Wednesday, May 23, 2018

कर्नाटक से बनेगा महागठबंधन?

अब तक समझ में नहीं आ रहा था कि कर्नाटक में BJP ने अपना इतना कुछ दांव पर क्यों लगा दिया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ लगभग पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल तक. कर्नाटक के स्तर पर हर किस्म के BJP नेताओं को एक साथ बांधकर झोंका गया. उधर, राहुल गांधी ने भी निसंकोच खुद को कर्नाटक में उतार दिया था. यानी कांग्रेस और BJP दोनों ने भांप लिया था कि कर्नाटक सिर्फ कर्नाटक नहीं, बहुत आगे की चीज़ है. लगता है, जनता भी यह भांप गई थी. उसने भी कर्नाटक को इतनी कांटे की टक्कर बनाकर छोड़ा कि बड़ी मुश्किल से पता चल पाया कि जनता ने अपने आदेश में लिखा क्या था. आज ज़रूर हम कहने लायक हैं कि बुधवार को जब कुमारस्वामी का शपथ ग्रहण समारोह हो रहा होगा, वहां कर्नाटक से ज्यादा देश दिख रहा होगा. वैसे कर्नाटक चुनाव से पहले BJP को भी विपक्षी ध्रुवीकरण होने का अंदेशा रहा ज़रूर होगा. चुनाव के नतीजों के बाद वहां जो नज़ारा है, उसके बाद तो कोई भी कह सकता है कि BJP का अंदेशा सही था.  ज़रा गौर करें तो गुजरात चुनाव भी इतना ही सनसनीखेज़ बन गया था. कांग्रेस की मौजूदगी देश में सबसे कम अगर किसी प्रदेश में थी, तो वह गुजरात में ही थी. फिर भी कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व वहां दिन-रात जूझ रहा था, ताकि BJP के अभेद्य किले को भेद सके, और चुनाव नतीजों में जब कांग्रेस वहां कांटे की टक्कर में दिखाई दी, तो कांग्रेस का उत्साह बढ़ना स्वाभाविक था. वैसे गुजरात के चुनाव मोदी सरकार के कार्यकाल के चौथे साल में हो रहे थे, यानी 2019 के एक प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में कांग्रेस को वहां शिद्दत से लगने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था. बहरहाल कांग्रेस ने गुजरात का चुनाव 2019 की तैयारियों के तौर पर ही लड़ा था, और उसके बाद कर्नाटक चुनाव तो मोदी सरकार के कार्यकाल के आखिरी साल में हुआ है, सो, इसका सीधा असर अगले लोकसभा चुनाव पर पड़ना ही पड़ना है.  कर्नाटक चुनाव के दौरान तीनों मुख्य दल कुछ भी दावे करते रहे हों, लेकिन उसी दौरान यह अटकल लगाई जा चुकी थी कि वहां त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं. यानी खंडित जनादेश का ऐलानिया पूर्वानुमान था. लेकिन इस संभावना को वहां के चुनावी मैदान में उतरे तीनों राजनीतिक दल सार्वजनिक रूप से कतई स्वीकार नहीं कर सकते थे. हां, JDS के बारे में ज़रूर यह अटकल थी कि वह 'किंगमेकर' की भूमिका में रह सकती है. शायद इसी आधार पर उत्तर प्रदेश से मायावती JDS का समर्थन करने कर्नाटक पहुंची थीं. यह एक ऐसा संकेत था, जिसे जो समझ सका हो, वह यह अनुमान भी लगा सकता था कि एक क्षेत्रीय दल के रूप में JDS बड़ी चीज़ है. इतना ही नहीं, कांग्रेस ने अपने चुनाव प्रचार में JDS को BJP की 'बी टीम' जैसे हल्के हमलों तक ही सीमित रखा. कांग्रेस का सारा ज़ोर BJP से निपटने में ही लगा. यानी कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस, खुद JDS और मायावती के व्यवहार को गौर से देखें, तो देश में विपक्षी ध्रुवीकरण के परोक्ष लक्षण देखे जा सकते थे. और आज तो ऐसे हालात बन गए हैं कि कुमारस्वामी का शपथग्रहण समारोह निकट भविष्य के विपक्षी ध्रुवीकरण का प्रस्थान बिंदु बनता दिख रहा है.  यह कहना गलत होगा कि बुधवार को बेंगलुरू का नज़ारा पहले से सोचा या रचा गया मंच है. इसे परिस्थितिवश बना एक सुयोग मानना चाहिए, और यह विपक्षी ध्रुवीकरण का कोई घोषित अवसर भी नहीं है. यहां तक कि उस मौके पर मीडिया अगर किसी से विपक्षी एकता को लेकर सवाल पूछेगा, तो बहुत संभावना इसी बात की है कि सभी नेता आगे आकर बोलने में संकोच करेंगे. सभी कहेंगे कि कुमारस्वामी ने खुशी के मौके पर आमंत्रित किया था, सो बस, बधाई देने आए हैं. लेकिन यह सभी समझ रहे होंगे कि विपक्षी ध्रुवीकरण के लिए इससे बड़ा और इससे अच्छा निमित्त और कोई नहीं बन सकता था. खासतौर पर अपने-अपने आग्रहों के कड़कपन के दौर में बड़ा मुश्किल काम यही है कि कोई बिना बहाने किसी को आमंत्रित करने की पहल करे. अपने भीतर ही बात दबाकर रखने वाले ऐसे विचित्र दौर में आमंत्रित करने और आमंत्रित होने की चाह रखने वालों के लिए यह शपथ समारोह वाकई विलक्षण अवसर है.
अटकल लगाने का भी रोमांच होता है. बहुत से लोगों की रुचि किसी नज़ारे की पहले से कल्पना करने में होती है. ऐसे लोग ज़रूर सोच रहे होंगे कि कुमारस्वामी के इस समारोह में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तत्परता और देहभाषा कैसी होगी. खासतौर पर मीडिया ने राहुल गांधी को जिस तरह प्रधानमंत्री पद के एक उम्मीदवार के तौर पर चर्चा में ला दिया है, उसके बाद उनकी भाव-भंगिमाएं बारीकी से देखी जानी शुरू हो गई हैं. सोनिया गांधी UPA की अध्यक्ष के तौर पर सबकी नज़रों में होंगी. विपक्षी एकता की धुरी बनने की संभावनाएं कहीं हैं, तो वे सोनिया गांधी के पास ही सबसे ज़्यादा दिखाई देती हैं. इस समारोह में दोनों प्रकार के दृश्य बन सकते हैं, सोनिया और राहुल भी उठकर दूसरों से बात करने जाते देखे जा सकते हैं और दूसरे नेता उठकर उनके पास आते हुए भी दिख सकते हैं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अलग-अलग खयालों के बड़े-बड़े नेताओं के बीच ये दो नेता आकर्षण के केंद्र होंगे.
यह अवसर सबसे ज्यादा आनंदकारी जनता के लिए ही होगा. वोट देने के अलावा कुछ भी न कर पाने वाली जनता यही तो चाहती है कि उसके दुःख-दर्द से सरोकार रखने वाले नेता कभी तो आपस का छोटा-बड़ा भूलकर एक साथ बैठे दिखें. जनता तो फोटो में ही उन नेताओं को अगल-बगल बैठे देखकर खुश हो जाती है, जिनमें आपस में अनबोला हो. वैसे 'मुंडे मुंडे मतिभिन्ना' सिर्फ नेताओं में थोड़े ही है, कनार्टक की जनता ने जिस तरह का जनादेश दिया है, उससे तो यह बात खुद जनता पर भी लागू होती है. यानी बेंगलुरू पहुंचे नेता अपने व्यवहार से देश की मतिभिन्न जनता को संदेश दे सकते हैं कि अब आप लोग भी आपस में मेल-मिलाप करने लगिए.

Saturday, May 19, 2018

अबकी फंसे जस्टिस

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव खारिज होने के बाद कांग्रेस ने अलग प्रकार की रणनीति तैयार की है। सात दलों के 71 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें सात रिटायर्ड सदस्यों के हस्ताक्षर थे। तकनीकी दृष्टि से प्रस्ताव इसी बिना पर खारिज होना चाहिए था। इसके बाद भी राज्यसभा के सभापति व उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस मामले में संविधान विशेषज्ञों व पूर्व न्यायाधीशों की राय लेने के बाद यह फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपने दौरे को रद्द कर पहले मामले को सुलझाने पर जोर दिया, ताकि किसी प्रकार का संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न न हो और सुप्रीम कोर्ट में कामकाज किसी प्रकार से प्रभावित न हो।
कांग्रेस पार्टी ने जिस प्रकार महाभियोग प्रस्ताव लाने के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस किया था, उसी समय उन्हें आभास हो गया था कि उनके प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति खारिज कर सकते हैं। नियम कहता है कि राज्यसभा में दिए गए नोटिस या प्रस्ताव के स्वीकृत होने तक उसे पब्लिक डोमेन में लेकर नहीं जाना है। कांग्रेस इतने लंबे समय तक सत्ता में रही है, इसलिए इस प्रकार के नियमों की जानकारी उनके नेताओं को नहीं होगी, ऐसा नहीं है। महाभियोग प्रस्ताव पर जिस प्रकार से आम लोगों के बीच बहस शुरू कराई गई, वह भी इस प्रस्ताव के खिलाफ गया। सभापति ने अपने फैसले में भी इसका जिक्र किया है। इसके बाद सवाल उठता है कि क्या सभापति महाभियोग प्रस्ताव के मेरिट की जांच कर सकते हैं या नहीं?
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी कहते हैं कि इस प्रकार का संवैधानिक अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास है। हालांकि, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर उठाए जा रहे सवालों को गैर-जरूरी बताया और कहा कि इससे संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। संविधान के तमाम जानकार कहते हैं कि राज्यसभा के सभापति तमाम प्रस्ताव या नोटिस को स्वीकार कर सकते हैं या भी रद्द कर सकते हैं। संविधान उन्हें इसकी शक्ति देता है। मामला चूंकि चीफ जस्टिस के खिलाफ था और वेंकैया नायडू जानते थे कि इस मामले को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने इस पर संविधान विशेषज्ञों से राय ली। आखिर में जो फैसला उन्होंने दिया है, उसे तमाम लोग स्वीकार कर रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी इस मामले में अड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायरमेंट तक पद पर बने रहते हैं तो वे उनकी कोर्ट में पेश नहीं होंगे। उन्होंने तो राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि किसी भी प्रस्ताव को रद्द करने का अधिकार उन्हें नहीं है। 50 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर वाले प्रस्ताव या नोटिस को सभापति को स्वीकार करना ही होगा। सिब्बल ने कहा कि मैं सोमवार से सीजेआई दीपक मिश्रा की कोर्ट में नहीं जाऊंगा। अब जब तक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रिटायर नहीं हो जाते, वे तब तक उनकी कोर्ट में नहीं उपस्थित होंगे।
कांग्रेस का यह रवैया पूरे मामले के राजनीतिक होने की गवाही दे रहा है। भाजपा ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न्याय प्रक्रिया को अपने हिसाब से कांग्रेस चलाना चाहती है, जबकि देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है। राज्यसभा सभापति का निर्णय आने के बाद से अब कांग्रेस पर सवाल खड़े हो गए हैं। सबका एक ही सवाल है कि क्या वे न्यायपालिका को अपने तरीके से चलाना चाहते हैं? अगर न्यायपालिका उनके मनमुताबिक निर्णय नहीं देगी तो वे महाभियोग लाकर जजों को डराएंगे? राज्यसभा के सभापति ने जब कहा है कि उनके आरोपों में दम नहीं है, तो वे किस आधार पर इस मामले को आगे ले जाने की मांग कर रहे हैं? ये कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब अब आने वाले दिनों में कांग्रेस को देने होंगे।

Friday, May 18, 2018

कर्नाटक में चल रहा नाटक

यह सच है कि कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर, यानी JDS के बीच तीखा टकराव रहा. कांग्रेस आरोप लगाती रही कि JDS दरअसल BJP की 'बी टीम' है. इस लिहाज़ से BJP की यह शिकायत जायज़ है कि अब चुनाव के बाद कांग्रेस और JDS का गठबंधन 'अपवित्र' और जनादेश-विरोधी है. इस 'अपवित्र' को इस बिना पर सही नहीं ठहराया जा सकता है कि ठीक यही काम BJP ने हाल ही के दिनों में गोवा सहित तीन राज्यों में किया है और आज जो लोग कर्नाटक में कांग्रेस की कोशिश को 'लोकतंत्र के साथ खिलवाड़' बता रहे हैं, वही BJP के कृत्य को अमित शाह का रणनीतिक पौरुष बताकर ताली बजा रहे थे. 
दरअसल गठजोड़ की राजनीति की संभावनाएं और विडम्बनाएं दोनों भारतीय लोकतंत्र में अब बहुत करीने से पहचानी जाने लगी हैं. इसे पवित्र-अपवित्र की मासूम शैली से नहीं समझा जा सकता और न ही व्यावहारिक-सैद्धांतिक की चालाक और अवसरवादी शब्दावली से. इसी कर्नाटक में एसआर बोम्मई का मामला हो चुका है, जहां केंद्र के दखल को सुप्रीम कोर्ट ने गैरकानूनी करार दिया था और जिसके बाद तय हुआ था कि किसी भी सरकार के बहुमत का फैसला अंततः विधानसभा के भीतर हो सकता है, बाहर नहीं. इसी कर्नाटक में एचडी देवगौड़ा हुए हैं, जो 1996 की लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी BJP की 13 दिन की सरकार गिरने के बाद गठबंधन की मजबूरियों की वजह से प्रधानमंत्री बने थे. आज कर्नाटक के राज्यपाल वजूभाई वाला ने दरअसल तोड़-फोड़ और गठजोड़ का खेल दो दशक पहले गुजरात में देखा था. तब वह गुजरात BJP के अध्यक्ष हुआ करते थे और BJP के बाग़ी विधायकों को पार्टी से बाहर करवाने की मुहिम में लगे हुए थे. दरअसल, विधायकों को टूट से बचाने के लिए रिसॉर्ट ले जाने का जो खेल आज कांग्रेस खेल रही है, वह गुजरात में BJP के टकराव से ही शुरू हुआ था. तब बाग़ी शंकर सिंह वाघेला अपने साथ के बाग़ियों को खजुराहो ले गए थे और गुजरात की राजनीति में खजूरिया और हजूरिया शब्द प्रचलित हुए थे. आज शंकर सिंह वाघेला भले BJP से अलग हों, लेकिन BJP में आते-जाते रहे हैं.
'90 के दशक में ही BJP ने ऐसे कई 'अपवित्र' गठजोड़ किए. उत्तर प्रदेश में 1993 का चुनाव सपा और बसपा ने मिलकर लड़ा, लेकिन जब दोनों की टूट हुई, तो 1995 में BJP को बसपा के साथ तालमेल में गुरेज़ नहीं हुआ - तब भी नहीं, जब बसपा अध्यक्ष कांशीराम BJP और कांग्रेस को खुलकर 'नागनाथ और सांपनाथ' कहा करते थे. जब कल्याण सिंह और मायावती में नहीं पटी, तो BJP ने एक और कमाल किया. 1998 में निर्दलीय के तौर पर जीते कई बाहुबली विधायकों को सीधे मंत्री बनाकर उनका समर्थन हासिल किया और सरकार बचाई. तब BJP में आज के अमित शाह और नरेंद्र मोदी की ही तरह कद्दावर लगते नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि इन बाहुबली नेताओं का भविष्य देखिए, अतीत नहीं. 
ऐसे 'अपवित्र' गठबंधनों और मजबूरी भरे समर्थनों का सिलसिला इसके आगे-पीछे पसरा पड़ा है. 1989 के चुनावों में राजीव गांधी की कांग्रेस सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी, लेकिन सरकार जनता दल ने बनाई, जिसका किसी ने बुरा नहीं माना - तब भी हैरानी नहीं जताई, जब उस सरकार की पालकी एक तरफ BJP और दूसरी तरफ लेफ्ट फ्रंट ढोते रहे. 1993 में पीवी नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार का दोनों धड़े अरसे तक परोक्ष साथ देते रहे. जब BJP अविश्वास प्रस्ताव लाई, तो लेफ्ट उसके साथ खड़ा नहीं हुआ, जब लेफ्ट अविश्वास प्रस्ताव लेकर आया, तो BJP उसके साथ खड़ी नहीं हुई. तीसरे अविश्वास प्रस्ताव के समय कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को ख़रीदकर अपना संकट हल कर लिया.
ऐसे उदाहरणों की भरमार है. कह सकते हैं कि इन सबमें भारतीय लोकतंत्र की कुछ सीमाएं झांकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि गठबंधन की इस राजनीति ने हाशिये पर खड़े दलों और समुदायों को ताकत और आवाज़ दी है. अगर गठबंधन राजनीति की यह मजबूरी नहीं होती, तो क्या रांची में बैठा कोई आदिवासी सोरेन परिवार यह कल्पना कर सकता था कि वह सोनिया और राहुल गांधी से संवाद कर पाएगा...? अगर यह राजनीति नहीं होती, तो क्या कोई मुसहर जीतनराम मांझी बिहार का मुख्यमंत्री होने का सपना देख पाता...? आपकी नज़र में चाहे जितना दुर्भाग्यपूर्ण हो, इसी गठजोड़ के ज़रिये सत्ता अपनी संभावनाओं और विरूपताओं के साथ निचले तबकों तक छलकती हुई पहुंची है. बिहार की बात चली है, तो नीतीश कुमार का भी उदाहरण याद कर लें. वह बड़ी सुविधा से एक ही कार्यकाल में मोदी से लेकर राष्ट्रीय जनता दल, यानी RJD तक से दोस्ती करते रहे हैं. चुनाव उन्होंने RJD के साथ मिलकर लड़ा, और तब लालू प्रसाद यादव का जातिवाद और भ्रष्टाचार भूल गए. इसके बाद BJP के साथ मिलकर सरकार बचाई, तो उसकी सांप्रदायिकता भूल गए. जबकि एक समय ऐसा था, जब नरेंद्र मोदी के साथ अपनी तस्वीर छापे जाने पर आगबबूला होकर उन्होंने बाढ़ के दौरान बिहार को गुजरात से मिली मदद तक वापस कर दी थी. 
जम्मू-कश्मीर में PDP और BJP का गठबंधन भी इसी बेतुकेपन का एक और उदाहरण है. दोनों पार्टियां एक-दूसरे के ख़िलाफ़ जैसे बंदूक ताने हुए हैं, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे की कुर्सी को सहारा दे रखा है.तो सवाल गठबंधनों के पवित्र या अपवित्र होने का नहीं है, भारतीय राजनीति और लोकतंत्र की तय कसौटियों पर खरे उतरने का है. यह अलग बात है कि यहां तक आने के लिए राजनीतिक दल जो धत्तकरम करते हैं, उनमें वे एक-दूसरे को जैसे टक्कर देते हैं. जिस येदियुरप्पा को BJP आज मुख्यमंत्री बना रही है, वह भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल जा चुके हैं और एक बार पार्टी छोड़कर अपनी अलग पार्टी भी बना चुके हैं - यह तथ्य BJP को परेशान नहीं करता, क्योंकि उनके ज़रिये वह सरकार बना सकती है. जिन बेल्लारी बंधुओं को भ्रष्टाचार का पर्याय मान लिया गया, उन्हें BJP ने साथ रखा - ज़ाहिर है, ऐसे ही अवसरों के लिए जब त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में घोड़ामंडी लगे तो वह ख़रीद-फरोख़्त कर सकने लायक साधन जुटा सके.
अब कांग्रेस-JDS गठबंधन पर आएं. अगर दोनों दल आपसी समर्थन के लिए पैसे के लेनदेन को दूर रखते हैं, अगर पिछली कटुताएं भूलकर आपसी सहयोग को तैयार हो जाते हैं, और अंततः मिलकर सरकार बनाने को तैयार हो जाते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र की जटिलता का एक नया पन्ना भर है. अंततः कर्नाटक की जनता ने ही यह फैसला किया है. दोनों को 56 फीसदी वोट दिए हैं. यह वोट प्रतिशत किसी भी सरकार की लोकतांत्रिक वैधता के लिए काफ़ी है. कम से कम जिस तेज़ी से कांग्रेस और JDS ने साथ आने का फैसला किया है, उसमें BJP को सत्ता से दूर रखने की राजनीति भले हो, ख़रीद-फ़रोख़्त की रणनीति नज़र नहीं आती. लेकिन अगर येदियुरप्पा 104 विधायकों के समर्थन के आगे कुछ और विधायकों को जुटाने या पार्टियों में सेंधमारी करने या फिर कुछ को अनुपस्थित रखने का लालच देने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं, तो बेशक वह अनैतिक होगा. विडम्बना यह होगी कि इसे ही BJP नैतिकता और लोकतंत्र की जीत बताएगी. 

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...