Saturday, May 19, 2018

अबकी फंसे जस्टिस

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव खारिज होने के बाद कांग्रेस ने अलग प्रकार की रणनीति तैयार की है। सात दलों के 71 सांसदों ने महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें सात रिटायर्ड सदस्यों के हस्ताक्षर थे। तकनीकी दृष्टि से प्रस्ताव इसी बिना पर खारिज होना चाहिए था। इसके बाद भी राज्यसभा के सभापति व उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस मामले में संविधान विशेषज्ञों व पूर्व न्यायाधीशों की राय लेने के बाद यह फैसला किया। इसके लिए उन्होंने अपने दौरे को रद्द कर पहले मामले को सुलझाने पर जोर दिया, ताकि किसी प्रकार का संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न न हो और सुप्रीम कोर्ट में कामकाज किसी प्रकार से प्रभावित न हो।
कांग्रेस पार्टी ने जिस प्रकार महाभियोग प्रस्ताव लाने के तुरंत बाद प्रेस कांफ्रेंस किया था, उसी समय उन्हें आभास हो गया था कि उनके प्रस्ताव को राज्यसभा के सभापति खारिज कर सकते हैं। नियम कहता है कि राज्यसभा में दिए गए नोटिस या प्रस्ताव के स्वीकृत होने तक उसे पब्लिक डोमेन में लेकर नहीं जाना है। कांग्रेस इतने लंबे समय तक सत्ता में रही है, इसलिए इस प्रकार के नियमों की जानकारी उनके नेताओं को नहीं होगी, ऐसा नहीं है। महाभियोग प्रस्ताव पर जिस प्रकार से आम लोगों के बीच बहस शुरू कराई गई, वह भी इस प्रस्ताव के खिलाफ गया। सभापति ने अपने फैसले में भी इसका जिक्र किया है। इसके बाद सवाल उठता है कि क्या सभापति महाभियोग प्रस्ताव के मेरिट की जांच कर सकते हैं या नहीं?
पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी कहते हैं कि इस प्रकार का संवैधानिक अधिकार राज्यसभा के सभापति के पास है। हालांकि, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर उठाए जा रहे सवालों को गैर-जरूरी बताया और कहा कि इससे संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। संविधान के तमाम जानकार कहते हैं कि राज्यसभा के सभापति तमाम प्रस्ताव या नोटिस को स्वीकार कर सकते हैं या भी रद्द कर सकते हैं। संविधान उन्हें इसकी शक्ति देता है। मामला चूंकि चीफ जस्टिस के खिलाफ था और वेंकैया नायडू जानते थे कि इस मामले को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने इस पर संविधान विशेषज्ञों से राय ली। आखिर में जो फैसला उन्होंने दिया है, उसे तमाम लोग स्वीकार कर रहे हैं।
कांग्रेस पार्टी इस मामले में अड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि अगर जस्टिस दीपक मिश्रा रिटायरमेंट तक पद पर बने रहते हैं तो वे उनकी कोर्ट में पेश नहीं होंगे। उन्होंने तो राज्यसभा के सभापति के अधिकार क्षेत्र पर भी सवाल उठाया और कहा कि किसी भी प्रस्ताव को रद्द करने का अधिकार उन्हें नहीं है। 50 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर वाले प्रस्ताव या नोटिस को सभापति को स्वीकार करना ही होगा। सिब्बल ने कहा कि मैं सोमवार से सीजेआई दीपक मिश्रा की कोर्ट में नहीं जाऊंगा। अब जब तक चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रिटायर नहीं हो जाते, वे तब तक उनकी कोर्ट में नहीं उपस्थित होंगे।
कांग्रेस का यह रवैया पूरे मामले के राजनीतिक होने की गवाही दे रहा है। भाजपा ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि न्याय प्रक्रिया को अपने हिसाब से कांग्रेस चलाना चाहती है, जबकि देश में स्वतंत्र न्यायपालिका है। राज्यसभा सभापति का निर्णय आने के बाद से अब कांग्रेस पर सवाल खड़े हो गए हैं। सबका एक ही सवाल है कि क्या वे न्यायपालिका को अपने तरीके से चलाना चाहते हैं? अगर न्यायपालिका उनके मनमुताबिक निर्णय नहीं देगी तो वे महाभियोग लाकर जजों को डराएंगे? राज्यसभा के सभापति ने जब कहा है कि उनके आरोपों में दम नहीं है, तो वे किस आधार पर इस मामले को आगे ले जाने की मांग कर रहे हैं? ये कुछ सवाल हैं, जिनके जवाब अब आने वाले दिनों में कांग्रेस को देने होंगे।

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...