Sunday, July 10, 2016

जाकिर नाइक पर टिप्पणी

पिछले हफ्ते ढाका में हुए आतंकी हमले के बाद एक बार फिर से इस्लाम को लेकर सब लोग आपस में शक जैसी स्थिति उत्पन्न करने लगे हैं, इस बहस का मुख्य केंद्र बने हुए हैं भारतीय इस्लामिक विद्वान ड़ॉ. जाकिर नाइक. मेरे कुछ मुस्लिम दोस्त उन्हें बहुत पहले से ही सुन रहे थे, ठीक उसी तरह जैसे कुछ हिंदू दोस्त ओसो को सुनते हैं. लेकिन कभी भी उन हिंदुओं को ना तो कभी कट्टरता की तरफ जाते देखा ना ही कभी उन मुस्लिम दोस्तों को. बस वो हमेशा क़ुरान मजीद की आवश्यकता को लेकर बातें करते थे, फिर भी कभी खुद पर लागू नहीं कर पाए. वो आज भी मेरे दोस्त हैं. मैं जाकिर नाइक को यह समझ कर इग्नोर कर रहा था, कि मैं किसी बाबा मौलवी को नहीं सुन सकता. हालाँकि हिलाल भाई को पढ़कर मैने इस्लाम के बारे में काफ़ी जानकारी ली है. एक बार से अधिक क़ुरान भी पढ़ी हैं हिन्दी में. कल मेरे दोस्तों का मैसेज आया कि जब जाकिर नाइक पर हमले हो रहे हैं, तो मैं उनका बचाव करूँ, जैसे हमेशा ही ग़लत लोगों को फँसता देख किया है. इसलिए रात में मैं जाकिर नाइक साहब के 20-30 वीडियो देख डाले. फिर वीडियो देखने के बाद मैने भगत सिंह को पढ़ा इन सबकी आलोचना करने के लिए. पहले तो यह तय कर देता हूँ कि मैं खुद एक प्रैक्टिकल हिंदू हूँ. लेकिन सेकुलर होने के कारण हिंदूवादी लोगों के निशाने पर रहता हूँ. आज मुझे बिल्कुल भी हिचक नहीं है यह कहने में कि जाकिर नाईक क़ुरान मजीद की ग़लत व्याख्या करते हैं. जब वो अध्यात्म की बातें करते हैं, तो पूरी तरह से बाबा राम देव हो जाते हैं, जबकि आध्यात्म की कोई जगह है ही नहीं इस्लाम में फिर भी उसको नमाज़ के साथ जोड़ते हैं. दूसरी बात यह कि इस्लाम को मानने की सलाह तो वो देते हैं लेकिन मुसलमानों को उसके बीच में आने वाली समस्याओं का निदान कभी नहीं बताते हैं. मसलन अशिक्षा, ग़रीबी और असमानता. उनको पहले तो मुस्लिम समाज में शिक्षा पर काम करना चाहिए, जिससे लोग क़ुरान पढ़ सकें. मेरे गाँव में कोई मुसलमान नहीं पढ़ा लिखा है, अब जो बच्चे पढ़ लिख रहे हैं, वो उर्दू नहीं जानते हैं. इसका कारण है उनमें व्याप्त ग़रीबी. वो अपने पेट के लिए मेहनत से ही फ़ुर्सत नहीं पाते हैं, वो नमाज़ कब पढ़ने जाएँगे. और एक बात यह कि इंसानियत के बेसिक पर हमेशा अव्वल हैं. मसलन चोरी, बेइमानी, हिंसा और झूठ से दूरी बनाकर रहना. बड़े अच्छे लोग हैं वो जब मैं सेकूलरिज़्म की बात करता हूँ तो उन सबके चेहरे मेरे सामने होते हैं. अगर कल उनको क़ुरान पढ़ाकर आप हूबहू उसी पर चलने को बोलेंगे तो वो रास्ते से भटक जाएँगे. क्योंकि उनको अभी इतना नहीं पता है धर्म के बारे में. उनको आप जब धार्मिक बातें, संघर्ष आदि बताएँगे, तो निश्चित तौर पर किसी समाज को विलेन बनाकर उनको एक अन्याय के  खिलाफ लड़ने को कहेंगे जो उनपर हुआ ही नहीं. उनकी ग़रीबी और अशिक्षा के कारण धार्मिक नहीं हो सकते हैं, क्योंकि यही दशा दलितों की है. मेरे गाँव की बारातों में दलित और मुस्लिम बाद में खाना खाते हैं, यह असमानता धार्मिक नहीं है. और जहाँ अन्याय हुआ उसके खिलाफ हम जैसे लोग लडे मुसलमानों के लिए. फिर उनको जिहाद के लिए प्रेरित करने का क्या मतलब है? अगर आप ना बताएँ तो वो उन बातों को आम समझते हैं, लेकिन आपके जिहाद बताते ही वो नाइंसफियाँ बन जाती हैं. तो कहने का अर्थ यह है क़ि समाज में फैली आर्थिक और शिक्षणिक समस्याओं को धर्म दे साथ जोड़ने का क्या अर्थ है. अब फिर से मैं आता हूँ जाकिर नाइक पर जाकिर नाईक इस्लाम और धर्म की बातें बताते हैं तो सही है, लेकिन जब वो उन बातों को अलग अलग धर्मों के साथ तुलना करके खुद को सही और दूसरे को ग़लत कहते हैं, तो मुझे आपत्ति होती है, जो कि तोगाड़िया जैसे लोगों के साथ भी होती है. आप कैसे तय कर सकते हैं कि एक खास धर्म सर्वश्रेष्ट है, और दूसरा बेकार. उनकी जगह दूसरा भी जब कोई अपने धर्म के बारे में बोलता है तो सही लगता है क्योंकि धार्मिक बातें सही ही होते हैं, लेकिन दूसरे धर्मों की गैर ज़िम्मेदाराना आलोचना बेकार हो जाती है. वही काम जाकिर नाईक करते हैं. वो असल में धर्म का प्रयोग करते हैं, समाज में खुद को खुदा बताने के लिए. जब कोई कहे मैं कुछ नहीं हूँ, मैं तो ईश्वर का एक छोटा सा आदमी हूँ, तो समझो वो ईश्वर समझता है खुद को. वो हमेशा कुतरकों का सहारा लेकर बातें करते हैं. जैसे जिहाद और महाभारत की बातें समान बता रहे हैं. बोले महाभारत में अर्जुन से भगवान श्री कृष्ण कहते हैं आप लड़ाई करो, झगड़ा करो इससे स्वर्ग मिलेगा. अब इसमें कितने कुतर्क हैं, महाभारत का पूरा इतिहास और कोन्सेपट कि युद्ध क्यों हुआ? युद्ध करने के पीछे के कारण अलग हैं? फिर जब अर्जुन डरे तो उनको प्रोत्साहित करने के लिए 700 श्लोक सुनाए. उसमें बहुत कुछ ऐसा है जो किसी भी धर्म का आदमी अपने में समाहित कर ले तो जीवन में ग़लत रास्ते पर नहीं जा सकता है, लेकिन जाकिर नायक एक श्लोक को बीच में घुसकर कुछ भी तुलना कर डालते हैं. ठीक उसी तरह क़ुरान में भी हम वैसा नहीं कर सकते है. उसकी कुछ बातें ऐसी हैं जो मुस्लिम विद्वान ही भारत में सही नहीं मानते हैं. वो अरब के हिसाब से वहाँ के लिए कहीं गई थी. आज उनका यहाँ क्या मतलब है? मसलन 4 शादी, तीन बार कहने से तलाक़ आदि. उसमें सुधार की ज़रूरत है. उसी तरह जिहाद कानून के राज में नहीं हो सकता है. मैं कभी नहीं कहूँगा कि हमे अर्जुन की तरह धनुष लेकर लड़ जाना चाहिए अपने भाई भतीजों से ज़मीन के लिए. हमें उसके लिए क़ानून के पास जाना चाहिए. जब कोई इंसान किसी भी धार्मिक पुस्तक की कुछ चंद लाइने उठाकर कहता है कि फलाँ किताब के फलाँ पेज पर, फलाँ नंबर के श्लोक, या सुरा में ऐसा कहा गया है, तो यह समझ लीजिए कि धर्मांधता को लेकर आगे बढ़ रहा है, वो खुद की बात साबित करने के लिए कोई बात कह रहा है मतलब वो खुद के अंदर वो धार्मिक बातें लागू नहीं कर पाता है. जबकि वो जानता सबकुछ है धर्म के बारे में लेकिन खुद को इतना सर्वश्रेष्ठ समझता है कि उसका प्रयोग किसी को नीचा दिखानें में करता है. ऐसा हमारे कई संत भी करते होंगे. इसलिए मेरा कहना है कि जाकिर नायक साहब को जिहाद के बजाय शिक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक समानता जिसमें हिंदू भी सामिल हैं, के लिए अभियान चलाते हुए धर्म की सकारात्मक बातों तक हर इंसान तक पहुँचाएँ, बजाए इसके कि श्रीकृष्ण, ईसा मसीह को उल्टा सीधा कहना, बजाए इसके कि ठीक अपने जैसे धार्मिक व्यापारी श्री श्री रविशंकर या बाबा रामदेव की बेइज़्ज़ती करने के. उनको मानवता के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अहिंसा के आंदोलन करना चाहिए, बजाए इसके कि ओसामा और आई एस आई को डिफ़ाइन करने के. ऐसा करेंगे तभी आप अब्दुल कलाम, महात्मा गाँधी, गौतम बुद्ध और मंडेला जैसे पूरे विश्व में पूजे जाएँगे. कम से कम अनपढ़ युवाओं को धर्म की असली परिभाषा और व्याख्या दीजिए, जो आज लागू हो सके, यह नहीं कि अरब में लिखी गई सैकड़ो साल पहले की पुस्तक की चार शादी और फटाफट तलाक़ और जिहाद के लिए उकसाएँ. क्योकि आज जमाना बहुत आगे निकल गया है, हमारे युवाओं के हाथ में टेक्नॉलॉजी, रोज़गार चाहिए. जब पूरे विश्व में लड़ाई समानता को लेकर है तो लड़कियों को सेक्स का सामान समझ कर क़ैद मत करो. यही बात मैं हमेशा अपने कट्टरपंथियों से कहता रहा हूँ, आज आपसे कह रहा हूँ. 

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...