Saturday, December 29, 2018

मजदूरों की चिंता किसे?

चूहे नहीं इंसान थे मेघालय के खदान मज़दूर, फिर थाईलैंड की तरह क्यों न तड़पी सरकार और मीडिया ?
मेघालय की अवैध कोयला खान में फंसे मज़दूर (जिनका अब यह भी नहीं पता कि वे जीवित हैं भी या नहीं), क्या इसी दुनिया के नागरिक हैं? क्या उनका कोई देश है? क्या किसी भारत या किसी विश्व का दिल उनके लिए धड़कता है? ये 13 से 15 मज़दूर ईस्ट जयंतिया हिल्स के क्सान (Kisan) गाँव के इलाक़े की एक कोयला खदान में 13 दिसम्बर को फँसकर रह गए। ये खदान rat hole कहलाती हैं। अवैध रूप से नीचे-नीचे छेद करके बेबस मज़दूरों की जान जोखिम में डालकर किया जाने वाला खनन। जैसे चूहे बनाते हैं छेद। नदी के पास की इस खदान में अचानक पानी भर जाने से ये मज़दूर फँस गए। मज़दूर फँस गए तो क्या? नेशनल मीडिया, खासकर कथित राष्ट्रीय भाषा की कथित मुख्यधारा के मीडिया तक यह बात पहुंचने में 10-12 दिन लगे। एक मामूली ख़बर की तरह। यह बताने में कि संसाधनों के अभाव में बचाव अभियान रोक दिया गया है।
आप किस बात के विश्वगुरु होने का ढिंढोरा पीटते फिरते हैं? इतने लोग मौत के मुंह मे धकेल दिए गए और फिर उन्हें बचा पाने की कोशिशों से हाथ खड़े कर दिए गए। थाइलैंड की गुफा में फंसे बच्चों और उनके अध्यापक के लिए चलाया गया सफल बचाव अभियान क्या ‘विश्वगुरू’ को याद है? लेकिन, यहां तो सारे बचाव अभियान साम्प्रदायिक अपराधियों को कानून से बचाए रखने के लिए चलाए जाते हैं। मज़दूरों के लिए कौन बोले, कौन करे, संसाधन कहाँ से आएं?
हालांकि, यह सवाल मज़दूरों की ज़िंदगी के बाद ही आता है और उनकी ज़िंदगी को खतरे में डालने वालों से जुड़ा है कि ये खनन माफिया कौन है और अब इस भयंकर ‘हादसे’ के बाद कितनी गिरफ्तारियां हुई हैं। बात-बात में हवन और प्रार्थना करने वाले कहाँ हैं? इस जनता ने सड़कों पर आकर खनन में फंसे मनुष्यों के लिए दबाव क्यों नहीं बनाया? मेघालय में क्रिसमस कितना मैरी रहा? क्या वहां के लोग अपने राज्य में इतने लोगों के फँसे होने को लेकर चिंतित होकर सड़कों पर आए?
क्या देश के लोगों की सेंसिबिलिटी भी पॉवर स्ट्रक्चर को संचालित करने वाली ताक़तें ही निर्मित-संचालित करती हैं?

Tuesday, December 11, 2018

छत्तीसगढ़ की जीत के कारण

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस तमाम कयासों को विराम देते हुए 15 वर्षों के बाद मजबूती से सत्ता में वापसी करती हुई दिख रही है. अंतिम चुनावी नतीजे के मुताबिक कांग्रेस ने 90 में से 68 सीटों पर जीत हासिल की है. यानी एक तरह से सूबे की जनता ने भाजपा की रमन सिंह सरकार को पूरी तरह से नकार दिया है. हालांकि, मतदान से पहले तक भाजपा को मजबूत स्थिति में बताया जा रहा था. कुछ लोग यह भी मान रहे थे कि ‘जोगी-माया’ गठबंधन की वजह से कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है. लेकिन, ऐसा कुछ हुआ नहीं.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की जोरदार वापसी की बड़ी वजहें ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों की 15 साल की भाजपा सरकार से नाराजगी और बदलाव की चाहत भी हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में मतदाताओं की नाराजगी की बड़ी वजह खेती-किसानी की बुरी स्थिति और फसलों की सही कीमत न मिलना रहा. वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी सभी जनसभाओं में जनता से वादा किया था कि यदि उनकी सरकार बनती है तो 10 दिनों के भीतर वे किसानों की कर्जमाफी करेंगे. कांंग्रेस ने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2300 रुपये देने का ऐलान किया था. चुनावी रुझान को देखते हुए माना जा सकता है कि किसानों ने कांग्रेस के इन वादों पर भरोसा किया है.
सूबे में आज कांग्रेस की जैसी स्थिति दिख रही है उसके पीछे महिलाओं की सरकार से नाराजगी की अनदेखी नहीं की जा सकती. छत्तीसगढ़ के चुनावी दौरे में सत्याग्रह के साथ बातचीत में महिलाओं का रमन सिंह सरकार को लेकर गुस्सा साफ दिखा था. इन्होंने कई मुद्दों पर सरकार को घेरा था. इनमें शराबखोरी को बेतहाशा बढ़ावा देना और महंगाई प्रमुख थे. ये दोनों मुद्दे सूबे की आधी आबादी के लिए इसलिए भी अहम थे क्योंकि, इनसे सबसे अधिक प्रभावित महिलाएं ही होती हैं. उनकी तकलीफ इस बात से थी कि कई विरोध प्रदर्शनों के बाद भी सरकार ने शराबबंदी के लिए कुछ खास नहीं किया. महिलाओं की नाराजगी को देखते हुए रमन सिंह सरकार ने गांवों में शराब की दुकानों के बीच की तो बढ़ा दी लेकिन चुनावी साल में शराबबंदी के अपने वादे से वे पलट गये. अब इसका नुकसान उन्हें चुनावी नतीजों से मिलता हुआ दिख रहा है. वहीं, कांग्रेस ने सत्ता में आने पर शराबबंदी का वादा किया है.
दूसरी ओर, इस चुनाव में महिलाओं के बीच महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा था. एक ओर भाजपा उज्ज्वला योजना को बतौर एक बड़ी उपलब्धि मतदाताओं के सामने परोस रही थी, वहीं एलपीजी गैस सिलिंडर की कीमत 1,000 रुपये पहुंचने की वजह से मतदाताओं में खासी नाराजगी थी. गरीब और निम्न मध्यम वर्ग से आने वाली अधिकांश महिलाओं की शिकायत थी कि सरकार ने गैस चूल्हा तो बांट दिया है लेकिन, सिलिंडर भरवाना अब मुश्किल हो रहा है. साथ ही, रोजाना इस्तेमाल में आने वाली अन्य चीजों की कीमत बढ़ने से भी महिलाएं खासी नाराज थीं. यहां तक कि एक रुपये किलो चावल और मुफ्त मोबाइल भी उनके इस गुस्से को शांत नहीं कर पाया.
18 साल के इस युवा राज्य में भाजपा सरकार से यदि किसान और महिलाओं में नाराजगी दिखी तो नौजवान भी इससे अलग नहीं थे. युवाओं में रोजगार के मौकों का पर्याप्त संख्या में न होना, उनकी नाराजगी की एक बड़ी वजह बना हुआ है. गांवों में खेती करना नुकसान का सौदा बना हुआ है, सरकारी क्षेत्र में रोजगार के मौके मिलना मुश्किल है, ऊपर से बाहरी कामगारों की वजह से निजी क्षेत्र में अवसर ज्यादा अवसर नहीं हैं. यदि इनमें रोजगार मिलता भी हैं तो कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
इन सारे मुद्दों के बीच नोटबंदी और जीएसटी की वजह से भी भाजपा को छत्तीसगढ़ में मतदाताओं की नाराजगी झेलने के लिए मजबूर होना पड़ा है. राज्य के कई छोटे-बड़े कारोबारी मतदाताओं की तकलीफ है कि इनकी वजह से उनका काम-धंधा पहले से आधा रह गया है. रायपुर स्थित एक कारोबारी का तो इतना तक कहना था कि यदि फिर से भाजपा सरकार आ गई तो दुकान का शटर गिराना पड़ सकता है. वहीं, अधिकांश मतदाताओं ने नोटबंदी को लेकर अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की. इनका कहना था कि इस बड़े फैसले से सरकार को तो हासिल कुछ नहीं हुआ लेकिन, उनकी मुश्किलें दो साल बाद भी खत्म नहीं हुई हैं.
इन सभी मुद्दों के अलावा सत्ता में 15 साल तक रहना भी भाजपा के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला रहा. सूबे के ऐसे मतदाता जिनका झुकाव न तो कांग्रेस की ओर है और न भाजपा की ओर, उनमें से कइयों का साफ-साफ कहना था कि अब सरकार बदलने का वक्त है. यहां तक कि मुख्यमंत्री रमन सिंह के काम से खुश दिखने वाले मतदाता भी सिर्फ सरकार बदलने के लिए उनके खिलाफ वोट करने की बात करते दिखे. इनसे साफ है कि रमन सिंह को अनुमानों से उलट राजस्थान और मध्य प्रदेश से अधिक सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा है.

एमपी में क्यों हारे मामा

मध्य प्रदेश में इस बार चुनावी मुकाबला कितना नज़दीकी रहा इसका अंदाज़ा इसी से लगा सकते हैं कि 11 दिसंबर यानी मतगणना वाले दिन की शाम को भी कोई यह कहने का जोख़िम लेने को तैयार नहीं कि अगली सरकार किसकी बनने वाली है. रुझानों के हिसाब से देखें तो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) यहां बराबरी के मुकाबले में उलझी हैं. इनके हिसाब से कांग्रेस करीब 113 सीटें जीत रही है और भाजपा 110. यह आंकड़ा हर कुछ समय में कम-ज्यादा हो रहा है. राज्य की 230 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 116 है, जो दिन भर की मतगणना के बाद भी साफ-साफ किसी के खाते में नहीं दिख रहा है. अलबत्ता मध्य प्रदेश से कुछ संकेत ज़रूर एकदम साफ़ तौर पर सामने आए हैं. उनके बारे में बात ज़रूर की जा सकती है. मध्य प्रदेश देश का इक़लौता राज्य है, जिसने भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार के नेतृत्व में पांच साल लगातार कृषि कर्मण पुरस्कार जीता. कृषि क्षेत्र में सबसे बेहतर प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार यह पुरस्कार देती है. इस हिसाब से प्रदेश में किसानों की हालत अच्छी ही नहीं बहुत बेहतर होनी चाहिए थी. लेकिन बीते दिनों नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ही लोक सभा में माना कि 2014 से 2016 के बीच मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर में 21 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. जबकि देश के अन्य इलाकों में इसी दौरान इसमें 10 फ़ीसद की कमी दर्ज़ की गई थी. ऐसे ही प्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र के लिए सोयाबीन की खेती काफ़ी मायने रखती है. यहां साल 2012-13 में 58.13 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में यह फसल बोई गई थी और उत्पादन हुआ था 64.86 लाख टन. लेकिन 2017-18 सोयाबीन की बुवाई घटकर रह गई 50.10 लाख हेक्टेयर और उत्पादन रह गया सिर्फ 42 लाख टन. कुछ साल पहले तक इसी सोयाबीन की वज़ह से मालवा को ‘भारत का मिडवेस्ट’ और इंदौर को ‘शिकागो’ कहा जाता था. इस इलाके में बड़े पैमाने पर होने वाली अफ़ीम की खेती का भी आज यही हाल है. फिर आती है बात फ़सलों के उचित दाम की, तो याद दिला दें कि मंदसौर मध्य प्रदेश में ही है. वह जगह जहां फसलों की उचित कीमत पाने के लिए आंदोलन कर रहे किसानों में से छह की मौत पुलिस की गोलियों से हुई थी. सिर्फ़ मालवा या मंदसौर ही क्यों, उस बुंदेलखंड का भी बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश में है जहां से रोज़ग़ार की तलाश में लोग बड़े पैमाने पर पलायन करते हैं. मालवा-निमाड़ की तरह यहां की भी लगभग 30-40 फ़ीसदी आबादी हर मौसम में अपने घरों से, जड़ाें से दूर रहने को मज़बूर होती है.
यानी राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश की ‘कृषि संपन्नता’ की जो तस्वीर बनाने की कोशिश (कृषि कर्मण पुरस्कार आदि के जरिए) की जा रही थी धरातल पर उसकी वास्तविकता कुछ और ही थी. इस सच्चाई का अहसास शायद शिवराज सिंह चौहान की सरकार को भी था. इसीलिए वह पिछले साल इन्हीं दिनों किसानों के लिए ‘भावांतर योजना’ लेकर आई. लेकिन यह भी ‘भंवर में उलझ गई’ और किसानों के बजाय व्यापारियों के लिए ज़्यादा मुनाफ़े की साबित हुई. यानी यह चुनावी दांव कारगर नहीं हुआ. प्रदेश में कृषि उत्पादन के लिए पहचान बना चुके क्षेत्रों (सीहोर, खुरई, आदि) में जिस तरह इस बार 75 से 85 फ़ीसदी तक मतदान हुआ उससे किसानाें के असंतोष की यह बात पुख़्ता होती है.
यही वज़ह है कि अब विशेषज्ञ भाजपा के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार को भी इस मसले पर चेता रहे हैं. द इकॉनॉमिक टाइम्स के विश्लेषण में साफ लिखा गया है, ‘देश के किसानों को अब इससे मतलब नहीं कि राहुल गांधी खेती-किसानी के बारे में कितना जानते हैं. उन्हें इससे ज़्यादा सरोकार है कि मोदी सरकार ने उनके लिए क्या किया है.’ यहां बताते चलें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी रैलियाें में अक्सर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर तंज कसते हैं कि कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें पता नहीं कि चने का पौधा होता या पेड़. जो मूंग और मसूर में फ़र्क़ नहीं जानते वे आज देश को किसानी सिखाने के लिए घूम रहे हैं.’
इस बार के परिणामों में दूसरी अहम भूमिका ‘भाजपा के शिवराज पर अंधविश्वास’ ने निभाई. इस बात का प्रमाण ये रहा कि भाजपा ने अपनी मातृ संस्था - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) - तक की बात तक नहीं मानी. टिकट बंटवारे के समय ऐसी ख़बरें आई थीं कि आरएसएस ने भाजपा को मौज़ूदा 165 में से 78 विधायकों के टिकट काटने का सुझाव दिया था. आरएसएस के प्रचारक जिस तरह ज़मीन से जुड़े होते हैं उसके मद्देनज़र यह सुझाव अहम था. लेकिन भाजपा ने शिवराज के भरोसे सिर्फ़ 54 विधायकों के टिकट काटे. सात की सीटें बदलीं. और उनमें से कई उम्मीदवारों को फिर टिकट दिया जो 2013 में हार गए थे. बताते हैं कि संघ ने मतदान से एक सप्ताह पहले ही शिवराज के साथ हुई एक अहम बैठक में बता दिया था कि भाजपा की लगभग 50-55 सीटें कम हाे रही हैं, जो हुई भीं.
भाजपा ने शिवराज को किस क़दर फ्रीहैंड दिया, इसका प्रमाण तब भी मिला जब पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता की उनके आगे नहीं सुनी गई. फिर चाहे वह लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन हों या राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर हों या पूर्व केंद्रीय मंत्री सरताज सिंह, जिन्हें पार्टी तक छोड़नी पड़ी. इस तरह हर वह नेता जो शिवराज के लिए आंख की किरकिरी (चुनौती) बना हुआ था या बन सकता था, उसे किनारे होना पड़ा. कर दिया गया. यहां तक कि 2008 और 2013 के चुनाव में प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर शिवराज के विजयरथ के सारथी रहे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी इस बार नेपथ्य में दिखे. उन्हें प्रदेश चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया. लेकिन पूरा अभियान सिर्फ़ शिवराज के ही इर्द-ग़िर्द नज़र आया. इससे शुरूआत में ही चुनावी मुकाबला 19-20 का हो गया.
कांग्रेस ने इस साल मई में जब कमलनाथ जैसे कद्दावर नेता को प्रदेश इकाई की कमान सौंपी थी, तब से ही उसके संगठन में ऊर्जा दिख रही थी. पार्टी कार्यकर्ताओं के जाेश का आलम ये था कि वे ‘ऊपर भोलेनाथ, नीचे कमलनाथ’ का नारा लगा रहे थे. यानी नेतृत्व के प्रति पहली बार वे पूरी तरह आश्वस्त और भरोसे से लबरेज दिख रहे थे. दूसरी तरफ़ इस नेतृत्व (कमलनाथ ही) के पास भी सरकार के ख़िलाफ़ सियासी असलहे की कमी नहीं थी. उसके पास एक तरफ़ व्यापम, अवैध रेत खनन और ई-टेंडरिंग जैसे घोटालों और भ्रष्टाचार के मसले थे. वहीं शिवराज की 21 हजार के करीब घोषणाओं में आधे से अधिक का अधूरा रह जाना इसका प्रमाण था कि अफ़सरशाही मनमानी हो चली है. सड़क, बिजली, पानी, बेरोजगारी, पलायन, खस्ता वित्तीय हाल के मसले ताे थे ही. कांग्रेस चाहती तो सिर्फ़ इन्हीं को ठीक तरह से जनता तक पहुंचाकर चुनाव एकतरफ़ा कर सकती थी. अपने ‘वचन पत्र’ में किसानाें से कर्ज़ माफ़ी, पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के दामों में कमी करने का वादा कर उसने कुछ हद तक ‘जन के मन तक पहुंचने की कोशिश’ भी की. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह (जिनके शासनकाल को भाजपा मुद्दा बनाती रही है) को पर्दे के पीछे रखकर रणनीतिक परिपक्वता का भी परिचय दिया. लेकिन प्रदेश नेतृत्व शायद अतिउत्साह में कहीं-कहीं चूक कर गया. प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ कभी महिलाओं काे ‘कोटा या सजावट की चीज’ कहकर फंसे तो कभी मुस्लिमों से कांग्रेस के पक्ष में 90 फ़ीसदी मतदान की अपील कर. आरएसएस पर उनकी टिप्पणी ने भी बैठे-बिठाए संघ और भाजपा को हथियार दे दिया. उसनेअपने अंदाज़ में मुद्दों को रंग देने की कोशिश की और नतीज़ा?

राजस्थान के चुनाव परिणाम

राजस्थान में मतदाताओं ने लगातार पांचवीं बार भी सत्ता बदलने की अपनी प्रवृत्ति को बरकरार रखा है. इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 200 में से 99 सीट हासिल करने के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. हालांकि वह बहुमत के जादुई आंकड़ें से दो सीट दूर रह गई. लेकिन यह तय है कि प्रदेश में अगली सरकार कांग्रेस की होगी. वहीं, सत्ताधारी भाजपा 73 सीटों के आसपास सिमटती दिख रही है. लेकिन जिस तरह रुझानों के घटने-बढ़ने का दौर चला उसे देखकर यहां बड़ा सवाल उठता है कि क्या यह वही जीत थी जिसकी उम्मीद कांग्रेस पाले हुए थी या फिर कांग्रेस, भाजपा को वही शिकस्त देने में सफल रही जिसके कयास जोर-शोर से लगाए जा गए थे? इस सवाल पर तमाम विश्लेषकों के जवाब को एक शब्द में समेटे तो ‘नहीं’. दरअसल यह चुनाव ‘सेंटिमेंट’ और ‘मैनेजमेंट’ के बीच माना जा रहा था. एक तरफ कांग्रेस राजस्थान में भाजपा के खिलाफ मौजूद जबरदस्त आक्रोश के भरोसे बैठी थी तो भाजपा की उम्मीद अपने चुनावी प्रंबधन पर टिकी थी. नतीजे बताते हैं कि चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन कई मायनों में बेहतर कहा जा सकता है. साल की शुरुआत में अलवर और अजमेर लोकसभा सीटों के साथ मांडलगढ़ विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद से ही विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा 150 का आंकड़ा पार करने के कयास लगाए जाने लगे थे. इसके कुछ ही महीनों बाद प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर चली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा हाईकमान की रस्साकशी ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल को खासा प्रभावित किया था. साथ ही लहसुन और मूंग की खरीद में भारी अव्यवस्था, खाद आवंटन में पुलिस बल प्रयोग, किसान आत्महत्या और सरकारी कर्मचारियों के विरोध की वजह से उपजी नाराजगी से भी सरकार चारों तरफ से घिरी हुई थी. इसके अलावा राजधानी जयपुर समेत कई जिलों में भाजपा का पारंपरिक माना जाने वाला शहरी वोटर भी पार्टी से छिटका है. जानकार इसके लिए नोटबंदी, जीएसटी और गैस-पेट्रोल-डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी के चलते केंद्र सरकार के प्रति रोष को बड़ा कारण मानते हैं. लेकिन इस सबके बावजूद पिछले एक महीने में जबरदस्त वापसी कर भाजपा अपनी लाज बचाने में सफल रही है. इसके लिए पार्टी की तरफ से अंतिम दिनों में किए गए आक्रामक प्रचार को प्रमुख श्रेय दिया जा रहा है. वहीं, तमाम हालात के पक्ष में होने के बावजूद कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत लचर रहा है. वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल शक्तावत इस बारे में कहते हैं, ‘भाजपा को एंटीइंकबेंसी ने हराया, लेकिन कांग्रेस ने भी सेल्फ गोल करने में कसर नहीं छोड़ी थी.’ यहां उनका इशारा प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की आपसी तनातनी की तरफ है.
इसकी ताजा बानगी के तौर पर पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति (सीईसी) की कथित अंतिम दौर की बैठकों को देखा जा सकता है. इसमें टिकट बंटवारे को लेकर प्रदेश संगठन के प्रमुख नेताओं के बीच अदावत की ख़बरों ने जमकर सुर्ख़ियां बटोरी थीं. इस दौरान पार्टी प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट और विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के बीच नोक-झोंक इतनी बढ़ गई कि पायलट ने अपनी बात न माने जाने पर राजनीति ही छोड़ देने की बात कह दी. वहीं, डूडी ने भी बीकानेर से कन्हैयालाल झंवर का टिकट कट जाने पर चुनाव न लड़ने की घोषणा कर पार्टी पर खूब दबाव बनाया था. हालांकि डूडी और झंवर दोनों ही यह चुनाव जीतने में नाकाम रहे हैं.
स्थानीय जानकारों का कहना है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता होने के बावजूद डूडी जिस तरह संगठन की मुख़ालफत पर उतर आए उसने क्षेत्र और कार्यकर्ताओं का उनसे जुड़ाव कम किया. हालांकि कुछ विश्लेषक डूडी की हार के पीछे कुछ अन्य आशंकाएं भी जता रहे हैं. इसके अलावा अपने-अपने खेमों को मजबूत करने के लिए भी संगठन के बड़े नेता भी कुछ दिग्गजों तक के टिकट काटने से भी नहीं चूके. संयम लोढ़ा (सिरोही), पूर्व राज्यपाल कमला बेनीवाल के बेटे आलोक बेनीवाल (शाहपुरा) और नाथूराम सिनोदिया (किशनगढ़) जैसे करीब दो दर्जन नेताओं के नाम इस सूची में शामिल हैं.
इसके अलावा कांग्रेस ने तय किया था कि दो बार से ज्यादा बार हारने वाले नेताओं को इस बार मौका नहीं दिया जाएगा. लेकिन पूर्व प्रदेशाध्यक्ष बीडी कल्ला और पूर्व मंत्री हरि सिंह जैसे नेताओं के मामले में पार्टी ने अपने ही नियम को दरकिनार कर दिया. इस बात से भी कई इलाकों में टिकट की उम्मीद पाले जो कार्यकर्ता जमीन पर मेहनत कर रहे थे वे नाराज़ हो गए. इनमें से अधिकतर ने बाग़ी होकर अपने और अपने आस-पास के क्षेत्र में कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया. सत्याग्रह से हुई बातचीत में वरिष्ठ पत्रकार अवधेश आकोदिया भी जीत के फासले को कम करने में कांग्रेस के टिकट वितरण को प्रमुख कारण बताते हैं. कांग्रेस के नेताओं की यह सिरफुटौव्वल सिर्फ बड़े स्तर न सिमट कर जिला व तहसील स्तर तक भी पहुंच गई थी. चुनाव प्रचार के लिए तय किए गए ‘मेरा बूथ, मेरा गौरव’ कार्यक्रम के आयोजन स्थल स्थानीय नेताओं के लिए अखाड़े बन गए जहां गाली-गलौज से लेकर आपस में जूते-चप्पल तक चले. वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ इस बारे में हमें बताते हैं, ‘लोगों के आक्रोश को भुनाकर कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. खुद में ही उलझी कांग्रेस के लिए यह बात बड़ी चुनौती बन सकती है कि कई सीटों पर भाजपा से नाराज मतदाताओं ने उसके बजाय निर्दलीयों या छोटे दलों पर भरोसा जताया है.’

Sunday, December 9, 2018

गाँधी बनाम अंबेडकर

26 फ़रवरी, 1955 को बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने बीबीसी को दिए इंटरव्यू में महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की तीखी आलोचना की थी. आंबेडकर का महात्मा गांधी के प्रति नज़रिया तब और अब, दोनों वक़्तों में बहस का विषय रहा है. इंटरनेट की वजह से आज हम उस इंटरव्यू को सुन पा रहे हैं. डॉक्टर आंबेडकर की रिकॉर्डिंग बहुत कम है, ऐसे में बीबीसी का इंटरव्यू एक महत्वपूर्ण आर्काइव है. इस इंटरव्यू में डॉक्टर आंबेडकर ने गांधी के बारे में कई तीखी बातें कही हैं. गांधी को ख़ारिज करने वालों के लिए ये इंटरव्यू एक संगीत की तरह है, जो उनके कानों को अच्छा लगेगा. हालांकि ये उन लोगों को चकित नहीं करेगा जो गांधी-आंबेडकर के रिश्तों के बारे में जानते हैं. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी नई किताब 'गांधीः द इयर्स दैट चेंज्ड द वर्ल्ड' ने इस इंटरव्यू का यह कहते हुए जिक्र किया है कि "1930 और 1940 के दशक में लिखे उनकी विवादित रचनाओं में भी उन्होंने (डॉक्टर आंबेडकर) गांधी की निंदा की है." 63 साल पहले की गई उनकी आलोचनाओं में उन्होंने अपनी राय, ऐतिहासिक दावों और विश्लेषण को शामिल किया था. छह दशक बाद कड़वाहट और ख़ारिज करने के दृष्टिकोण भरे उस इंटरव्यू को दोबारा पढ़ना ज़रूरी है.
आंबेडकर के मुताबिक, "गांधी भारत के इतिहास में एक प्रकरण थे, वो कभी एक युग-निर्माता नहीं थे. गांधी पहले से ही इस देश के लोगों के ज़ेहन से ग़ायब हो चुके हैं. उनकी याद इसी कारण आती है कि कांग्रेस पार्टी उनके जन्मदिन या उनके जीवन से जुड़े किसी अन्य दिन सालाना छुट्टी देती है. हर साल सप्ताह में सात दिनों तक एक उत्सव मनाया जाता है. स्वाभाविक रूप से लोगों की स्मृति को पुनर्जीवित किया जाता है." गांधी एक युग निर्माता थे या नहीं, यह एक खुला सवाल है और इसका सही जवाब पाना और उसे सभी के लिए स्वीकार करना मुश्किल है. यह तब और मुश्किल है जब गांधी को इस दुनिया से गए हुए महज सात दशक हुए हैं. और जहां तक बात रही छुट्टियों के जरिए उन्हें लोगों की स्मृति में बनाए रखने का तो यह कल की बात है. गांधी आज भी जिंदा हैं और हम उन्हें आने वाले समय में भी याद रखेंगे.( हम गांधी को एक ऐतिहासिक शख़्सियत की बात कर रहे हैं न कि उनके विचारों की)
आंबेडकर ने कहा कि वो गांधी से हमेशा एक प्रतिद्वंद्वी की हैसियत से मिलते थे. इसलिए वो गांधी को अन्य लोगों की तुलना में बेहतर जानते थे. आंबेडकर ने इंटरव्यू मे कहा था, "आमतौर पर भक्तों के रूप में उनके पास जाने पर कुछ नहीं दिखता, सिवाय बाहरी आवरण के, जो उन्होंने महात्मा के रूप में ओढ़ रखा था. लेकिन मैंने उन्हें एक इंसान की हैसियत से देखा, उनके अंदर के नंगे आदमी को देखा, लिहाज़ा मैं कह सकता हूं कि जो लोग उनसे जुड़े थे, मैं उनके मुक़ाबले गांधी को बेहतर समझता हूं." आंबेडकर के नज़रिए से ये दावे शायद सही हों, पर उनके बयान से यह स्पष्ट है कि उन्होंने गांधी को केवल एक दृष्टिकोण और एक तरह के नज़रिए से ही देखा था और इसी की बदौलत उन्होंने गांधी के बारे में अपनी राय बनाई थी. राजनीतिक ज़रूरतों के लिए उन्होंने गांधी के लिए शालीनता और कोमलता का भी प्रदर्शन कई बार किया. जैसे, 6 सितंबर 1954 को डॉक्टर आंबेडकर ने नमक पर टैक्स लगाने की सलाह दी और इसका नाम 'गांधी निधि' रखने का सुझाव दिया. वो चाहते थे कि इसमें जमा राशि का खर्च दलितों के उत्थान के लिए किया जाए. उन्होंने कहा था, "मेरे मन में गांधीजी के प्रति आदर है. आप जानते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, गांधीजी को पिछड़ी जाति के लोग अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे थे. इसलिए वह स्वर्ग में से भी आशीर्वाद देंगे."
आंबेडकर ने इंटरव्यू में गांधी पर आरोप लगाया है, "गांधी हर समय दोहरी भूमिका निभाते थे. उन्होंने युवा भारत के सामने दो अख़बार निकाले. पहला 'हरिजन' अंग्रेज़ी में, और गुजरात में उन्होंने एक और अख़बार निकाला जिसे आप 'दीनबंधु' या इसी प्रकार का कुछ कहते हैं. अंग्रेज़ी समाचार पत्र में उन्होंने ख़ुद को जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता का विरोधी और ख़ुद को लोकतांत्रिक बताया. लेकिन अगर आप गुजराती पत्रिका को पढ़ते हैं तो आप उन्हें अधिक रूढ़िवादी व्यक्ति के रूप में देखेंगे. वो जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम धर्म या सभी रूढ़िवादी सिद्धांतों के समर्थक थे. दरअसल किसी को गांधी के 'हरिजन' में दिए गए बयान और गुजराती अख़बार में दिए उनके बयानों का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी जीवनी लिखनी चाहिए." इस इंटरव्यू के बाद के सालों में बहुत कुछ हुआ. गांधी के सभी लेख मूल रूप में आज उपलब्ध हैं. इनके अनुवाद भी किए गए हैं, जो 100 खंडों में हमारे बीच मौजूद हैं. किसी के लिए आज गांधी के गुजराती लेखों को अंग्रेज़ी में प्राप्त करना आसान है. गांधी की विरासत को समेटे वेबसाइट पोर्टल ( gandhiheritageportal.com) पर भी हरिजन (अंग्रेजी), 'हरिजन सेवक' (हिंदी) और 'हरिजन बंधु' (गुजरात) के लगभग सभी अंक उपलब्ध हैं. कोई भी आसानी से उनके गुजराती और अंग्रेज़ी के लेखों की तुलना कर सकता है और अपनी ग़लतफहमी को दूर कर सकता है. इन लेखों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि गांधी ने अपने अंग्रेज़ी लेखों में जाति-व्यवस्था का जोरदार समर्थन किया और गुजराती लेखों में सख्त शब्दों में छूआछूत का विरोध किया है.
डॉक्टर आंबेडकर ने छूआछूत के उन्मूलन के साथ समान अवसर और गरिमा पर जोर दिया था और दावा किया कि गांधी इसके विरोधी थे. उनके मुताबिक गांधी छूआछूत की बात सिर्फ़ इसलिए करते थे ताकि अस्पृश्यों को कांग्रेस के साथ जोड़ सकें. वो चाहते थे कि अस्पृश्य स्वराज की उनकी अवधारणा का विरोध न करें.
गांधी एक कट्टरपंथी सुधारक नहीं थे और उन्होंने ज्योतिराव फूले या फिर डॉक्टर आंबेडकर के तरीके से जाति व्यवस्था को खत्म करने का प्रयास नहीं किया. फिर भी, कांग्रेस या राष्ट्रीय राजनीति में उतरने से पहले गांधी ने 1915 में अपने आश्रम में एक दलित परिवार को रहने दिया. उनके इस फ़ैसले का काफी विरोध हुआ और आश्रम बंद होने की संभावना बढ़ने लगी थी, लेकिन वो अपने फैसले से पलटे नहीं. ऐसे कई उदाहरण हैं. और अगर बात की जाए दलित अधिकारियों की तो उन्होंने अपने कैबिनेट में जगजीवन राम और खुद डॉक्टर आंबेडकर को जगह दी थी. डॉक्टर आंबेडकर ने सही कहा था कि अंग्रेजों ने भारत को आज़ादी देने पर सहमति गांधी के आंदोलनों की वजह से नहीं बल्कि अन्य दूसरे कारणों से दी थी. गांधी और आंबेडकर के बीच दलितों के लिए अलग मतदाता सूची और पूना पैक्ट विवाद का मुद्दा था. आंबेडकर का दावा भी सही था. मुंबई इलाक़े में डॉक्टर आंबेडकर की पार्टी के समर्थित 17 में से 15 उम्मीदवारों ने आरक्षित सीट पर जीत हासिल की थी. बाकी अन्य 151 आरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने आधी से ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की थी. डॉक्टर आंबेडकर ने जो कुछ भी इंटरव्यू में कहा है, उसके आधार पर वर्तमान समय में गांधी को खारिज नहीं किया जा सकता है और यह सही भी नहीं है.

एक्ज़िट पोल्स का इतिहास

पांच राज्यों में हुए चुनावों के बाद एग्ज़िट पोल आ चुके हैं. एग्ज़िट पोल के नतीजों में तस्वीर एकदम साफ़ नहीं है लेकिन इनमें से अधिकतर में राजस्थान और मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता में लौटती दिख रही है.
एग्ज़िट पोल

छत्तीसगढ़ में रमन सिंह अपनी सरकार बचाने में कामयाब नज़र आ रहे हैं. वहीं तेलंगाना में कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन कुछ ख़ास असर दिखाता नज़र नहीं आया और चंद्रशेखर राव की सत्ता में वापसी का अनुमान जताया जा रहा है.

एग्ज़िट पोल चुनावों के नतीजों का अनुमान लगाने के लिए किया जाता है. यह कोशिश की जाती है कि स्थिति स्पष्ट दिखे पर आमतौर पर यह लोगों में भ्रम की स्थिति ज़्यादा पैदा करता है.
एग्ज़िट पोल

क्या एग्ज़िट पोल सटीक आकलन करता है या फिर इसे अनुमान के तौर पर तैयार किया जाता है?

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए बीबीसी ने साल 2014 से 2018 के बीच हुए एग्ज़िट पोल का विश्लेषण किया.

अधिकांशतः एग्ज़िट पोल में विजेता की भविष्यवाणी सही साबित होती नज़र आई है लेकिन सीटों की संख्या में पोल्स के अनुमान ग़लत साबित हुए हैं. साल 2017 में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद एग्ज़िट पोल्स में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान लगाया गया था. सी-वोटर ने 111 सीटों पर भाजपा और 71 सीटों पर कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाया था.

वहीं टुडे-चाणक्या ने भाजपा के खाते में 135 सीटे और कांग्रेस के खाते में 47 सीटों के जाने का अनुमान लगाया था.
एग्ज़िट पोल

अगर सभी एग्ज़िट पोल के आंकड़ों का औसत देखें तो भाजपा को 65 फ़ीसदी सीटें जीतनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. भाजपा ने चुनावों में 10 फ़ीसदी कम सीटों पर जीत हासिल की.

भविष्यवाणी के मुताबिक़ कांग्रेस को 65 से 70 सीटों पर जीत हासिल करनी चाहिए थी लेकिन कांग्रेस पार्टी 77 सीटों पर परचम लहराने में कामयाब रही.

एग्ज़िट पोल का अनुमान कांग्रेस के आंकड़ों के आसपास रहा, लेकिन चुनाव में जीत हासिल करने वाली भाजपा के संभावित आंकड़ों की वो सही भविष्यवाणी नहीं कर पाया.
इस साल कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों के असल परिणाम के कुछ महीने पहले कई राजनीतिक वैज्ञानिकों ने तर्क दिया था कि विजेता की भविष्यवाणी से हिसाब से यह चुनाव सबसे कठिन था.

एबीपी-सी वोटर ने 110 सीटों पर भाजपा के जीत के अनुमान लगाए थे, वहीं 88 सीटों पर कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणी की गई थी.

दूसरी तरफ इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्ज़िट पोल में 85 पर भाजपा और 111 सीटों पर कांग्रेस के जीत के अनुमान लगाए गए थे.

हालांकि चुनावों के असल परिणाम अलग रहे. इसमें भाजपा को उम्मीद से अधिक सफलता मिली थी. भाजपा 100 से ज़्यादा सीटों पर जीत का परचम लहराने में कामयाब रही थी, हालांकि वो सरकार नहीं बना पाई.

चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफल रही थी.

प्रत्येक चुनाव परिणाम का सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल होता है, लेकिन अनुमानित सीटें यह तय नहीं करती कि सरकार कौन बना रहा है.

सरकार बनाने के दावों के ग़लत साबित होने की संभावना होती है.
2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनावों के बाद चाणक्य ने भाजपा के बंपर जीत का अनुमान लगाया था. पोल में चाणक्य ने भाजपा को 155 और महागठबंधन को महज 83 सीटों पर जीत की भविष्यवाणी की थी.

वहीं नीलसन और सिसरो ने 100 सीटों पर भाजपा की जीत का अनुमान लगाया था लेकिन नतीजे बिल्कुल विपरीत रहे थे.

जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के महागठबंधन ने कुल 243 सीटों में से 178 पर जीत हासिल की थी.

यह बड़ी जीत थी और एग्ज़िट पोल और असल नतीजों में काफ़ी अंतर देखने को मिला था.
साल 2016 में पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए थे. इस चुनाव के असल नतीजे एग्ज़िट पोल के काफ़ी क़रीब रहे थे.

चाणक्या ने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के 210 सीटों पर जीत के अनुमान लगाए थे. वहीं इंडिया टुडे-एक्सिस ने यह संख्या 243 बताई थी.
एग्ज़िट पोल

ये सारे अनुमान सरकार बनाने के जादुई आंकड़ों से अधिक थे और कमोबेश ये सही भी साबित हुए. ममता बनर्जी की पार्टी ने 211 सीटों पर जीत हासिल की थी.

हालांकि सारे अनुमान दूसरे नंबर पर रही पार्टी के मामले में ग़लत साबित हुए. एग्ज़िट पोल्स यह सटीक अनुमान नहीं लगा पाए कि उपविजेता कितनी सीटें जीतेगा. इंडिया टुडे-एक्सिस को छोड़कर सभी एग्ज़िट पोल लेफ़्ट और कांग्रेस को 100 से अधिक सीट दे रहे थे, लेकिन असल नतीजों में लेफ़्ट और कांग्रेस को महज़ 44 सीटें मिली थीं.

साल 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों के बाद लगभग सभी एग्ज़िट पोल में भाजपा की जीत के प्रबल अनुमान लगाए गए थे.
चाणक्या ने 285 सीटों का अनुमान लगाया था, जो जीती गई सीटों से 7 अधिक थी. समाजवादी पार्टी के गठबंधन को 88 से 112 सीटों पर जीत के अनुमान लगाए गए थे.

ऐसा बहुत कम होता है जब एग्जिट पोल असल नतीजों के काफ़ी क़रीब होते हैं लेकिन ये दूसरे नंबर की पार्टियों के सही अनुमान लगाने में ज़्यादातर ग़लत साबित हुए हैं.

मोदी सरकार और आरबीआई में झगड़ा

आरबीआई की बोर्ड बैठक में सरकार और आरबीआई के बीच चल रही जंग में भले ही युद्ध विराम घोषित हो गया, लेकिन इससे पहले हालात ऐसे हो गए थे कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का इस्तीफा होते-होते बचा. जानकार मानते हैं कि आरबीआई-सरकार विवाद में सरकार के बैकफुट पर आ जाने की वजह गवर्नर उर्जित पटेल की इस्तीफे की चेतावनी ही रही. क्योंकि अगर स्वायत्तता के नाम पर गवर्नर का इस्तीफा होता तो दुनिया भर में आरबीआई की साख रसातल में चली जाती.
तलवारें फिलहाल भले ही म्यान में चली गईं हो, लेकिन यह तो जगजाहिर हो चुका है कि उर्जित पटेल और नरेंद्र मोदी सरकार के बीच अब तालमेल जैसी चीज नहीं रही. बाकी, आरबीआई के रिजर्व पर सरकार को आंख न गड़ाने की नसीहत देने वाले डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य तो सरकार में किसी को भी फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं. इससे पहले भी महत्वपूर्ण पदों पर बैठे अर्थशास्त्रियों से मोदी सरकार की नहीं बनी और वे एक-एक कर उससे विदा लेते रहे. आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, फिर नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया और आखिर में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ‘सरकारी कूचे’ से निकल गए. नोटबंदी केे समय देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रमण्यम ने नोटबंदी को देश के लिए एक आर्थिक झटका बताकर इशारों में यह जाहिर कर दिया है सरकार के इस फैसले से उनकी सहमति नहीं थी.
रघुराम राजन के बारे में तो यह माना जा सकता है कि उनकी नियुक्ति कांग्रेस सरकार ने की थी, लेकिन बाकी सभी को तो नरेंद्र मोदी सरकार ने खुद नियुक्त किया था. सवाल उठता है कि पूरे कार्यकाल के दौरान उसकी इन अर्थशास्त्रियों से भी पटरी क्यों नहीं बैठी?
मोदी सरकार ने चुनाव से पहले ‘मिनीमम गवर्मेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ का नारा दिया था. तब उद्योग जगत के साथ-साथ तमाम आर्थिक जानकारों को लगा कि मोदी सरकार आर्थिक मोर्चे पर तेजी से काम करने को प्रतिबद्ध दिख रही है. लेकिन सत्ता में आने के बाद वह बदली-बदली नजर आई. आर्थिक जानकार कहते हैं कि कुछ सरकार की राजनीतिक मजबूरियों (कई विधानसभा चुनावों के कारण सरकार चुनावी मोड में थी) और फिर धीरे-धीरे आरएसएस की स्वदेशी समर्थक लॉबी के दबाव ने उसका आर्थिक एजेंडा तय करना शुरू कर दिया.
शुरुआत रघुराम राजन से हुई. जब ऐसा लगा कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नापसंद नहीं हैं तो उन्हें नया कार्यकाल न मिले, इसके लिए एक सुनियोजित पेशबंदी की गई. इसके तहत स्वदेशी लॉबी ने उन्हें ‘अमेरिका समर्थक’ अर्थशास्त्री बताना शुरू कर दिया. कहा गया कि अमेरिका में पढ़े किसी अर्थशास्त्री के बजाय ‘भारतीय जड़ों’ से जुड़ा अर्थशास्त्री आरबीआई का गवर्नर बने.
दबाव रंग लाया और रघुराम राजन को दूसरे कार्यकाल की पेशकश नहीं की गई. सरकार के साथ काम कर रहे पेशेवर अर्थशास्त्रियों के लिए यह फैसला एक झटका था कि राजन जैसे दुनिया के जाने-माने अर्थशास्त्री को भारत सरकार क्यों जाने दे रही है? लेकिन फिर इस बात से संतोष कर लिया गया कि राजन की नियुक्ति कांग्रेस सरकार में हुई है और इसलिए यह फैसला उतना भी अजीब नहीं था.
लेकिन बात शायद इससे कहीं ज्यादा थी. जानकार मानते हैं कि भारतीय विशेषज्ञों के नाम पर जो जोर था, वह आरएसएस और स्वेदशी जागरण मंच के ‘बौद्धिक प्रकोष्ठ’ को सत्ता में सेट करने की मुहिम भी थी. आर्थिक जानकार कहते हैं कि स्वेदशी नीतियों के नाम पर यह दबाव लगातार बढ़ता रहा और तमाम महत्वपूर्ण पदों पर पेशेवर लोगों की जगह राजनीतिक लोगों को तरजीह मिलने लगी. इसने पेशेवर तरीके से काम करने वालों को असहज कर दिया. और धीरे-धीरे वे सरकार से अपनी सम्मानजनक विदाई का रास्ता खोजने लगे.
आर्थिक मुद्दों पर नज़र रखने वाले जानकर मानते हैं कि अकादमिक आर्थिक जानकारों को विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों का वाहक बताकर उनकी छवि खराब की गई. लेकिन आरबीआई के मौजूदा गवर्नर तो लंबे समय से भारत में काम कर रहे हैं, फिर उनके साथ विवाद क्यों खड़ा हुआ है? इसके पीछे वजह यह मानी जा रही है कि सरकार और स्वेदशी लॉबी चाहती है कि महत्वपूर्ण आर्थिक पदों पर बैठे लोगों के काम करने का तरीका पेशेवर होने के बजाय सरकारी इच्छा को गति देने वाला होना चाहिए. और सरकारी इच्छा स्वदेशी को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए. स्वदेशी लॉबी के एक प्रमुख विचारक गुरुमूर्ति आरबीआई-सरकार विवाद में जिस तरह मुखर थे वह सब साफ कर देता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक, नीति निर्माण में मदद करने वाले पेशवरों से कमोबेश ऐसी उम्मीद सभी सरकारें रखती हैं, लेकिन उनसे पेश आने और उन्हें अपनी इच्छा जताने का एक सम्मानजनक तरीका होता है. लेकिन मोदी सरकार में मंत्रियों से लेकर नौकरशाह तक इस मामले में उतने संवेदनशील नहीं रहे और कई बार सरकार से जुड़े अर्थशास्त्रियों ने खुद को उपेक्षित महसूस किया.
इसका सबसे ताजा उदाहरण आरबीआई और सरकार के बीच विवाद में देखा जा सकता है. वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने एक ट्वीट में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की नकल कर एक तरह से उनका मजाक उड़ाया. विरल ने अपने चर्चित भाषण में कहा था कि अगर सरकार आरबीआई की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करती है तो उसे ‘बाजार के कोप’ का सामना करना पड़ेगा. आर्थिक मामलों के सचिव ने इस विवाद के दौरान रुपये में सुधार और आर्थिक प्रगति दर्शाने वाले कुछ अन्य आंकड़े पेश करते हुए लिखा था कि क्या यही ‘बाजार का कोप’ है. उन्होंने अंग्रेजी के ठीक वही शब्द इस्तेमाल किये थे जो विरल ने कहे थे. जानकारों का मानना है कि यह उसी तरह से जवाब देना था, जैसे नेता एक-दूसरे को रैलियों में देते हैं. जाहिर है एक सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर इतना हो सकता है तो भीतर का हाल आर्थिक पेशेवरों के लिए और भी उलझन भरा रहा होगा.
यह ताजा मामला है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक पेशेवर सलाहकारों पर नौकरशाही का दबाव और उसे तरजीह मिलना मोदी सरकार की पुरानी समस्या है. सूत्रों के मुताबिक, मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम वित्त मंत्री अरुण जेटली की पसंद थे, लेकिन कई बार महत्वपूर्ण फैसलों में अधिकारी उन्हें लूप में नहीं रखते थे. वित्त विभाग के आंतरिक सूत्रों के मुताबिक, वित्त मंत्री की बीमारी के दौरान वित्त मंत्रालय के अफसर उन्हें पूरी तरह दरकिनार करने लगे, ऐसे में उन्होंने पद छोड़ना ही बेहतर समझा. हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से इस्तीफा देने के बाद अरविंद सुब्रमण्यम ने इसकी वजह निजी और पारवारिक बताई थी. लेकिन उन्होंने अपनी आने वाली किताब में नोटबंदी को भारतीय व्यवस्था के लिए करारा झटका बताया हैै. गुरुवार को उनकी किताब ‘अॉफ काउंसिल : द चैलेंज अॉफ द मोदी-जेटली’ के कुछ अंश सामने अाए, जिसमें उन्होंने नोटबंंदी को लेकर पूरा एक अध्याय शामिल किया गया है. इस अध्याय में उन्होंने लिखा है कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था को खासा प्रभावित किया, बाजार से 86 फीसद मुद्रा हट जाने सेे विकास दर तेेजी से गिरकर आठ फीसद से 6.8 फीसद तक आ गई. उनका यह इशारा साफ करता है कि नोटबंदी को लेकर न तो उनसे सलाह ली गई और न वे इसके हक में थेे. जाहिर हैै सरकार न तो उनकी सुन रही थी और न महत्वपूर्ण मुद्दों पर उनसे चर्चा की जा रही थी. यह सारा प्रकरण साफ करता है कि सुब्रमण्यम के इस्तीफे की वजह विशुद्ध पारिवारिक और निजी नहीं मानी जा सकती.
आर्थिक जानकारों का कहना है कि नीति निर्माण के स्तर पर काम करने वाले अर्थशास्त्रियों के साथ यह समस्या भी बनी रही कि वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सरकार आर्थिक सुधारों को गति देकर उदारीकरण को रफ्तार देना चाहती है या संरक्षणवाद को बढ़ावा देकर स्वेदशी जागरण मंच को खुश करना चाहती है.
कांग्रेस की समाजवादी आर्थिक नीतियों का प्रतिबिम्ब रहे योजना आयोग को भंग कर जब नीति आयोग बनाया गया तो लोगों को लगा कि अब आर्थिक सुधार का नया दौर शुरू होगा. लेकिन नीति आयोग को जोर-शोर से गठित करने की इवेंट के बाद सरकार ने इसकी भूमिका तय करने में कोई रुचि नहीं ली. नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने इस्तीफे की वजह निजी बताई थी, लेकिन जानकार मानते हैं कि अमेरिका के विश्वविद्यालयों के ये पेशेवर अकादमिक इस बात से भी नाराज थे कि सरकार फिर से संरक्षणवाद पर लौट रही है. अपने इस्तीफे के बाद उन्होंने अपने कई लेखों में मोदी सरकार को इसके लिए लगातार चेताया भी है. सत्ता के गलियारों पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि इस सरकार में नीतियों को प्रभावित करने वाले इतने समूह हैं कि नीतियों की दिशा तय करना मुश्किल है. शक्ति का केंद्र पूरी तरह से पीएमओ की अोर झुका हुआ है, जो सलाहकारोंं की ‘स्वतंत्र आवाज’ के बजाय ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ पर भरोसा करता हैै. लेकिन इस खींचतान से तंग आकर क्या अब नौकरशाही के लोग भी सरकार से किनारा कर रहे हैं?
जीएसटी के ‘पोस्टर बॉय’ कहे जाने वाले राजस्व सचिव हसमुख 30 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं. उन्होंने किसी भी तरह का सेवा विस्तार लेने से इंकार कर दिया है. हालांकि वित्त मंत्रालय में यह अलिखित परंपरा रही है कि बजट से जुड़े काम पूरे करने के लिए अधिकारियों को सेवा विस्तार मिलता ही है. सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र के इस बात से खिन्न हैं कि जीएसटी की नाकामी का सारा ठीकरा उनके सिर पर फोड़ा जा रहा है. वित्त मंत्री भी उनके साथ बहुत सहज नहीं थे और चिर आलोचक सुब्रमण्यम स्वामी लगातार जीएसटी लागू करने के तरीके को अर्थव्यवस्था के लिए घातक बता रहे थे.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...