Thursday, April 2, 2020

कोरोना के नाम पर लोकतंत्र का खात्मा

आजकल कोरोना वायरस का कहर चीन के बाद सबसे ज्यादा अमेरिका और यूरोपीय देशों में चल रहा है। ऐसे समय में यूरोप के ही एक देश से लोकतंत्र पसंद लोगों को नाराज करने वाली खबर आई है। इस देश का नाम है हंगरी, जहाँ कोरोना से बचाव के नाम पर लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। इस देश की शुरुआती कहानी ये  है कि हंगरी में 2003 में एक जनमत संग्रह हुआ कि उसे यूरोपीय यूनियन में मिलना चाहिए या नहीं? वही यूरोपीय यूनियन जिससे हाल ही में ब्रिटेन बाहर निकला है। इसमें शामिल होने की पहली शर्त है सदस्य देश को अपने यहाँ लिबरल डेमोक्रेसी रखनी पडेगी। पब्लिक ने हाँ कर दी और हंगरी ईयू में मिल गया। और अभी दो दिन पहले ही हंगरी की संसद में लोकतंत्र खत्म करने का प्रस्ताव पास हो गया, प्रधानमंत्री को अनिश्चित काल के लिए पीएम घोषित कर दिया गया है। और साथ ही उसे अपने मनमाने कानून बनाने का अधिकार भी दे दिया। इसके अलावा भी अथाह शक्तियां दी गई हैं। और ये सब हुआ है कोरोना महामारी के बहाने। असल में यहाँ ऐसा फेर बदल पहली बार नहीं हुआ है। साल 1988 तक यहाँ कम्युनिस्ट शासन था। एक 25 साल के एक रिसर्च स्टूडेंट की चिट्ठी जार्ज सोरोस नाम के, लोगों की मदद करने वाले एक सेठ के पास आर्थिक मदद के लिए पहुंची, उसी चिट्ठी में उस लडके ने ये भी कहा था कि जल्द ही यहाँ कम्युनिज्म खत्म होने वाला है। आगे चलकर उस लडके की बात सच हुई और यहाँ संसदीय लोकतंत्र आ गया। असल में कहानी का रोमांचक मोड तब आया जब 1998 में वही चिट्ठी लिखकर भविष्यवाणी करने वाला लडका विक्टर ओरवन प्रधानमंत्री बन गया। इसके पीछे उनका 1989 में दिया गया साढे छः मिनट लंबा भाषण है जिससे वो बहुत मशहूर हुआ। इस भाषण में उन्होंने ढाई लाख लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि सोवियत यूनियन की सेना जल्द ही यहाँ से चली जाए।  इसके बाद ओरवन राजनीति में आए और 1990 में सांसद बन गये, 1993 में Fidesz Party के अध्यक्ष बन गये। 1994 में चुनाव हुए तो पार्टी की सीटें कम हो गईं, अब ओरवन बदलने लगे और दक्षिणपंथियों की तरह भाषण देने लगे। हर कट्टरपंथी नेता की तरह नस्लभेदी टिप्पणियाँ और हंगरी को फिर से महान बनाने जैसी बातें करने लगे। वो हंगरी के कट्टरपंथी विचारधारा के वोट बटोरने की हर कोशिश करने लगे। बता दूं कि उनकी शादी 1986 में कोर्ट में हुई थी, लेकिन उन्होंने दोबारा धार्मिक रीति रिवाज से अपनी पत्नी से दोबारा शादी की। लोगों को ये सब पसंद आया और 1998 में सोशलिस्ट सरकार चली गयी, और कंजरवेटिव गठबंधन की तरफ से ओरवन प्रधानमंत्री बने। 2004 और 2006 में ओरवन की पार्टी चुनाव हार गई और वो विपक्ष में बैठे। इसके बाद ओरवन ने अपने अंदर और अधिक कट्टरता लानी शुरू कर दी। कहते हैं कि सत्ता नेता को बिगाड़ देती है जबकि यहाँ सत्ता चली गयी तो नेता बिगडने लगा। वो 2006 में हारने के बाद मीडिया को कारण बताते रहे। कहते थे कि ये लोकतंत्र किसी काम का नहीं जो जिसमें मीडिया पब्लिक को भड़काकर आपकी सत्ता छीन लेती है, इसपर नकेल कसनी चाहिए। 2008 में वैश्विक मंदी आई तो ओरवन ने इसका फायदा उठाया, कहा कि मैं ऐसा देश बनाऊंगा जिसपर विश्व की अर्थव्यवस्था का कोई फर्क ही न पड़े। ओरवन सत्ता में लौटे और 2011 में नया संविधान लेकर आए। ओरवन तब से अबतक सत्ता में बैठे हैं और अब तो ऐसा प्रावधान कर लिया कि जबतक चाहे सत्ता में रह सकते हैं। जो युवा अपनी जवानी में हंगरी से कम्युनिस्ट तानाशाही खत्म होने की मांग कर रहा था वो अब खुद तानाशाह बन गया, कभी लिबरल रहा नेता आज कट्टरपंथी राजनीति का चेहरा बन चुका है। कहते हैं कि आजतक ओरवन ने इसके लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया। कुछ लोगों का मानना है कि वहाँ तानाशाही तो 2011 में नये संविधान के साथ ही आ चुकी थी, बस नाम का लोकतंत्र था, विपक्ष था जिसकी आवाज के कोई मायने नहीं, चुनाव होता था जिसमें ओरवन का जीतना तय था। इसे राजनीति शास्त्र में "साॅफ्ट ऑटोपैसी" कहते हैं, मतलब असली लोकतंत्र न होते हुए भी उसका नाटक करना, तानाशाही को चुपके से ऐसे लागू कर देना जिससे जनता को भनक तक न लगे। नतीजतन अब हंगरी वन पार्टी सिस्टम बन चुका है। मीडिया को सरकार ने पूरी तरह नियंत्रण में ले लिया है। अप्रैल 2018 में अटलांटिक की एक रिपोर्ट में ओरवन को यूरोपियन यूनियन का सबसे खतरनाक आदमी माना गया था, अब उसकी आशंका सच हो रही है। हलांकि सरकार कह रही है कि ये सब केवल कोरोना खतरे से निपटने के लिए है लेकिन ये पूरा सच नहीं है। यूरोपियन यूनियन ने आलोचना भी ऊपर ऊपर ही कर दी, उसने एक बार भी हंगरी का नाम लिए बिना कहा कि, "ईयू की बुनियाद में आजादी, लोकतंत्र और मानवाधिकार की रक्षा करना। सभी सदस्यों को इसका पालन करना चाहिए।"

अब सवाल ये भी है कि ईयू पहले से ओरवन के खिलाफ क्यों नहीं बोलता रहा जब वो 2011 से ही लोकतंत्र खत्म करने की राह पर चल रहे थे? जब शरणार्थी समस्या पूरे विश्व में बहुत बडी हो रही थी तो ईयू हमेशा ही इसके लिए लिबरल होने की कवायद करता रहा। वो बर्लिन की दीवार टूटने को आज भी इसीलिए सेलिब्रेट करता है। लेकिन हंगरी ने शरणार्थियों को रोकने के लिए अपने बार्डर पर कंटीले तारों की दीवार बनवा दी, तब ईयू क्यों नहीं बोला? ईयू के लोग ही हंगरी को सबसे कम लोकतांत्रिक देश और ओरवन की पार्टी को अपने आप में एक स्टेट कहा, लेकिन ईयू चुप रहा। कुछ लोग इसकी वजह बताते हैं कि ओरवन हर काम कानून बनाकर करते हैं। अगर कोई इन मुद्दों पर उनको घेरेगा तो कह सकते हैं कि ये तो जनमत है, जनता की चुनी संसद में पास कानून।

अजीब है कि ओरवन खुद को इतना गरीब बताते हैं कि उनको 15 साल में पहली बार नहाने के लिए गर्म पानी और बंद दरवाजे का बाथरुम मिला था। लेकिन अब वो हंगरी के सबसे अमीर आदमी हैं।
अंत में सौरभ द्विवेदी की सुनाई एक कहानी सुनाता हूँ कि दादा ने पोती से पूछा कि लोकतंत्र की अहमियत क्या है?
पोती ने जवाब दिया," खाने में नमक की तरह।"
मतलब रोज रोज खाना खाने में नमक को कोई याद नहीं करता लेकिन जिस दिन नमक न हो, पूरा खाना ही अधूरा लगता है। वैसे ही ऐसे तो किसी को लोकतंत्र की परवाह नहीं, लेकिन जिस दिन खत्म हो जाए, आजादी के मायने उस दिन समझ आते हैं।


Wednesday, April 1, 2020

ब्राजील में कोरोना बनाम राष्ट्रपति

जब पूरे विश्व में कोरोना वायरस से हाहाकार मचा है तो वहीं, लैटिन अमेरिका में बसा एक देश ऐसा है जिसके राष्ट्रपति इसके खतरे को सिरे से नकार रहे हैं। ये देश है अपने समुद्रीय तटों और फुटबॉल के लिए प्रसिद्ध ब्राजील। जो पिछले दिनों अमेज़न जंगलों में लगी आग की वजह से चर्चा में आया था। यहाँ के राष्ट्रपति हैं दक्षिणपंथी नेता जायर बोलसेनेरो। आप लोगों को एक रोते हुए नेता की तस्वीर याद होगी जिसे इटली का प्राइम मिनिस्टर बताकर  वायरल किया जा रहा था, असल में वो इटली के पीएम नहीं बल्कि यही बोलसेनेरो का पुराना फोटो था। बोलसेनेरो अल्पसंख्यकों और समलैंगिकों पर अपनी नफरत भरी टिप्पणियों के लिए भी अक्सर चर्चा में रहते हैं। याद रहे कि पहले ट्रम्प भी कोरोना के खतरे को नकारते रहे और अमेरिका अब कीमत चुका रहा है।
ब्राजील में जनता के भी दो धडे हो गये हैं एक तरफ हैं बोलसेनेरो के समर्थक जो उनकी तरह एकदम निश्चिंत हैं, और दूसरी तरफ उनके विरोधी जो मानते हैं कि वहाँ भविष्य खतरे में है। यहाँ कोरोना के केस 4500 से अधिक हो गये हैं और मरने वालों की संख्या 200 के आसपास। लेकिन बोलसेनेरो तो कोरोना को मीडिया का बनाया हुआ "हिस्टीरिया" (एक तरह का काल्पनिक डर) बताते हैं। उनके अनुसार कोरोना साधारण जुकाम और बुखार है। इससे डरने की जरूरत नहीं है। लोगों के मरने पर बोले कि सबको एक दिन मरना है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो तर्क देते हैं कि एक एक्सीडेंट होने पर क्या हम कार बनाना बंद कर देंगे? 
यहाँ तक कि उनका अपना स्वास्थ्य विभाग लगातार लोगों को संक्रमण से बचने को कहता रहा लेकिन खुद राष्ट्रपति तो रैलियों में जाते रहे। राजधानी ब्राजीलिया सहित कुल 27 सूबे हैं, जिनके सभी गवर्नरों ने उनको गिडगिडाने की शक्ल में पत्र लिखकर गुज़ारिश की लेकिन कोई फर्क नहीं पडा। इसके बावजूद रियो डी जेनैरो और साओ पाउलो जैसे राज्यों के गवर्नर ने लाॅकडाउन किया है, लेकिन बोलसेनेरो इसके खिलाफ रैलियां कर रहे। एक स्थानीय चैनल के पोल में 67% लोग लाॅकडाउन के समर्थन और 33% लोग बोलसेनेरो के साथ हैं। अब दोनों पक्ष सोसल मीडिया के हैसटैग से लेकर विरोध प्रदर्शन तक में एक दूसरे के खिलाफ लड रहे हैं। राष्ट्रपति के समर्थन में लोग गाडियो पर झंडे लगाकर निकल रहे हैं, पार्टी कर रहे, अपने अपने काम पर जा रहे हैं। तो दूसरी तरफ उनके विरोध में लोग अपने घरों से बोलसेनेरो के खिलाफ जबरदस्त नारेबाजी कर रहे। बर्तन पीट रहे, गलियां Go back बोलसेनेरो के नारों से गूंज रहीं। 
पूरी मानव सभ्यता के लिए आज ये खतरे का समय है जब लोग एकजुट हैं, तब ब्राजील में ध्रुवीकरण हो गया है। राजनीतिक गणित ये भी कहता है कि 2015 की मंदी से अबतक ब्राजील उबरा नहीं था कि अमेज़न के जंगल में आग लग गई, फिर कोरोना आ गया। तो राष्ट्रपति ठीक से समझते हैं कि इससे पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था बिगडेगी, तो ब्राजील में भी पर्यटन कम होने की वजह से ऐसा होगा। फिर 2022 में ब्राजील के राष्ट्रपति के चुनाव हैं, जिसमें वो इस नाकामी का ठीकरा गवर्नरों पर फोडेंगे। उनको अंदाजा है कि रियो डि जेनेरो के गवर्नर विल्सन विटजेल और साओ पाउलो के गवर्नर जोआओ डोरिया उनके खिलाफ चुनाव लड सकते हैं, जिनपर वो अभी से सबसे अधिक हमले कर रहे। फिर चुनाव के समय भी बोलसेनेरो यही करके चुनाव जीतना चाहते हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ खबर आई है कि आइसोलेशन के विरोधी बोलसोनारो को ही आइसोलेट कर दिया गया है. 
जायर बोलसोनारो को उनकी ही सरकार के मंत्रियों ने किनारे कर दिया है. दो दिन पहले ख़बर आयी थी कि मंत्रिमंडल की बैठक में वरिष्ठ मंत्रियों ने कोरोना संकट पर राष्ट्रपति के बेहद लापरवाह रवैए पर नाख़ुशी जतायी थी. और अब कहानी बदल गयी है. सूत्र बता रहे हैं कि उनकी मिलिटरी और सीनियर सहयोगियों ने बोलसोनारो से अपने हाथ में कमान ले ली है. उन्हें बैठा दिया गया है यानी अब वे नाम के राष्ट्रपति हैं. कहा तो यह भी जा रहा है कि मंत्री और मिलिटरी जरनल वाल्टर ब्रेगा नेत्तो ने 'ऑपरेटिंग प्रेज़िडेंट' के रूप में सारे अधिकार बोलसोनारो से ले लिया है. देखते हैं, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि कब होती है.
फिलहाल जैसे हालत बन रहे उससे संदेह है कि इस संकट के बाद 2022 चुनाव के पहले ही उनका तख्ता पलट भी हो सकता है। ये बात आप याद रखिएगा कि अमेरिका से लेकर यूरोप तक में बहुत से देशों में ऐसा सत्ता पलटने का खेल देखने को मिल सकता है। हंगरी में ऐसा हो ही गया है और अमेरिका में भी बर्नी सैंडर्स ने अपना नाॅमिनेशन वापस ले लिया है, मतलब अब मुकाबला जो बाइडन और प्रेसीडेंट ट्रम्प के बीच कड़ा होगा। यहाँ तक कि खतरा चीन के राष्ट्रपति सी जिनपिंग की कुर्सी पर भी है।
मुझे खुशी है कि भारत में भी इतनी असहमति रखने वाले इतने दल, राज्य और सरकारें सबने मिलकर बढिया काम किया है। इतनी एकजुटता बहुत सुखद है। इसे किसी इस्लाम या हिंदुत्व में न बांटिए खासकर इस मुश्किल दौर में।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...