Sunday, September 30, 2018

497 खत्म होने पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने  158 साल पुराना क़ानून रद्द करके महिलाओं की यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. दरअसल इसकी व्याख्या ही ग़लत की जा रही है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला बस इतना नहीं है कि स्त्री और पुरुष के विवाहेतर संबंधों को अब जुर्म नहीं माना जाएगा. और कुछ लोगों को ये फ़ैसला केवल पति पत्नी के संबंधों के खुलेपन पर कुछ जोक्स बनाने भर का अवसर भर लग सकता है. लेकिन यह एक ऐतिहासिक फैसला है. क्योंकि इस फैसले का वास्ता स्त्री की आजादी और उसकी यौनिक आज़ादी से भी है. सुप्रीम कोर्ट ने संभवतः पहली बार इतने स्पष्ट ढंग से रेखांकित किया है कि देह स्त्री की संपत्ति है और उसे इसके बारे में फैसला करने का अधिकार है. हालांकि स्त्री की यौनिक आजादी का जिक्र छिड़ते ही कुछ लोग इस तरह बोल पड़ते हैं जैसे यह विमर्श चलाने वाले या स्त्री के लिए यौनिक आजादी की मांग करने वाले लोग विवाहेतर संबंधों का लाइसेंस मांग रहे हैं. जबकि बात बात ये है कि पुरुष की तरह स्त्री भी स्वाधीन है, शादी उसे सामाजिक और नैतिक बंधन में बांधती जरूर है, लेकिन दोनों का एक स्वायत्त व्यक्तित्व भी है. पहले यह स्वायत्तता सिर्फ़ पुरुष को हासिल थी.
अब तो नहीं, लेकिन अतीत में विवाहित पुरुषों का वेश्यागमन भी सामाजिक तौर पर स्वीकृत था, बल्कि जिन जमींदार घरों में पुरुष इससे बचते थे, वहां उनकी मर्दानगी पर सवाल उठते थे. सुप्रीम कोर्ट ने दरअसल इस मर्दानगी की अवधारणा को भी झटका दिया है. क्योंकि इसी अवधारणा के तहत मर्द औरत को अपनी संपत्ति समझता रहा है. वह चाहे तो औरत घर में रहेगी, वह चाहे तो दफ़्तर जाएगी- वह उसकी दी हुई आज़ादी का उपभोग करेगी और उसके लिए उसकी कृतज्ञ होगी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने अपने लेख में एक बहुत बढ़िया उदाहरण देकर बताया है, जिसका ज़िक्र मैं भी करना चाहूँगा, " कुछ दिन पहले आई एक फिल्म 'दिल धड़कने दो' में प्रियंका चोपड़ा शादी के बावजूद बच्चा नहीं चाहती, वह उस शादी से अलग होना चाहती है- उसका यह फ़ैसला किसी को समझ में नहीं आता- उसके मां-पिता को भी नहीं. इसके ठीक पहले प्रियंका चोपड़ा का पति राहुल बोस बहुत गरूर से बताता है कि उसने प्रियंका को काम करने की पूरी आज़ादी दी है. इस पर प्रियंका का दोस्त फ़रहान अख्तर सवाल उठाता है कि उसे अपनी आज़ादी के लिए तुम्हारे आदेश की ज़रूरत क्या है."
कहने का मतलब यह कि सुप्रीम कोर्ट ने स्त्री की आज़ादी के कई रूपों पर पहले से बहस चलती रही है. लैंगिक समानता और यौनिक आज़ादी के जिन दो मोर्चों पर स्त्री लगातार संघर्षरत रही है और जिसकी वजह से लगातार पिटती रही है, उसमें धीरे-धीरे उसे जीत मिलती दिख रही है. सुप्रीम कोर्ट ने पहले स्त्री को पारिवारिक संपत्ति का अधिकार देकर उसकी लैंगिक बराबरी का रास्ता बनाया और अब डेढ़ सौ साल पुराना क़ानून रद्द  करके उसकी यौनिक आज़ादी का रास्ता खोल दिया है. क्या तमाम क़ानूनी व्यवस्थाओं और अधिकारों के बावजूद स्त्री को वो आज़ादी और समानता मिल पाई है, जो सरकारी एडवरटाइजिंग में दिखाई देती है? भले शत प्रतिशत सच न हो लेकिन कह सकते हैं पहले के मुक़ाबले बहुत अधिक बदलाव हुए हैं, पढ़ाई में, नौकरियों में, खेलों और तमाम क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी भी बढ़ी है और स्वीकृति भी.
लेकिन कुछ कड़वी सच्चाइयां इन सारे प्रयासों पर पानी फेर देती हैं.  एक तो यह कि सारे कानून मिलकर भी स्त्री को उसकी संवैधानिक हैसियत नहीं दिला पाए हैं. बहुत सख्त दहेज कानून के बावजूद दहेज के मामलों में कमी नहीं आई. घरेलू हिंसा विरोधी कानून के बावजूद घरों में औरतों की पिटाई नहीं रुकी है. ओफिसेज में यौन उत्पीड़न रोकने का कानून बना, लेकिन वो सब बहुत जगहों पर हो रहा है. बलात्कार पर फांसी तक की सज़ा  होने लदी लेकिन दिल दहला देने वाली बलात्कार या छेड़खानी की वारदाते आय दिन होती रहती हैं.  इस सबमें क़ानून के डर से अगर कुछ नहीं बदल रहा तो इसका मतलब है हमारा समाज इस बदलाव को लेकर तैयार नहीं है? अभी भी अधिकतम प्रगतिशाली लोग भी बाहर तो बड़े भाषण देते हैं लेकिन निजी जीवन में महिलाओं को बराबरी पर खड़ा करने में असुविधाजनक महसूस करते हैं. बेटी, पत्नी या बहन के पुरुष दोस्तों पर संदेह की नज़र लगाकर रखते हैं. किसी भी आदमी की अगर प्रगतिशाली सोच देखनी है तो खुद ही विचार करके देख ले क़ि मान लो कल को हमारी बेटी प्रेम विवाह करना चाहे तो आप क्या करोगे? बस ईमानदारी से खुद के ही दिल को जवाब दे लो, और जो सच है उस हिसाब से खुद को बदलने की कोशिश कीजिए. असल में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से एक ग़लत संदेश भी समाज में बड़ी आसानी से भेजा जा सकता है क़ि अदालत ने विवाहेतर संबंधों की छूट दी है. जबकि अदालत ने ऐसा कुछ नहीं किया है. अदालत ने बस ऐसे किसी संबंध को जुर्म माने जाने से इनकार किया है. उसने वह धारा 497 हटा दी है जिसके तहत कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ किसी और के संबंध को लेकर उस पुरुष पर मुकदमा कर सकता था. जबकि इस फ़ैसले के पहले भी ऐसे मामले तो सामने आते ही थे, और ना इस फ़ैसले के बाद सब ऐसा करने को उत्साहित घूमेंगे. बस इस फ़ैसले से ये साफ हो गया है कि महिला का शरीर उसके पति की संपत्ति नहीं है. जो लोग इस फ़ैसले को वेस्टर्न कल्चर का असर बताते हुए विवाह संस्था के लिए खतरनाक मान रहे हैं, उन्हें समझना चाहिए कि विवाह संबंध को सबसे ज्यादा खतरा रिश्तों की असमानता से है. अगर विवाह संस्था में दोनों बराबर न हों और स्त्री को पुरुष की संपत्ति बने रहना है तो फिर इस संस्था के होने का मतलब नहीं है. दो बालिग लोगों का विवाह तभी सार्थक है जब दोनों के भीतर आपसी बराबरी और भरोसे का रिश्ता हो. सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला बस इस बात को सुनिश्चित करता है.

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