Thursday, April 30, 2015

"मजदूर" की बात करने पर हमें शर्म क्यो आती है?

क्योंकि मैं कार्ल मार्क्स को बहुत पढता रहा हूँ, और उनकी विचारधारा (गैरराजनीतिक) पर काफी विश्वास भी करता हूँपूरे विश्व में प्रतिवर्ष 1 मई का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रम दिवस’ अथवा ‘मजदूर दिवस’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘मई दिवस’ भी कहा जाता है। मई दिवस समाज के उस वर्ग के नाम किया गया है, जिसके कंधों पर सही मायनों में विश्व की उन्नति का दारोमदार है। इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति एवं राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का प्रमुख भार इसी वर्ग के कंधों पर होता है। यह मजदूर वर्ग ही है, जो हाड़-तोड़ मेहनत के बलबूते पर राष्ट्र के प्रगति चक्र को तेजी से घुमाता है लेकिन कर्म को ही पूजा समझने वाला श्रमिक वर्ग श्रम कल्याण सुविधाओं के लिए आज भी तरस रहा है। मई दिवस के अवसर पर देशभर में बड़ी-बड़ी सभाएं होती हैं, बड़े-बड़े सेमीनार आयोजित किए जाते हैं, जिनमें मजदूरों के हितों की बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं और ढ़ेर सारे लुभावने वायदे किए जाते हैं, जिन्हें सुनकर एक बार तो यही लगता है कि मजदूरों के लिए अब कोई समस्या ही बाकी नहीं रहेगी। लोग इन खोखली घोषणाओं पर तालियां पीटकर अपने घर लौट जाते हैं किन्तु अगले ही दिन मजदूरों को पुनः उसी माहौल से रूबरू होना पड़ता है, फिर वही शोषण, अपमान व जिल्लत भरा तथा गुलामी जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। 
बहुत से स्थानों पर तो ‘मजदूर दिवस’ पर भी मजदूरों को ‘कौल्हू के बैल’ की भांति काम करते देखा जा सकता है यानी जो दिन पूरी तरह से उन्हीं के नाम कर दिया गया है, उस दिन भी उन्हें दो पल का चैन नहीं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर मनाया किसके लिए जाता है ‘मजदूर दिवस’? बेचारे मजदूरों की तो इस दिन भी काम करने के पीछे यही मजबूरी होती है कि यदि वे एक दिन भी काम नहीं करेंगे तो उनके घरों में चूल्हा कैसे जलेगा। बहुत से कारखानों के मालिक उनकी इन्हीं मजबूरियों का फायदा उठाकर उनका खून चूसते हैं और बदले में उनके श्रम का वाजिब दाम तक उन्हें उपलब्ध नहीं कराया जाता। विड़म्बना ही है कि देश की स्वाधीनता के छह दशक बाद भी अनेक श्रम कानूनों को अस्तित्व में लाने के बावजूद हम आज तक ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं कर पाए हैं, जो मजदूरों को उनके श्रम का उचित मूल्य दिला सके। भले ही इस संबंध में कुछ कानून बने हैं पर वे सिर्फ ढ़ोल का पोल ही साबित हुए हैं। हालांकि इस संबंध में एक सच यह भी है कि अधिकांश मजदूर या तो अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ होते हैं या फिर वे अपने अधिकारों के लिए इस वजह से आवाज नहीं उठा पाते कि कहीं इससे नाराज होकर उनका मालिक उन्हें काम से ही निकाल दे और उनके परिवार के समक्ष भूखे मरने की नौबत आ जाए।
देश में हर वर्ष श्रमिकों को उनके श्रम के वाजिब मूल्य, उनकी सुविधाओं आदि के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करने की परम्परा सी बन चुकी है। समय-समय पर मजदूरों के लिए नए सिरे से मापदंड निर्धारित किए जाते हैं लेकिन इनको क्रियान्वित करने की फुर्सत ही किसे है? यूं तो मजदूरों की समस्याओं को देखने, समझने और उन्हें दूर करने के लिए श्रम मंत्रालय भी अस्तित्व में है किन्तु श्रम मंत्रालय की भूमिका भी संतोषजनक नहीं रही। कितनी हैरत की बात है कि एक ओर तो सरकार द्वारा सरकारी अथवा गैर-सरकारी किसी भी क्षेत्र में काम करने पर मजदूरों को मिलने वाली न्यूनतम मजदूरी तय करने की घोषणाएं जोर-शोर से की जाती हैं, वहीं देशभर में करीब 36 करोड़ श्रमिकों में से 34 करोड़ से अधिक को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पा रही। यह अफसोस का ही विषय है कि निरन्तर महंगाई बढ़ने के बावजूद आजादी के 61 साल बाद भी मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी ‘गुजारे लायक’ भी नहीं हो पाई है। देश का शायद ही ऐसा कोई हिस्सा हो, जहां मजदूरों का खुलेआम शोषण न होता हो। आज भी स्वतंत्र भारत में बंधुआ मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद है। कोई ऐसे मजदूरों से पूछकर देखे कि उनके लिए देश की आजादी के क्या मायने हैं? जिन्हें अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का ही अधिकार न हो, जो दिनभर की हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी अपने परिवार का पेट भरने में सक्षम न हो पाते हों, उनके लिए क्या आजादी और क्या गुलामी? सबसे बदतर स्थिति तो बाल एवं महिला श्रमिकों की है। बच्चों व महिला श्रमिकों का आर्थिक रूप से तो शोषण होता ही है, उनका शारीरिक रूप से भी जमकर शोषण किया जाता है लेकिन अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए चुपचाप सब कुछ सहते रहना इन बेचारों की जैसे नियति ही बन जाती है!जहां तक मजदूरों द्वारा अपने अधिकारों की मांग का सवाल है तो मजदूरों के संगठित क्षेत्र द्वारा ऐसी मांगों पर उन्हें अक्सर कारखानों के मालिकों की मनमानी और तालाबंदी का शिकार होना पड़ता है और सरकार कारखानों के मालिकों के मनमाने रवैये पर कभी भी कोई लगाम लगाने की चेष्टा इसलिए नहीं करती क्योंकि चुनाव का दौर गुजरने के बाद उसे मजदूरों से तो कुछ मिलने वाला होता नहीं, हां, चुनाव फंड के नाम पर सब राजनीतिक दलों को मोटी-मोटी थैलियां कारखानों के इन्हीं मालिकों से ही मिलनी होती हैं।
जहां तक मजदूर संगठनों के नेताओं द्वारा मजदूरों के हित में आवाज उठाने की बात है तो आज के दौर में अधिकांश ट्रेड यूनियनों के नेता भी भ्रष्ट राजनीतिक तंत्र का हिस्सा बने हैं, जो विभिन्न मंचों पर श्रमिकों के हितों के नाम पर गला फाड़ते नजर आते हैं लेकिन अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु कारखानों के मालिकों से सांठगांठ कर अपने ही मजदूर भाईयों के हितों पर कुल्हाड़ी चलाने में संकोच नहीं करते। देश में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के फैलते जाल से भारतीय उद्योगों के अस्तित्व पर वैसे ही संकट मंडरा रहा है और ऐसे में मजदूरों के लिए रोजी-रोटी की तलाश का संकट और भी विकराल होता जा रहा है।

कल रात को लाइब्रेरी में कार्ल मार्क्स की हिन्दुस्तान में अहमियत को लेकर रिसर्च करते समय एक पुराने अखबार में किसी पाठक की कविता पढी थी. फिर कैमरे में कैद करके घर ले आया और अब उसकी चन्द पंक्तियाँ आपको भी सुनाना चाहता हूँ.....

वह आता है 
सड़कों पर ठेले में 
बोरियां लादे
भरी दोपहर और तेज धूप में 
पसीने से तर -बतर 
जलती है देह 
ठेले पर नहीं है पानी से भरी
कोई बोतल .....
वह आता है
 कमर झुकाए
कोयले की खदानों से
बीस मंजिला इमारत में 
चढ़ता है बेधड़क
गटर साफ़ करने झुका 
वह मजदूर ...
वह दिन भर 
धूप में झुलसेगा
एक पाव दाल 
एक पाव चावल
एक किलो आटा 
एक बोतल मिटटी के तेल की खातिर
काला पड़ गया है बदन 
फटी एड़ियाँ
खुरदरे  हाथ 
बोझ से दबा हुआ 
धड़ है जैसे सर विहीन ....
वह सृजनकर्ता है  
दुख सहके भी सुख बांटता
भूख को पटकनी देता
वह हमारी खातिर तपता है
दसवीं मंजिल से गिरता है
वह भारत का मजदूर   ...
वह भारत का मजदूर   ...
"मजदूर" एक ऐसा शब्द है जिसपर हमारा पढ़ा लिखा समाज बात करने से डरता है, बड़ा घिन सा लगता है उसके बारे में सोंचकर।  जबकि हम जहाँ रहते हैं, जो खाते हैं, जो पीते हैं, जिसपर बड़े बड़े लोगों के ऐश किए जाते हैं उसमें मजदूर की ही मेहनत छुपी होती है।  अगर मैं फ़ेसबुक पर एक मजदूर की फोटो डाल दूं तो लोग लाइक करना तो दूर मुझसे घिन करने लगेगे। आखिर क्यों? हममे से कितने ऐसे लोग हैं, जिनके पूर्वज( पिताजी, उनके पिता जी या उनके पिताजी) ने कभी मजदूरी नहीं की होगी। अगर अपने भी खेतों में काम कर रहे हैं तो भी वो छोटे खेतिहर मजदूर माने जाते हैं।  25-30 बीघे के जोतिहार जमींदार टाइप लोग अपने को इस लाइन से अलग कर सकते हैं।  हमारे आस पास भी मजदूर रहते होंगे, उनके किए कार्यों पर अपना मतलब तो निकाल लेते हैं, लेकिन ओफ़िस या कॉलेज पहुंचते ही ऐसे बातें करते हैं जैसे मजदूर शब्द या मिट्टी से एलर्जी हो?  

Thursday, April 16, 2015

जनता दल, परिवार या दिल मिले?

दुश्मन के दुश्मन पहले दोस्त बने, अब परिवार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वही जनता परिवार जिसकी नींव 1977 में पड़ी और जो 1988 में वी।पी। सिंह के समय तक साथ था। यह परिवार जब मजबूत हुआ तो टूट गया। इससे निकले अलग-अलग दल अब कमजोर हुए हैं, तो 25 साल बाद फिर हाथ मिलाने की कोशिशें हो रही हैं। सपा, राजद, जेडीयू, जेडीएस, आईएनएलडी और एसजेपी को मिलाकर आज इसका विलय भी हो गया। भले ही इसका नाम और चुनाव चिन्ह नहीं बताया गया है लेकिन इसके नेता का नाम तय कर दिया गया है। उम्मीद यह लगाई जा रही है कि इसका नाम समाजवादी जनता परिवार या समाजवादी जनता दल होगा। इसका चुनाव चिन्ह भी साइकिल ही रहेगा। तो इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं क़ि सपा ही मजबूत हो रही है। लेकिन फिर भी सपा के नेता ही कुछ परेशना दिख रहे हैं। कुछ बड़े नेता जो राज्य सभा में हैं या तैयारी कर रहे हैं, उन्हें अपने भविष्य को लेकर कुछ चिंता है, तभी हो परेशान हैं। वैसे मुलायम सिंह और अखिलेश के आगे ये सब मान जाएंगे।
इसकी जरूरत क्यों पड़ी इसके लिए हमें जनता परिवार नहीं भाजपा की तरफ नजर डालनी पड़ेगी। दिसंबर 2013 से भाजपा का हर चुनाव में अच्छा प्रदर्शन रहा। उसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता कायम रखी। लोकसभा चुनाव जीता। फिर महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाई। सिर्फ दिल्ली का चुनाव वह हार गई। लालू-नीतीश-मुलायम को विलय की जरूरत इसलिए महसूस हुई, क्योंकि बिहार में इसी साल और यूपी में 2017 में चुनाव हैं। ये दल मिलकर मोदी लहर को वहां बेअसर करना चाहते हैं। विपक्ष में रहकर ये लोग अपनी ताकत सड़क से लेकर संसद तक दिखाना चाहते हैं। जनता परिवार के इन दलों का असर 5 राज्यों में हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में ये सत्ता में हैं। लोकसभा में 15 और राज्यसभा में इनके 30 सांसद हैं। इन दलों के पास कुल 424 विधायक हैं। विलय हुआ तो यह देश में तीसरी बड़ी संख्या होगी। देश भर में भाजपा के 1029 विधायक और कांग्रेस के 941 विधायक हैं।

दल           राज्य      लोकसभा            राज्यसभा                       विधानसभा

SP        उत्तर प्रदेश    5                        15                             232/403

RJD       बिहार         4                        1                                24/243

JDU        बिहार         2                        12                              110/243

INLD      हरियाणा      2                        1                                 18/77

JDS       कर्नाटक       2                         1                                  40/225


जनता परिवार के इन पांच प्रमुख दलों के 30 राज्यसभा सदस्य बड़ी ताकत हैं। ये सांसद अगर राज्यसभा में तृणमूल के 12, वाम मोर्चे के 11 और बीजद के 7 सदस्यों से हाथ मिला लें तो इनकी संख्या 60 हो जाती है। ये राज्यसभा में कोई भी बिल रोक सकते हैं। इसी तरह बिहार में लालू-नीतीश साथ चुनाव लड़े तो फायदा होगा। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी सपा की अगुआई में ये दल कास्ट वोटरों के बीच पकड़ बना सकेंगे। जिस तरह से ये दलों में अभी तक टूट होती रही है इससे आप कह सकते हैं, कि क्या भरोसा क़ि इनमें फिर से एकता ज्यादा दिन तक रहेगी? लेकिन अगर देखा जाए तो इसबार परिस्थितियाँ कुछ और ही हैं। फिलहाल तो लोकसभा के चुनाव आस पास नहीं हैं। इनमें टूट तभी होगी जब इनमे देश की सत्ता की बात आएगी। ये विपक्ष की भूमिका जबरजस्त तरीके से निभाएंगे और ऐसा हमेशा से हुआ है। रही बात सत्ता कि तो फिलहाल इनको अपने अपने राज्यों में अपनी अपनी सत्ता बचाना या लाना है। एक राज्य में दो दल हैं ही नहीं। सबके अपने अपने राज्य हैं। बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद एक दूसरे के विरोधी थे, लेकिन लालू प्रसाद ने उनको स्वीकार कर लिया है। लालू नीतीश के लिए बिहार केवल एक चोटी सी शर्त पर छोड़ देंगे, वो है उनके बेटे और बेटी को राजनीति में जगह देना। बाकी कार्यों में दखल ना देने की बात ये कह चुके हैं। इन सब पार्टियों में एक दो सांसद बहुत अच्छा बोलने वाले हैं, जो मिलकर संसद में अच्छा कार्य करेगे, अगर ये लोग अच्छे से मिलकर अरविन्द केजरीवाल की तरह विपक्ष की भूमिका निभाएंगे, तो सरकार की छवि 2019  तक कमजोर कर देगे। राजनीति में हार जीत ही सबकुछ नहीं होता है भारतीय राजनीति में यह अपने आप में एक बड़ी घटना है। भले ही मोदी के डर से लेकिन कुछ तो ऐसा हुआ है जो सभी विरोधी एक हो गए हैं। आप इन समाजवादियों के कार्यों या नीतियों की कुछ दिन तक तो आलोचना कर सकते हो, लेकिन इनके पिछले योगदान भारतीय राजनीति और समानता के सिद्धांत में बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए इनकी बहुत जरूरत है इस देश में। विपक्ष में कांग्रेस और सत्ता में कांग्रेस की राजनीतिक और आर्थिक नीतियाँ एक जैसी ही हैं, इसलिए इनकी लेफ्ट की तरह एक वैचारिक जरूरत है। इनसे जो गलतियाँ हुई हैं, उन्हे दूर करेगे और आगे कुछ सुधार करेगे। इनके पास अनुभव के साथ साथ, युवाओं में अखिलेश, डिम्पल, तेजस्वी, दुष्यंत जैसे लोग हैं। सेकुलरिज्म के लिहाज से भी इनकी बहुत जरूरत है इस देश में देखते हैं ये आगे कैसी भूमिका निभाएगे।

Friday, April 3, 2015

मोदी जी को कमलेश कुमार का पत्र

आदरणीय
नरेन्द्र भाई दामोदरदास मोदी जी,

विषय: किसानो से मन की बात पर प्रतिक्रियात्मक पत्र।

प्रधानमंत्री जी, नमस्कार,
आशा है कि आपके हाल-चाल कुशल मंगल होंगे। बहुत दिन हुए आपको पत्र लिखे (शायद जुलाई में साम्प्रदायिकता पर लिखा था) पता नहीं आपने पढ़ा भी होगा या नहीं? लेकिन आपके भक्तों ने बहुत गालियों से जवाब दिया था मुझे। आज भी मैं अपने तीन अहम मुद्दों में से एक किसानों की व्यथा पर लिख रहा हूँ। (मैं हमेशा स्त्रीकिसान और अल्पसंख्यक: अल्पसंख्यक शब्द कर प्रयोग किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि हर दबे तबके, धर्म, जाति के लिए है, मुम्बई में यूपी-बिहार के लोंगों के लिए भी
आपने अभी कुछ दिन पहले  रेडियो पर मन की बात किसानों के साथ संवाद स्थापित करके की। मैं उस दिन मुम्बई से कानपुर जाने के लिए सुरेश प्रभु की अव्यवस्थित ट्रेन में सफर कर रहा था। एक दिन बाद सुना लेकिन उसपर कुछ टिप्पणी नहीं कर पाया। आज व्यस्तता से समय निकालकर, पार्लियामेंट की बहस सुनकर, आपका मेनिफेस्टो पढ़कर और स्वामी नाथन की रिपोर्ट पढ़कर पत्र लिखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। आपकी बात सुनकर तो सबको बहुत अच्छा लगा, लेकिन मुझे लगा कि आपने मन की बात की लेकिन अपने मन की बात। किसानों के मन की बात नहींइसे हम "मन मुताबिक बात" भी कह सकते हैं।
आज मैं शुरुआत यूपी, बिहार, पंजाब नहीं महाराष्ट्र से शुरु करना चाहूंगा। यहाँ जबरजस्त सूखे की शुरुआत हो चुकी है। मैने कल ही इंडीयन एक्सप्रेस में शालिनी सिंह की एक बड़ी सी रिपोर्ट देखी। जिसमें मराठवाडा, नागपुर,  जैसे कई ज़िलों में अभी से सूखा शुरु हो गया है। उसपर तो आप कुछ नहीं बोले, माफ करिएगा अब आप राज्य सरकार को दोषी नहीं कह सकते क्योंकि राज्य सरकार  भी आपकी ही है। मैं सूखे के लिए आपको दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ लेकिन सूखे से होने वाली समस्याओं से तो आपकी सरकार को ही निपटना है। एक गाँव का दृश्य मैने देखा एबीपी न्यूज पर जबरजस्त संकट में हैं लोग। एक गाँव है, जालना। पूरे गाँव में एक ही टैंकर पानी आता है वो भी रात को 8 बजे से 1 बजे तक कभी भी। लोग अपनी नींद, बच्चे, परिवार छोड़कर बैठे रहते हैं पानी की आस में। आते ही लोग ऐसे भागते हैं कि  जहां से पानी लेना बहुत मुस्किल होता है। औरतें और बूढ़े तो उसमें चोंट भी खा बैठते हैं। नहाने को तो दूर उनको पीने का पानी भी ना मिले जिस दिन टैंकर ना आए।
वहां के युवा मुम्बई, पूना जैसे शहरों में रोजी रोटी के लिए पलायन कर गए हैं। मै पत्र की लंबाई को देखते हुए एक ही घटना लिखूंगा, लेकिन ये हाल तो पूरे के पूरे 10-12 ज़िले या तालुका का है। 

दूसरी बात आपको याद दिलाता हूँ," बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार, अबकी बार आपकी सरकार।(आपकी मतलब आपकी, अरविन्द वाली आपकी नहीं, असल में हमारे यहाँ सम्मनित लोगों का नाम बहुत जरूरत पड़ने पर ही लेते हैं) लेकिन हो क्या रहा है जब से आपकी सरकार आई है, तब से 6000 से भी अधिक किसानों ने आत्म हत्या कर ली, उन 6000 में से लगभग 1400 तो केवल महाराष्ट्र से हैं। आप कब जागेंगे
किसानों के अच्छे दिन कब आएंगे? क्या इसे भी 15 लाख हर गरीब को मिलेगा वाले जुमले जैसे मान लूं

आप नेपाल, श्रीलंका, मॉरिसस में हजारों करोड़ रुपए का दान करके आ रहे हैं. वोडाफोन जैसी कम्पनियों का 10 हजार करोड़ का टैक्स माफ कर देते हैं, लेकिन किसान कर्ज़ के लिए बैंको के चक्कर काटता फिरे? कितने किसानो को कर्ज़ माफी की सौगात मिल गई? 




खैर, अब आपको तीसरी बात यूपी की बताता हूँ जबरजस्त बारिस-ओले पड़ने से उत्तर भारत में पूरी की पूरी फसल खत्म हो गई। नहीं खत्म हुई तो लगत निकलना भी मुस्किल है।  गेंहू 4-5 कुंतल प्रति बीघा हो जाए तो बहुत होगा,  जो एवरेज उपज से आधे से भी कम है। इतने में तो हमारी लागत भी नहीं निकलेगी। आलू के  हाल तो ऐसे हो गए हैं, कि कोई पूंछ नहीं रहा है। 7-8 रुपए मे अगर किसानों की आलू बिक जाए तो बहुत होगा। जबकि मुम्बई जैसे शहर में 28-30 रुपए प्रति किलो है। यह अंतर कैसे है? उसके अपने अलग कारण होंगे, लेकिन आपको कोशिश करनी चाहिए क़ि अधिकतम लाभ किसानों को मिल सके। आप बातें तो बड़ी बड़ी कर गए, लेकिन यूपी को दे क्या रहे हैं? मुवबजा तो सबसे बाद में यूपी को ही मिल  रहा है, अगर यह राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है तो आपको अखिलेश सरकार पर दबाव डालना चाहिए। आपने ही टीम इंडिया बनाकर काम करने की बात की थी। आपका घोषणापत्र (मेनिफेस्टो) मैने पूरा पढ़ा है, उसमेआपने वादा किया था क़ि किसानों को लागत मूल्य का 50 फीसदी मुनाफा सरकार की जिम्मेदारी होगी। अर्थात अगर किसी ने 5000/- लागत लगाई है, तो उसकी फसल की कीमत 75000/- तो कम से कम दी जाएगी। अगर बाजार भाव उपर जाता है, तो मुनाफा और भी बढेगा वो सीधा किसान को मिलेगा। इस वादे का क्या हुआ? यह बात तो स्वामी नाथन की रिपोर्ट में सबसे प्रमुख है, जिसे लागू करने में आपकी सरकार डर रही है। 
आपने लैंड एक्विजिशन पर जो किया उसके बारे में कुछ ना ही बोंलूं तो ठीक है। 2013 में कानून बना था, उसे पास करने वाली स्टैइंडिग कमेटी की अध्यक्ष आज की आपकी लोकसभा स्पीकर सुमित्रा जी थी, तब राजनाथ और सुषमा स्वराज ने लंबे लंबे भाषण दिए थे इस बिल के समर्थन में। आज क्या हुआ क़ि वही बिल लागू भी नहीं किया और नया कानून बना दिया। इसमें तो मुझे अंबानी-अड़ानी जैसे कॉर्पोरेट्स का डर लग रहा है। आप बिना लागू किए किसी कानून को नकारा बता रहे हैं, जबकि वो आपकी सहमति से बना था। आपकी पार्टी के सदस्य उस कमेटी में थे, जिसने इस कानून को पास किया। क्या आपको सुमित्रा महाजन पर विश्वास नहीं हैं? वो ही तो इसकी प्रमुख थी। आप देश को अंग्रेजो जैसा कानून कैसे दे सकते हैं? किसान की जमीन ली जाएगी, उसकी अनुमति भी नहीं होगी, उसका भाव आप तय करेगे, उसपर केश भी आप नहीं करने देंगे, आखिर किसान के गले की फांसी का फंदा आप क्यों तैयार कर रहे हो? उपर से आपका पीपीपी मॉडल उस पर हावी है, अभी तक सरकारी काम के लिए जमीन ली जाती थी, आज कोई भी प्राइवेट कम्पनी भी सरकार से ओर्डर लेकर किसान  की भूमि का अधिग्रहण कर सकती है। आपने रेडियो पर सरसर गलत बोला कि प्राइवेट सेक्टर के लिए किसान की अनुमति ली जाएगी। मैने सभी संसोधन पिछले कानून से कम्पेयर करके देखे हैं, इसबार ऐसा कोई प्रावधान अभी तक तो नहीं है। हर किसान ने कानून तो नहीं पढ़ा है, उसे जैसे बताओंगे वैसा ही समझेगा। खैर, बाकी की कमिया आप अपने ही सांसदों(जो ग्रामीण क्षेत्रों से चुनकर आए हों, कॉर्पोरेट्स समर्थकों से नहीं) से बंद कमरे में पूछेगे, तो मिल जाएंगी। अगर इस बिल पर ही ज्यादा व्याख्यित करके लिखूंगा, तो समय अधिक लगेगा। 
उम्मीद है, आप लोकतंत्र की गाड़ी को चलने के लिए आलोचना रूपी डीजल को स्वीकारते रहेगे, जो फ्री में यहीं पर मिलता है, इराक से नहीं। क्योंकि आप ही कई बार कह चुके हैं क़ि हमें आलोचना स्वीकार करने की क्षमता में बृद्धि करनी चाहिए। इसी से गलती सुधारी जाती है। वैसे एक बात कहूँ  आज मैने निडर होकर लिखा क्योंकि आई टी एक्ट की धारा 66 सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दी है, जिससे बहुत आज़ाद महसूस कर रहा हूँ। अब तो आपकी सरकार का डर खत्म हुआ है, कि सरकार के खिलाफ ज्यादा लिखने पर मुझे जेल में डाला जा सकता है।  इसी का फायदा कल लोगों ने उठाया फेकू दिवस मानकर, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। कसम से मैने एक भी  जोक लाइक नहीं किया जो आप पर बना हो। चलिए माफ कर दो बच्चों को सार्वजनिक जीवन में थोड़ा सा हंसी मजाक चलता है, यह भी आपने ही एक बार पार्लियामेंट में कहा था। 
आपके उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी उम्र की कामना करता हूँ, क्योंकि आपकी बहुत जरूरत है, इस देश की राजनीति को। आपसे मैं किसी मुद्दे पर सहमत/ असहमत तो हो सकता हूँ, लेकिन एक वैचारिक राजनीति की शुरुआत जो आपने की है उसकी निरंतरता भी बहुत जरूरी है, जो फिलहाल कम ही नेताओं में है।  उम्मीद है, आप अच्छा ही करेगे, अगर कुछ गलतियाँ हो रही होंगी तो उनको सही करेगे। अब किसानो के मन की बात करेगे। करेगे? सच में?



धन्यवाद!

आपका शुभेच्छु,

कमलेश कुमार राठोड़
(पिछड़े हुए उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गंगा किनारे बसे गाँव के बूढ़े गरीब किसान का संघर्षरत पुत्र)

(नोट: माँ गंगा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि माँ गंगा से आपका और आपकी पार्टी का बहुत लगाव  हो सकता है, आपको हमारे यहाँ की भी गंगा माँ कभी बुला लें और हमारा भी उद्धार हो जाए, बनारस के जैसे।

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...