जब असम में एनआरसी आई तो, खूब हो हल्ला मचा, लेकिन मुझे बिना जानकारी के उसपर कुछ लिखना बिल्कुल सही नहीं लगा. अब यहाँ सबसे बुनियादी सवाल है, कि क्या भारत में ऐसे लोग हैं जो नागरिक नहीं हैं और अवैध रूप से देश में दाखिल हो गए हैं? हां, ऐसे लोग हैं. तो, ये पता लगाने के लिए कौन देश का नागरिक नहीं है, पहले हमें ये पता लगाना होगा कि आख़िर नागरिक कौन है? भारत में सक्रिय कोई भी क़ानूनी राजनैतिक दल इसके ख़िलाफ़ नहीं है. अब सवाल ये पैदा होता है कि ये कैसे तय होगा कि कोई भारत का नागरिक है या नहीं? आप इस बात को किसी भी तरह से निर्धारित करें, इसके लिए निष्पक्षता और क़ानून के सामने बराबरी जैसी बुनियादी शर्तें पूरी करना ज़रूरी होगा. इसका ये मतलब है कि नागरिकता तय करने के लिए निष्पक्ष सबूतों की ज़रूरत होगी. सबूतों का मतलब है दस्तावेज़ी सबूत, जिनकी प्रतिलिपि, नागरिकता तय करने वाली एजेंसी को सुरक्षित रखनी होगी, जिसकी जनता पड़ताल कर सके. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की पड़ताल के दायरे में वो सभी लोग आएंगे, जो भारत गणराज्य के परिक्षेत्र में रहते हैं. इसका ये मतलब है कि नागरिकता की जांच करने वाली एजेंसी भारत की सरकार या इसके नागरिक के हाथ में नहीं हो सकती. इसका ये भी मतलब है कि नागरिकता की जांच का काम सरकार की निगरानी में नहीं हो सकता. एनआरसी के रजिस्ट्रेशन के दौरान इनमें से किसी भी शर्त को पूरा नहीं किया गया. तो, कुल मिलाकर असम में एनआरसी तैयार करने की प्रक्रिया वही बन गई, जिस मक़सद से इसे शुरू किया गया था. यानी बंगालियों और कुछ दूसरे समुदायों को नागरिकता के दायरे से क़ानूनी तरीक़े से बाहर करना. ताकि, दिल्ली, नागपुर और गुवाहाटी में बीजेपी की नस्लवादी प्यास को बुझाया जा सके. शुरुआत में तो बीजेपी ने एनआरसी ड्राफ्ट प्रकाशित होने पर ख़ूब जश्न मनाया. लेकिन अब पार्टी को लग रहा है कि वो इसके ज़रिए जो सियासी फ़सल काटना चाहती थी, उसके ख़िलाफ़ बंगालियों ने सांप्रदायिक रूप से एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया. बंगाल में पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है कि सत्ताधारी टीएमसी और प्रमुख विपक्षी दल सीपीएम किसी मुद्दे पर एकजुट हो गए हैं. बीजेपी के ख़िलाफ़ ये मोर्चेबंदी असम से लेकर बंगाल तक फैल गई है. दिल्ली के मीडिया ने एनआरसी के विरोध को हिंदू-मुसलमान का सवाल बना दिया. जबकि हक़ीकत कुछ और ही है. बीजेपी के ही असम में कट्टरहिंदू बंगाली विधायक शिलादित्य देब ने माना कि एनआरसी से बाहर रह गए ज़्यादातर लोग हिंदू बंगाली हैं. असम में आसू और उल्फा जैसे संगठनों में बंगाली विरोधी सोच पहले से ही थी. जब इसका मेल बीजेपी की मुस्लिम विरोधी विचारधारा से हुआ, तो उसका नतीजा एनआरसी की प्रक्रिया के दौरान सामने आया. हिंदू बंगालियों को सब्ज़बाग़ दिखाए गए, ताकि आसू के पूर्व अध्यक्ष सर्बानंद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बन जाएं. उन्हें हिंदू बंगालियों के वोट इसलिए मिले, क्योंकि बीजेपी ने उन्हें ये भरोसा दिया था कि वो हिंदू बंगालियों को मुस्लिम बंगालियों से अलग करके देखेगी. बीजेपी असल में असमिया और बंगालियों के बीच फंस गई थी. तो, पार्टी ने पहले बंगालियों के वोट हासिल किए, फिर उन्हें उठाकर फेंक दिया. भारत में बांग्लादेशी का मतलब बांग्लादेश के वो नागरिक होने चाहिए, जो ग़ैरक़ानूनी रूप से भारत में हैं. लेकिन बीजेपी की सांप्रदायिक सियासत में बांग्लादेशी का मतलब सारे मुस्लिम बंगाली हैं. जब बात असम और आस-पड़ोस के बीजेपी प्रशासित राज्यों की आती है, तो बांग्लादेशी का दायरा और बढ़ जाता है. तब बांग्लादेशी का मतलब सारे बंगाली हो जाते हैं. फिर वो हिंदू हों या मुसलमान, भारतीय हों या ग़ैर-भारतीय. असम में लंबे समय से 'असम केवल असमियों का' जैसे नारे दिए जाते रहे हैं. इस तरह के नारों का नतीजा 1961 में सिल्चर के बंगाली विरोधी हत्याकांड के तौर पर सामने आया. असम की नस्लवादी राजनीति के चलते वहां की बराक घाटी में रहने वाले बंगाली भाषी मूल निवासियों की हत्याएं हुईं. उन पर अपनी मातृभाषा बांग्ला छोड़ने का दबाव पड़ा. असम में उग्र जातीयता के निशाने पर नेल्ली और सिलापाथोर के गैर-असमिया निवासी भी आए. बाद में गैर-असमिया लोगों के ख़िलाफ़ मुहिम उल्फ़ा के उग्र हिंसक अलगाववादी आंदोलन के तौर पर सामने आई. अब यहाँ पर वही असमिया माने गए जिनको इन संगठनों ने चाहा, क्योंकि भारत के खिलाफ बंदूक लेकर लड़ने वाले ये संगठन अब सरकार के साथ आ चुके हैं, इसलिए राष्ट्रवादी हो गए, और अपनी लड़ाई को गैर असमिया के बदले गैर भारतीय या बांग्लादेशी घुसपैठिए कर दिया, जबकि असल में उसका अर्थ वही था.
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