उत्तरी सीरिया का इलाका है जहाँ कुर्दों का कब्ज़ा हुआ करता था. 2012 के
आसपास जब आईएसआईएस ने अपना विस्तार किया तो ये इलाके भी उसके कब्जे में आ
गए. फिर आती हैं अमेरिकी सेनाएं. वो पहले तो अकेले लड़ते रहे फिर कुर्द
लड़ाकों को अपने साथ मिलकर इस्लामिक स्टेट मतलब ISIS के खिलाफ युद्ध छेड़ा।
एक अहम बात ये कि टर्की कुर्दों को बहुत पहले से आतंकवादी संगठन मानता था. लेकिन अमेरिकी सेना द्वारा दिए जा रहे संरक्षण की वजह से कुछ कर नहीं पा रहा था. अब कुछ समय से जब से इस्लामिक स्टेट कमजोर या उनके दावे के अनुसार ख़त्म हुआ तब से अमेरिका धीरे धीरे अपनी सेना वहां से हटाने लगा है.
अब फिर से एंट्री हुई टर्की की. तुर्की ने उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्द लड़ाकों के क़ब्ज़े वाले इलाकों में हवाई हमले करना शुरू कर दिया है. कुर्दों के नेतृत्व वाले सुरक्षाबलों ने तुर्की के हमलों का जवाब दिया है और दोनों पक्षों के सैनिकों में संघर्ष हुआ है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस्लामिक स्टेट को सीरिया से खदेड़ने में कुर्दों का बड़ा अमेरिकी और सीरियन सेना को बड़ा सहयोग रहा है. अब कुर्द अपने क़ाबू वाले इलाक़ों की जेलों में बंद हज़ारों इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों और शिविरों में रह रहे उनके रिश्तेदारों की सुरक्षा करते हैं. अगर टर्की से युद्ध हुआ तो वो आगे भी ऐसा ही करेंगे कह नहीं सकते, हो सकता है जरुरत पड़े तो उनको जेलों से निकलकर अपने साथ शामिल करके लड़ने का भी मौका दे दें. या फिर हो सकता है कि टर्की की सीमा से लगी जेलों में रह रहे आतंकियों को टर्की ही छोड़ दे, तो वो फिर से तैयार हो जाएं. इनकी संख्या लगभग 12 से 15 हजार के करीब बताई जाती है.
कुछ लोगों का कहना है कि अब अमेरिकी सेना इराक, अफगानिस्तान और सीरिया से धीरे धीरे अपनी सेना निकल रही है उसकी के चलते अब एक तरफ तो अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत की कोशिश जारी है. इसलिए ही वहां तालिबान की गतिविधियां फिर से शुरू हो गई हैं, दूसरी तरफ टर्की और ईरान जैसे देशों ने फिर से अपना दबाव बनाना चालू कर दिया है. कुछ लोग तो यहाँ तक बताते हैं कि इस्लामिक स्टेट के हारने के बाद अब अमेरिका को कुर्दों की जरुरत नहीं इसलिए उसने ही टर्की को ग्रीन सिग्नल दिया हमले करने के लिए. ट्रैम्प केवल बाहर से दिखावे के लिए कहते हैं कि अगर टर्की ने हद पार की तो उसकी अर्थव्यवस्था बर्बाद कर देंगे. अमेरिकी मीडिया में ही बहुत लोगों का कहना है कि ट्रम्प से खुद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इस मुद्दे पर बात की थी. इसलिए उन्होंने अचानक ये फैसला लिया जबकि पेंटागन के अधिकारी तो इसके उलट ये चाहते थे कि फ़िलहाल अमेरिकी सेना की छोटी संख्या वहां रहनी चाहिए.
एक अहम बात ये कि टर्की कुर्दों को बहुत पहले से आतंकवादी संगठन मानता था. लेकिन अमेरिकी सेना द्वारा दिए जा रहे संरक्षण की वजह से कुछ कर नहीं पा रहा था. अब कुछ समय से जब से इस्लामिक स्टेट कमजोर या उनके दावे के अनुसार ख़त्म हुआ तब से अमेरिका धीरे धीरे अपनी सेना वहां से हटाने लगा है.
अब फिर से एंट्री हुई टर्की की. तुर्की ने उत्तर-पूर्वी सीरिया में कुर्द लड़ाकों के क़ब्ज़े वाले इलाकों में हवाई हमले करना शुरू कर दिया है. कुर्दों के नेतृत्व वाले सुरक्षाबलों ने तुर्की के हमलों का जवाब दिया है और दोनों पक्षों के सैनिकों में संघर्ष हुआ है. जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि इस्लामिक स्टेट को सीरिया से खदेड़ने में कुर्दों का बड़ा अमेरिकी और सीरियन सेना को बड़ा सहयोग रहा है. अब कुर्द अपने क़ाबू वाले इलाक़ों की जेलों में बंद हज़ारों इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों और शिविरों में रह रहे उनके रिश्तेदारों की सुरक्षा करते हैं. अगर टर्की से युद्ध हुआ तो वो आगे भी ऐसा ही करेंगे कह नहीं सकते, हो सकता है जरुरत पड़े तो उनको जेलों से निकलकर अपने साथ शामिल करके लड़ने का भी मौका दे दें. या फिर हो सकता है कि टर्की की सीमा से लगी जेलों में रह रहे आतंकियों को टर्की ही छोड़ दे, तो वो फिर से तैयार हो जाएं. इनकी संख्या लगभग 12 से 15 हजार के करीब बताई जाती है.
कुछ लोगों का कहना है कि अब अमेरिकी सेना इराक, अफगानिस्तान और सीरिया से धीरे धीरे अपनी सेना निकल रही है उसकी के चलते अब एक तरफ तो अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत की कोशिश जारी है. इसलिए ही वहां तालिबान की गतिविधियां फिर से शुरू हो गई हैं, दूसरी तरफ टर्की और ईरान जैसे देशों ने फिर से अपना दबाव बनाना चालू कर दिया है. कुछ लोग तो यहाँ तक बताते हैं कि इस्लामिक स्टेट के हारने के बाद अब अमेरिका को कुर्दों की जरुरत नहीं इसलिए उसने ही टर्की को ग्रीन सिग्नल दिया हमले करने के लिए. ट्रैम्प केवल बाहर से दिखावे के लिए कहते हैं कि अगर टर्की ने हद पार की तो उसकी अर्थव्यवस्था बर्बाद कर देंगे. अमेरिकी मीडिया में ही बहुत लोगों का कहना है कि ट्रम्प से खुद तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इस मुद्दे पर बात की थी. इसलिए उन्होंने अचानक ये फैसला लिया जबकि पेंटागन के अधिकारी तो इसके उलट ये चाहते थे कि फ़िलहाल अमेरिकी सेना की छोटी संख्या वहां रहनी चाहिए.
हमले के बीच हज़ारों लोगों का पलायन
हो रहा है और कुर्दों का दावा है कि कई आम नागिरक मारे गए हैं. तुर्की का
कहना है कि वो कुर्द लड़ाकों को हटाकर एक 'सेफ़-ज़ोन' तैयार करना चाहता है,
जहां लाखों सीरियाई शरणार्थी भी रहते हैं. युद्ध कोई भी हो उसका सबसे बड़ा
असर वहां औरतों को झेलना पड़ता है. अपना घर छोड़कर बच्चों को लिए सुरक्षित
ठिकाने तलाशती कुर्द औरतों की कहानी आज बीबीसी ने एक रिपोर्ट में छापी थी
जिसे सबको देखना चाहिए. आपको उससे शायद कश्मीर की स्थिति का भी थोड़ा बहुत
अंदाजा हो जायेगा. तुर्की साथ साथ ये भी धमकी दे रहा है कि ये करवाई हमने
अपनी सिमा सुरक्षा के लिए की है, अगर किसी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर
कब्जे की करवाई कही तो हम अपने यहाँ से सभी सीरियाई शरणार्थियों को यूरोप
भेज देंगे. अब इसके बाद ईरान और रूस का भी दखल सीरिया में बढ़ जाएगा. और ये
भी तय माना जा रहा है कि अब अमेरिका इस लड़ाई से दूर ही रहेगा. क्योंकि
टर्की भी नाटो का बड़ा देश है.
इनके इतिहास की बात करें तो
एक समय उस्मानी साम्राज्य के केंद्र रहे तुर्की में 20 फ़ीसदी आबादी
कुर्दों की है. कुर्द संगठन आरोप लगाते हैं कि उनकी सांस्कृति पहचान को
तुर्की में दबाया जा रहा है. ऐसे में कुछ संगठन 1980 के दशक से ही छापामार
संघर्ष कर रहे हैं. कई सालों से वे आज़ादी की मांग कर रहे हैं. वे
कुर्दिस्तान बनाना चाहते हैं. मध्य-पूर्व के नक्शे में नज़र डालें तो
तुर्की के दक्षिण-पूर्व, सीरिया के उत्तर-पूर्व, इराक़ के उत्तर-पश्चिम और
ईरान के उत्तर पश्चिम में ऐसा हिस्सा है, जहां कुर्द बसते हैं. कुर्द हैं
तो सुन्नी मुस्लिम, मगर उनकी भाषा और संस्कृति अलग है. तुर्की इस बात से
डरा हुआ है कि कुर्दों का एक राष्ट्र सा लगभग बना हुआ है, ऊपर से कुर्द
लड़ाकों को आईएस के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अमरीका से हथियार भी मिले हैं. हो
सकता है कि वे इतने शक्तिशाली हो जाएं कि सीरिया में आईएस से जीते हिस्से
को इराक़ के कुर्दिस्तान से जोड़कर बड़ा सा कुर्द राष्ट्र बना लें. ऐसा हुआ
तो तुर्की के लिए ख़तरा पैदा हो जाएगा. तुर्की को यह चिंता पहले भी थी.
शुरू में जब आईएस के ख़िलाफ़ अमरीका ने क़ुर्दों से सहयोग लेना चाहा था, तब
भी तुर्की ने इसका विरोध किया था. ऐसे में यह आशंका बनी हुई है कि जैसे ही
अमरीका सीरिया से अपनी सेनाएं हटाएगा, तुर्की वहां पर कार्रवाई करके कुर्द
इलाक़ों को ख़त्म कर देगा और उनके नियंत्रण वाली ज़मीन छीन लेगा.
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