Friday, April 3, 2015

मोदी जी को कमलेश कुमार का पत्र

आदरणीय
नरेन्द्र भाई दामोदरदास मोदी जी,

विषय: किसानो से मन की बात पर प्रतिक्रियात्मक पत्र।

प्रधानमंत्री जी, नमस्कार,
आशा है कि आपके हाल-चाल कुशल मंगल होंगे। बहुत दिन हुए आपको पत्र लिखे (शायद जुलाई में साम्प्रदायिकता पर लिखा था) पता नहीं आपने पढ़ा भी होगा या नहीं? लेकिन आपके भक्तों ने बहुत गालियों से जवाब दिया था मुझे। आज भी मैं अपने तीन अहम मुद्दों में से एक किसानों की व्यथा पर लिख रहा हूँ। (मैं हमेशा स्त्रीकिसान और अल्पसंख्यक: अल्पसंख्यक शब्द कर प्रयोग किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि हर दबे तबके, धर्म, जाति के लिए है, मुम्बई में यूपी-बिहार के लोंगों के लिए भी
आपने अभी कुछ दिन पहले  रेडियो पर मन की बात किसानों के साथ संवाद स्थापित करके की। मैं उस दिन मुम्बई से कानपुर जाने के लिए सुरेश प्रभु की अव्यवस्थित ट्रेन में सफर कर रहा था। एक दिन बाद सुना लेकिन उसपर कुछ टिप्पणी नहीं कर पाया। आज व्यस्तता से समय निकालकर, पार्लियामेंट की बहस सुनकर, आपका मेनिफेस्टो पढ़कर और स्वामी नाथन की रिपोर्ट पढ़कर पत्र लिखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ। आपकी बात सुनकर तो सबको बहुत अच्छा लगा, लेकिन मुझे लगा कि आपने मन की बात की लेकिन अपने मन की बात। किसानों के मन की बात नहींइसे हम "मन मुताबिक बात" भी कह सकते हैं।
आज मैं शुरुआत यूपी, बिहार, पंजाब नहीं महाराष्ट्र से शुरु करना चाहूंगा। यहाँ जबरजस्त सूखे की शुरुआत हो चुकी है। मैने कल ही इंडीयन एक्सप्रेस में शालिनी सिंह की एक बड़ी सी रिपोर्ट देखी। जिसमें मराठवाडा, नागपुर,  जैसे कई ज़िलों में अभी से सूखा शुरु हो गया है। उसपर तो आप कुछ नहीं बोले, माफ करिएगा अब आप राज्य सरकार को दोषी नहीं कह सकते क्योंकि राज्य सरकार  भी आपकी ही है। मैं सूखे के लिए आपको दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ लेकिन सूखे से होने वाली समस्याओं से तो आपकी सरकार को ही निपटना है। एक गाँव का दृश्य मैने देखा एबीपी न्यूज पर जबरजस्त संकट में हैं लोग। एक गाँव है, जालना। पूरे गाँव में एक ही टैंकर पानी आता है वो भी रात को 8 बजे से 1 बजे तक कभी भी। लोग अपनी नींद, बच्चे, परिवार छोड़कर बैठे रहते हैं पानी की आस में। आते ही लोग ऐसे भागते हैं कि  जहां से पानी लेना बहुत मुस्किल होता है। औरतें और बूढ़े तो उसमें चोंट भी खा बैठते हैं। नहाने को तो दूर उनको पीने का पानी भी ना मिले जिस दिन टैंकर ना आए।
वहां के युवा मुम्बई, पूना जैसे शहरों में रोजी रोटी के लिए पलायन कर गए हैं। मै पत्र की लंबाई को देखते हुए एक ही घटना लिखूंगा, लेकिन ये हाल तो पूरे के पूरे 10-12 ज़िले या तालुका का है। 

दूसरी बात आपको याद दिलाता हूँ," बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार, अबकी बार आपकी सरकार।(आपकी मतलब आपकी, अरविन्द वाली आपकी नहीं, असल में हमारे यहाँ सम्मनित लोगों का नाम बहुत जरूरत पड़ने पर ही लेते हैं) लेकिन हो क्या रहा है जब से आपकी सरकार आई है, तब से 6000 से भी अधिक किसानों ने आत्म हत्या कर ली, उन 6000 में से लगभग 1400 तो केवल महाराष्ट्र से हैं। आप कब जागेंगे
किसानों के अच्छे दिन कब आएंगे? क्या इसे भी 15 लाख हर गरीब को मिलेगा वाले जुमले जैसे मान लूं

आप नेपाल, श्रीलंका, मॉरिसस में हजारों करोड़ रुपए का दान करके आ रहे हैं. वोडाफोन जैसी कम्पनियों का 10 हजार करोड़ का टैक्स माफ कर देते हैं, लेकिन किसान कर्ज़ के लिए बैंको के चक्कर काटता फिरे? कितने किसानो को कर्ज़ माफी की सौगात मिल गई? 




खैर, अब आपको तीसरी बात यूपी की बताता हूँ जबरजस्त बारिस-ओले पड़ने से उत्तर भारत में पूरी की पूरी फसल खत्म हो गई। नहीं खत्म हुई तो लगत निकलना भी मुस्किल है।  गेंहू 4-5 कुंतल प्रति बीघा हो जाए तो बहुत होगा,  जो एवरेज उपज से आधे से भी कम है। इतने में तो हमारी लागत भी नहीं निकलेगी। आलू के  हाल तो ऐसे हो गए हैं, कि कोई पूंछ नहीं रहा है। 7-8 रुपए मे अगर किसानों की आलू बिक जाए तो बहुत होगा। जबकि मुम्बई जैसे शहर में 28-30 रुपए प्रति किलो है। यह अंतर कैसे है? उसके अपने अलग कारण होंगे, लेकिन आपको कोशिश करनी चाहिए क़ि अधिकतम लाभ किसानों को मिल सके। आप बातें तो बड़ी बड़ी कर गए, लेकिन यूपी को दे क्या रहे हैं? मुवबजा तो सबसे बाद में यूपी को ही मिल  रहा है, अगर यह राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है तो आपको अखिलेश सरकार पर दबाव डालना चाहिए। आपने ही टीम इंडिया बनाकर काम करने की बात की थी। आपका घोषणापत्र (मेनिफेस्टो) मैने पूरा पढ़ा है, उसमेआपने वादा किया था क़ि किसानों को लागत मूल्य का 50 फीसदी मुनाफा सरकार की जिम्मेदारी होगी। अर्थात अगर किसी ने 5000/- लागत लगाई है, तो उसकी फसल की कीमत 75000/- तो कम से कम दी जाएगी। अगर बाजार भाव उपर जाता है, तो मुनाफा और भी बढेगा वो सीधा किसान को मिलेगा। इस वादे का क्या हुआ? यह बात तो स्वामी नाथन की रिपोर्ट में सबसे प्रमुख है, जिसे लागू करने में आपकी सरकार डर रही है। 
आपने लैंड एक्विजिशन पर जो किया उसके बारे में कुछ ना ही बोंलूं तो ठीक है। 2013 में कानून बना था, उसे पास करने वाली स्टैइंडिग कमेटी की अध्यक्ष आज की आपकी लोकसभा स्पीकर सुमित्रा जी थी, तब राजनाथ और सुषमा स्वराज ने लंबे लंबे भाषण दिए थे इस बिल के समर्थन में। आज क्या हुआ क़ि वही बिल लागू भी नहीं किया और नया कानून बना दिया। इसमें तो मुझे अंबानी-अड़ानी जैसे कॉर्पोरेट्स का डर लग रहा है। आप बिना लागू किए किसी कानून को नकारा बता रहे हैं, जबकि वो आपकी सहमति से बना था। आपकी पार्टी के सदस्य उस कमेटी में थे, जिसने इस कानून को पास किया। क्या आपको सुमित्रा महाजन पर विश्वास नहीं हैं? वो ही तो इसकी प्रमुख थी। आप देश को अंग्रेजो जैसा कानून कैसे दे सकते हैं? किसान की जमीन ली जाएगी, उसकी अनुमति भी नहीं होगी, उसका भाव आप तय करेगे, उसपर केश भी आप नहीं करने देंगे, आखिर किसान के गले की फांसी का फंदा आप क्यों तैयार कर रहे हो? उपर से आपका पीपीपी मॉडल उस पर हावी है, अभी तक सरकारी काम के लिए जमीन ली जाती थी, आज कोई भी प्राइवेट कम्पनी भी सरकार से ओर्डर लेकर किसान  की भूमि का अधिग्रहण कर सकती है। आपने रेडियो पर सरसर गलत बोला कि प्राइवेट सेक्टर के लिए किसान की अनुमति ली जाएगी। मैने सभी संसोधन पिछले कानून से कम्पेयर करके देखे हैं, इसबार ऐसा कोई प्रावधान अभी तक तो नहीं है। हर किसान ने कानून तो नहीं पढ़ा है, उसे जैसे बताओंगे वैसा ही समझेगा। खैर, बाकी की कमिया आप अपने ही सांसदों(जो ग्रामीण क्षेत्रों से चुनकर आए हों, कॉर्पोरेट्स समर्थकों से नहीं) से बंद कमरे में पूछेगे, तो मिल जाएंगी। अगर इस बिल पर ही ज्यादा व्याख्यित करके लिखूंगा, तो समय अधिक लगेगा। 
उम्मीद है, आप लोकतंत्र की गाड़ी को चलने के लिए आलोचना रूपी डीजल को स्वीकारते रहेगे, जो फ्री में यहीं पर मिलता है, इराक से नहीं। क्योंकि आप ही कई बार कह चुके हैं क़ि हमें आलोचना स्वीकार करने की क्षमता में बृद्धि करनी चाहिए। इसी से गलती सुधारी जाती है। वैसे एक बात कहूँ  आज मैने निडर होकर लिखा क्योंकि आई टी एक्ट की धारा 66 सुप्रीम कोर्ट ने खत्म कर दी है, जिससे बहुत आज़ाद महसूस कर रहा हूँ। अब तो आपकी सरकार का डर खत्म हुआ है, कि सरकार के खिलाफ ज्यादा लिखने पर मुझे जेल में डाला जा सकता है।  इसी का फायदा कल लोगों ने उठाया फेकू दिवस मानकर, मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। कसम से मैने एक भी  जोक लाइक नहीं किया जो आप पर बना हो। चलिए माफ कर दो बच्चों को सार्वजनिक जीवन में थोड़ा सा हंसी मजाक चलता है, यह भी आपने ही एक बार पार्लियामेंट में कहा था। 
आपके उत्तम स्वास्थ्य और लम्बी उम्र की कामना करता हूँ, क्योंकि आपकी बहुत जरूरत है, इस देश की राजनीति को। आपसे मैं किसी मुद्दे पर सहमत/ असहमत तो हो सकता हूँ, लेकिन एक वैचारिक राजनीति की शुरुआत जो आपने की है उसकी निरंतरता भी बहुत जरूरी है, जो फिलहाल कम ही नेताओं में है।  उम्मीद है, आप अच्छा ही करेगे, अगर कुछ गलतियाँ हो रही होंगी तो उनको सही करेगे। अब किसानो के मन की बात करेगे। करेगे? सच में?



धन्यवाद!

आपका शुभेच्छु,

कमलेश कुमार राठोड़
(पिछड़े हुए उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गंगा किनारे बसे गाँव के बूढ़े गरीब किसान का संघर्षरत पुत्र)

(नोट: माँ गंगा का जिक्र इसलिए किया क्योंकि माँ गंगा से आपका और आपकी पार्टी का बहुत लगाव  हो सकता है, आपको हमारे यहाँ की भी गंगा माँ कभी बुला लें और हमारा भी उद्धार हो जाए, बनारस के जैसे।

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