Friday, May 1, 2015

"महाराष्ट्र दिवस" विशेष

एक मई १९६० को महाराष्ट्र प्रथक राज्य बना। महाराष्ट्र का इतिहास काफी पुराना है। इसके लिखित इतिहास के अनुसार सबसे पहले इस राज्य में सातावाहन राजवंश और उसके बाद वाकाटक वंश का राज्य रहा है। इसके पश्चात इस क्षेत्र पर कलचुरी, चालुक्य, यादव, दिल्ली के खिलजी और बहमिनी वशों ने शासन किया। इसके बाद केंद्रीय सत्ता बिखरकर छोटी-छोटी सल्त्नतों में बदल गई।
सत्रहवीं शताब्दी में शिवा जी के प्रभावशाली बनने के बाद आधुनिक मराठा राज्य का उदय हुआ। शिवाजी ने बिखरी ताकतों को एकजुट कर शक्तिशाली सैन्य बल का संगठन किया। इस सेना की मदद से मुग़लों को दक्षिण के पत्थर से आगे बढ़ने से रोका । लेकिन, शिवाजी की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति बिखरने लगी। शिवाजी के उत्तराधिकारियों की विफलता के कारण पेशावओं ने सत्ता पर अधिकार कर लिया।  सन 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा शक्ति पूरी तरह से बिखर गई। अंततः 1818 तक अंग्रेजों ने सम्पूर्ण मराठा क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। फिर से 1875 में नाना साहब के सैनिकों ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गाँधी और तिलक ने महाराष्ट्र के लोगों को सक्षम नेत्रत्व प्रादन किया। उसी दौरान पेशवा भी अंग्रेज़ों से हार गए और नाना साहब महाराष्ट्र से भागकर बिठूर (कानपुर के पास गंगा किनारे बसा एक छोटा सा कस्बा, जहां तात्या टोपे से मिले) में रहने लगे। स्वंत्रता प्राप्ति के बाद बम्बई प्रान्त में महाराष्ट्र और गुजरात शामिल थे। बाद में बम्बई पुनर्गठन अधिनियम १९६० के अंतर्गत एक मई १९६० को इस सम्मलित प्रान्त को महाराष्ट्र और गुजरात नामक दो प्रथक राज्यों में बाँट दिया गया।
पुराने बम्बई राज्य की राजधानी नए महाराष्ट्र राज्य की राजधानी बन गई।
इसी लाइन में मुम्बई का इतिहास कहता है कि कभी किसी जमाने में किसी पोटिगुज राजा ने चार्ल्स द्वितीय, इंग्लैंड को दहेज स्वरूप दे दिये थे। चार्ल्स का विवाह कैथरीन डे बर्गैन्ज़ा से हुआ था। यहाँ पहले केवल मच्छुवारे (कोली) लोग ही रहते थे। यह द्वीपसमूह १६६८ में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को मात्र दस पाउण्ड प्रति वर्ष की दर पर पट्टे पर दे दिये गये। कंपनी को द्वीप के पूर्वी छोर पर गहरा हार्बर मिला, जो कि उपमहाद्वीप में प्रथम पत्तन स्थापन करने के लिये अत्योत्तम था। यहां की जनसंख्या १६६१ की मात्र दस हजार थी, जो १६७५ में बढ़कर साठ हजार हो गयी। १६८७ में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अपने मुख्यालय सूरत से स्थानांतरित कर यहां मुंबई में स्थापित किये। और अंततः नगर बंबई प्रेसीडेंसी का मुख्यालय बन गया। चार्ल्स का उद्देश्य पहले मुम्बई को लेकर केवल इतना ही था कि उद्देश्य था उन गांवो में सबलोग आएं और बिजनेस करें। पूरे हिन्दुस्तान से लोग आए। बिजनेस करने के लिए गुजरात और राजस्थान से लोग आए। मजदूर वर्ग में बड़े पैमाने पर उत्तर भारत से लोग आए। पारसी लोग भी आए। जो थोड़ा सा हिसाब किताब या ओफ़िस का काम करने वाले लोग थे, वो दक्षिण भारत से लोग आए। इसी के साथ मुम्बई आज भारत का सबसे बड़ा शहर बन गया। सन १९९५ में बम्बई का नाम बदलकर मुम्बई कर दिया गया।
(यह मुम्बई का स्वतंत्रता प्राप्ति से बहुत पुराना है। उसपर अभी बहुत पढ़ना बाकी है, फिर लिखूंगा। )
अगर महाराष्ट्र के भौगोलिक क्षेत्र में नजर डालें तो महाराष्ट्र देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। राज्य के पश्चिम में अरब सागर, दक्षिण में कर्नाटक दक्षिण पूर्व में आंध्र प्रदेश और गोवा , उत्तर पशिम में गुजरात और उत्तर में मध्य प्रदेश स्थित है। महाराष्ट्र का तटीय मैदानी भाग कोंकण कहलाता है। कोंकण के पूर्व में सह्याद्री की पड़ी श्रंखला सागर के समांतर स्थित है। आज महाराष्ट्र में विधान सभा की सीटें २८८, विधान परिषद् की सीटें ७८ ,लोकसभा की सीटें ४८ ,और राज्य सभा की १९ सीटें हैं। और महाराष्ट्र में ३५ जिले है।
महाराष्ट्र का सांस्कृतिक जीवन प्राचीन भारतीय संस्कृति, सभ्यता और ऐतिहासिक घटनाओं के प्रभावों का मिश्रण है। मराठी भाषा और मराठी साहित्य का विकास महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति है। स्थानीय व क्षेत्रीय देवताओं के प्रति भक्ति, ज्ञानेश्वर व तुकाराम जैसे संत कवियों की शिक्षाओं और छत्रपति शिवाजी व अन्य राजनीतिक तथा सामाजिक नेताओं के प्रति आदरभाव, महाराष्ट्र की संस्कृति की विशेष पहचान है। कोल्हापुर, तुलजापुर, पंढरपुर, नासिक, अकोला, फल्तन, अंबेजोगाई और चिपलूण व अन्य धार्मिक स्थलों पर दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मेलों और त्योहारों का भी महत्व कम नहीं है। महाराष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में गणेश चतुर्थी, रामनवमी, अन्य स्थानीय व क्षेत्रीय मेले और त्योहार महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके द्वारा लोगों का स्थानीय तथा क्षेत्रीय मेल-मिलाप होता है और ये सामाजिक एकता को बढ़ावा देते हैं। अन्ध धर्मों के त्योहारों में भी लोग बड़ी संख्या में शामिल होते हैं, जो सांस्कृतिक जीवन के महानगरीय चरित्र को दर्शाता है। ‘महानुभाव मत’ और डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर द्वारा पुनर्जीवित किए गए बौद्ध धर्म से सांस्कृतिक जीवन को नया आयाम मिला है।
महाराष्ट्र हमेशा से ही वीर भूमि रही है। इसके लिए मुझे कुछ कहने की जरूरत नहीं है, इतिहास खुद गवाह है। कुछ राजनैतिक तथाकथित लोगों(जिनका नाम आज के शुभ दिन नहीं लेना चहिए) को छोड़ दिया जाए तो यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं, यह मेरा अपना 4 साल का अनुभव है। यहाँ की संस्कृति में एक समावेश है। खाना-पीना, संगीत, नृत्य(खासकर लावली), पहनावा( पुरुषों में टोपी और महिलाओं की नावरी साडी बाँधने का तरीका मुझे मुझे बेहद पसंद है।) भाषा का तो ऐसा शौक चढ़ा कि 2-3 बजे रात तक जागकर मैने कुछ किताबें और अखबार पढ़े, अब 90% बोल और 100% समझ लेता हूँ। 1990 के दशक में महाराष्ट्र में रंगमंच पर विशेष ध्यान दिया गया; वी. खादिलकर और विजय तेंदुलकर जैसे नाटककार और बालगंधर्व जैसे कलाकारों ने मराठी नाटक को कला के रूप में स्थापित कर दिया। भारत के फ़िल्म उद्योग की शुरुआत का श्रेय दादा साहब फाल्के और बाबूराव पेंटर जैसे अग्रणियों को जाता है। पुणे की प्रभात फ़िल्म कम्पनी, संत तुकाराम और ज्ञानेश्वर के निर्माण के लिए प्रसिद्ध हुई। हिन्दी सिनेमा के क्षेत्र में नाना पाटेकर और माधुरी दीक्षित जैसे मराठी कलाकार विशेष रूप से सफल रहे हैं। मराठी साहित्य की ही तरह महाराष्ट्र में संगीत की भी प्राचीन परम्परा है। लगभग 14वीं शताब्दी में इसका मेल भारतीय संगीत से हुआ। आधुनिक काल में पंडित पलुस्कर और पंडित भातखण्डे ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई दिशा दी। विलायत हुसैन, अल्ला रक्खा जैसे अन्य वादकों की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आज पंडित भीमसेन जोशी और लता मंगेशकर जैसे गायक महाराष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में संगीत की महत्त्वपूर्ण भूमिका का प्रतिनिधित्व करते हैं।  मराठी सिनेमा में भी मैने काफी फिल्में(टाइम पास के दोनो भाग, लयभारी, मितवा आदि) देखी हैं। मराठी फिल्म कोर्ट तो देखने का इतना मन है कि पूंछो मत।  उसपर बैन चल रहा कुछ जगह पर।  लेकिन जब भी बैन हटेगा, तब हम लॉ क्लासेज के फ्रेंड्स ग्रुप जाएंगे देखने के लिए। शहर से बड़ा प्यार सा हो जाता है, अगर आप जहां भी रहने लगें। एक तरफ जितना फर्ज हमारा हमारी जन्मभूमि के लिए है, उतना ही कर्म भूमि (महाराष्ट्र) के लिए भी है। मैने अपनी जिंदगी के 20 साल निकाल दिए उत्तर प्रदेश में, शायद 4-5 मई 2011 में आया था मुम्बई, लॉ पढने के लिए और यही पर काम करने और पढने लगा। एक छात्र होने के नाते मेरे लिए यहाँ की शिक्षा व्यवस्था पर कुछ कहना बड़ा आवश्यक था। हाल के दशकों में इस महाराष्ट्र ने शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति की है। अब साक्षरता दर (2001 जनगणना) 77.27 प्रतिशत है, स्त्री साक्षरता दर 67.51 प्रतिशत, पुरुष 86.27 प्रतिशत है। बीच में पढ़ाई छोड़कर चले जाने वालों के ऊंचे प्रतिशत, स्थान की कमी, अपर्याप्त पुस्तकालय और सहयोगी उपकरणों के अभाव के बावजूद प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा तथा शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में विकास हुआ है। यहाँ के शैक्षणिक संस्थानों में मुंबई विश्वविद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय, पुणे विश्वविद्यालय, शिवाजी विश्वविद्यालय (कोल्हापुर),  इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फ़ॉर पापुलेशन साइंसेज़ (मुंबई), टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसज़, कवि गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयम् (रामटेक), कोंकण कृषि विद्यापीठ (दापोली), महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा),  और यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र विश्वविद्यालय (नासिक) शामिल हैं। राजनीति का जबरजस्त शौक था। उत्तर प्रदेश से बहुत कुछ सीखा। लेकिन जब डिग्री और रिसर्च की बात आई तो मुम्बई यूनिवर्सिटी मुझे सबसे अच्छी लगी। यहाँ के बहुत सारे लेखकों को मैने बहुत पढ़ा है। अम्बेडकर साहब, विनोबा भावे, प्रबोधनकार ठाकरे और कुमार केतकर। लिखा भी बहुत कुछ यहाँ के बारे में है। मैं खाने पीने के मामले में काफी सेन्सटिव हूँ, इसलिए बहुत कुछ नहीं खाया पिया है, लेकिन जो कुछ भी छोटा मोटा खाना (वड़ापाव, मिसलपाव, उपमा, कोल्हापुरी डिसेज, मोदक, चिवड़ा, पावभाजी आदि) अपने हिसाब से खाया है, बहुत मजेदार जिसका जिक्र  घर जाकर परिवार और दोस्तों से तारीफ ए काबिल किया। ओफ़िस के काम और पढ़ाई के चलते कम समय मिल पाता है इसलिए कम घुमा-फिरा हूँ लेकिन जितना भी घुमा हूँ, बहुत दर्शनीय और यादगार। मुम्बई का सांस्कृतिक जीवन इसकी जातीय विविधतायुक्त जनसंख्या को प्रतिबिम्बित करता है। शहर में बहुत से संग्रहालय, पुस्तकालय, साहित्यिक एवं कई अन्य सांस्कृतिक संस्थान, कला, दीर्घाएँ व रंगशालाएँ हैं। भारत का कोई अन्य शहर अपनी सांस्कृतिक एवं मनोरंजन सुविधाओं के मामले में इतनी उच्च श्रेणी की विविधता और गुणवत्ता का शायद ही दावा कर सके। इंडो—सार्सेनिक वास्तुशिल्प की एक इमारत में द प्रिंस आफ़ वेल्स म्यूज़ियम आफ़ वेस्टर्न इंडिया है, जिसमें कला, पुरातत्त्व व प्राकृतिक इतिहास के तीन प्रमुख विभाग हैं। संजय गाँधी नेशनल पार्क और नेहरू साइंस सेंटर अभी हाल ही में मैने देखे हैं, निकट ही जहाँगीर आर्ट गैलरी है, जो मुम्बई की पहली स्थायी कला दीर्घा है और सांस्कृतिक व शैक्षिक गतिविधियों का केन्द्र है। एलीफैंटा की गुफ़ाओं को पिछले साल देखा और एलोरा के बारे में काफी कुछ पढ़ा है। यहाँ की कला  वस्त्र, सोने-चाँदी के आभूषण, लकड़ी के खिलौनों, चमड़े के सामान और मिट्टी के बर्तन की डिज़ाइनों में देखा जा सकता है।

Thursday, April 30, 2015

"मजदूर" की बात करने पर हमें शर्म क्यो आती है?

क्योंकि मैं कार्ल मार्क्स को बहुत पढता रहा हूँ, और उनकी विचारधारा (गैरराजनीतिक) पर काफी विश्वास भी करता हूँपूरे विश्व में प्रतिवर्ष 1 मई का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है। मई दिवस समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति एवं राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है। यह मजदूर वर्ग ही है, जो हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते पर राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेजी से घुमाता है लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। मई दिवस के अवसर पर देशभर में बड़ी-बड़ी सभाएं होती हैं, बड़े-बड़े सेमीनार आयोजित किए जाते हैं, जिनमें मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं और ढ़ेर सारे लुभावने वायदे किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर एक बार तो यही लगता है कि मजदूरों के लिए अब कोई समस्या ही बाकी नहीं रहेगी। लोग इन खोखली घोषणाओं पर तालियां पीटकर अपने घर लौट जाते हैं किन्तु अगले ही दिन मजदूरों को पुनः उसी माहौल से रूबरू होना पड़ता है, फिर वही शोषण, अपमान व जिल्लत भरा तथा गुलामी जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। 
बहुत से स्थानों पर तो ‘मजदूर दिवस’ पर भी मजदूरों को ‘कौल्हू के बैल’ की भांति काम करते देखा जा सकता है यानी जो दिन पूरी तरह से उन्हीं के नाम कर दिया गया है, उस दिन भी उन्हें दो पल का चैन नहीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर मनाया किसके लिए जाता है ‘मजदूर दिवस’? बेचारे मजदूरों की तो इस दिन भी काम करने के पीछे यही मजबूरी होती है कि यदि वे एक दिन भी काम नहीं करेंगे तो उनके घरों में चूल्हा कैसे जलेगा। बहुत से कारखानों के मालिक उनकी इन्हीं मजबूरियों का फायदा उठाकर उनका खून चूसते हैं और बदले में उनके श्रम का वाजिब दाम तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराया जाता। विड़म्बना ही है कि देश की स्वाधीनता के छह दशक बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम आज तक ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं कर पाए हैं, जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके। भले ही इस संबंध में कुछ कानून बने हैं पर वे सिर्फ ढ़ोल का पोल ही साबित हुए हैं। हालांकि इस संबंध में एक सच यह भी है कि अधिकांश मजदूर या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होते हैं या फिर वे अपने अधिकारों के लिए इस वजह से आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से ही निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए।
देश में हर वर्ष श्रमिकों को उनके श्रम के वाजिब मूल्य, उनकी सुविधाओं आदि के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की परम्परा सी बन चुकी है। समय-समय पर मजदूरों के लिए नए सिरे से मापदंड निर्धारित किए जाते हैं लेकिन इनको क्रियान्वित करने की फुर्सत ही किसे है? यूं तो मजदूरों की समस्याओं को देखने, समझने और उन्हें दूर करने के लिए श्रम मंत्रालय भी अस्तित्व में है किन्तु श्रम मंत्रालय की भूमिका भी संतोषजनक नहीं रही। कितनी हैरत की बात है कि एक ओर तो सरकार द्वारा सरकारी अथवा गैर-सरकारी किसी भी क्षेत्र में काम करने पर मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी तय करने की घोषणाएं जोर-शोर से की जाती हैं, वहीं देशभर में करीब 36 करोड़ श्रमिकों में से 34 करोड़ से अधिक को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पा रही। यह अफसोस का ही विषय है कि निरन्तर महंगाई बढ़ने के बावजूद आजादी के 61 साल बाद भी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी ‘गुजारे लायक’ भी नहीं हो पाई है। देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा हो, जहां मजदूरों का खुलेआम शोषण न होता हो। आज भी स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद है। कोई ऐसे मजदूरों से पूछकर देखे कि उनके लिए देश की आजादी के क्या मायने हैं? जिन्हें अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का ही अधिकार न हो, जो दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी अपने परिवार का पेट भरने में सक्षम न हो पाते हों, उनके लिए क्या आजादी और क्या गुलामी? सबसे बदतर स्थिति तो बाल एवं महिला श्रमिकों की है। बच्चों व महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण होता ही है, उनका शारीरिक रूप से भी जमकर शोषण किया जाता है लेकिन अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए चुपचाप सब कुछ सहते रहना इन बेचारों की जैसे नियति ही बन जाती है!जहां तक मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों की मांग का सवाल है तो मजदूरों के संगठित क्षेत्र द्वारा ऐसी मांगों पर उन्हें अक्सर कारखानों के मालिकों की मनमानी और तालाबंदी का शिकार होना पड़ता है और सरकार कारखानों के मालिकों के मनमाने रवैये पर कभी भी कोई लगाम लगाने की चेष्टा इसलिए नहीं करती क्योंकि चुनाव का दौर गुजरने के बाद उसे मजदूरों से तो कुछ मिलने वाला होता नहीं, हां, चुनाव फंड के नाम पर सब राजनीतिक दलों को मोटी-मोटी थैलियां कारखानों के इन्हीं मालिकों से ही मिलनी होती हैं।
जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर गला फाड़ते नजर आते हैं लेकिन अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही मजदूर भाईयों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते। देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के फैलते जाल से भारतीय उद्योगों के अस्तित्व पर वैसे ही संकट मंडरा रहा है और ऐसे में मजदूरों के लिए रोजी-रोटी की तलाश का संकट और भी विकराल होता जा रहा है।

कल रात को लाइब्रेरी में कार्ल मार्क्स की हिन्दुस्तान में अहमियत को लेकर रिसर्च करते समय एक पुराने अखबार में किसी पाठक की कविता पढी थी. फिर कैमरे में कैद करके घर ले आया और अब उसकी चन्द पंक्तियाँ आपको भी सुनाना चाहता हूँ.....

वह आता है 
सड़कों पर ठेले में 
बोरियां लादे
भरी दोपहर और तेज धूप में 
पसीने से तर -बतर 
जलती है देह 
ठेले पर नहीं है पानी से भरी
कोई बोतल .....
वह आता है
 कमर झुकाए
कोयले की खदानों से
बीस मंजिला इमारत में 
चढ़ता है बेधड़क
गटर साफ़ करने झुका 
वह मजदूर ...
वह दिन भर 
धूप में झुलसेगा
एक पाव दाल 
एक पाव चावल
एक किलो आटा 
एक बोतल मिटटी के तेल की खातिर
काला पड़ गया है बदन 
फटी एड़ियाँ
खुरदरे  हाथ 
बोझ से दबा हुआ 
धड़ है जैसे सर विहीन ....
वह सृजनकर्ता है  
दुख सहके भी सुख बांटता
भूख को पटकनी देता
वह हमारी खातिर तपता है
दसवीं मंजिल से गिरता है
वह भारत का मजदूर   ...
वह भारत का मजदूर   ...
"मजदूर" एक ऐसा शब्द है जिसपर हमारा पढ़ा लिखा समाज बात करने से डरता है, बड़ा घिन सा लगता है उसके बारे में सोंचकर।  जबकि हम जहाँ रहते हैं, जो खाते हैं, जो पीते हैं, जिसपर बड़े बड़े लोगों के ऐश किए जाते हैं उसमें मजदूर की ही मेहनत छुपी होती है।  अगर मैं फ़ेसबुक पर एक मजदूर की फोटो डाल दूं तो लोग लाइक करना तो दूर मुझसे घिन करने लगेगे। आखिर क्यों? हममे से कितने ऐसे लोग हैं, जिनके पूर्वज( पिताजी, उनके पिता जी या उनके पिताजी) ने कभी मजदूरी नहीं की होगी। अगर अपने भी खेतों में काम कर रहे हैं तो भी वो छोटे खेतिहर मजदूर माने जाते हैं।  25-30 बीघे के जोतिहार जमींदार टाइप लोग अपने को इस लाइन से अलग कर सकते हैं।  हमारे आस पास भी मजदूर रहते होंगे, उनके किए कार्यों पर अपना मतलब तो निकाल लेते हैं, लेकिन ओफ़िस या कॉलेज पहुंचते ही ऐसे बातें करते हैं जैसे मजदूर शब्द या मिट्टी से एलर्जी हो?  

Thursday, April 16, 2015

जनता दल, परिवार या दिल मिले?

दुश्मन के दुश्मन पहले दोस्त बने, अब परिवार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वही जनता परिवार जिसकी नींव 1977 में पड़ी और जो 1988 में वी।पी। सिंह के समय तक साथ था। यह परिवार जब मजबूत हुआ तो टूट गया। इससे निकले अलग-अलग दल अब कमजोर हुए हैं, तो 25 साल बाद फिर हाथ मिलाने की कोशिशें हो रही हैं। सपा, राजद, जेडीयू, जेडीएस, आईएनएलडी और एसजेपी को मिलाकर आज इसका विलय भी हो गया। भले ही इसका नाम और चुनाव चिन्ह नहीं बताया गया है लेकिन इसके नेता का नाम तय कर दिया गया है। उम्मीद यह लगाई जा रही है कि इसका नाम समाजवादी जनता परिवार या समाजवादी जनता दल होगा। इसका चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही रहेगा। तो इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं क़ि सपा ही मजबूत हो रही है। लेकिन फिर भी सपा के नेता ही कुछ परेशना दिख रहे हैं। कुछ बड़े नेता जो राज्य सभा में हैं या तैयारी कर रहे हैं, उन्हें अपने भविष्य को लेकर कुछ चिंता है, तभी हो परेशान हैं। वैसे मुलायम सिंह और अखिलेश के आगे ये सब मान जाएंगे।
इसकी जरूरत क्यों पड़ी इसके लिए हमें जनता परिवार नहीं भाजपा की तरफ नजर डालनी पड़ेगी। दिसंबर 2013 से भाजपा का हर चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा। उसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता कायम रखी। लोकसभा चुनाव जीता। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई। सिर्फ दिल्ली का चुनाव वह हार गई। लालू-नीतीश-मुलायम को विलय की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि बिहार में इसी साल और यूपी में 2017 में चुनाव हैं। ये दल मिलकर मोदी लहर को वहां बेअसर करना चाहते हैं। विपक्ष में रहकर ये लोग अपनी ताकत सड़क से लेकर संसद तक दिखाना चाहते हैं। जनता परिवार के इन दलों का असर 5 राज्यों में हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ये सत्ता में हैं। लोकसभा में 15 और राज्यसभा में इनके 30 सांसद हैं। इन दलों के पास कुल 424 विधायक हैं। विलय हुआ तो यह देश में तीसरी बड़ी संख्या होगी। देश भर में भाजपा के 1029 विधायक और कांग्रेस के 941 विधायक हैं।

दल           राज्य      लोकसभा            राज्यसभा                       विधानसभा

SP        उत्तर प्रदेश    5                        15                             232/403

RJD       बिहार         4                        1                                24/243

JDU        बिहार         2                        12                              110/243

INLD      हरियाणा      2                        1                                 18/77

JDS       कर्नाटक       2                         1                                  40/225


जनता परिवार के इन पांच प्रमुख दलों के 30 राज्यसभा सदस्य बड़ी ताकत हैं। ये सांसद अगर राज्यसभा में तृणमूल के 12, वाम मोर्चे के 11 और बीजद के 7 सदस्यों से हाथ मिला लें तो इनकी संख्या 60 हो जाती है। ये राज्यसभा में कोई भी बिल रोक सकते हैं। इसी तरह बिहार में लालू-नीतीश साथ चुनाव लड़े तो फायदा होगा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी सपा की अगुआई में ये दल कास्ट वोटरों के बीच पकड़ बना सकेंगे। जिस तरह से ये दलों में अभी तक टूट होती रही है इससे आप कह सकते हैं, कि क्या भरोसा क़ि इनमें फिर से एकता ज्यादा दिन तक रहेगी? लेकिन अगर देखा जाए तो इसबार परिस्थितियाँ कुछ और ही हैं। फिलहाल तो लोकसभा के चुनाव आस पास नहीं हैं। इनमें टूट तभी होगी जब इनमे देश की सत्ता की बात आएगी। ये विपक्ष की भूमिका जबरजस्त तरीके से निभाएंगे और ऐसा हमेशा से हुआ है। रही बात सत्ता कि तो फिलहाल इनको अपने अपने राज्यों में अपनी अपनी सत्ता बचाना या लाना है। एक राज्य में दो दल हैं ही नहीं। सबके अपने अपने राज्य हैं। बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद एक दूसरे के विरोधी थे, लेकिन लालू प्रसाद ने उनको स्वीकार कर लिया है। लालू नीतीश के लिए बिहार केवल एक चोटी सी शर्त पर छोड़ देंगे, वो है उनके बेटे और बेटी को राजनीति में जगह देना। बाकी कार्यों में दखल ना देने की बात ये कह चुके हैं। इन सब पार्टियों में एक दो सांसद बहुत अच्छा बोलने वाले हैं, जो मिलकर संसद में अच्छा कार्य करेगे, अगर ये लोग अच्छे से मिलकर अरविन्द केजरीवाल की तरह विपक्ष की भूमिका निभाएंगे, तो सरकार की छवि 2019  तक कमजोर कर देगे। राजनीति में हार जीत ही सबकुछ नहीं होता है भारतीय राजनीति में यह अपने आप में एक बड़ी घटना है। भले ही मोदी के डर से लेकिन कुछ तो ऐसा हुआ है जो सभी विरोधी एक हो गए हैं। आप इन समाजवादियों के कार्यों या नीतियों की कुछ दिन तक तो आलोचना कर सकते हो, लेकिन इनके पिछले योगदान भारतीय राजनीति और समानता के सिद्धांत में बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इनकी बहुत जरूरत है इस देश में। विपक्ष में कांग्रेस और सत्ता में कांग्रेस की राजनीतिक और आर्थिक नीतियाँ एक जैसी ही हैं, इसलिए इनकी लेफ्ट की तरह एक वैचारिक जरूरत है। इनसे जो गलतियाँ हुई हैं, उन्हे दूर करेगे और आगे कुछ सुधार करेगे। इनके पास अनुभव के साथ साथ, युवाओं में अखिलेश, डिम्पल, तेजस्वी, दुष्यंत जैसे लोग हैं। सेकुलरिज्म के लिहाज से भी इनकी बहुत जरूरत है इस देश में देखते हैं ये आगे कैसी भूमिका निभाएगे।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...