दुश्मन के दुश्मन पहले दोस्त बने, अब परिवार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वही जनता परिवार जिसकी नींव 1977 में पड़ी और जो 1988 में वी।पी। सिंह के समय तक साथ था। यह परिवार जब मजबूत हुआ तो टूट गया। इससे निकले अलग-अलग दल अब कमजोर हुए हैं, तो 25 साल बाद फिर हाथ मिलाने की कोशिशें हो रही हैं। सपा, राजद, जेडीयू, जेडीएस, आईएनएलडी और एसजेपी को मिलाकर आज इसका विलय भी हो गया। भले ही इसका नाम और चुनाव चिन्ह नहीं बताया गया है लेकिन इसके नेता का नाम तय कर दिया गया है। उम्मीद यह लगाई जा रही है कि इसका नाम समाजवादी जनता परिवार या समाजवादी जनता दल होगा। इसका चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही रहेगा। तो इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं क़ि सपा ही मजबूत हो रही है। लेकिन फिर भी सपा के नेता ही कुछ परेशना दिख रहे हैं। कुछ बड़े नेता जो राज्य सभा में हैं या तैयारी कर रहे हैं, उन्हें अपने भविष्य को लेकर कुछ चिंता है, तभी हो परेशान हैं। वैसे मुलायम सिंह और अखिलेश के आगे ये सब मान जाएंगे।
इसकी जरूरत क्यों पड़ी इसके लिए हमें जनता परिवार नहीं भाजपा की तरफ नजर डालनी पड़ेगी। दिसंबर 2013 से भाजपा का हर चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा। उसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
में सत्ता कायम रखी। लोकसभा चुनाव जीता। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई। सिर्फ दिल्ली का चुनाव वह हार गई। लालू-नीतीश-मुलायम को विलय की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि बिहार में इसी साल और यूपी में 2017 में चुनाव हैं। ये दल मिलकर मोदी लहर को वहां बेअसर करना चाहते हैं। विपक्ष में रहकर ये लोग अपनी ताकत सड़क से लेकर संसद तक दिखाना चाहते हैं। जनता परिवार के इन दलों का असर 5 राज्यों में हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ये सत्ता में हैं। लोकसभा में 15 और राज्यसभा में इनके 30 सांसद हैं। इन दलों के पास कुल 424 विधायक हैं। विलय हुआ तो यह देश में तीसरी बड़ी संख्या होगी। देश भर में भाजपा के 1029 विधायक और कांग्रेस के 941 विधायक हैं।
दल राज्य लोकसभा राज्यसभा विधानसभा
SP उत्तर प्रदेश 5 15 232/403
RJD बिहार 4 1 24/243
JDU बिहार 2 12 110/243
INLD हरियाणा 2 1 18/77
JDS कर्नाटक 2 1 40/225
जनता परिवार के इन पांच प्रमुख दलों के 30 राज्यसभा सदस्य बड़ी ताकत हैं। ये सांसद अगर राज्यसभा में तृणमूल के 12, वाम मोर्चे के 11 और बीजद के 7 सदस्यों से हाथ मिला लें तो इनकी संख्या 60 हो जाती है। ये राज्यसभा में कोई भी बिल रोक सकते हैं। इसी तरह बिहार में लालू-नीतीश साथ चुनाव लड़े तो फायदा होगा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी सपा की अगुआई में ये दल कास्ट वोटरों के बीच पकड़ बना सकेंगे। जिस तरह से ये दलों में अभी तक टूट होती रही है इससे आप कह सकते हैं, कि क्या भरोसा क़ि इनमें फिर से एकता ज्यादा दिन तक रहेगी? लेकिन अगर देखा जाए तो इसबार परिस्थितियाँ कुछ और ही हैं। फिलहाल तो लोकसभा के चुनाव आस पास नहीं हैं। इनमें टूट तभी होगी जब इनमे देश की सत्ता की बात आएगी। ये विपक्ष की भूमिका जबरजस्त तरीके से निभाएंगे और ऐसा हमेशा से हुआ है। रही बात सत्ता कि तो फिलहाल इनको अपने अपने राज्यों में अपनी अपनी सत्ता बचाना या लाना है। एक राज्य में दो दल हैं ही नहीं। सबके अपने अपने राज्य हैं। बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद एक दूसरे के विरोधी थे, लेकिन लालू प्रसाद ने उनको स्वीकार कर लिया है। लालू नीतीश के लिए बिहार केवल एक चोटी सी शर्त पर छोड़ देंगे, वो है उनके बेटे और बेटी को राजनीति में जगह देना। बाकी कार्यों में दखल ना देने की बात ये कह चुके हैं। इन सब पार्टियों में एक दो सांसद बहुत अच्छा बोलने वाले हैं, जो मिलकर संसद में अच्छा कार्य करेगे, अगर ये लोग अच्छे से मिलकर अरविन्द केजरीवाल की तरह विपक्ष की भूमिका निभाएंगे, तो सरकार की छवि 2019 तक कमजोर कर देगे। राजनीति में हार जीत ही सबकुछ नहीं होता है भारतीय राजनीति में यह अपने आप में एक बड़ी घटना है। भले ही मोदी के डर से लेकिन कुछ तो ऐसा हुआ है जो सभी विरोधी एक हो गए हैं। आप इन समाजवादियों के कार्यों या नीतियों की कुछ दिन तक तो आलोचना कर सकते हो, लेकिन इनके पिछले योगदान भारतीय राजनीति और समानता के सिद्धांत में बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इनकी बहुत जरूरत है इस देश में। विपक्ष में कांग्रेस और सत्ता में कांग्रेस की राजनीतिक और आर्थिक नीतियाँ एक जैसी ही हैं, इसलिए इनकी लेफ्ट की तरह एक वैचारिक जरूरत है। इनसे जो गलतियाँ हुई हैं, उन्हे दूर करेगे और आगे कुछ सुधार करेगे। इनके पास अनुभव के साथ साथ, युवाओं में अखिलेश, डिम्पल, तेजस्वी, दुष्यंत जैसे लोग हैं। सेकुलरिज्म के लिहाज से भी इनकी बहुत जरूरत है इस देश में देखते हैं ये आगे कैसी भूमिका निभाएगे।
No comments:
Post a Comment