Thursday, October 25, 2018

सीबीआई में चल रही उठापटक क्या है?

सीबीआई के डायरेक्टर रहे आलोक वर्मा की छुट्टी. वही आलोक वर्मा जिनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'ब्लू-आइड बॉय' बताए जाने वाले राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ साज़िश और भ्रष्टाचार के मामले में केस दर्ज हुआ था और मामले की जांच हो रही थी. राकेश अस्थाना हाल तक सीबीआई में नंबर टू पर थे. प्रेस-कांफ्रेस के दौरान वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जब सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारी एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे थे तो इसकी जांच के लिए किसी तीसरे आदमी की ज़रूरत थी. अरुण जेटली ने ये बात उनसे सीबीआई में अचानक से किए गए बदलावों पर किए गए सवालों के जवाब में कही थी. मगर ये तो एक सरकारी जवाब सा है. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके अरुण शौरी और एडवोकेट प्रशांत भूषण रफ़ाल सौदे में हुए कथित घोटाले की बात लेकर सीबीआई गए थे, और उनकी मुलाक़ात आलोक वर्मा से हुई. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ सरकार आलोक वर्मा और अरुण शौरी-प्रशांत भूषण के बीच हुई मुलाक़ात को लेकर ख़ुश नहीं थी और हुकूमत के एक सीनियर अधिकारी का कहना था कि एजेंसी के चीफ़ का राजनीतिज्ञों से मिलना आम बात नहीं है. लेकिन सीबीआई के पूर्व निदेशक डीआर कार्तिकेयन कहते हैं कि कोई भी अधिकारी किसी से मिलने से कैसे मना कर सकता है? डीआर कार्तिकेयन के मुताबिक़, "वो किसी से भी मिलने को ग़लत नहीं समझते बशर्ते कि ये बार-बार न हो और सबसे बेहतर तो ये होगा कि एजेंसी प्रमुख ऐसी मुलाक़ातों में अपने साथ किसी सीनियर अधिकारी को भी बैठक में रहने को कहें." प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और वाजपेयी सरकार के एक अन्य पूर्व मंत्री यशवंत सिन्हा भारत और फ्रांस के बीच हुए राफेल विमान सौदे में कथित घोटाले और प्राइवेट कंपनी रिलायंस को कथित तौर पर फायदा पहुंचाने का इलज़ाम लगाते रहे हैं और बार-बार इसमें जांच की मांग उठाते रहे हैं. कांग्रेस भी रफ़ाल सौदे पर भारतीय जनता पार्टी पर लगातार दबाव बनाए हुए है और कई बार तो बात यहां तक हो रही है कि रफ़ाल सौदा मोदी सरकार के लिए राजीव गांधी के बोफोर्स जैसा बनता जा रहा है. साल 1984 में भारी मतों से सत्ता में आए 'मिस्टर क्लीन' यानी राजीव गांधी को अगले चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था जिसकी एक बड़ी वजह बोफोर्स तोप सौदे में हुआ कथित घोटाला बताया गया था. अरुण शौरी ने बीबीसी से कहा कि ये एक ऐसी आंधी है जिसमें बीजेपी दब जाएगी. उन्होंने ये भी कहा कि इस पूरे मामले ने मोदी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं. हाल में कई विश्लेषकों ने कहा है कि मोदी जो सत्ता में कंट्रोल और दृढ़ नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, वो सीबीआई के मामले में कमज़ोर दिखाई देते हैं और ये पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. आनेवाले दिनों में चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं और बीजेपी जिन कुछ मुद्दों पर जनता से वोट मांगती रही है उसमें मोदी का दृढ़-नेतृत्व भी शामिल रहा है. 
स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई, प्रधानमंत्री ने वर्मा को सोमवार को मुलाक़ात के लिए बुलाया, मंगलवार को अस्थाना दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गए जिसने उनकी गिरफ्तारी पर चंद दिनों के लिए रोक तो लगा दी लेकिन उनके ख़िलाफ़ जांच को ये कहते हुए रोकने से मना कर दिया कि उन पर लगे आरोप गंभीर हैं. अस्थाना ने भी कैबिनेट सेक्रेटरी को भेजे गए एक ख़त में वर्मा पर रिश्वतख़ोरी और दूसरे कई तरह के आरोप लगाए थे.सीबीआई के कई जानकार इशारों में कहते हैं कि राकेश अस्थाना ने ये ख़त किसी की शह पर लिखे थे क्योंकि हुकूमत को ये डर सताने लगा था कि आलोक वर्मा राफेल सौदे पर सीबीआई जांच न शुरू करवा दें. मोदी-शाह के क़रीबी मानेजाने वाले अस्थाना को इस काम में लगाया गया लेकिन जब वर्मा के ख़िलाफ़ जाल बुना जा रहा था तो सीबीआई के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर ख़ुद उस जाल में उलझते चले गए. मगर वर्मा और अस्थाना के बीच की रस्साकशी कोई नई थी और वो तबसे जारी थी जब अस्थाना को हुकूमत ने स्पेशल डायरेक्टर के पद पर नियुक्त करने की शुरुआत की थी जिसका विरोध आलोक वर्मा की तरफ से ये कहते हुए हुआ था कि अस्थाना के खिलाफ कई मामलों में जांच जारी है तो उन्हें जांच एजेंसी में नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए. दोनों के बीच का ये तनाव आगे के दिनों में और आगे भी बढ़ा जो आख़िरकार अदालत तक जा पहुंचा. मंगलार को अस्थाना मामले में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने भी आदेश दिया था कि इस मामले में यथास्थिति बरक़रार रखी जाए. अब ये सवाल उठ रहा है कि क्या सीबीआई हेडक्वॉर्टर में मंगलवार आधी रात के वक़्त जो कुछ हुआ वो हाईकोर्ट के उस हुक्म का उल्लंघन तो नहीं जिसमें अदालत ने यथास्थिति क़ायम रखने को कहा था. नए डायरेक्टर ने चार्ज लेने के बाद कई अधिकारियों का तबादला कर दिया है. इनमें वो भी शामिल हैं जो राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ हो रही जांच में शामिल थे. आलोक वर्मा ने अपने खिलाफ़ की गई कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है जिसकी सुनवाई अदालत शुक्रवार को करेगी. वकील प्रशांत भूषण ने कहा है कि सीबीआई में किया गया बदलाव सुप्रीम कोर्ट के उस हुक्म के खिलाफ़ है जिसमें निदेशक की बहाली में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का होना ज़रूरी है.

Thursday, October 11, 2018

छे ग्वेरा की कहानी

एर्नेस्तो ‘चे’ गेवारा. वह शख्स जो कुछ लोगों के लिए हीरो था तो कुछ के लिए हत्यारा. उस पर आरोप लगता था कि वह तीसरा विश्वयुद्ध करवाना चाहता है. अमेरिका और अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज उसे ख़त्म करना चाहती थीं, हालांकि उसकी मौत आज भी एक रहस्य है. उसके शव को और भी रहस्यमय तरीके से किसी अनजान जगह पर दफ़नाया गया था. पर जिस व्यक्ति का नामोनिशान अमेरिका और पूंजीवादी ताक़तें मिटा देना चाहती थीं, वह आज एक किंवदंती बन चुका है. अर्जेंटीना में जन्मे एर्नेस्तो गेवारा ने क्यूबा की क्रांति में अहम योगदान दिया था. गेवारा ने ग़ैर साम्राज्यवादी और ग़ैर-पूंजीवादी समाज की कल्पना की थी. इसमें हर कोई बराबर का भागीदार था. उनके इस सपने ने जाने कितने ही युवाओं को सशस्त्र क्रांति की राह पर चलने की प्रेरणा दी. गेवारा की असल ज़िंदगी वहां से शुरू होती है जब उन्होंने अपने दोस्त, अल्बेर्तो ग्रेनादो के साथ दक्षिण अमेरिका को जानने के लिए तकरीबन दस हज़ार किलोमीटर की यात्रा की. तब उनकी उम्र तकरीबन 23 साल थी. मोटरसाइकल पर की गई यही यात्रा उनकी जिंदगी का वह महत्वपूर्ण पड़ाव थी जिसने उन्हें हमेशा के लिए बदल दिया. इस दौरान उन्होंने दक्षिण अमेरिका के लोगों को जीने के लिए विषम परिस्थितियों से जूझते हुए देखा. उन्होंने देखा कि कैसे पूंजीवाद ने लोगों को अपने अस्तित्व से अलग कर दिया था. कैसे कुष्ठ रोग से मर रहे मरीज़ों को समाज से अलग-थलग दिया गया था. कैसे खदानों में काम करने वाले मजदूरों का शोषण किया जा रहा था. कैसे समाजवादियों को ख़त्म किया जा रहा था और कैसे पंद्रहवीं शताब्दी की महान ‘इंका सभ्यता’ से जुड़े लोगों को हाशिये पर धकेला जा रहा था. गेवारा ने इस पूरे वृतांत को ‘मोटरसाइकिल डायरीज’ नाम से संस्मरण में कलमबद्ध किया है. इसके अंत में उन्होंने ग़रीब और हाशिये पर धकेले जा चुके लोगों के लिए जीवनभर लड़ने की कसम भी उठाई थी. 
1953 में गेवारा अपने शहर ब्यूनस आयर्स लौट आए. कुछ ही वक्त में उनकी पढ़ाई पूरी हो गई और वे डॉ एर्नेस्तो गेवारा बन गए. लेकिन उनका इरादा डॉक्टरी करने का नहीं था. वे पहले ही दुनिया और समाज को बदलने की कसम खा चुके थे. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए उन्हें एक बड़ी जंग लड़नी थी. यह जंग या क्रांति पूंजीवाद के ख़िलाफ़ थी जो अमेरिकी समाज का आधार था. गेवारा जिस व्यवस्था के प्रशंसक थे, कुछ-कुछ वैसी ही व्यवस्था पड़ोसी देश ग्वाटेमाला में तैयार हो रही थी. उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद निश्चय किया कि वे वहां जाकर इस व्यवस्था को करीब से देखेंगे.
ग्वाटेमाला में तब समाजवादी सरकार हुआ करती थी और जहां राष्ट्रपति जैकब अर्बेंज गुजमान बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम लागू कर रहे थे. इन कार्यक्रमों का शिकार अमेरिका की एक बड़ी कंपनी – यूनाइटेड फ्रूट कंपनी भी हुई जिसके पास वहां लाखों एकड़ जमीन थी. इन कार्यक्रमों से अमेरिका के और भी कारोबारी हित प्रभावित हो रहे थे तो आखिरकार अमेरिकी सरकार और सीआईए ने यहां गुजमान सरकार का तख्ता पलट करवा दिया. गेवारा उस समय ग्वाटेमाला में ही थे और गुजमान का समर्थन कर रहे थे. लेकिन तख्तापलट के बाद पकड़े और मारे जाने के डर से वे मैक्सिको आ गए.
ग्वाटेमाला में सरकार के तख्तापलट ने गेवारा के मन में क्रांति की आग और अमेरिका विरोध को और भड़का दिया. लेकिन वे तुरंत कुछ करने की स्थिति में नहीं थे इसलिए मैक्सिको पहुंचकर उन्होंने एक अस्पताल में नौकरी कर ली. इसी दौरान उनकी मुलाकात क्यूबा से निर्वासित फिदेल कास्त्रो और उनके भाई राउल कास्त्रो से हुई. इस मुलाकात के बाद गेवारा के लिए आगे का रास्ता बिलकुल स्पष्ट हो गया था. उन्होंने तय कर लिया था कि अब उनका लक्ष्य क्यूबा की अमेरिका समर्थित तानाशाही सरकार को हटाना है. इसके बाद वे फिदेल के साथ क्यूबा की क्रांति के अगुवा नेता बन गए.
क्यूबा की क्रांति के दौरान गेवारा की दिलेरी ने बाकी विद्रोहियों के ज़ेहन पर गहरी छाप छोड़ी थी; डॉक्टर की हैसियत से और विद्रोही की हैसियत से भी. इसी संघर्ष ने उन्हें एर्नेस्तो गेवारा से चे गेवारा बना दिया. स्पेनिश में चे का मतलब होता है- दोस्त. चे गेवारा की जीवनी लिखने वाले अमेरिकी पत्रकार जॉन ली एंडरसन के मुताबिक़ ‘गेवारा की ख़ुद को मिटाकर क्रांति को जिंदा रखने की ज़िद ने विद्रोहियों के बीच उन्हें सबसे ऊंचा मुक़ाम दिलाया था. पंद्रह-सोलह साल के विद्रोहियों के लिए तो चे ‘सबकुछ’ हो गए थे - महान नायक, क्रान्तिकारी और किंवदंती.’
दूसरी तरफ सीआईए क्यूबा की बातिस्ता सरकार के सैनिकों को कास्त्रो के विद्रोह के ख़िलाफ़ हथियार और प्रशिक्षण दे रही थी. इसकी वजह यह थी कि अमेरिकियों का बेहिसाब पैसा क्यूबा के तेल और अन्य व्यवसायों में लगा हुआ था. उनके लिए क्यूबा ड्रग्स, वेश्यावृति और जुए का सबसे मुख्य स्थान भी था. इसके बावजूद कास्त्रो के विद्रोही जीत रहे थे. इस जीत के पीछे स्थानीय लोगों का समर्थन एक वजह थी और इस समर्थन के पीछे चे की प्रेरणा की भी अहम भूमिका थी. धीरे-धीरे यह विद्रोह क्यूबा में प्रांत दर प्रांत फैलता जा रहा था. जनवरी 1959 में मुश्किल से 500 विद्रोहियों ने बतिस्ता सरकार का तख्तापलट कर दिया. फ़िदेल कास्त्रो ने सत्ता में आते ही चुनावों का वादा किया, जो कभी पूरा नहीं हुआ. चे के विचारों से प्रभावित होकर फिदेल ने क्यूबा में मार्क्सवादी व्यवस्था को लागू किया था. क्यूबा क्रांति के संस्मरणों पर भी चे गेवारा ने क़िताब लिखी है. फ़िदेल की सरकार में गेवारा को उद्योग मंत्रालय मिला और वे ‘बैंक ऑफ़ क्यूबा’ के अध्यक्ष बनाये गए. चे की ‘नई दुनिया’ अब आकार लेने लगी थी. बतौर मंत्री उन्होंने कभी भी सत्ता को नहीं जिया. एंडरसन बताते हैं कि उनका परिवार उस समय पर भी बसों से सफ़र किया करता था और वे सप्ताह में एक दिन खुद श्रमदान भी करते. सत्याग्रह में ही 12 जून को प्रकाशित लेख ‘मार्क्स ख़ुद कितने मार्क्सवादी थे’ पढ़कर और चे गेवारा को जानकर लगता है कि शायद चे गेवारा ही अकेले सच्चे मार्क्सवादी रहे हैं. 1959 में क्यूबा के उद्योग मंत्री के रूप में वे भारत भी आये थे. कहा जाता है कि उन्होंने नेहरू से क्यूबा की चीनी ख़रीदकर अपरोक्ष रूप से समाजवाद को फ़ैलाने का अनुरोध किया था. क्यूबा क्रांति के बाद चे ने पूरे लैटिन अमेरिका के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य को बदलने का संकल्प लिया. इसका मतलब था हर देश में विद्रोह फैलाना. और जाहिर है कि इसके लिए खूंनी क्रांति को ही जरिया बनाया जाना था. चे और कास्त्रो ने कई राजनैतिक विद्रोहियों का क़त्ल किया था. चे पर इल्ज़ाम लगा कि उन्होंने कई बेगुनाह भी मारे. हालांकि एंडरसन बेगुनाहों की हत्या की बात नकारते हैं. चे क्यूबा को रूस के नज़दीक ले गए. सोवियत रूस के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता ख्रुश्चेव के बेटे सर्गेई एक इंटरव्यू में बताते हैं कि ‘दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है’ वाले फ़लसफ़े पर उनके पिता ने क्यूबा को सहयोग देने का फ़ैसला किया था. जानकारों के मुताबिक ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ के दौरान चे चाहते थे कि रूस अमेरिका पर परमाणु बम गिराए पर लेकिन बाद में रूस के अमेरिका से हाथ मिलाने पर उन्हें धक्का लगा था. अब चे गेवारा चीन की तरफ झुकने लगे थे. इधर फिदेल कास्त्रो रूस के साथ ही रहना चाहते थे. लिहाज़ा, दोनों में वैचारिक मतभेद उभरने लगे. इसको देखते हुए चे ने क्यूबा छोड़ कर कांगो में क्रांति लाने का मन बनाया जो नाकाम रही. कांगो में रहने के दौरान ही उन्होंने फ़िदेल कास्त्रो को ख़त लिखकर सरकार में अपना मंत्री पद और इस देश की नागरिकता छोड़ने के फैसले से अवगत कराया. हालांकि कांगो में विफल होने पर फ़िदेल ने उन्हें दोबारा क्यूबा लौटने का सुझाव दिया जिसे चे ने ठुकरा दिया. उसके बाद वे बोलीविया में सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश में नौ अक्टूबर, 1967 को बोलीवियाई सेना और सीआईए के हाथों मारे गए. विश्वभर का युवा आज चे के चेहरे के तस्वीर वाली टी-शर्ट पहनना फैशन समझता है. हाथ में बड़ा सा सिगार, बिखरे हुए बाल, सिर पर टोपी, फौजी वर्दी सबको लुभाती है. जिस तरह से वे जिए और जैसे मरे उसने उन्हें पूरी दुनिया में ‘सत्ताविरोधी संघर्ष’ का प्रतीक बना दिया है.
कुछ अर्थों में चे गेवारा की यात्रा भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महानायक महात्मा गांधी से भी मिलती है. दोनों एक मध्यवर्गीय परिवार से थे. दोनों ने ऊंची तालीम हासिल की और दोनों के सपनों की परिणति बराबरी और इंसाफ वाली एक व्यवस्था थी. चे गेवारा की तरह गांधी ने भी अपने अस्तित्व को एक यात्रा के जरिये खोजा था. लेकिन ऐसी यात्रा के बीच जहां चे गेवारा पिस्तौल उठा लेते हैं, वहीं चौरीचौरा में हिंसा के बाद गांधी असहयोग आंदोलन को बंद करते वक़्त दलील देते हैं कि ‘हिंसा से प्राप्त हुई आजादी का कोई मोल नहीं है.’ गांधी साधन और साध्य की एकता में यकीन करते थे. उनका विश्वास हिंसा के बजाय प्रेम से हृदय परिवर्तन में था. शायद इसीलिए बहुत से लोग मानते हैं कि भारतीयों में ही नहीं पूरे विश्व की बड़ी आबादी के के डीएनए में ‘चेवाद’ से ज़्यादा ‘गांधीवाद’ है. और शायद रहेगा भी.
याद कीजिये रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ का वह दृश्य जिसमें गांधी दक्षिण अफ्रीका में ‘परमिट’ को जलाते हैं. गांधी अपने परमिट को आग के हवाले करते हैं और अंग्रेज़ सिपाही उनके हाथ पर लाठी मारकर उन्हें ख़बरदार कर देता है. अब जब तय है कि दोबारा ऐसा करने पर लाठी पड़ेगी, गांधी एक और परमिट उठाते हैं और जलती हुई आग में डाल देते हैं. उन्हें दोबारा लाठी पड़ती है. कुल मिलाकर गांधी समाज में व्याप्त अंतर को खत्म करने का बीड़ा उठाते हैं पर वे हथियार नहीं उठाते.
जहां चे गेवारा आज़ाद प्रेस जैसी किसी भी बात को मानने से इंकार कर देते हैं, गांधी ‘यंग इंडिया’, या ‘हरिजन’ जैसे अखबार निकालकर समाज तक पहुंचते हैं. जहां चे पूरे विश्व में समान विचारधारा के लिए हिंसक हो उठते हैं, वहीं गांधी अध्यात्म के रास्ते भारत में विविध विचारधाराओं को समेटने का प्रयास करते नज़र आते हैं. एक तरह से मार्क्सवाद समाज की विचारधारा को पलटने की कोशिश करता है. वहीं गांधीवाद समाज के अन्दर पनप रहीं विचारधाराओं को अध्यात्म से साधने की कोशिश है. और गांधी की राह चले नेल्सन मंडेला से लेकर मार्टिन लूथर किंग के संघर्षों का हासिल बताता है कि यह रास्ता मुश्किल सही, पर कारगर है. जों ली एंडरसन चे और गांधी की लोकप्रियता के अंतर को भौतिक स्तर पर समझाते हैं. उनके मुताबिक़ चे पूरे ऊंचे कद के ख़ूबसूरत इंसान थे वहीं गांधी छोटे कद के थे और चश्मा लगाते थे. कहा जा सकता है कि चे की क्रांति को समझने के लिए सिर्फ़ पिस्तौल थाम लीजिए वही काफी है. लेकिन गांधी की विचारधारा समझने के लिए अध्यात्म थामना होगा. इसलिए अल्बर्ट आइन्स्टीन ने कहा था- ‘आने वाली पीढ़ियां ताज्जुब करेंगी कि हाड़-मांस का एक ऐसा इंसान इस धरती पर कभी चला था.’

Monday, October 8, 2018

देश की इकॉनोमी गिरने के कारण कहीं हमारे इन्टरनल तो नहीं?

आजकल देश की आर्थिक स्थिति की बहुत चिंता होने लगी है.  महंगा होता कच्चा तेल, भारतीय मुद्रा (इंडियन रुपी)  की गिरती कीमत, खेती-किसानी में बढ़ती लागत, भयावह बेरोज़गारी और महंगाई बढ़ने के अंदेशे ने चिंता को अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा दिया है. सरकार का कोई भी तर्क हालात को संभाल नहीं पा रहा. इसका सबूत यह कि बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के शेयर बाज़ार दहशत के मारे बैठते ही चले जा रहे हैं. देश के सबसे ज़्यादा लोगों की जेब पर असर डालने वाली चीज़ें - यानी डीज़ल और पेट्रोल - के दाम अगर हर 24 घंटे में तेज़ रफ्तार से बढ़ाए जा रहे हों, तो कोई भी कह सकता है कि हालात गंभीर हैं. ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात से देश पहले कभी नहीं गुज़रा. पिछले दशक में भी महंगे कच्चे तेल और गिरते रुपये का संकट आया था. हालांकि आज जितना बड़ा संकट तब भी नहीं था. तब और अब के आर्थिक संकट का एक फर्क यह भी है कि उस समय मीडिया में उसे सातों दिन, चौबीसों घंटे बताया जा रहा था. आज अख़बार-टीवी पर वैसी मुस्तैदी नहीं है. दूसरा फर्क यह कि मुश्किल के उन दिनों वैश्विक मंदी के रूप में संकट का प्रत्यक्ष कारण था. आज मंदी जैसा संकट सामने नहीं है, और इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं कि वैश्विक मंदी की उस चुनौती से सिर्फ अपना देश ही निपट पाया था. सिर्फ अपना देश ही उस संकट से बच पाया था. यानी अपना वह इतिहास बताता है कि हम अपने हुनर से बड़ी से बड़ी समस्या से निपटने में सक्षम हैं. इस समय हमारे पास वैश्विक मंदी के रूप में स्पष्ट कारण उपलब्ध नहीं है, लिहाज़ा वे उपाय नहीं किए जा सकते, जो उपा सरकार के समय मंदी से उपजे संकट से निपटने के लिए किए गए थे. यानी आज की सरकार और सरकारी अर्थशास्त्रियों को नए उपाय खोजकर लाने होंगे. समाधान के लिए नए उपाय खोजने से पहले यह खोजना पड़ेगा कि हमारे रुपये की कीमत गिरते जाने के वास्तविक कारण क्या हैं?
सरकार गिरते रुपये के संकट को बिल्कुल भी तवज्जो नहीं देना चाहती. उसका तर्क है कि दुनिया की दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की मुद्रा भी नीचे गिर रही हैं. इसका एक आशय यह भी निकलता है कि हम अब तक उभरी हुई अर्थव्यवस्था नहीं बन पाए, बल्कि दशकों से उभरती हुई अर्थव्यवस्था ही बने हुए हैं. यानी हमें मानकर चलना चाहिए कि हमारी हालत इस समय भी कच्ची गृहस्थी जैसी है. रुपये की गिरती कीमत ने हमारे सामने व्यापार घाटे की समस्या को और बढ़ा दिया है. खासतौर पर कच्चे तेल के बढ़ते दामों के कारण तेल के आयात पर खर्चा ज़्यादा हो रहा है. उस हिसाब से हम निर्यात बढ़ा नहीं पा रहे हैं. दुनिया की कोई भी या कैसी भी सरकार हो, हर संकट का यही तर्क देती है कि ऐसा तो हर जगह हो रहा है. यानी सरकारों के लिए समस्या का वैश्वीकरण करने का तरीका नया नहीं है, और मौजूदा हालात में अगर इस तर्क का इस्तेमाल करना हो, तो कम से कम यह भी साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि वे बाहरी कारण हैं कौन से... उन कारणों को बोलने-बताने में संकोच कैसा. इसका एक ही तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव बढ़ रहे हैं. क्या इतना भर कहने से यह साबित किया जा सकता है कि देश में 80 से 90 रुपये प्रति लीटर पेट्रोल इसलिए बिक रहा है, क्योंकि कच्चा तेल 84 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. इस तर्क में कच्चापन इसलिए है, क्योंकि अभी कुछ साल पहले ही जब कच्चे तेल का भाव 147 डॉलर हो गया था, उस समय देश में पेट्रोल और डीज़ल के दाम आज से बहुत कम थे. कच्चे तेल के भाव डेढ़ सौ होने के बावजूद देश के लोगों को आज से कम रेट पर डीज़ल-पेट्रोल मुहैया करा पाने के लिए क्या इंतजाम किया गया था, उसकी चर्चा ज़रूर होनी चाहिए, और उससे डीज़ल-पेट्रोल के दाम काबू करने के तरीके भी पता चलेंगे. कुछ साल पहले ही देश के हर नागरिक को समझाया गया था कि तेल महंगा होता है, तो महंगाई हर हाल में बढ़ती है. आज यह समझाया जा रहा है कि तेल के दाम बढ़ने से महंगाई नहीं बढ़ रही है. देश में महंगाई के सरकारी आंकड़े यही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि यह बात भी याद करने लायक है कि कुछ साल पहले हम सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित कर रहे थे. वह वक्त गुज़रे ज़्यादा दिन नहीं हुए हैं, जब कुछ विद्वान सरकारी आंकड़ों को झूठ साबित करने के लिए एक वाक्य सुनाते थे कि झूठ के तीन रूप होते हैं, एक झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सरकारी आंकड़ा. यानी वक्त कितना बदला हुआ है कि कहावतों और मुहावरों का इस्तेमाल ही बंद होता जा रहा है. महंगे कच्चे तेल के कारण सरकारी तेल कंपनियों को उसी हिसाब से तेल के रेट बढ़ाने की छूट है. सरकार को, खासतौर पर राज्य सरकारों को बढ़े रेट के हिसाब से और ज़्यादा टैक्स मिलता है. एक अनुमान है कि मौजूदा केंद्र सरकार के कार्यकाल में अब तक सरकारें कोई 20 लाख करोड़ रुपये पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्स से वसूल चुकी हैं. इससे साबित होता है कि महंगे तेल की चिंता सरकार की चिंता तो बिल्कुल भी नहीं है. केंद्र सरकार ने भी पहले से ही तेल पर अपना टैक्स इतना खींचकर बढ़ा रखा है कि उसके ज़्यादातर खर्चे तेल पर लगे टैक्स से ही चल रहे हैं. चाहे सड़क निर्माण के 10 लाख करोड़ के ठेके हों या दूसरी योजनाओं के काम के लिए ठेके हों, सारे काम एक तरह से पेट्रोल-डीज़ल की बिक्री से मिले टैक्स से ही शुरू हो पा रहे हैं. देश की मुश्किल आर्थिक परिस्थतियों में तीन रोज़ पहले ही, यानी शुक्रवार को रिज़र्व बैंक से उम्मीद लगाई जा रही थी कि वह किसी मौद्रिक उपाय का ऐलान करेगा. प्रेस कॉन्फेंस हुई, लेकिन उसने यथास्थिति का ऐलान कर दिया. गिरता हुआ शेयर बाज़ार, जो प्रेस कॉन्फ्रेस से पहले थोड़ी देर के लिए संभला हुआ दिख रहा था, वह फिर धड़ाम हो गया. उसके एक रोज़ पहले वित्तमंत्री ने डीज़ल-पेट्रोल पर वसूले जा रहे भारी-भरकम टैक्स में डेढ़ रुपये की कटौती का ऐलान किया था, हालांकि उसका कोई असर नहीं पड़ा था.

विशाखा गाइड लाइंस

कुछ ही दिन पहले पूर्व फिल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता और अब कंगना रनौट द्वारा साथी कलाकारों व फिल्म निर्देशकों पर लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के चलते सोशल मीडिया पर आजकल एक बार फिर #Mएटू हैशटैग ट्रेंड कर रहा है, और एक के बाद एक कई महिलाओं और लड़कियों ने अपने खिलाफ हुई हरकतों पर ज़ुबान खोली है. इसी संदर्भ में हाल ही कॉमेडी कलेक्टिव ऑयिब के पूर्व-कॉमेडियन उत्सव चक्रवर्ती पर भी आरोप लगाए गए, और ऑयिब ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. इनमें से लगभग सभी के साथ उनके कार्यस्थल पर गलत व्यवहार किया गया, सो, इन हरकतों के खिलाफ मुल्क में मौजूद सख्त कानूनों का ज़िक्र होना स्वाभाविक है. हमारे देश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले इस तरह के अत्याचार के विरुद्ध कड़ा कानून सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के रूप में पहले से मौजूद है, जिन्हें 'विशाखा गाइडलाइन्स'  के रूप में जाना जाता है.
दरअसल, कुछ दशक पहले राजस्थान में हुए भंवरी देवी गैंगरेप केस के बाद महिलाओं के प्रति अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाली संस्था विशाखा ने जो पेटिशन दायर की थी, उसी के मद्देनज़र साल 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिए ये दिशानिर्देश जारी किए थे, और सरकार से आवश्यक कानून बनाने के लिए कहा था. 'विशाखा गाइडलाइन्स' जारी होने के बाद वर्ष 2012 में भी एक अन्य याचिका पर सुनवाई के दौरान नियामक संस्थाओं से यौन हिंसा से निपटने के लिए समितियों का गठन करने को कहा था, और उसी के बाद केंद्र सरकार ने अप्रैल, 2013 में 'सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वीमन एट वर्कप्लेस एक्ट' को मंज़ूरी दी थी. 'विशाखा गाइडलाइन्स'   के तहत किसी को भी गलत तरीके से छूना या छूने की कोशिश करना, गलत तरीके से देखना या घूरना, यौन संबंध स्थापित करने के लिए कहना या इससे मिलती-जुलती टिप्पणी करना, यौन इशारे करना, महिलाओं को अश्लील चुटकुले सुनाना या भेजना, महिलाओं को पोर्न फिल्में या क्लिप दिखाना - सभी यौन उत्पीड़न के दायरे में आता है.
क्या हैं विशाखा गाइडलाइन

    हर ऐसी कंपनी या संस्थान के हर उस कार्यालय  में, जहां 10 या उससे ज़्यादा कर्मचारी हैं, एक अंदरूनी शिकायत समिति (इन्टर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी) की स्थापना करना अनिवार्य होता है.
    इक की अध्यक्ष महिला ही होगी और कमेटी में अधिकांश महिलाओं को रखना भी ज़रूरी होता है. इस कमेटी में यौन शोषण के मुद्दे पर ही काम कर रही किसी बाहरी गैर-सरकारी संस्था (गो) की एक प्रतिनिधि को भी शामिल करना ज़रूरी होता है.
    कंपनी या संस्थान में काम करने वाली महिलाएं किसी भी तरह की यौन हिंसा की शिकायत इक से कर सकती हैं. यह कंपनी अथवा संस्थान का उत्तरदायित्व होगा कि शिकायतकर्ता महिला पर किसी भी तरह का हमला न हो, या उस पर कोई दबाव न डाला जाए.
    कमेटी को एक साल में उसके पास आई शिकायतों और की गई कार्रवाई का लेखाजोखा सरकार को रिपोर्ट के रूप में भेजना होगा. अगर कमेटी किसी को दोषी पाती है, तो उसके खिलाफ इप्सी की संबंधित धाराओं के अलावा अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जानी होगी

Sunday, October 7, 2018

किसानों की समस्या पर कितना गंभीर है सरकार?

नाबार्ड यानी राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक ने जनवरी से जून 2017 के बीच एक सर्वे किया. इस सर्वे के मुताबिक देश के 87 फीसद किसानों के पास 2 हेक्टेयर से भी कम जमीन है. अगर आपका खेती-किसानी से थोड़ा सा भी साबका रहा है/होगा, तो समझ सकते हैं कि दो एकड़ जमीन कितनी होती है और इसमें क्या उपजाकर कितना कमाया जा सकता है. नहीं तो गूगल कर सकते हैं. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (.) ने साल 2012-13 में इसी तरह का एक सर्वे किया था. इसके मुताबिक तब 86.5 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर या इससे कम जमीन थी. यानी सूरत अभी भी बदली नहीं है.
लेकिन नाबार्ड के सर्वे में जो सबसे चौंकाने वाली बात है वह यह कि इन 87 फीसद किसानों की आय अभी 2436 रुपये के आसपास है. हम मान लें कि एक परिवार में न्यूनतम 5 लोग होंगे तो एक सदस्य के हिस्से 500 रुपये से भी कम आएगा.  500 रुपये में आप क्या-क्या कर लेंगे? दो वक्त लंच और डिनर, या सिर्फ लंच या डिनर या एक चाय/कॉफी या शायद इतना टिप ही दे दें. राजधानी कूच करने वाले किसानों की मांग है कि स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिश के अनुसार उन्हें उनकी फसल का उचित मूल्य मिले. दिल्ली में इन दिनों आलू 20-25 रुपये किलो है, लेकिन आप जानते हैं किसानों ने आलू की फसल को कितने रुपये किलो में मंडी में बेचा था? 4 से 5 रुपये...जी हां, सही पढ़ा आपने. किसानों की और क्या मांग है, फसलों की समय पर सिंचाई के लिये डीजल के दाम में कुछ कमी मिल जाए और बिजली के दाम में थोड़ी सी रियायत.
गन्ना  पैदा करने वाले किसान अपनी फसल की बकाया राशि के लिए चक्कर काट रहे हैं? गन्ना किसानों का 10 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है. यूं तो सरकार ने गन्ना किसानों के लिए 'स्पेशल पैकेज' की घोषणा की है, लेकिन किसानों तक यह पैकेज कैसे और किस रूप में आता है यह शायद किसी से छिपा नहीं है! चाहें तो इसे भी गूगल कर सकते हैं. हां...किसानों ने एक और 'बहुत बड़ी मांग' कर दी. विपरीत परिस्थितियों का सामना करने वाले किसान की सामाजिक सुरक्षा. सर्दी के दिनों में जब हम/आप, हाकिम-हुक्काम और हुजूरे आला मुलायम रजाई में दुबके रहते हैं तब कोई किसान कड़ाके की ठंड में गेहूं की फसल में पानी दे रहा होता है. और ऐसी ही किसी रात ठंड की वजह से उसकी जान चली जाती है.  2436 रुपये कमाने वाले उसके परिवार को क्या कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए? इन दिनों मक्का पकने को है और धान में बालियां लगनी शुरू हो गई हैं. जिस किसान को हाथ में फावड़ा, दरांती, खुरपी और कुदाल लिये खेतों में होना चाहिए था, वह अपनी मांगों को लेकर दिल्ली आया, लेकिन आपने क्या किया? जिस शरीर से मिट्टी की सौंधी खुशबू लिपटी होनी चाहिए थी, उसको लहू से रंग दिया. किसी किसान के सिर में चोट आई, तो किसी का हाथ-पैर टूटा! क्या उनकी बात सुनी नहीं जा सकती थी? क्या उनकी मांग वाकई इतनी बड़ी थी? चंद दिनों में चुनाव आने वाले हैं. याद रखिये, 'दिल्ली का रास्ता' किसानों के दर से होकर ही गुजरता है और आपको उसके दर पर जाना ही पड़ेगा. लेकिन किस मुंह से जाएंगे? कल किसानों पर जो लाठियां चटकाई गई हैं, उसके निशान इतने जल्दी नहीं मिटने वाले हैं. हवा-हवाई दावों और वादों से तो कतई नहीं. याद रखियेगा. 

क्यों अलग छिटक रहीं हैं माया?

मध्य प्रदेश में मायावती ने 22 सीटों पर अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी साथ ही छत्तीसगढ़ में मायावती ने अजित जोगी से हाथ मिलाया है. इस पर कई लोगों को काफी आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो गया और लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि विपक्ष का महागठबंधन टूट गया, यह गठबंधन नहीं लठबंधन है. दरअसल दिक्कत ये है कि लोग जल्दबाजी में राय बना लेते हैं बिना हालात का आकलन किए हुए. इस सब के बीच राहुल गांधी का एक बयान आया जिसमें उन्होंने कहा कि बीएसपी नेता मायावती का मध्यप्रदेश में गठबंधन ना करने से कांग्रेस पर कोई असर नहीं पड़ेगा मगर कांग्रेस अध्यक्ष ने ये जरूर कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वो जरूर महागठबंधन का हिस्सा होंगी. राहुल ने कहा कि राज्य और केन्द्र में गठबंधन काफी अलग अलग चीज है. उन्होंने कहा कि राज्यों में गठबंधन के मामले में हम काफी लचीला रुख रखते हैं मगर मायावती ने बातचीत से पहले ही अपने पत्ते खोल दिए. लगता है इस बार राहुल गांधी अपना होमवर्क अच्छी तरह करके आए थे.
मध्यप्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष पहले ही साफ कर चुके हैं कि किन वजहों से मध्यप्रदेश में बीएसपी से गठबंधन नहीं हो पाया. उन्होंने कहा कि हम मायावती को 12 से 15 सीटें देने के लिए तैयार थे मगर वो 50 सीटें मांग रही थीं. अब जरा एक नजर आंकड़ों पर डालते हैं कि आखिरकार मध्यप्रदेश की हालत क्या है.
1998 में बीएसपी को 11 सीटें मिली थीं जो 2003 में घट कर 2 रह गईं. मगर जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तब उन्हें 7 सीटें मिली थीं यानी तब मुख्यमंत्री होने के कारण उनके पास सारे संसाधन मौजूद थे, यानी धन, बल और वो तमाम चीजें जो चुनाव में एक पार्टी को चाहिए होती हैं. मगर फिर 2013 में उनकी सीट घट कर 4 रह गई. ऐसे में यदि वो कांग्रेस से 50 सीटें मांगती हैं तो उन्हें वो सीट मिलना असंभव जैसी बात है. यही वजह है कि राहुल मध्यप्रदेश कांग्रेस के निर्णय को सही करार दे रहे हैं.
वैसे कुछ अन्‍य आंकड़ों पर नजर डालें तो आप को लगेगा कि कहीं कांग्रेस गलती तो नहीं कर रही है. बीजेपी को मध्यप्रदेश में 44.88 फीसदी वोट मिले तो कांग्रेस को 36.38 फीसदी और वहीं बीएसपी को 6.42 फीसदी वोट मिले हैं. अब बात करते हैं राजस्थान की. बीएसपी को 1998 में 2, 2003 में भी 2 सीट मिली मगर जब 2008 में मायावती मुख्यमंत्री थीं तब उसे 6 सीटें मिली थीं. मगर बाद में इन सभी 6 विधायकों ने कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार को सर्मथन दे दिया था और उनका कांग्रेस में विलय हो गया था. जबकि 2013 में बीएसपी को केवल 3 सीटें मिली थी और सबसे मजेदार बात है कि बीएसपी ने कभी भी अपनी सीट दुबारा नहीं जीती, हर बार उसने नई सीट पर जीत दर्ज की, यानी राजस्थान में बीएसपी की सफलता में उसके उम्मीदवार की निजी लोकप्रियता का ज्यादा हाथ रहता है.
राजस्‍थान में बीजेपी को 45.17 फीसदी वोट मिले थे जबकि कांग्रेस को 33.07 फीसदी और बीएसपी को 3.37 फीसदी. यही वजह है कि कांग्रेस ने बीएसपी को चारा नहीं डाला. लगे हाथ छत्तीसगढ़ की भी बात कर लेते हैं. यहां हमेशा टक्कर कांटे की होती है. बीजेपी को यहां 49 सीटें मिली हैं और कांग्रेस को 39 सीटें मगर यदि वोटों के प्रतिशत को देखें तो बीजेपी को 41.18 फीसदी वोट मिले तो कांग्रेस को 40.43 फीसदी यानी वोटों का अंतर एक फीसदी के आसपास है जबकि छत्तीसगढ़ में बीएसपी के पास 1 सीट है और उसे 4.29 फीसदी वोट मिले हैं यानी कांग्रेस यदि यहां बीएसपी के साथ जाती तो जीत से कोई नहीं रोक सकता था मगर मायावती ने अजित जोगी को क्यों चुना यह कहना मुशिकल है. खैर आंकड़े जो भी कहें, इन तीनों राज्यों के चुनाव दिलचस्प होने वाले हैं. आंकड़े भी चौंकाने वाले होंगे जो 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए भी एजेंडा तय करेंगे.

गाँधी के कुछ अनकहे पहलू

महात्मा गांधी का देहावसान होने पर अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट जनरल सी मार्शल ने कहा था - 'महात्मा गांधी आज सारी मानवता के प्रतिनिधि बन गए हैं. यह वह व्यक्तित्व है जिसने सत्य और विनम्रता को साम्राज्यों से भी ज्यादा शक्तिशाली बनाया.'  वास्तव में आज जब महात्मा गांधी के जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे हो रहे हैं, तब भी क्या उनके बाद कोई ऐसा इंसान हुआ जिसे समूची मानवता का प्रतिनिधि समझा जा सके? गांधीवाद की राह पर चलने वाले, गांधी के आदर्शों का अनुसरण करने वाले तो बहुत हैं लेकिन कोई गांधी नहीं हुआ. वह गांधी जो समाज के लिए अपना जीवन दांव पर लगाने में भी कतई संकोच नहीं करता था. जो विदेशी हुकूमत के खिलाफ अपने नैतिक बल, अकाट्य तर्कों के आधार पर ताजिंदगी संघर्ष करता रहा और इसके साथ भेदभाव, जात-पात, सामाजिक वैमनस्यता, साम्प्रदायिकता, कुरूढ़ियों आदि के खिलाफ भी अलख जगाता रहा.     
उच्च आदर्श स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को विस्मृत नहीं किया जा सकता. भारतीय जनमानस के अहसास गांधी के साथ काफी गहरे जुड़े हैं. गांधी वास्तव में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक जीवन दर्शन है जो भारतीय समाज की जीवन शैली में रच-बस गया है. इसके पीछे सहिष्णुता को लेकर वह सामाजिक स्वीकार्यता है जिसका दायरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहता बल्कि वैश्विक हो जाता है. गांधी दर्शन ने समूचे विश्व को प्रभावित किया है. गांधी का चिंतन किसी क्षेत्रीय सीमा से नहीं बंधा क्योंकि वह मानव मात्र के लिए है, वह मानव जो दुनिया के किसी भी कोने का हो सकता है.
गांधी एक ऐसा व्यक्तित्व है, जिसके प्रभाव से कोई जुदा नहीं हो सका, यहां तक कि गांधी की आलोचना करने वाले भी. गांधी प्रतीकों में सामने आए हैं और समाज के अंतर्मन में बैठे हैं. गांधी की टोपी आजादी के आंदोलन में भारतीय अस्मिता की प्रतीक बनी. यह वह टोपी है जो कभी खत्म नहीं होती, जिसका असर खत्म नहीं होता. गांधी के प्रबल आलोचक भी, जिन पर गांधी की हत्या का दाग है, गांधी टोपी को अपनाए हैं, भले ही टोपी को बदले हुए रंग में अपनाया गया. आखिर कैसे अनदेखा कर दें वे गांधी को, गांधी उस व्यक्तित्व का नाम है जो उच्च आदर्शों के साथ अडिग है. गांधी उस पुरातन भारतीय परंपरा के ध्वजवाहक हैं जिसकी आत्मा में सामाजिक समरसता कूट-कूटकर भरी है. समय गुजर गया है, गांधी की कांग्रेस अब नहीं है लेकिन टोपी मौजूद है. यह टोपी फिर-फिर अपना असर दिखाती है. यह बात अलग है कि इस टोपी को धारण कर लेने वाले न तो गांधी हो जाते हैं न ही ऐसे अधिकतर लोग उन आदर्शों को अंगीकार करते हैं, जो गांधी ने दिए हैं. इसका उपयोग अस्त्र की तरह भी हुआ क्योंकि इस प्रतीक के आगे सब बौने हो जाते हैं. अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन में गांधी टोपी ने ऐसा असर दिखाया कि आगे जाकर एक राजनीतिक पार्टी और फिर पूरी सरकार ही टोपी वाली बन गई. 
खादी को आप सिर्फ कपड़ा नहीं कह सकते, यह भारतीय अस्मिता की प्रतीक है. खादी वास्तव में हमारी खुद्दारी है. यह ऐसा प्रतीक है जो भारत को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करता है. गांधी के सिद्धांतों के अनुसार पराधीनता में वह सब कुछ शामिल है जिसके लिए हम विदेशों पर निर्भर हों. विदेशी वस्तुओं को अपनाने का अर्थ अपने देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना है. गांधी ने हमेशा बकरी का दूध पिया. वे हमेशा गौ-पालन को प्रोत्साहित करते रहे. गांधी की ग्राम स्वराज्य की अवधारणा में खेती-बाड़ी से साथ-साथ मवेशी पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष माना गया है. कहने को भले ही खादी को सिर्फ एक कपड़ा मान लें या बकरी को सिर्फ एक मवेशी, लेकिन यह वे प्रतीक हैं जो संदेश देते हैं कि जब गांव आत्मनिर्भर होंगे तभी सही मायने में देश का विकास हो सकेगा.   
गांधी के आदर्श प्रतीकों के जरिए हमारे समाज में अनजाने ही कैसे पीढ़ियों में हस्तांतरित होते रहते हैं इसका एक उदाहरण देता हूं. कुछ साल पहले मैं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में था. मेरा छोटा बेटा उस समय करीब छह साल का था. एक दिन वह स्कूल से लौटा और अपनी यूनिफार्म उतारी. इसके बाद उसने बजाय दूसरे कपड़े पहनने के वहां रखी एक सफेद चादर आधी नीचे लपेटी और बाकी ऊपर से कंधे पर डाल ली. मैंने पूछा यह क्या हो रहा है? वह पहले कुछ नहीं बोला. मैंने फिर पूछा कि यह चादर ऐसी क्यों लपेट ली. उसने कहा, गांधी जी ऐसे ही पहनते हैं. मैंने पूछा तुमने कहां देखा? उसने कहा स्कूल में लगी तस्वीर में...मैंने पूछा इससे क्या होता है? उसने कहा एक ही कपड़ा पहनना पड़ता है. फिर मैंने पूछा कि इससे क्या फायदा, क्यों एक ही कपड़ा पहना जाए? उसने ऐसी बात कही कि मैं हतप्रभ रह गया. उसने कहा- एक ही कपड़े से काम चलता है तो दूसरे की क्या जरूरत? मैंने पूछा कि क्या यह तुम्हें तुम्हारी टीचर ने बताया...उसने कहा नहीं. मैं सोच में पड़ गया कि पहली कक्षा में तो गांधी जी के बारे में शायद कुछ पढ़ाया भी नहीं जाता, फिर कैसे यह ऐसी बात कर रहा है? जब मैंने फिर पूछा तो उसने कहा...वह तो गांधी जी की फोटो में ही दिख रहा है कि वे एक ही कपड़ा पहने हैं. गांधी के आदर्श प्रतीक रूप में कुछ इसी तरह आ जाते हैं. गांधी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहते हैं. 
गांधी को अपना समझना आसान है क्योंकि वे हमेशा हमारे आसपास के आम इंसान बने रहे हैं. अपनी जरूरतें न्यूनतम करके जीवन यापन का उनका सिद्धांत आडंबरों से दूर सात्विक जीवन की ओर ले जाता है. वास्तव में सत्य की कसौटी पर परखें तो आडंबरों को हमेशा निरर्थक ही पाएंगे. 
गांधी ने कहा था किसी के साथ ऐसा व्यवहार न करें जैसे व्यवहार की आप किसी से अपेक्षा नहीं करते. किसी को कष्ट पहुंचाने से पहले सोच लें, कोई आपको भी चोट पहुंचा सकता है. गांधी के विचारों को जरूर ही पढ़ा जाना चाहिए लेकिन गांधी के बारे में सिर्फ पढ़-लिख लेने से वे हमारे जीवन में नहीं आ जाते, उन्हें महसूस करना होता है. गांधी के आदर्शों को पहनने, ओढ़ने और बिछाने की जरूरत है.  महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था - 'आने वाली पीढ़ियों को यह मुश्किल से विश्वास होगा कि हाड़-मांस का कोई ऐसा भी मानव धरती पर जन्मा था.' वास्तव में जिस तरह जाति-धर्म को लेकर विद्वेष का माहौल बनता जा रहा है, जिस तरह से जाति और धर्म आधारित वोटों की राजनीति होने लगी है.. जिस तरह समाज में विदेशी वस्तुओं और विदेशी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढ़ता जा रहा है... तो क्या कुछ और साल बाद इसी देश में गांधी के जन्म लेने पर कोई विश्वास कर पाएगा?

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...