Monday, October 24, 2016

समाजवादी पार्टी का महाभारत

मुलायम घराने के सियासी ड्रामे से मुझे कुछ नहीं लेकिन अखिलेश यादव को मायूस देखकर एक राजनीतिक छात्र होने के नाते थोड़ा सा खराब ज़रूर लगा. एक ऐसा समय जब देश में राजनीतिक विरासतों का दौर है, यूपी में मुलायम, राष्ट्रीय लोकदल के अजीत सिंह, अपना दल की अनुप्रिया पटेल, बिहार में पासवान और लालू, पंजाब में बादल, तमिलनाडु में करुणानिधि, महाराष्ट्र में ठाकरे और सबसे पुरानी और पूर्व में सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस में गाँधी परिवार ने कार्यकर्ताओं की मेहनत से खड़ी पार्टियों पर परिवार के लोगों को जबरजस्ती थोपा है तो अखिलेश के रूप में यह बग़ावत कुछ ना कुछ संकेत है. अगर अखिलेश इसमें सफल हो जाते तो अन्य दलों में भी हो रही परिवारिक मनमर्ज़ी को चैलेंज मिलता था. मैं मानता हूँ कि वो चार साल तक हिम्मत नहीं कर सके, लेकिन अंतिम समय में कुछ करने की ठान ली जब उनको लगा क़ि अब हारना तय है. ऐसा होता तो बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, जयललिता की पार्टी में भी एक बग़ावत के संकेत दिखते. 
हालाँकि मुझे इस मामले में अखिलेश के अलावा राहुल गाँधी में वो माद्दा दिखता है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं दिखाई. उनको कई मौके मिले लेकिन नहीं कर पाए. एक तो वो दगी नेताओं को बचाने का बिल फाड़ने वाला एपीसोड याद होगा. इसमें वो कभी कोशिश करते नहीं दिखे शायद कार्यकर्ताओं की जगह हवाई चॅमचे टाइप नेताओं से घिरे थे, अखिलेश और नीतीश इसी में उनसे आगे निकल गए. नीतीश कुमार ने यह हिम्मत 2013 में भाजपा से गठबंधन के समय दिखाई थी, फिर मोदी से हारे और मांझी को सब देकर निकल पड़े नई रणनीति पर फिर सब वापस मिल गया. मोदी भी भाजपा में बहुत बड़ी लड़ाई जीतकर आए हैं. ऐसा नहीं है क़ि उनको संघ का पूरा समर्थन था. संघ उनके गुजरात के कार्यकाल में अपने खुद के अविकसित होने के डर से वाकिफ़ था, लेकिन मोदी ने 2 साल पहले से जो लहर बनाई थी, वो पहले भाजपा में उनको विजयी करती है. फिर देश में.
समाजवादी पार्टी का अब हारना तय है, मुश्किल से 80 सीटें आएँगी, अब उनका मुस्लिम वोट बीएसपी और यादव वोट भाजपा के साथ जाएगा. मुस्लिम को लगता है जो भाजपा को हाराए उसे वोट दो, तो अब बीएसपी ही उसे टक्कर देगी. दूसरी तरफ यादवों को लगता है क़ि अगर मायावती जीत गईं तो यादवों पर एससी एस टी के झूठे केश पूर्व की तरह लगाएँगी, तो वो उसके साथ जाएँगे जो बीएसपी को हराएगा।
अखिलेश यादव की टीम में लगातार काम कर रहे लोग बता रहे थे क़ि अखिलेश जी का राजनीतिक गुरुओं के आधार पर अनुमान और रणनीति है क़ि अगर समाजवादी पार्टी से अलग दल बनाकर वो मैदान में उतरेंगे तो फिर वो सबसे बड़े दल (150-170 सीट) बनकर उभर सकते हैं. ऐसा होगा जनता के बीच इमोशनल कार्ड खेलकर. उत्तर प्रदेश में जनता अखिलेश के बहुत करीब है ये तो मैं जानता हूँ. ख़ासकर ओबीसी. आप देखेंगे क़ि युवा उनको भईया और डिंपल को भाभी, बुजुर्ग डिंपल को बहू कहते हैं. लोग जो विरोधी हैं वो भी कहते हैं वो लड़का तो ठीक है लेकिन शिवपाल के गुंडे प्रदेश को लूट रहे हैं. काम भी हुआ है, जिसको कोई नकार नहीं सकता है, मीडिया और इंडस्ट्रलीस्ट के बीच में उनकी छवि अच्छी है. लेकिन सब उनके परिवार और दबंग यादवों से डरते हैं. ऐसे में अगर अखिलेश ये कहकर क़ि ये धर्म युद्ध है, घर में बाप और चाचा ही साथ नहीं हैं, जनता के बीच जाएँगे तो लोगों की हमदर्दी होगी उनके साथ. क्योंकि पार्टी के बँटवारे में लगभग गुंडे तो शिवपाल चाचा के साथ चले जाएँगे. दूसरी तरफ अखिलेश को कांग्रेस का समर्थन मिल सकता है. कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित को उम्मीदवार बना दिया है लेकिन अगर उनको हटाकर अभी भी अखिलेश से गठबंधन हो जाए तो कोई दिक्कत  नहीं होगी. ऐसे में उत्तर प्रदेश में 100 ऐसी सीटें तो हैं ही जहाँ पर कांगेस को 20000 वोट से अधिक मिलता है. जो अखिलेश के साथ जुड़ने से जीत में तब्दील हो सकता है. और अखिलेश के पास अकेले 60-70 सीटों पर जीतने के दम तो बिना मुलायम सिंह के है. फिर इस स्थिति में उनका MY (मुस्लिम-यादव) वोट नहीं बिखरेगा, क्योंकि उनको जीत दिखेगी. मुझे लगता है क़ि अब अखिलेश यादव पर मुलायम सिंह यादव ने इमोशनल कार्ड खेलकर सब गेम बेकार कर दिया है. अब जो टकराव हो चुके हैं वो साथ आने से मिट नहीं सकते हैं, बल्कि अभी और भी चालें चली जाएँगी जिससे नुकसान होगा.

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...