क्या उन महिला संगठनों को यहां नहीं होना चाहिए था. निर्भया के वक्त भी यही संगठन था और कविता कृष्णन थी आइसा की, इन लोगों का मार्च हुआ था मगर बाद में दिल्ली के लोगों का आंदोलन बन गया था. इसमें बीजेपी के नेता भी आते थे, दूसरे दलों के नेता भी आते थे. आज सब घरों में बैठे हैं. 
ऐसा नहीं था कि आसिफा के मामले में भीड़ नहीं आई. 15 फरवरी को एक रैली हुई थी जिसमें लोग तिरंगा लेकर निकले थे. यही तिरंगा कभी निर्भया के आरोपियों को सज़ा देने की मांग करने वालों के हाथ में था, मगर आप देख सकते हैं कि यहां आरोपी पुलिसकर्मी को बचाने के लिए तिरंगा लेकर भीड़ आई हुई है. 
15 फरवरी का वीडियो है, जिसमें लोग आरोपी और पुलिस अधिकारी खजुरिया को बचाने के लिए नारे लगा रहे हैं. लोगों के हाथ में तिरंगा है. यही तिरंगा कभी निर्भया के आरोपियों को सज़ा देने की मांग करने वालों के हाथ में था, मगर यहां तिरंगा उनके हाथ में है जो आरोपी को सज़ा नहीं बल्कि बचाना चाहते हैं. 10 जनवरी को आसिफा अगवा की जाती है और उसके कुछ दिन बाद हिन्दू एकता मंच का गठन होता है. दि वायर में 17 फरवरी को मुदासिर अहमद की एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें हिन्दू एकता मंच के प्रमुख विजय शर्मा ने कहा था कि पुलिस उत्पीड़न से बचाने के लिए हिन्दू एकता मंच का गठन किया गया है. वायर की स्टोरी के हिसाब से बीजेपी की वेबसाइट से पता चलता है कि विजय शर्मा पार्टी का राज्य सचिव है. तो क्या बीजेपी के नेता ने इस केस के आरोपियों को बचाने के लिए हिन्दू एकता मंच बनाया? विजय शर्मा हीरानगर विधानसभा के हिन्दू एकता मंच का प्रमुख भी है. इसी रैली में बीजेपी के दोनों मंत्री भी शामिल हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्री लाल सिंह चौधरी और उद्योग व वाणिज्य मंत्री चंदर प्रकाश भी शामिल हैं. हिन्दू एकता मंच ने उस वक्त कहा था कि जब तक आरोपी छोड़े नहीं जाएंगे उनका आंदोलन चलता रहेगा. 

चंद प्रकाश गंगा ने ज़रूर कहा कि बच्ची को इंसाफ मिलना चाहिए, इंसानियत का कत्ल हुआ है. लेकिन जिस तरह से वे जांच पर सवाल उठा रहे हैं उससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि वे उस भीड़ को भी खुश करना चाह रहे हैं कि अफसरों की क्लास लगवाऊंगा. भीड़ ताली बजाती है. वे आरोपियों की उम्र के आधार पर सवाल करते हैं. क्या चार आरोपियों की उम्र अलग अलग नहीं होती है जो ये बात चंद प्रकाश जी को गलत लग रही है. हमारी सहयोगी नीता शर्मा ने बताया है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती दिल्ली में गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिली हैं. महबूबा ने इन दो मंत्रियों के ख़िलाफ शिकायत की है. नीता के अनुसार मुख्यमंत्री ने कहा कि बीजेपी के नेता जम्मू कश्मीर सरकार के लिए परेशानी खड़ी कर रहे हैं. नीता के मुताबिक गृहमंत्री ने कहा कि इस प्रदर्शन में शामिल हुए लोग बीजेपी से नहीं हैं. जबकि तमाम रिपोर्ट यह कह रही है कि हिन्दू एकता मंच की रैली में बीजेपी के दो मंत्री शामिल हुए थे. विजय शर्मा के बारे में भी दि वायर की रिपोर्ट बताती है कि वह बीजेपी का राज्य सचिव है और हीरानगर हिन्दू एकता मंच का प्रमुख भी है. पीएमओ के राज्यमंत्री जीतेंद्र सिंह का बयान 22 फरवरी के ट्रिब्यून में छपा था जिसे बाद स्क्रोल डाट इन ने भी अपने यहां छापा था. पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद सिंह ने कहा था कि अगर लोगों का भरोसा पुलिस और क्राइम ब्रांच की जांच में नहीं है तो यह केस सीबीआई को दे देना चाहिए. मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई समस्या है. अगर राज्य सरकार इसका प्रस्ताव करती है तो हम ज़रूर इस पर कार्रवाई करेंगे.' 
12 मार्च 2018 के मिड की ख़बर है कि बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अविनाश राय खन्ना ने भी सीबीआई जांच का समर्थन किया था. आपने 11 अप्रैल के प्राइम टाइम में हमारे सहयोगी ज़फ़र इक़बाल की रिपोर्ट में बीजेपी प्रवक्ता सुनील सेठी भी पुलिस जांच पर सवाल उठा रहे हैं. 
सवाल यह होना चाहिए कि हिन्दू एकता मंच आसिफा के इंसाफ के लिए लड़ रहा है या आरोपी अधिकारियों को बचाने के लिए. बीजेपी कैसे कह सकती है कि उसके नेता हिन्दू एकता मंच के साथ नहीं हैं. जबकि उसके मंत्री हिन्दू एकता मंच की रैली में शामिल रहे हैं. उसकी मांग का समर्थन करते रहे हैं. अगर बीजेपी की सीबीआई जांच पर इतना ही भरोसा था वो गंभीर क्यों नहीं हुई. सीबीआई जांच के आदेश क्यों नहीं हुए. महबूबा मुफ्ती इस बात पर अड़ी हैं कि जांच उनकी ही पुलिस करेगी. उन्होंने ट्विट किया है कि 'ग़ैर ज़िम्मेदार बयान से कानून का काम प्रभावित नहीं होगा. सारी प्रक्रियाओं का पालन किया जा रहा है. काफी तेज़ी से जांच हो रही है. इंसाफ होगा.' 
इस घटना से सिस्टम के भीतर आई दरार भी दिख रही है. क्या आरोपियों के पक्षधर को पुलिस पर इसलिए भरोसा नहीं था कि उसमें कोई मुसलमान नहीं था. अगर विश्वास का यह पैमाना है तो शर्मनाक है. एक्सप्रेस में मुजामिल जलील की खबर आपको परेशान करनी चाहिए. जम्मू कश्मीर पुलिस में हिन्दू मुस्लिम रोकने के लिए दो सिख अधिकारियों को जांच दल में शामिल किया जाएगा. पुलिस सामने से नहीं कह रही है कि सिख अधिकारियों को इसलिए रखा जा रहा है ताकि आरोपियों के पक्षधर को विश्वास हो सके. 
इस केस की जांच जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की निगरानी में हो रही थी. रमेश जल्ला जो कि खुद कश्मीरी पंडित हैं और काबिल अफसर नहीं होते तो इंस्पेक्टर से एसएसपी के पद तक नहीं पहुंचते. उनकी निगरानी में एसआईटी जांच कर रही थी जिसका नेतृत्व एक और काबिल अफसर नावीद पीरज़ादा कर रहे थे. इस टीम को 90 दिनों में चार्जशीट तैयार करनी थी मगर 10 दिन पहले ही तैयार कर ली. इसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. क्या कानून में लिखा है कि 90वें दिन ही रिपोर्ट तैयार होगी, 90 दिन तो समय सीमा है. श्रनीगर के रहने वाले जाल्ला ने 1984 में बतौर पुलिस इंसपेक्टर ज्वाइन किया था. उन्होंने चार्जशीट दायर करने के बाद एशिया टाइम्स के रिपोर्टर माजिद हैदरी से कहा है कि दो महीने के बाद अब मैं चैन की नींद सो पाया हूं. 

अगस्त 2016 में रमेश जाल्ला को बढ़िया काम के लिए शेर-ए-कश्मीर पुलिस मेडल दिया गया था. रमेश जाल्ला पर आतंकवादी हमला भी हुआ है और वे कई महीने तक अस्पताल में रहे हैं. 

पुलिस की टीम ने अगर पुलिस के अफसरों को आरोपी बनाया है तो हिन्दू एकता मंच को क्या दिक्कत है. बीजेपी के नेताओं को क्यों शक है. अगर शक है भी तो इसमें तिरंगे का क्या काम है. अगर कल कोई मुस्लिम संगठन यह मांग करने लगे कि आसिफा की मौत की जांच के लिए हिन्दू अधिकारियों पर भरोसा नहीं है, तब इस राज्य व्यवस्था की क्या साख रह जाएगी, क्या हम यहां तक आ पहुंचे हैं कि हर समुदाय को अपनी घटना की जांच के लिए अपने समुदाय का अधिकारी चाहिए होगा. 
हमारे नेताओं को बोलने की जल्दी रहती है. मध्य प्रदेश के खांडवा से सांसद और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान का कहना है कि कश्मीर में जिस मासूम के साथ बलात्कार हुआ उसके पीछे पाकिस्तान का हाथ है. उन्होंने ही भारत में फूट डालने के लिए किया था. 
इन बयानों का एक ही मकसद है कि कहानी हिन्दू मुस्लिम हो जाए. फिर नेता उसके हिसाब से एक बच्ची की लाश पर अपनी रोटी सेंक लें. एनडीटीवी डाट काम पर हमारे सहयोगी नज़ीर मसूदी ने एक रिपोर्ट लिखी है. नज़ीर इस केस को 17 जनवरी के फॉलो कर रहे हैं जब आसिफा की लाश मिली थी. नज़ीर ने लिखा है कि हीरानगर पुलिस स्टेशन ने शुरू में ही कई महत्वपूर्ण सबूत नष्ट कर दिए. जिसमें आसफा के खून से सने कपड़े थे जिसे फोरेंसिक लैब में भेजा जाना था. ज़िला अस्पताल ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट देने में दो महीने का समय लगाया. जिस मेडिकल सुप्रीटेंडेंट ने बलात्कार की पुष्टि की थी, उसका अचानक से तबादला कर दिया गया. फरवरी में आसिफा के परिवार ने हाईकोर्ट में निष्पक्ष जांच की गुहार लगाई थी. प्रत्येक सुनवाई में क्राइम ब्रांच ने स्टेटस रिपोर्ट जमा किया है. हाईकोर्ट ने आरोपियों को अरेस्ट करने के आदेश दिये. कोर्ट की निगरानी के बाद भी वकील और राजनीतिक दल गिरफ्तारी का विरोध कर रहे थे. क्या इसलिए वे जय श्री राम का नारा लगा सकते थे, हाथ में तिरंगा लेकर आ सकते हैं. कोर्ट में इतनी भीड़ हो गई कि छह घंटे लग गए पुलिस को मजिस्ट्रेट के हाथ में चार्जशीट सौंपने में. ये है नया इंडिया. जिसमें एक भीड़ है जो रैपिड एक्शन फोर्स की तरह हर जगह स्टैंड बाई पर है. 

यह भीड़ पहले तिरंगा लेकर आती है, बार बार तिरंगे के सम्मान का सवाल उठाती है, इस तिरंगे को पहले यूनिवर्सिटी में टांगा गया ताकि वहां राष्ट्रवाद फैले मगर जल्दी ही भीड़ ने उस तिरंगे को अपना नक़ाब बना लिया. ताकि आप तिरंगे के प्रति सम्मान के कारण भीड़ का चेहरा न देख सकें. न्यूज चैनलों और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के ज़रिए हिन्दू मुस्लिम डिबेट से फैली नफ़रत इस भीड़ में भरी होती है. अब ये भीड़ हर तरफ है. इसमें शामिल हर किसी का चेहरा तिरंगे से ढंका है. आपको तिरंगा दिखता है और आप क्या हम भी उस तिरंगे का दिल से सम्मान करते हैं. मगर आप भीड़ के पांव देखिए. वह कहां जाने को तैयार है. कहां आग लगाने के तैयार है. आप पांव से देखते हुए चेहरे की तरफ बढ़िए, इस भीड़ का इरादा दिख जाएगा और आपको अफसोस होगा कि आपके प्यारे तिरंगे का इस्तमाल भीड़ बलात्कार के आरोपियों को बचाने के लिए करने लगी है. 

10 जनवरी को आसिफा को अगवा किया गया था. उसके साथ मंदिर में बार बार बलात्कार हुआ. बेहोशी की दवा दी जाती रही. मरने के बाद भी बलात्कार किया गया. चार्जशीट में इसका डिटेल इतना भयानक है कि आपको तभी फर्क नहीं पड़ेगा जब आप इस भीड़ में शामिल हैं. अगर शामिल नहीं हैं तो रात भर सो नहीं पाएंगे. हमारे सहयोगी ज़फर इक़बाल उन जगहों पर गए हैं जहां आसिफा के आख़िरी क्षणों के आंसू और ख़ून के निशान हैं. निशान तो नहीं हैं मगर दास्तान है. 

विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने कहा है कि हमने आसिफा के भरोसे को तोड़ा है. प्रधानमंत्री की चुप्पी के बीच वी के सिंह का यह बयान चलताऊ ही सही मगर मरहम तो है. कम से कम ईमानदारी तो है. यही बयान देने में नेताओं को इतनी देर क्यों लग जाती है. इसी 21 फरवरी को ऑस्ट्रेलिया में एक बच्ची के साथ बलात्कार की घटना हुई. वहां की सरकार ने माफी मांगी. पुलिस प्रमुख ने माफी मांगी. हम जाति और धर्म देख रहे हैं. कांग्रेस नेता मनीष तिवारी प्रधानमंत्री मोदी के पुराने ट्वीट को रि ट्विट किया है. 30 अप्रैल 2014 के इस ट्वीट में नरेंद्र मोदी ने कहा है कि 'निर्भया को मत भूलना. बेरोजगार युवाओं को मत भूलना. आत्महत्या कर रहे किसानों को मत भूलना. मत भूलना किस तरह हमारे जवानों के सर काटे गए.' 

क्या हिन्दू मुस्लिम की राजनीति समाज और सिस्टम को यहां तक ले आएगी. अगर बीजेपी पहले से सचेत थी तो जनवरी से जम्मू में चल क्या रहा था. राम माधव ने फेसबुक पर लिखा है कि एक अप्रैल को जम्मू कश्मीर राज्य की बीजेपी कार्यकारिणी में प्रस्ताव पास हुआ था कि नाबालिग के जघन्य बलात्कार की निंदा की जाती है. ऐसे अपराध अमानवीय हैं. इनके सांप्रदायिक बनाने के किसी भी प्रयास की निंदा करने की जरूरत है. अपराध को अंजाम देने वालों को कानून के मुताबिक सज़ा देनी चाहिए और निर्दोष का उत्पीड़न नहीं करना चाहिए. क्या राम माधव ने लाल सिंह और चंद प्रकाश गंगा से पूछा था कि वे हिन्दू एकता मंच की सभा में जांच में फिर क्यों सवाल उठा रहे थे. हिन्दू एकता मंच के नेता उनकी पार्टी के हैं या नहीं. आरोपी को बचाने के लिए हिन्दू एकता मंच को आगे लाने की क्या ज़रूरत थी. कौन लाया हिन्दू एकता मंच को आगे, महबूबा मुफ्ती ही बेहतर बता सकती हैं. उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि बीजेपी के दो मंत्रियों के इशारे पर भीड़ बेकाबू हुई. उनके खिलाफ कब कार्रवाई होगी. अगर महबूबा इन दो मंत्रियों की शिकायत गृहमंत्री से करने आईं थीं तो वे कार्रवाई कब करेंगी. राहुल गांघी ने ट्विट किया है, 'ऐसे गुनाह के दोषी का बचाव कोई कैसे कर सकता है. यह मानवता के खिलाफ अपराध है. हम क्या हो गए हैं? अगर हम एक मासूम बच्ची के साथ हुई अकल्पनीय क्रूरता में राजनीति को हस्तक्षेप करने देते हैं?' 

आप अपने बच्चे से ज़रूर पूछिए कि कहीं वो इस नफ़रत के साथ तो नहीं है. देर न हो जाए. वर्ना वो भी किसी दिन इस भीड़ में शामिल होकर अपराध कर बैठेगा. बिहार के रोहतास में 6 साल की एक बच्ची से बलात्कार का मामला सामने आया है. जो आरोपी गिरफ्तार हुआ है वो मुस्लिम है. कठुआ में जहां बीजेपी के नेताओं ने यह नहीं कहा कि आरोपी को मार देना चाहिए, फांसी पर लटका देना चाहिए, रोहतास में बीजेपी के सांसद किस भाषा का इस्तमाल कर रहे हैं, आप सुनिये. वो तो अपनी ही पार्टी की सरकार को निकम्मा बता रहे हैं. 

कठुआ में आठ साल की आसिफा की हत्या और बलात्कार के आरोपियों का क्या इसलिए साथ दिया जा रहा है वे हिन्दू हैं. रोहतास में आरोपी को बांध कर मारने की बात बीजेपी सांसद इसलिए कर रहे हैं कि वो मुस्लिम है. हम कहां आ गए हैं. आज सोशल मीडिया में आईटी सेल रोहतास की घटना को लेकर सक्रिय है. वो उसी तरह पूछ रहा है कि कठुआ की आसिफा की बात करते हो, रोहतास की बच्ची की बात क्यों करते हो. आईटी सेल की मानसिकता इंसान को दरिंदा बना देती है. एक ही क़त्ल को धर्म के हिसाब से जायज़ और नाजायज़ बना देती है. प्रधानमंत्री बताएं कि सांसद छेदी पासवान की बात सही है या सीबीआई जांच की मांग करने वाले विधायक लाल सिंह की बात सही है.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...