Wednesday, March 18, 2020

क्या बर्नी सैंडर्स का खेल खत्म?

जो बाइडन मंगलवार को डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी अपने नाम पक्का कर सकते हैं.
फ़्लोरिडा, इलिनॉय और ऐरिज़ोना में भारी जीत के साथ उन्होंने अपनी 894 और 743 की बढ़त को और मज़बूत कर लिया है. इसके अलावा वो अपनी उम्मीदवारी पक्का करने के लिए 1,991 डेलिगेट्स के 'जादुई आँकड़े' के ज़्यादा क़रीब पहुंच गए हैं.
अगर ऐसा हुआ तो ये राजनीति की दुनिया में सबसे बड़ी ख़बर होगी क्योंकि इसके बाद सबकी नज़र डोनल्ड ट्रंप और जो बाइडेन के मुक़ाबले पर होगी.
इस मंगलवार को 'सुपर ट्यूज़्डे' होने वाला था क्योंकि इस दिन चार बड़े राज्यों में चुनाव होने वाले थे. लेकिन कोरोना वायरस के कहर की वजह से 136 डेलिगेट्स वाले ओहायो राज्य ने अपने यहाँ होने वाला मतदान अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया है.
हालांकि कई अन्य राज्य पहले वोटिंग करा चुके हैं.
बाक़ी के तीन राज्यों इलिनॉय, फ़्लोरिडा और ऐरिज़ोना में प्राइमरी चुनाव पूर्व निर्धारित समय पर हुए. फ़्लोरिडा और ऐरिज़ोना में जबर्दस्त 'अर्ली वोटिंग' होती है यानी उस दिन होने वाले मतदान में कमी का कुल टर्नआउट पर ज़्यादा असर नहीं पड़ता.
उदाहरण के लिए, साल 2016 में ऐरिज़ोना में हुई प्राइमरी में 'अर्ली वोटिंग' डेमोक्रेटिक पार्टी को जितने वोट मिले वो कुल टर्नआउट से भी ज़्यादा थे.
दूसरी तरफ़ इलिनॉय बहुत हद तक चुनाव के दिन के टर्न-आउट पर निर्भर होता है. इस बार इलिनॉय से जो रिपोर्ट्स आ रही हैं, वो बताती हैं कि आख़िरी वक़्त में पोलिंग बूथ बंद होने, चुनाव स्थल पर वॉलंटियर्स की ग़ैर-मौजूदगी, सैनिटाइज़र और अन्य ज़रूरी सामानों के अभाव की वजह से राज्य के मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी.
साल 2016 के मुक़ाबले टर्नआउट कम दर्ज किया गया. कुछ लोगों को वोटिंग बैलट के बिना ही वापय लौटा दिया गया और कुछ लोगों को लंबी क़तार और भीड़-भाड़ वाले कमरों में इंतज़ार करना पड़ा. स्थिति इतनी बिगड़ कई थी कि एक अदालत को शिकागो में वोटिंग के लिए एक घंटा अतिरिक्ट दिए जाने का आदेश देना पड़ा.
जैसे ही वोटिंग ख़त्म हुई, अमरीका के कई मीडिया संस्थानों को विजेता बताना शुरू कर दिया. हालांकि उनकी आसान जीत उन समस्याओं का हल नहीं निकाल पाएंगी जो मंगलवार को इलिनॉय में सामने आईं.
मंगलवार को जो कुछ हुआ वो बताता है कि अगर कोरोना जैसी महामारी में नेताओं ने पर्याप्त तैयारियां करनी शुरू नहीं कीं तो आगे क्या होगा.
फ़्लोरिडा: बुजुर्ग मतदाता बाइडन के पक्ष में
कोरोना वायरस की दहशत के बावजूद फ़्लोरिडा में डेमोक्रेटिक पार्टी का टर्नआउट बेहतरीन (17 लाख से ज़्यादा) था. ये टर्नआउट साल 2016 के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा होने की उम्मीद जताई जा रही है.
फ़्लोरिडा में सेवानिवृत्त मतदाताओं की संख्या काफ़ी ज़्यादा है और ये वोटर जो-बाइडन के पक्ष में हैं. सेवानिवृत्त मतदाताओं ने ज़ाहिर कर दिया है कि वो बर्नी सैंडर्स के 'क्रांतिकारी उत्साह' के बजाय पूर्व उप-राष्ट्रपति बाइडन की पेंशन बढ़ाने की योजना के ज़्यादा समर्थन में हैं. केंद्रीय फ़्लोरिडा के सम्टर काउंटी में बुज़ुर्ग मतदाताओं की औसत संख्या सबसे ज़्यादा है. यहां बर्नी सैंडर्स जो बाइडन और माइकल ब्लूमबर्ग से पीछे तीसरे नंबर पर थे. ब्लूमबर्ग पहले ही चुनावी दौड़ से बाहर हो चुके हैं.
बाइडन ने फ़्लोरिडा के स्पैनिश भाषी मतदाताओं के बीच भी अच्छा प्रदर्शन किया. इस इलाक़े पर पहले के चुनावों में बर्नी सैंडर्स की पकड़ थी.
टेक्सस और नेवाडा के उलट फ़्लोरिडा के 'हिस्पैनिक्स' में ज़्यादातर लोग कैरिबियाई और दक्षिण अमरीकी इलाक़ों से ताल्लुक रखते हैं. इनमें से कई लोग अब बर्नी सैंडर्स के 'समाजवादी' तमगे से दूर भाग रहे हैं और वो इसे कई बार तानाशाही से जुड़ा एक रवैया मानते हैं.
जो बाइडन को जैसी भारी जीत मिली है, उससे उन्हें सैंडर्स के मुक़ाबले दोगुने डेलिगेट्स अकेले फ़्लोरिडा से ही मिल सकते हैं.
 कई राज्य अपने प्राइमरी चुनाव को जून तक के लिए टालने की योजना बना रहे हैं. यहां तक कि कोरोना संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए अब जुलाई में होने वाला डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन पर भी संहेद के बादल मंडरा रहे हैं.
कन्वेंशन रद्द होने का असर डेमोक्रेटिक पार्टी पर ज़रूर पड़ेगा क्योंकि यह अपने नॉमिनी को कन्वेंशन में ही सामने लाती है. आधुनिक अमरीकी राजनीति में ये बिल्कुल नया है.
आने वाले कुछ वक़्त में जो बाइडन की यह बढ़त बनी रहेगी जब तक कि सैंडर्स की किस्मत एकदम से न पलट जाए. हालांकि सैंडर्स के चाहने वालों को अब भी यह उम्मीद है कि पूरी प्रक्रिया में अगर देरी होती है तो इससे मतदाताओं को अपने फ़ैसले पर दोबारा विचार करने का वक़्त मिलेगा.
कुछ लोग हालिया चुनावों में बाइडेन की बढ़त धीरे-धीरे कम होने को इस बात का इशारा मानते हैं कि बर्नी सैंडर्स की वापसी होगी. ख़ासकर कोरोना जैसी महामारी के प्रसार और गिरती अर्थव्यवस्था के समय में लोगों को बर्नी सैंडर्स के प्रस्तावित सुधारों की ज़रूरत महसूस हो रही है.
सैंडर्स को इस बारे में अच्छी तरह सोचना होगा कि वो इस रेस में कैसे बने रहना चाहते हैं और क्या इसके लिए उनके पास पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं?
पिछले हफ़्ते वो छह में से पाँच चुनाव हार गए थे और मंगलवार को भी वो बुरी तरह पिछड़ गए थे. जैसे-जैसे प्राइमरी चुनाव ख़त्म हो रहे हैं, सैंडर्स के लिए वापसी की संभावनाएं भी कम होती जा रही हैं.
हो सकता है कि आने वाले वक़्त में डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद सैंडर्स से विनम्रतापूर्वक रेस से बाहर होने के लिए कहें. हालांकि सैंडर्स इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं थे. उन्होंने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में कन्वेशंस की पूर्व संध्या से पहले अपने क़दम पीछे नहीं खींचे थे और इससे हिलरी क्लिंटन के समर्थक काफ़ी असहज भी थे.
बर्नी सैंडर्स को अब ये तय करना होगा कि उन्होंने जो आंदोलन शुरू किया है, उसे जारी रखने के लिए अभी क्या करना सबसे अच्छा होगा.
क्या इस दौड़ में बने रहना उन्हें उनके उठाए मुद्दों पर बात करने के लिए बड़ा मंच और वापसी का वक़्त देगा? या फिर लड़ाई में बने रहने से उनका नुक़सान होगा?

Sunday, March 8, 2020

महिला दिवस की शुभकामनाएं

*महिलाओं का सम्मान केवल एक दिन ही करना है या रोज?
*या फिर कल से उनपर " घुटनों में अकल" जैसे घटिया जोक भी शेयर करना है?
*या फिर आदमी की गलती पर भी औरतों को ही गाली देना है? कभी माँ बहन की बजाय बाप भाई की गाली सुनी है?
*कहीं उनके बारे में दोस्तों से बात करने के लिए बाजारू कोड वर्ड "आइटम, माल, तो नहीं बुलाना है?
*Mothers Day पर माँ का ही सम्मान करना है या हर लडकी का?
*क्या शाॅपिंग या restaurant में extra discount से ही women empowerment हो जाता है?
*क्या आपको पता है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक मज़दूर आंदोलन से उपजा है. इसकी शुरुआत  साल 1908 में हुआ था जब 15 हज़ार औरतों ने न्यूयॉर्क शहर में मार्च निकालकर नौकरी में कम घंटों की मांग की थी. इसके अलावा उनकी मांग थी कि उन्हें बेहतर वेतन दिया जाए और मतदान करने का अधिकार भी दिया जाए.
*क्या आपको पता है कि भारत में सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा, और अंबेडकर ने वोटिंग से लेकर संपत्ति के अधिकार तक में बडी भूमिका निभाई है?
*क्या आपको पता है कि पहले औरतों को ब्रेस्ट टैक्स देना पडता था, फिर करथॅला नाम की जगह पर नेंगाली नाम की महिला ने 1803 में आंदोलन करते हुए अपनी जान दी तब वो टैक्स हटा?
 * क्या आप जानते हैं कि बहुत पढे लिखे समाज में भी पीरियड्स को आज भी अशुद्ध मानते हैं। शहरों में भी उनको भगवान के मंदिर, और गांवो में तो रसोई में जाने से रोका जाता है? क्या ये समाज का दोगलापन नहीं है?
*क्या आपको पता है कि आप जिस भारत माता की जय बोलते हो वो कोई पोस्टर में साडी पहने सजी देवी नहीं, वो कोई भी महिला साडी, बुरका, जींस किसी भी कपडे में, काली, गोरी, सांवली, किसी भी भाषा की, नीता अंबानी, दीपिका पादुकोण या कोई मजदूरी करने वाली महिला भी हो सकती है।
वैसे मैं ये सब याद दिला रहा था, कि अगर हम सब अपने अपने स्तर पर ही सुधार कर लें तो सब सही हो जाए।
और अंत में आप सबको महिला दिवस की शुभकामनाएं। 😊

Saturday, March 7, 2020

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया

दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका और उस पर राज करने वाला व्यक्ति सबसे ताकतवर माना जाता है. ऐसे में अमेरिका का राष्ट्रपति कौन बनता है दुनिया इस पर कड़ी निगाह रखती है. वहां अभी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है और 3 नवंबर को अमेरिका की जनता अपने नए नेता के लिए मतदान डालेगी.
भारत की तरह ही अमेरिका भी एक लोकतांत्रिक देश है ऐसे में वोटिंग बहुत अहम है. लेकिन भारत से इतर वहां की प्रक्रिया थोड़ी कठिन और लंबी है. ऐसे में अमेरिका में चुनाव किस तरह होते हैं, वहां की प्रणाली क्या है और एक अमेरिकी व्यक्ति अपने राष्ट्रपति को किस तरह चुनता है यहां आसान भाषा में समझें.
कौन बन सकता है अमेरिका का राष्ट्रपति?
अमेरिकी संविधान के आर्टिकल 2 के सेक्शन 1 में वहां के राष्ट्रपति चुनाव की जानकारी विस्तृत रूप से दी गई है. इसमें तीन प्रमुख बातों का ध्यान दिया गया है जिसके तहत अमेरिकी चुनाव की नींव पड़ती है अगर कोई व्यक्ति अमेरिका का राष्ट्रपति बनना चाहता है तो तीन शर्तों को पूरा करना जरूरी है.
1. चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति पैदाइशी अमेरिकी होना चाहिए.
2. उसकी उम्र कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए.
3. चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति कम से कम 14 बरस तक अमेरिका में रहा होना चाहिए.
अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया
कैसे शुरू होती है चुनावी प्रक्रिया?
कहा जाता है कि  अमेरिका में दो पार्टी का सिस्टम है, लेकिन थे सच नही है। यहां और भी दल हैं जो चुनाव लड़ते हैं लेकिन उनको कभी सफलता नहीं मिली इसलिए दो दल ही मुख्य हैं, पहला रिपब्लिकन और दूसरा डेमोक्रेट्स. दोनों पार्टियों को अपनी-अपनी तरफ से किसी एक व्यक्ति को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाना होता है जिसे जनता वोट देती है. इसे सीधा सीधा चुनाव भी नहीं कह सकते यहां भी जनता इलेक्टर्स को वोट देती है जो राष्ट्रपति चुनते हैं। लेकिन इस उम्मीदवार को चुनने से पहले भी एक लंबी प्रक्रिया है क्योंकि राष्ट्रपति तो हर कोई बनना चाहता है लेकिन कोई उम्मीदवार कैसे बनेगा इसका चयन भी जनता या पार्टी के समर्थक करते हैं.
पार्टी का उम्मीदवार तय करने के लिए दो तरह से चुनाव किए जाते हैं पहला प्राइमरी और दूसरा कॉकसस. इसमें पार्टी का कोई भी कार्यकर्ता राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए खड़ा हो सकता है, उसे सिर्फ अपने समर्थकों का साथ चाहिए होता है.
अगर प्राइमरी चुनाव के बात करें तो यह राज्य सरकारों के अंतर्गत कराए जाते हैं जोकि खुले और बंद रूप से भी कराए जा सकते हैं. यानी अगर राज्य सरकार चुनती है कि खुले रूप से चुनाव करेगी तो उसमें पार्टी के समर्थक के साथ-साथ आम जनता भी मतदान कर सकती है. वहीं अगर बंद रूप से मतदान होता है तो सिर्फ पार्टी से जुड़े समर्थक ही उम्मीदवार के लिए वोटिंग करते हैं.
जबकि कॉकसस सिस्टम की बात करें तो यह चुनाव पार्टी की तरफ से ही कराए जाते हैं इसमें पार्टी के समर्थक एक जगह इकट्ठे होते हैं और अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करते हैं. राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए खड़े हो रहे व्यक्ति की बात सुनते हैं उसके बाद उसी सभा में हाथ खड़े कर एक उम्मीदवार को समर्थन दे दिया जाता है हालांकि ऐसा बहुत ही कम राज्यों में होता है.
अमेरिकी चुनावी सिस्टम में एक पेच ये भी है कि वहां पर एक वोटर को चुनाव से पहले कुछ समय के लिए एक पार्टी के लिए रजिस्टर करना पड़ता है तभी वह इस तरह के प्राइमरी या कॉकसस चुनावों में हिस्सा ले सकता है।
रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, दोनों पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने के लिए एक संख्या की जरूरत होती है वह संख्या जो प्राइमरी और कॉकसस के चुनावों में जरूरी होती है. उदाहरण के तौर पर अगर एक पार्टी की तरफ से 10 लोग राष्ट्रपति पद की रेस में है तो उन्हें हर राज्य में होने वाले प्राइमरी या कॉकसस चुनाव में सबसे अधिक डेलिगेट्स का समर्थन हासिल करना होगा, अंत में इन्हीं डेलिगेट्स की संख्या के आधार पर नेशनल कन्वेंशन की ओर बढ़ा जाता है.
2020 में डेमोक्रेट्स के कुल डेलिगेट्स की संख्या 3979 है और जीतने के लिए 1991 की जरूरत है, जबकि रिपब्लिकन के कुल डेलिगेट्स की संख्या 2550 है और उम्मीदवार बनने के लिए 1276 की जरूरत है.
नेशनल कन्वेंशन और उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार
एक बार जब प्राइमरी इलेक्शन खत्म हो जाता है तो यह तस्वीर साफ हो जाती है कि दोनों पार्टियों की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन बनेगा. लेकिन इसका आधिकारिक ऐलान नेशनल कन्वेंशन में होता है, डेमोक्रेट्स का नेशनल कन्वेंशन हमेशा जुलाई में होता है और रिपब्लिकन पार्टी का अगस्त के महीने में.
यहां पर पार्टी की सर्वोच्च टीम उम्मीदवार का ऐलान करती है, फिर राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपने समर्थकों के सामने एक भाषण देते हुए उम्मीदवारी को स्वीकार करता है और इसके साथ अपनी मर्जी से चुने हुए उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का ऐलान करता है. और यहां से अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की असली प्रक्रिया शुरू होती है जब पार्टी की ओर से चुना गया राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार पूरे देश में प्रचार करने के लिए निकलता है.
अमेरिकी जनता हमेशा नवंबर के पहले सप्ताह में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान करती है लेकिन यह मतदान सीधे उम्मीदवार के लिए नहीं किया जाता है. अमेरिकी जनता सबसे पहले स्थानीय तौर पर एक इलेक्टर का चुनाव करती है यह अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का प्रतिनिधि होता है.
इसके समूह को इलेक्टोरल कॉलेज कहा जाता है जिसमें कुल 538 सदस्य होते हैं जो अलग-अलग राज्यों से आते हैं. जनता सीधे तौर पर इन्हीं सदस्यों को चुनती है जो आगे जाकर राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं. जब अमेरिकी जनता एक बार अपने इलेक्टर को वोट दे देती है तो उसका राष्ट्रपति पद के चुनाव में कोई हाथ नहीं रहता है. सिर्फ यह इलेक्टर पर निर्भर करता है कि वह किसी राष्ट्रपति बनाना चाहता है.
राष्ट्रपति बनने के लिए किसी भी उम्मीदवार को 270 से अधिक इलेक्टर्स के समर्थन की जरूरत होती है. जिसके पास 270 से अधिक का आंकड़ा होता है वह व्यक्ति 20 जनवरी को अमेरिका के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति पद की शपथ लेता है.
अमेरिका भी भारत की तरह कई राज्यों का एक देश है. हर राज्य के पास सीटों की अपनी एक ताकत है जो प्राइमरी और बाद में फाइनल चुनाव में अपना किरदार निभाती है. कुछ राज्य ऐसे हैं जो अकेले दम पर पूरा चुनाव ही बदल सकते हैं जैसे कि भारत में उत्तर प्रदेश लोकसभा चुनाव के लिहाज से सबसे अहम राज्य है.
प्राइमरी चुनाव के हिसाब से अमेरिका में सबसे ताकतवर राज्य कैलिफोर्निया है जिसके पास 415 डेलीगेट्स है, इसके बाद टेक्सस 228 और फिर नॉर्थ कैरोलिना 110 के आंकड़े के साथ आता है.
हालांकि राष्ट्रपति चुनाव के लिए हिसाब थोड़ा अलग भी हो सकता है क्योंकि तब डेलिगेट्स नहीं इलेक्टर तवज्जो रखते हैं लेकिन उनकी संख्या भी राज्यों के साइज के आधार पर ही होती है ऐसे में किसी उम्मीदवार का राज्य राज्य जीत हासिल करना भी काफी अहम माना जाता है.
अमेरिकी चुनाव का एक सबसे बड़ा हिस्सा है टीवी डिबेट्स. चुनाव प्रचार के दौरान भले ही सभी उम्मीदवार अलग-अलग इलाके में जाकर रैलियां करते हो लेकिन टीवी डिबेट्स ही वह असली मुद्दा है जिनके आधार पर अधिकतर वोटर प्रभावित होते हैं. यह डिबेट्स भी दो तरह की होती हैं पहली प्राइमरी लेवल की डिबेट जो पार्टी के कैंडिडेट के बीच में होती है और दूसरी प्रेसिडेंशियल डिबेट जो दोनों पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच में होती है.
यह सभी डिबेट्स किसी ना किसी अमेरिकी न्यूज़ चैनल के जरिए आयोजित की जाती हैं. हर डिबेट का एक अलग मुद्दा होता है जो कई चरणों तक चलता है. प्राइमरी चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार 1-1 मसले पर अपनी बात रखते हैं और जनता को लुभाने की कोशिश करते हैं. इसी तरह राष्ट्रपति चुनाव के डिबेट्स में दोनों पार्टी के उम्मीदवार अलग-अलग न्यूज़ चैनल पर जाकर डिबेट में हिस्सा लेते हैं.
प्रक्रिया जारी है और हर किसी की नजर है डोनाल्ड ट्रंप पर, क्या कोई ट्रंप को इस चुनाव में टक्कर दे पाएगा. अभी तक प्राइमरी चुनाव चल रहे हैं ऐसे में यह तय नहीं हुआ है कि डेमोक्रेट्स की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा लेकिन रेस जारी है.
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के कैंडिडेट के चुनाव की प्रक्रिया में 4 मार्च  #SuperTuesday को हुई वोटिंग जो बाइडेन के कैम्पेन के लिए शानदार वापसी साबित हुई. उन्होंने 14 में से 9 राज्य जीत कर बढत बना ली है। 
दूसरी तरफ़ अब तक आगे चल रहे बर्नी सैंडर्स उनसे पिछड रहे हैं, बर्नी सैंडर्स ने अभी तक तीन राज्य जीते हैं और कैलिफ़ोर्निया में वे आगे चल रहे हैं. जो बाइडेन ने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी बर्नी सैंडर्स से टेक्सास जैसा अहम राज्य क़रीबी फ़ासले से जीत लिया.
हालांकि चुनावी पूर्वानुमानों में टेक्सास के बारे में कहा जा रहा था कि ये बर्नी सैंडर्स के खाते में जा सकता है. बर्नी सैंडर्स के खाते में कैलिफ़ोर्निया की बढ़त के अलावा कोरोराडो, उताह और वर्मोंट जैसे राज्य हैं. वे वर्मोंट से ही सिनेट में चुने जाते रहे हैं. 
इस कैम्पेन के लिए अपनी जेब से 500 मिलियन डॉलर से भी ज़्यादा की रक़म ख़र्च कर देने वाले न्यूयॉर्क के पूर्व मेयर माइकल ब्लूमबर्ग एक भी राज्य जीत पाने में नाकाम रहे. उम्मीदवारी हासिल करने के लिए 1991 डेलीगेट्स चाहिए होंगे. सुपर ट्यूजडे को हुई वोटिंग से 1300 से ज़्यादा डेलीगेट्स का फ़ैसला हो गया है.
अभी तक की जो तस्वीर हैं, उसमें जो बाइडेन के खाते में 643 डेलीगेट्स हैं जबकि बर्नी सैंडर्स के खाते में 566 डेलिगेट्स हैं। बर्नी सैंडर्स 2016 में हिलेरी क्लिंटन से पिछड़ गए थे लेकिन वे पूरी तरह डेमोक्रेट्स नहीं माने जाते हैं. बर्नी सैंडर्स सीनेट में इंडिपेंडेंट उम्मीदवार के तौर पर बैठते हैं. वे एक तरह से लेफ्ट विंगर माने जाते हैं. जबकि जो बाइडन बराक ओबामा के समय उप राष्ट्रपति थे। मैं इसबार के अमेरिकी चुनाव की प्रक्रिया सहित हर डिबेट को फाॅलो कर रहा हूँ, मुझे लगता है कि बर्नी सैंडर्स की विचारधारा आज के दौर में अमेरिका जैसे देश में तो बहुत जरूरी है। वो आम आदमी, लेबर क्लास, प्रवासियों, युद्ध और सेकुलरिज्म पर बहुत साफ राय रखते हैं।

Thursday, January 30, 2020

गांधी के कुछ अनसुने तथ्य

महात्मा गाँधी की हत्या के लगभग 6-7 प्रयास किये गए तब जाकर नाथूराम गोडसे की गोली से उनकी मौत हुई. बीबीसी पर इनमें से दो रोचक किस्से पढ़ने को मिले। एक बार गाँधी को एक समारोह में उनको जाना था, उनको लेने दो गाड़ियां आईं, एक में कार्यक्रम के आयोजक थे और दूसरे में कस्तूरबा के साथ गांधी. आयोजकों की कार थोड़ा सा आगे निकल गई और बीच में रेलवे फाटक पड़ता था तो महात्मा गांधी की कार वहां रुक गई. तभी एक धमाका हुआ, जो कार आगे निकली, उसके परखच्चे उड़ गए. महात्मा गांधी उस हमले से बच गए, क्योंकि ट्रेन आने में देरी हुई. और रेलवे फाटक न खुलने से उनकी कार पीछे रह गई.  ये 1934 की घटना है.
साल 1917 में महात्मा गांधी मोतिहारी में थे. मोतिहारी में सबसे बड़ी नील मिल के मैनेजर इरविन ने गांधी को बातचीत के लिए बुलाया. इरविन ने सोचा कि जिस आदमी ने उनकी नाक में दम कर रखा है, अगर इस बातचीत के दौरान उन्हें खाने-पीने की किसी चीज़ में ज़हर दे दिया जाए. ऐसा ज़हर जिसका असर थोड़ी देर बाद होता हो तो न उनके ऊपर आंच आएगी और गांधी की जान भी चली जाएगी. ये बात इरविन ने अपने खानसामे बत्तख मियां अंसारी को बताई गई. बत्तख मियां से कहा गया कि वो ट्रे लेकर गांधी के पास जाएंगे. बत्तख मियां एक छोटे- मोटे किसान थे. नौकरी करके परिवार चलाते थे, उन्होंने मना नहीं किया और वे ट्रे लेकर गांधी के पास चले गए. लेकिन जब वे गांधी जी के पास पहुंचे तो बत्तख मियां की हिम्मत नहीं हुई कि वे ट्रे गांधी के सामने रख देते. वो खड़े रहे ट्रे लेकर, गांधी ने उन्हें सिर उठाकर देखा, तो बत्तख मियां रोने लगे और सारी बात खुल गई. ये किस्सा महात्मा गांधी की जीवनी में कहीं नहीं है. किसी और हवाले से इसका जिक्र नहीं है. लेकिन ये कहा जाता है कि वो न होते तो इस देश का इतिहास क्या होता? उसके बाद बत्तख मियां का कोई नामलेवा  नहीं बचा, जेल हो गई, ज़मीनें नीलाम हो गईं.

गाँधी का जिक्र आते ही कई तरह के रंग उनके अंदर देखने को मिलते हैं. कभी वो मजाकिया, तो कभी जिद्दी आंदोलनकारी, कभी एकदम साधारण आदमी तो कभी संगीत के बड़े शौक़ीन नजर आते हैं. आजकल जैसे आंदोलनों में खूब नारे, संगीत और क्रिएटिविटी देखने को मिलती है वैसे ही गाँधी को भी ये सब पसंद था. मधुकर उपाध्याय के एक लेख में मैंने पढ़ा कि गांधी का हमेशा मानना था कि हिंदुस्तान की आज़ादी की लड़ाई तब तक मुक्कमल नहीं हो सकती जब तक उसमें संगीत न हो. बल्कि उनका कहना था कि संगीत नहीं है इसलिए ये लड़ाई उस ज़ोर से नहीं चल पा रही है जिससे उसे चलना चाहिए. वो सत्याग्रह से लोगों को जोड़ने का एक तरीका उसे मानते थे. वो नरसी मेहता का 'वैष्णवजन' अक्सर गाते थे. 'रघुपति राघव राजा राम' भी उनको पसंद था. लेकिन गांधी इतने पर ही नहीं रुक रहे थे. तमाम तरह के दूसरे गानों में भी उनकी दिलचस्पी थी. मसलन जब वो यरवडा जेल में थे और दलितों के पक्ष में आणरण अनशन करने जा रहे थे, तो अनशन पर बैठने से पहले उन्होंने सरदार पटेल को और महादेव देसाई को बुलाया और एक गीत 'उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां जो सोवत है ' गाने लगे. उसके बाद सरदार पटेल और महादेव देसाई सबने गाना शुरू किया. फिर जेल में जितने और कैदी थे उन्होंने भी गाना शुरू कर दिया और एक पूरा माहौल बन गया.
एक किस्सा बहुत मज़ेदार है गांधी की संगीत में दिलचस्पी का और वो बताता है कि उनकी दिलचस्पी सिर्फ़ हिंदुस्तानी संगीत में नहीं थी, विदेशी संगीत में भी थी. पाश्चात्य संगीत में थी. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए गांधी लंदन में थे और ठहरे थे मुरिएल लेस्टर के यहां. उनका एक आश्रम था जिसको किंग्सले हॉल कहा जाता था. पूर्वी लंदन का इलाका था. गांधी रोज शाम को जब भी फारिग होते बाकी काम करने से, बैठकें करने से तो किंग्सले हॉल के सभागार में चले जाते थे. क्योंकि वहां कुछ स्थानीय लोग इकट्ठा होकर एक गाना गाते थे. एक स्कॉटिश गीत. स्कॉटलैंड का एक लोकगीत था जिसको रॉबर्ट बर्न्स ने बाद में नए ढंग से लिखा. आउड लैंग साइन यानी गए ज़माने की बात. गांधी वो गीत सुनने के लिए कितनी बार गए, लोगों को अंदाज़ा नहीं हुआ और फिर गांधी को पता चला कि हर शनिवार को लोग इस गाने पर नाचते हैं. कांग्रेस के लोगों को जो उनके साथ गए थे राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के लिए उनको ये पसंद नहीं आता था कि गांधी इस तरह की चीजों में दिलचस्पी ले रहे हैं. उन्होंने मना करने की कोशिश की. गांधी नहीं माने और एक दिन शनिवार को जब वो वहां पहुंचे और गाना शुरू हुआ और अचानक एक महिला ने हाथ उठाकर कहा कि गाना रोक दो. फिर उसने गांधी की तरफ देखकर कहा कि आप हमारे साथ नाचना चाहेंगे? गांधी ने देखा कि वहां जितने लोग थे वो या तो पति पत्नी थे या दोस्त थे लेकिन एक लड़का, एक लड़की साथ में नाच रहे थे. गांधी ने कहा जरूर. मैं नाचूंगा लेकिन एक शर्त पर कि मेरा जोड़ीदार मेरी छड़ी होगी और गांधी अपनी छड़ी के साथ किंग्सले हॉल के उस सभागार में नाचे.
साल 1915 में हरिद्वार में कुंभ लगा था और गांधी कुंभ मेले में जा रहे थे. रास्ते में जब ट्रेन सहारनपुर रुकी तो उन्होंने देखा कि लोग पसीना-पसीना हैं, गला सूख रहा है, पानी नहीं है, लेकिन अगर पानी पिलाने वाला आता था और उन्हें पता चल जाए कि वो मुसलमान है तो वो पानी नहीं पीते थे. वो हिंदू पानी का इंतज़ार करते थे, मुसलमान पानी नहीं पी सकते थे, जान भले ही चली जाए. बहुत समय तक गांधी को ये बात सालती रही कि अगर डॉक्टर मुसलमान हो और वो आपको दवा दे तो ले लेंगे लेकिन उसके हाथ का पानी नहीं पिएंगे, इसका मतलब है कि समस्या समाज में है, बाहर है, आपके अंदर है, उससे इसका कोई मतलब नहीं है कि आप हिंदू हैं या मुसलमान हैं. आज़ाद हिंद फ़ौज के तमाम लोग जब गिरफ़्तार हुए और उनपर मुकदमा चलने वाला था और सारे लोग लाल क़िले में बंद थे, तो गांधी उनसे मिलने गए. गांधी ने पाया कि उन्होंने कलकत्ता में वॉवेल से जो बात कही थी कि आपके रहते एकता नहीं हो सकती, वो कितनी सच थी.
आज़ाद हिंद फ़ौज के लोगों ने गांधी को बताया कि यहां सुबह हांक लगती है कि हिंदू चाय तैयार है और मुसलमान चाय अभी आने वाली है.
तो उन्होंने सिपाहियों से पूछा कि आप करते क्या हैं, उनका जवाब था कि 'ये लोग हमको रोज़ सुबह बांटते हैं, जबकि हमारे अंदर कोई भी मंशा नहीं होती, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं है, लेकिन सरकार का हुक़्म है कि हिंदू चाय अलग बने और मुसलमान चाय अलग बने.
तो गांधी ने पूछा कि 'आप क्या करते हैं अगर हिंदू चाय और मुसलमान चाय अलग अलग दी जाती है?'
उनका कहना था कि 'हमने एक बड़ा सा बर्तन रखा है और उसमें हिंदू चाय और मुसलमान चाय मिला देते हैं और फिर बांट के पी लेते हैं.'
महात्मा गांधी ने सुभाष चंद्र बोस के काम करने के ढंग की, हिंसा पर जो उनका भरोसा था उस पर, फ़ौज के गठन और फ़ौज के ज़रिए आज़ादी हासिल करने की कोशिश की कई बार आलोचना की थी.
लेकिन लाल क़िले से लौटने के बाद गांधी ने साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि 'सुभाष चंद्र बोस एक राष्ट्रवादी नेता हैं और उनका सबसे बड़ा योगदान एक पूरा संगठन खड़ा करना और उसमें हिंदू मुसलमान का भेद मिटा देना है और इसके लिए मैं उन्हें सलाम करता हूं.'
गाँधी की एक बात और सबसे ख़ास थी, "उनकी बात रखने की कला", जिसके जरिये वो लोगों को अपने पक्ष में कर लेते थे. बात 1910 की है, उस वक्त गांधी जोहन्सबर्ग में थे. वहां सरकारें हर रोज़ नए फरमान जारी करती थी, उसी दौरान एक फरमान आ गया कि जिनकी शादियां दक्षिण अफ़्रीका में नहीं हुई हैं, वहां रजिस्टर्ड नहीं हैं. उनको पति पत्नी नहीं माना जाएगा. यह बात बहुत गंभीर थी क्योंकि इससे कई लाख भारतीय मूल के लोग प्रभावित होने वाले थे. गांधी घर लौटे और उन्होंने बा को यानी कस्तूरबा जी को आवाज़ दी और कहा, "तुम आज से मेरी रखैल हो गई." 
बा ने कहा, "क्या बात हुई? मेरी शादी हुई है, आप इस तरह की बात कैसे कह रहे हैं?"
गांधी ने कहा, "सरकार ने क़ानून बना दिया है अब हमारी शादी मान्य नहीं है. और अब अगर तुम मेरे साथ रहोगी तो मेरी रखैल रहोगी."
ये बात सिर्फ घर के अंदर नहीं रही, ये बात फैलने लगी. पूरे दक्षिण अफ़्रीका में जो भारतीय समाज था उसके बीच ये बात फैल गई और फिर बा ने वहां भारतीय लोगों को संगठित किया. पहली बार दक्षिण अफ़्रीका में आंदोलन के समय औरतें और बच्चे अपने-अपने घरों से बाहर निकले. उन्होंने छह मील लंबा जुलूस निकाला और सरकार को ये क़ानून वापस लेना पड़ा.
एक किस्सा और है उनका. जब गांधी हिंदुस्तान लौट चुके थे तो लोगों ने उनसे कहा, "मुसलमान बहुत अड़ियल किस्म के लोग हैं, ये कोई बात ही नहीं सुनते. हम उनसे सुलह की बात करते हैं. हम उनसे कहते हैं कि आंदोलन में साथ आइए. लेकिन वो इसमें भाग लेने के लिए राजी ही नहीं है. हमने उन्हें बहुत समझाया, बहुत कहा कि हिंदुस्तान तुम्हारा भी मुल्क है. तुम यहीं पैदा हुए हो. इसके अलावा कहां जाओगे तुम. लेकिन कोई राजी नहीं है सुनने को."
तब गांधी ने उन लोगों से कहा, "आप डंडा लेकर किसी लड़की के पास जाएंगे और उससे पूछेंगे कि मुझसे इश्क करोगी. तो क्या करेगी वो, आपको भगा देगी. जब आप किसी से बात करें तो नरमी रखें- अपने स्वभाव में, अपने शब्दों में और अपनी आवाज़ में. कायदे से बात करिए. कोई इतना नामुनासिब हो ही नहीं सकता कि वो आपकी बात ही ना सुने. सब सुनेंगे, सब साथ होंगे, हिंदुस्तान आज़ाद होगा."
आगे चलकर यही हुआ, मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर आंदोलन में हिस्सा लिया और देश को आजाद कराने में बहुत अहम् भूमिका निभाई.
ये सिर्फ़ एक बात कहने का ढंग ही था जो आपको बताता है कि गांधी कैसे सोचते थे और कैसे चीज़ों को अपने हक़ में बदल देते थे.
महात्मा गांधी छुआछूत के सख्त ख़िलाफ़ थे. वो चाहते थे कि ऐसा समाज बने जिसमें सभी लोगों को बराबरी का दर्जा हासिल हो क्योंकि सभी को एक ही ईश्वर ने बनाया है. उनमें भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए. दक्षिण भारत के दौरे में जब गांधी मायावरम पहुंचे तब उनका एक नए शब्द से सामना हुआ और वो शब्द था 'पंचम'. यह पंचम शब्द संगीत की भाषा में तो बहुत अच्छा माना जा सकता है लेकिन पंचम शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत में दलितों के लिए किया जाता था. यह कहा जाता था कि ये लोग हिंदू धर्म में चार वर्णों की व्यवस्था से बाहर के लोग हैं. दलित पांचवा वर्ण हैं और इन्हें इन चार वर्णों में शामिल नहीं किया जा सकता.
मायावरम में पंचमों से मुलाक़ात के बाद महात्मा गांधी को दक्षिण अफ़्रीका के अपने वो दिन याद आए जब वो दलितों को अपने घर खाने के लिए बुलाते थे और महसूस करते थे कि कोई उनका विरोध नहीं कर रहा है. लेकिन एक तरह का दबा हुआ विरोध ख़ुद कस्तूरबा गांधी की तरफ़ से होता था. कस्तूरबा को लगता था कि शायद भारत में पहुंचकर यह समस्या और बड़ी और विकराल होगी. दक्षिण अफ़्रीका में घर से ज़्यादा दूरी होने की वजह से शायद लोग एकसाथ आसानी से आ जाते हैं लेकिन भारत में यह काम कठिन होगा. कस्तूरबा गांधी का यह अनुमान ग़लत नहीं था. जब गांधी चंपारण जाने वाले थे और बांकीपुर स्टेशन उतरे जो पटना का पुराना नाम था. उन्हें कुछ लोग राजेंद्र प्रसाद के घर ले गए.
उस समय राजेंद्र प्रसाद घर पर नहीं थे और वहां मौजूद नौकर गांधी को पहचानते नहीं थे. इसलिए उन्हें बाहर वाले कमरे में ठहरा दिया गया क्योंकि उन्हें लगा कि यह शख़्स पता नहीं किस जाती या धर्म से होगा. इस व्यवहार से गांधी बहुत ही खिन्न हो गए. बाद में गांधी ने जब अहमदाबाद के पास अपना आश्रम बनाया तब ठक्कर बापा का पत्र लेकर एक आदमी उनके पास आया.
उस पत्र में ठक्कर बापा ने लिखा था, ''आप कहते हैं कि सभी लोग बराबर हैं और अगर आश्रम के नियमों का पालन करेंगे तो उन्हें आश्रम में रहने की जगह दी जाएगी. इसलिए मैं एक आदमी को आपके आश्रम में रहने के लिए भेज रहा हूं. वो एक दलित हैं और आपको उन्हें आश्रम में रखने पर विचार करना है.''
गांधी ठक्कर बापा को मना नहीं कर सकते थे. मना ना करने एक वजह यह भी थी कि गांधी के प्रयोग का यह पहला चरण था और गांधी देखना चाहते थे कि उन्हें क्या हासिल होता है.
जो व्यक्ति आश्रम में रहने आए उनका नाम दूदा भाई था और साथ में उनकी पत्नी दानी बेन और एक छोटी बच्ची थी. इन तीनों को गांधी ने आश्रम में जगह दी तो अहमदाबाद में हंगामा हो गया. जुलूस निकला और नारे लगे.
जो सवर्ण आश्रम को चंदा देते थे उन्होंने चंदा देना बंद कर दिया. आश्रम बंद होने की नौबत आ गई. आसपास के लोगों ने गाली देना शुरू कर दिया और दूदा भाई का जीना हराम कर दिया. लेकिन गांधी अपने फ़ैसले से टस से मस नहीं हुए.
जब गांधी को यह पता चला कि कस्तूरबा जाने-अनजाने आश्रम की अन्य महिलाओं का केंद्र बन गई हैं और दूदा भाई को आश्रम में रखने का विरोध कर रही हैं तो उन्होंने कहा कि यह नहीं होगा. कहते हैं कि उन्होंने बहुत ऊंची आवाज़ में कस्तूरबा से कहा कि वो अपना फ़ैसला नहीं बदलेंगे.
उन्होंने कस्तूरबा से यहां तक कह दिया कि अगर वो चाहें तो अपना अलग रास्ता अपना सकती हैं. इसे झगड़ा नहीं माना जाएगा लेकिन अब वो दोनों एक साथ नहीं रह सकते. यह उनका तलाक़ होगा.
यह नाराज़गी ज़ाहिर करने के बाद गांधी ने दो चीज़ें कीं. एक तो उन्होंने ईश्वर से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी कि ग़ुस्सा उनकी एक समस्या है और वो इससे कैसे निपटेंगे नहीं जानते.
दूसरा, उन्होंने अपने एक मित्र को पत्र लिखकर पूरी घटना की जानकारी दी और कहा कि यह बात एक अछूत व्यक्ति को आश्रम में रखने की वजह से हुई है और उन्होंने कस्तूरबा से कह दिया है कि अब उनके रास्ते अलग हो चुके हैं. यह बात वो सार्वजनिक करते हैं.
बाद में कुछ नहीं हुआ. दूदा भाई आश्रम में रहे और उनकी पत्नी भी रहीं. सब कुछ ठीक ठाक हो गया. जो धन बंद हो गया था वो दूसरे स्रोत से आने लगा था लेकिन गांधी दलितों को मुख्यधारा में लाने के लिए जो कुछ भी कर सकते थे उन्होंने किया. इस हद तक किया कि अगर इससे उनका परिवार प्रभावित हो जाए या उनका वैवाहिक जीवन छिन्न भिन्न हो जाए उन्हें फ़र्क नहीं पड़ता था.

Friday, January 3, 2020

क्या होगा मिडल-ईस्ट युद्ध?

ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख जनरल क़ासिम सुलेमानी की अमरीकी एयरस्ट्राइक में मौत हो गई है. सुलेमानी ईरान के लिए कितने अहम थे इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी मौत की ख़बर के आने के फ़ौरन बाद ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के राष्ट्रीय झंडे की तस्वीर ट्वीट की. वहीं ईरान में तीन दिन का शोक घोषित करते हुए देश के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई ने कहा कि 'इस हमले के अपराधियों से गंभीर बदला' लेने का इंतज़ार है.
ईरान सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा है कि कुछ घंटे के बाद देश की शीर्ष सुरक्षा एजेंसियां इस आपराधिक हमले को लेकर बैठक करेंगी. वहीं ईरान के विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ ने इसे 'अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद' क़रार देते हुए अमरीका को इसका ख़ामियाज़ा भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी है. इन सब के बीच मध्य-पूर्व में आए इस नए भूचाल के बाद वैश्विक तेल की क़ीमतों में भी चार फ़ीसदी इज़ाफ़ा हो गया. 
जनरल सुलेमानी भले ही ईरान के एक बड़े सैन्यकर्मी और उभरते हुए नेता थे, अमरीका ने उन्हें और उनकी क़ुद्स फ़ोर्स को सैकड़ों अमरीकी नागरिकों की मौत का ज़िम्मेदार क़रार देते हुए 'आतंकवादी' घोषित कर रखा था. सुलेमानी को पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को चलाने का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है. 1998 से सुलेमानी ईरान की क़ुद्स फ़ोर्स का नेतृत्व कर रहे हैं. वे ईरान की एक ख़ास शख़्सियत थे जिनकी क़ुद्स फ़ोर्स सीधे देश के सर्वोच्च नेता आयतोल्लाह अली ख़मेनेई को रिपोर्ट करती है. सुलेमानी की पहचान देश के वीर के रूप में थी. ख़मेनेई ने उन्हें 'अमर शहीद' का ख़िताब दिया है. उनकी एक बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके.
सुलेमानी के नेतृत्व में ईरान की ख़ुफ़िया, आर्थिक और राजनीतिक पटल पर भी क़ुद्स फ़ोर्स का प्रभाव रहा है.
ईरान के दक्षिण-पश्चिम प्रांत किरमान के एक ग़रीब परिवार से आने वाले सुलेमानी ने 13 साल की आयु से अपने परिवार के भरण पोषण में लग गए. अपने ख़ाली समय में वे वेटलिफ्टिंग करते और ख़ामनेई की बातें सुनते थे. 23 अक्तूबर 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी और इसकी क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था. 
सद्दाम हुसैन के साम्राज्य के पतन के बाद 2005 में इराक़ की नई सरकार के गठन के बाद से प्रधानमंत्रियों इब्राहिम अल-जाफ़री और नूरी अल-मलिकी के कार्यकाल के दौरान वहां की राजनीति में सुलेमानी का प्रभाव बढ़ता गया. उसी दौरान वहां की शिया समर्थित बद्र गुट को सरकार का हिस्सा बना दिया गया. बद्र संगठन को इराक़ में ईरान की सबसे पुरानी प्रॉक्सी फ़ोर्स कहा जाता है. 2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ा तो सुलेमानी ने इराक़ के अपने इसी प्रॉक्सी फ़ोर्स को असद सरकार की मदद करने को कहा था जबकि अमरीका बशर अल-असद की सरकार को वहां से उखाड़ फेंकना चाहता था. ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध और सऊदी अरब, यूएई और इसराइल की तरफ़ से दबाव किसी से छुपा नहीं है. और इतने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपने देश का प्रभाव बढ़ाने या यूं कहें कि बरक़रार रखने में जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका बेहद अहम थी और यही वजह थी कि वो अमरीका, सऊदी अरबऔर इसराइल की तिकड़ी की नज़रों में चढ़ गए थे. अमरीका ने तो उन्हें आतंकवादी भी घोषित कर रखा था.
सुलेमानी का क़ुद्स फ़ोर्स इरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स की विदेशी यूनिट का हिस्सा हैं. 1979 की ईरानी क्रांति के बाद उस वक़्त के ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतोल्लाह ख़ुमैनी के आदेश से रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स का गठन हुआ था. इसका मक़सद देश की इस्लामिक व्यवस्था की हिफ़ाज़त और नियमित सेना के साथ सत्ता का संतुलन बनाना था.
ईरान में शाह के पतन के बाद ईरान में नई हुकूमत आई तो सरकार को लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निज़ाम और क्रांति के मक़सद की हिफ़ाज़त कर सके. ईरान के मौलवियों ने एक नए क़ानून का मसौदा तैयार किया जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का ज़िम्मा दिया गया और रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को निज़ाम की हिफ़ाज़त का काम दिया गया.
लेकिन ज़मीन पर दोनों सेनाएं एक दूसरे के रास्ते में आती रही हैं. उदाहरण के लिए रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी मदद करती हैं और सेना, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है. माना जाता है कि रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है. ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है. इसके दम पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में अच्छी सैलेरी पर धार्मिक नौजवानों की नियुक्ति की जाती है. भले ही रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स में सैनिकों की संख्या नियमित सेना के सैनिकों की संख्या के मामले में क़रीब तीन लाख कम है लेकिन इसे ईरान की सबसे ताक़तवर फ़ौज के रूप में जाना जाता है. जनरल क़ासिम सुलेमानी का क़द ईरान के पावर- स्ट्रक्चर में बहुत बड़ा था. ईरान के सबसे ताक़तवर नेता - सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई - के बाद अगर ईरान में किसी को दूसरा सबसे ताक़तवर शख़्स समझा जाता था तो वो थे - जनरल क़ासिम सुलेमानी.
दूसरी तरफ़ सुलेमानी को अमरीका अपने सबसे बड़े दुश्मनों में से एक मानता था. अमरीका ने क़ुद्स फ़ोर्स को 25 अक्तूबर 2007 को ही आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था और इस संगठन के साथ किसी भी अमरीकी के लेनदेन किए जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया. सद्दाम हुसैन के साम्राज्य के पतन के बाद 2005 में इराक़ की नई सरकार के गठन के बाद से प्रधानमंत्रियों इब्राहिम अल-जाफ़री और नूरी अल-मलिकी के कार्यकाल के दौरान वहां की राजनीति में सुलेमानी का प्रभाव बढ़ता गया. उसी दौरान वहां की शिया समर्थित बद्र गुट को सरकार का हिस्सा बना दिया गया. बद्र संगठन को इराक़ में ईरान की सबसे पुरानी प्रॉक्सी फ़ोर्स कहा जाता है. 2011 में जब सीरिया में गृहयुद्ध छिड़ा तो सुलेमानी ने इराक़ के अपने इसी प्रॉक्सी फ़ोर्स को असद सरकार की मदद करने को कहा था जबकि अमरीका बशर अल-असद की सरकार को वहां से उखाड़ फेंकना चाहता था.
ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध और सऊदी अरब, यूएई और इसराइल की तरफ़ से दबाव किसी से छुपा नहीं है.
और इतने सारे अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच अपने देश का प्रभाव बढ़ाने या यूं कहें कि बरक़रार रखने में जनरल क़ासिम सुलेमानी की भूमिका बेहद अहम थी और यही वजह थी कि वो अमरीका, सऊदी अरब और इसराइल की तिकड़ी की नज़रों में चढ़ गए थे. अमरीका ने तो उन्हें आतंकवादी भी घोषित कर रखा था.
23 अक्तूबर 2018 को सऊदी अरब और बहरीन ने ईरान की रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को आतंकवादी और इसकी क़ुद्स फ़ोर्स के प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को आतंकवादी घोषित किया था. और इसके बाद से ही जनरल सुलेमानी अमरीका के निशाने पर थे. 3 जनवरी को जब बग़दाद एयरपोर्ट पर उनके दो कारों के काफ़िले पर ड्रोन से निशाना लगाया गया, उस वक़्त वो जिन लोगों के साथ सफ़र कर रहे थे, उनमें कताइब हिज़्बुल्लाह के नेता अबु महदी अल-मुहांदिस भी थे.
2009 से ही अमरीका ने कताइब हिज़्बुल्लाह को आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा है. उसने इसके कमांडर अबु महदी अल-मुहांदिस को वैश्विक आतंकवादी भी क़रार दिया था.
अभी अगर बात की जाए तो सीधे युद्ध की स्थिति तो नहीं लगती है, पर ईरान ने बदला लेने की बात कही है. ऐसा माना जा रहा है कि ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान कुछ कार्रवाई कर सकता है. ईरान के समर्थक लड़ाकू, जो जनरल सुलेमानी के संरक्षण में थे, वे भी बदले के लिए सक्रिय हो सकते हैं. रूस, चीन और ईरान की बढ़ती साझेदारी के लिए भी यह घटनाक्रम परीक्षा की घड़ी है. ट्रंप ने दो दिन पहले ऐसे हमले की धमकी दी थी और अब वे चुनाव में इसका राजनीतिक फ़ायदा भी उठायेंगे. ईरानी हितों के लिए यह हत्या एक बहुत बड़ा झटका है. इसका सीधा असर दुनियाँ भर में तेल के दामों पर पडेगा।

Monday, November 25, 2019

क्या अदालत राज्यपाल के फैसले को गलत ठहराएगी?

अदालतों में होने वाली बहसें कई बार सियासी दलों के असल ख़यालात से पर्दा हटाती हैं. क्योंकि वो हलफ़नामे या दूसरे दस्तावेज़ों में तो दूसरी बातें कहते हैं. मगर, हक़ीक़त में उनकी नीयत कुछ अलग ही होती है.
ये बात सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान साफ़ तौर पर दिखी. जब बीजेपी की तरफ़ से वक़ीलों ने अपना पक्ष अदालत के सामने रखा.
इस दौरान, एक तरफ़ तो, राज्यपाल, महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार की तरफ़ से वक़ीलों ने तमाम दलीलें दीं.
वहीं दूसरी तरफ़, शिवसेना और कांग्रेस के वक़ीलों ने भी अपना पक्ष सर्वोच्च अदालत के सामने प्रस्तुत किया. मैंने पिछले वाक्य में जान बूझकर एनसीपी का ज़िक्र नहीं किया. क्योंकि, सुप्रीम कोर्ट और बाक़ी लोगों की तरह ही मुझे भी इस बात का यक़ीन नहीं है कि आख़िर वो हैं किस की तरफ़.
सुनवाई शुरू होते ही ये साफ़ था कि दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट से चाहते क्या हैं. कांग्रेस और शिवसेना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट देवेंद्र फड़णवीस की अगुवाई वाली बीजेपी-एनसीपी गठबंधन सरकार को जल्द से जल्द विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहे.
वहीं, बीजेपी की ख़्वाहिश है कि सर्वोच्च न्यायालय बहुमत साबित करने के लिए उन्हें राज्यपाल के तय की हुई मियाद यानी 30 नवंबर या उससे भी आगे का वक़्त दे, तो बेहतर हो. कांग्रेस और शिवसेना चाहती हैं कि सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक के मामले में अपने रुख़ की ही तरह महाराष्ट्र में भी सरकार को अगले 24 घंटे में बहुमत साबित करने का आदेश दे. वहीं, बीजेपी ये सवाल उठा रही है कि क्या सुप्रीम कोर्ट को संविधान के तहत ये अधिकार है कि वो बहुमत परीक्षण का अंतरिम आदेश दे सके?
कांग्रेस और शिवसेना के पक्ष में पहले के कई उदाहरण मौजूद हैं. 1998 से लेकर अब तक कम से कम चार बार ऐसा हो चुका है. फिर चाहे 1998 में उत्तर प्रदेश का जगदंबिका पाल बनाम भारत सरकार का मामला हो या फिर बाद में गोवा और झारखंड के मामले हों.
सबसे हालिया मिसाल कर्नाटक की है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधानसभा का विश्वास किस दल या नेता में है, ये जानने के लिए तुरंत विधानसभा में बहुमत परीक्षण कराया जाए. ऐसे आदेशों की बुनियाद सुप्रीम कोर्ट का 1994 का एस आर बोम्मई बनाम भारत सरकार का केस है. जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार बनाने का प्रयास कर रहे एक या दूसरे दल के प्रति राज्यपालों के पक्षपात पर पूर्ण विराम लगाने की कोशिश की थी.
तब सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में साफ़ तौर से कहा था कि अगर इस बात पर ज़रा भी संशय है कि जनता ने चुनाव में किस पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दिया है, तो इसका फ़ैसला विधानसभा में बहुमत परीक्षण के माध्यम से विधानसभा के अंदर होना चाहिए. बीजेपी का तर्क ये है कि संविधान के तहत अदालत को ऐसा आदेश देने का अधिकार ही नहीं है. क्योंकि, संविधान का अनुच्छेद 212 ये कहता है कि विधानसभा की कार्यवाही को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है.
साथ ही कोई अदालत इसलिए भी ऐसा आदेश नहीं दे सकती क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 361 ये कहता है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति अपने किसी फ़ैसले के लिए अदालत के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे. इन सवालों के जवाब बेहद आसान हैं.
अनुच्छेद 212 के तहत विधानसभा की कार्यवाही को तब कोई संरक्षण नहीं मिल सकता अगर ये कार्यवाही ही असंवैधानिक हो. और, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मामले में ख़ुद ही स्पष्ट किया था, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का राज्यपाल का फ़ैसला, संविधान के इस अनुच्छेद के तहत अदालत की समीक्षा के दायरे बाहर नहीं है. इसी तरह, अनुच्छेद 361 के तहत राज्यपाल या राष्ट्रपति भले ही अपने फ़ैसले के लिए अदालत के प्रति जवाबदेह न हों. लेकिन, अदालतें इस बात की समीक्षा तो कर ही सकती हैं कि राज्यपाल का कोई फ़ैसला संविधान सम्मत है या नहीं. क्योंकि सरकार तो राज्यपाल या राष्ट्रपति के हर फ़ैसले का बचाव ही करेगी. इसलिए, उनके फ़ैसलों की समीक्षा तो अदालतों का काम है ही.
बीजेपी के तर्क ठीक वैसे ही हैं, जैसी चिंता जस्टिस के रामास्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई बनाम केंद्र सरकार के फ़ैसले में जताई थी. जब उन्होंने अदालत के बहुमत के फ़ैसले से अलग अपना विचार रखा था.
विधानसभा में बहुमत परीक्षण का आदेश देकर अदालत सिर्फ़ ये सुनिश्चित करती है कि जनता ने चुनाव के माध्यम से अपनी राय जिस भी पार्टी या नेता के पक्ष में दी है, वो संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से स्पष्ट हों. और राज्यपाल, जनादेश के साथ खिलवाड़ न कर सकें.
इस नज़रिए से देखें, तो, कर्नाटक और महाराष्ट्र के हालात में कोई ख़ास फ़र्क़ नज़र नहीं आता है. ऊपरी तौर पर देखें, तो राज्यपाल ने राज्य के सबसे बड़े दल को विधानसभा के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश देकर कुछ ग़लत नहीं किया है. लेकिन, कर्नाटक का मामला हो, या फिर महाराष्ट्र का, राज्यपाल ने ऐसा करने के लिए जो तरीक़ा अपनाया, सवाल उस पर उठे हैं. दोनों ही मामलों में संबंधित राज्यपालों ने एक पार्टी के नेता को आनन फानन में शपथ दिला दी और फिर उन्हें बहुमत साबित करने के लंबा समय दे दिया.
दोनों ही मामलों में ऐसा दिखता है कि राज्यपाल का एक ही लक्ष्य था कि उनकी पसंद की पार्टी (और जिस ने उन्हें राज्यपाल नियुक्त किया), वो उनके माध्यम से फ़ायदा उठा कर सरकार बना ले. ऐसे हालात में ये तर्क गले नहीं उतरता है कि अदालतें अपने उन नियम क़ायदों को भी लागू कराना न सुनिश्चित करें, जो ख़ुद न्यायालय ने ही दिए हैं. और इसकी जगह अदालतें ख़ामोश बैठी रहें और सिर्फ़ एक पवित्र उम्मीद जताने को ही अपना कर्तव्य मान लें.

महाराष्ट्र का सियासी भूचाल

इस समय महाराष्ट्र की राजनीति में बडा भूचाल मचा हुआ है, ये एकदम यूपी बिहार स्टाइल वाली राजनीति है शायद इसलिए ही हमारे जैसे कानून और राजनीति के स्टूडेंट को इसमें इतनी दिलचस्पी है। शुक्रवार शाम को शिवसेना के उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की बातें हुईं और  सुबह-सुबह भाजपा के देवेंद्र फणनवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते नज़र आए. और ये सब किया शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने। महाराष्ट्र की राजनीति की बिसात पर अजित पवार की इस चाल ने सबको चौंका दिया. उन लोगों को भी, जो उन्हें बेहद क़रीब से जानते हैं. शाम होते-होते राजनीति की ये बाज़ी पूरी तरह बदली हुई नज़र आई. अजित पवार को राजभवन में भाजपा की सरकार बना रहे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ लेते देखने वाले एनसीपी के कई विधायक शाम होते-होते पार्टी नेता शरद पवार के पास पहुंच गए और सत्ता के खेल के समीकरण फिर बदल गए. हिसाब लगाने वाले हिसाब लगाते रह गए कि कौन फ़ायदे में रहा और कौन नुक़सान में. लेकिन अभी के समीकरणों को देखते हुए लगता है कि सबसे बड़े लूज़र देवेंद्र फडणवीस ही रहेंगे क्योंकि शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने अपने विधायकों को अपने पास रखा है और उनके लिए बहुमत साबित करना मुश्किल होगा. दूसरे लूज़र होंगे अजित पवार. उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के साथ बग़ावत की और एनसीपी के विश्वास को ठेस पहुंचाई है. इससे उनकी साख़ को बहुत नुक़सान हुआ है. उन्हें शरद पवार के वारिस के तौर पर भी देखा जाता था. उन्होंने उनके साथ भी गद्दारी की है. देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के आशीर्वाद से मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली है लेकिन उनके कई इम्तिहान अभी बाक़ी है. ताज़ा आंकड़ें देखें जो बीजेपी के पास 105 के विधायक, निर्दलीय और छोटे दलों के 14 विधायकों को मिलाकर कुल 119 विधायक हो गए. कल सुबह अजित पवार के साथ एनसीपी के 11 विधायक गए थे. अब इनमें से छह शरद पवार के पास वापस आ गए हैं और उन्होंने कहा कि हमें तो कुछ पता ही नहीं था हमें तो अचानक पकड़ कर राजभवन ले गए. ऐसे में अजित पवार के पास अब बच गए पांच विधायक. इन पांच को अगर 119 के साथ जोड़ दें तो संख्या होती है 124 और बहुमत का आंकड़ा है 145. ऐसे में भाजपा को 20 विधायकों की जरूरत है और वह कहां से लाएगी शायद किसी को नहीं पता.
थोड़ी देर पहले नारायण राणे ने बीबीसी के साथ बातचीत में कहा कि बाजार में बहुत सारे विधायक बाकी हैं. इसका मतलब यह है कि बीजेपी यह सोच रही है कि वो बहुमत के लिए एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना के अलावा और कहां-कहां से विधायक ला सकती है.
ऐसा लग रहा है कि जैसे कर्नाटक में 'ऑपरेशन कमल' कई चरण में हुआ था, वैसे ही महाराष्ट्र मे भी 'ऑपरेशन कमल' अभी बाकी है. देवेंद्र फडणवीस आगे क्या रणनीति अपनाएंगे, इस बारे में अभी कोई अंदाज़ा लगाना मुश्किल है क्योंकि उन्होंने शपथ तो ले ली लेकिन उनके पास उतने विधायक नहीं है. फ़िलहाल कोई नहीं जानता कि फडणवीस 145 विधायक कहां से लाएंगे.
उन्हें 30 नवंबर को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना है. 
दूसरी ओर शनिवार तड़के देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ लेने के बाद कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. तीनों पार्टियों का कहना है कि राज्य में जो कुछ भी हुआ है, असंवैधानिक है. कांग्रेस ने इसे विशेष रूप से चुनौती दी है. अतीत में पिछले राज्यों में पैदा हुई ऐसी ही परिस्थितियों पर वापस नज़र डालें तो ऐसे में विधानसभा में शक्ति परीक्षण सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ है. महाराष्ट्र में शक्ति परीक्षण 30 नवंबर को होगा जिसमें अभी छह दिन-छह रातें बाकी हैं. ये रातें ही नहीं बल्कि अगली कई रातें भी महाराष्ट्र पर भारी पड़ने वाली हैं और ऐसा पिछले एक महीने से चलता रहा है. ईमानदारी से कहें तो जो कुछ हो रहा है, उसकी ठीक-ठीक जानकारी नेताओं और पत्रकारों को भी नहीं है. सारे सूत्र फ़ेल हो गए हैं.
अब बात अगर पवार फैमिली की राजनीति की करें तो एक ज़माने में अजित पवार एनसीपी के बहुत बड़े नेता हुए करते थे. जब से शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले राजनीति में आईं, तब से अजित पवार ने कई  बार अपनी नाराज़गी जताई. धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद छोटा होता गया और ऐसा शरद पवार ने जानबूझकर भी किया. चाचा-भतीजे की आपस में नहीं बनती है लेकिन कोई इस बारे में खुलकर बात नहीं करता. बात तब भी ऐसी ही अदावत की हुई जब अजित पवार के बेटे पार्थ पवार को लोकसभा की टिकट मिली और वो हार गये, जबकि शरद पवार के बडे भाई अन्ना साहब पवार के पोते रोहित पवार को विधायकी  का टिकट मिला और वो जीत गये। पार्टी में उनको तरजीह अधिक मिल रही थी। अब अजित पवार ने शपथ तो ले ली है लेकिन उनके पास सिर्फ़ पांच विधायक ही बचे हैं. ऐसे में वो एनसीपी में अलगाव पैदा करके विधायकों को अपने साथ ला पाएंगे, ये मुश्किल लगता है. देवेंद्र फडणवीस के शपथ लेने के बावजूद अगर आज महाराष्ट्र में अगर किसी के पास ताकत है तो शरद पवार के पास है. फिर चाहे वो अलग-अलग पार्टियों के साथ रिश्तों के मामले में हो या फिर संख्याबल के बारे में.
मिशन नाकाम रहा तो क्या होगा? अगले कुछ दिनों में क्या होगा, अभी इस बारे में ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता. यह भी ठीक-ठीक नहीं मालूम कि किस पार्टी के विधायक किसके संपर्क में हैं। राजनीति और क्रिकेट में कभी भी कुछ भी हो सकता है.'' यह बयान नितिन गडकरी ने कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के राजनीतिक हालात पर दिया था. उनके ये शब्द तब सच साबित हो गए जब महाराष्ट्र सहित देश की अधिकांश जनता शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को राज्य का अगला मुख्यमंत्री बनने की ख़बरें सुनते हुए सोने के लिए गई लेकिन सुबह उठी तो बीजेपी के नेता देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके थे और उनके साथ एनसीपी के प्रमुख नेता अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.
कुछ पल के लिए आम जनता ही क्या राजनीतिक जगत की हर ख़बर सूंघने का दम भरने वाले बड़े पत्रकार और कई नेता अचंभे में थे. धीरे-धीरे ख़बरें खुलने लगीं और मालूम चला कि रात ही रात में बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने की पेशकश की.
इसके बाद राज्यपाल ने प्रदेश में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की प्रक्रिया प्रारंभ की और सुबह तड़के देवेंद्र फडणवीस को राज्य की कमान सौंप दी गई. महाराष्ट्र के इतिहास में 22 नवंबर की रात हमेशा के लिए दर्ज हो गई. पूरी रात महाराष्ट्र की सत्ता की चाभी एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन में किस तरह निकली या निकाली गई, यह अपने-आप में बेहद दिलचस्प है.
मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक ये पूरा खेल 22 नवंबर को देर शाम शुरू हुआ जब एनसीपी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार करीब 54 विधायकों के हस्ताक्षर वाली चिट्ठी लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पास पहुंचे. इसके बाद देर रात देवेंद्र फडणवीस ने राज्यपाल से मुलाक़ात की और सरकार बनाने का दावा पेश किया. उन्होंने अपने साथ एनसीपी के विधायकों के समर्थन की बात बताई.
इसके बाद मामला पूरी तरह राजधानी दिल्ली शिफ्ट हो गया. राज्यपाल कोश्यारी ने केंद्र को इस पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया, इसके बाद राष्ट्रपति भवन तक जानकारी भेजी गई. शनिवार यानी 23 नवंबर की सुबह 5.47 मिनट पर केंद्र ने महाराष्ट्र में जारी राष्ट्रपति शासन को हटाने की बात कही. महाराष्ट्र में राज्यपाल ने 12 नवंबर को राष्ट्रपति शासन लगा दिया था.
राष्ट्रपति शासन हटते ही महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया और फिर सुबह करीब 7.30 बजे देवेंद्र फडणवीस ने राजभवन में शपथ ग्रहण कर ली. जिस तरह से बीजेपी ने अजित पवार के समर्थन से रात ही रात में सरकार बनाई उसे विपक्षी दल असंवैधानिक बता रहे हैं. समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस मामले पर अपनी मंजूरी पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए लिखा, ''संविधान के आर्टिकल 356 के खण्ड दो में दिए गए अधिकारों के तहत, मैं राम नाथ कोविंद, भारत का राष्ट्रपति, मेरे द्वारा 12 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र में लगाए गए राष्ट्रपति शासन को, 23 नवंबर 2019 को हटाए जाने का आदेश देता हूं.''
अगर संविधान के नियमों के हिसाब से देखें तो इसमें कुछ भी ग़लत नहीं हुआ है, लेकिन नैतिकता के आधार पर यह कोई अच्छा उदाहरण नहीं है. राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं, उन्हें अगर लगता है कि कोई दल सरकार बनाने के लिए बहुमत साबित कर सकता है तो वह उसे निमंत्रण भेज सकते हैं. लेकिन बीजेपी पहले ही राज्यपाल के सामने सरकार ना बनाने की बात कह चुकी थी ऐसे में उन्हें दोबारा सरकार बनाने का मौका देना नैतिकता के आधार पर सही नहीं है. महाराष्ट्र में 12 नवंबर से राष्ट्रपति शासन जारी था. 23 नवंबर की रात इसे हटाया गया और उसके बाद सरकार का गठन हुआ.
सवाल उठाया जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी की ज़रूरत होती है, ऐसे में रात भर में कैबिनेट की मंजूरी कैसे ली गई?
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि यह 'एलोकेशन ऑफ़ बिज़नेस रूल्स' के रूल नंबर 12 के तहत लिया गया फ़ैसला है और वैधानिक नज़रिए से बिल्कुल ठीक है.
रूल नंबर 12 कहता है कि प्रधानमंत्री को अधिकार है कि वे एक्सट्रीम अर्जेंसी (अत्यावश्यक) और अनफ़ोरसीन कंटिजेंसी (ऐसी संकट की अवस्था जिसकी कल्पना न की जा सके) में अपने-आप निर्णय ले सकते हैं. संविधान में यह बताया गया है कि जब भी राष्ट्रपति कोई निर्णय लेते हैं तो वह इसके लिए कैबिनेट की मंजूरी लेते हैं. अब इस मामले में कैबिनेट की बैठक कब हुई यह साफ़ नहीं है. फिर भी नियमों के अनुसार अगर प्रधानमंत्री अकेले भी राष्ट्रपति के फै़सले पर मंजूरी देते हैं तो वह भी कैबिनेट की ही मंजूरी मानी जाती है.'
इस बीच एक बार फिर संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल की भूमिका सवालों के घेरे आ गई है. सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर उन्होंने एनसीपी के किन विधायकों के समर्थन की चिट्ठी प्राप्त की और अगर उनके पास देवेंद्र फडणवीस सरकार बनाने के लिए आए भी तो उन्होंने सुबह तक का इंतज़ार क्यों नहीं किया? कांग्रेस ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर अमित शाह के हित के लिए काम करने का आरोप लगाया. यह बातें निश्चित तौर पर राज्यपाल पर सवाल उठाने का काम करती हैं. उन्हें देवेंद्र फडणवीस से पूछना चाहिए था कि सरकार बनाने के लिए जो विधायक उनके साथ हैं उनके सिर्फ हस्ताक्षर ही नहीं चाहिए वो खुद भी राजभवन में मौजूद होने चाहिए. 
ख़ैर फडणवीस के शपथ ग्रहण का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शिव सेना ने देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के शपथ ग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका दायर की. अब देश की सर्वोच्च अदालत ही यह फ़ैसला करेगी कि रात में बनी इस सरकार में कितने नियमों को ताक रखा गया.
अब चर्चा में है दल बदल कानून। आइए हम आपको समझाते हैं इस कानून के बारे में। दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके. 1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था. उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा ख़ूब प्रचलित था. दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद आया राम गया राम प्रचलित हो गया.
लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई. संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वें संशोधन था. इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.
कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
3. अगर कोई सदस्य पार्टी ह्विप के बावजूद वोट नहीं करता.
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.
लेकिन इसमें अपवाद भी है......
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी. वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया. इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया. विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी. ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.
तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून:
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा. पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवेधानिक क़रार दे दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.
एनसीपी के 54 विधायक हैं, अगर अजित पवार 36 विधायकों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो दल-बदल क़ानून उन पर लागू नहीं होगा। अगर वो इतने नंबर नहीं ला पाते, तो उनकी सदस्यता जा सकती है.
अब मुझे कुछ और संदेह है कि इसमें एक बहुत बारीक चीज आप लोगों ने देखी हो तो ये कि अजीत पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन ये भी कह रहे हैं कि हम एनसीपी में हैं और हमारे नेता भी शरद पवार हैं। एनसीपी ने अपना विधायक दल का नेता तो बदला लेकिन कानूनी तौर पर इसके बदलने का क्या प्रावधान है नहीं पता। क्या अजीत पवार का रोल नहीं है उसमें? एनसीपी ने अभी तक आधिकारिक तौर पर अपना चीफ व्हिप किसी को नहीं बनाया है तो हो सकता है कि राज्यपाल या सुप्रीम कोर्ट व्हिप जारी करने का अधिकार अजीत पवार को दे दें? और याद रहे कि वो पार्टी के महासचिव भी हैं।
और फ्लोर टेस्ट के दिन अजीत पवार बीजेपी के समर्थन में व्हिप जारी कर दें और एनसीपी विधायक विरोध में अपना वोट दे दें तो उनकी सदस्यता चली जाए। और बहुमत का आकडा ही खिसक कर 215/20 तक आ जाए? आप बीजेपी की खामोशी और आज उसके मुम्बई अध्यक्ष आशीष सेलार के बयान (अभी भी संवैधानिक तौर पर एनसीपी के विधायक दल के नेता अजीत पवार ही हैं,) से अनुमान लगा सकते हैं कि उनकी रणनीति क्या हो सकती है।
एक दोस्त ने इसके जवाब में बताया कि महाराष्ट्र में एनसीपी विधानमंडल दल के नेता को लेकर तमाम मित्रों में संदेह है, विधानमंडल दल का नेता चुनने का अधिकार विधायकों (या बहुमत से विधायकों को) को है उन्होंने पहले अजित पवार को चुना लेकिन अगले दिन 41 विधायकों ने जयंत पाटिल को विधानमंडल दल का नेता चुन लिया। जो विधानमंडल दल का नेता होगा उसे व्हिप चुनने का अधिकार है अगर वो ऐसा नहीं करता है तो व्हिप की पावर विधानमंडल दल के नेता के पास ही रहेगी। यहां तक की अगर कल फिर एनसीपी अपना विधानमंडल दल का नेता बदलना चाहती है तो विधायक बहुमत से ऐसा फिर कर सकते हैं और स्पीकर से लेकर राज्यपाल दोनों के पास ये अधिकार नहीं है कि विधायकों के चुने हुए नेता के चुनाव को खारिज कर दे। बस इस परिवर्तन की सूचना पार्टी को राज्यपाल को देनी होती है जो जयंत पाटिल राजभवन जाकर दे चुके हैं और एहतियातन कल सभी विधायकों का साइन किया हुआ एफिडेविट भी सुप्रीम कोर्ट में जमा करेगी।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...