Tuesday, May 5, 2015

क्या मैरिटल रेप अपराध है?

हमारे देश में पिछले 3-4 दिनों में मैरिटल रेप  को लेकर जबरजस्त बहस चालू हो गई है। सरकार चाहती है, क़ि ऐसा कानून नहीं होना चाहिए, जिसमे पत्नी पति पर रेप केश करा सके और हम जैसे कानून के युवा छात्र और वकील या महिला आधिकारों की बात करने वाले लोग ऐसा कानून बनाने की मांग कर रहे हैं।
अब देश के हर इंसान को कानून तो नहीं पता होता है इसलिए मैं आपको कुछ बताना चाहता हूँ। हमारे देश में एक रेप का कानून है, जिसकी परिभाषा में ही कहा गया है क़ि किसी महिला पर किसी भी तरह से जबरजस्ती या उसकी मर्जी के बिना किया गया यौन व्यवहार बलात्कार होता है। लेकिन उसमें नीचे पैरा में यह लिखा गया है कि वह महिला अगर किसी आदमी की पत्नी है तो यह रेप नहीं होगा, अगर पत्नी 15 साल से कम उम्र की है तो यह रेप माना जाएगा। मतलब पत्नी के साथ कुछ भी करने की छूट। अगर हम इसपर बात करते हैं तो लोग कहते हैं कि ऐसा भी कहीं हो सकता है कि कोई आदमी अपनी पत्नी के साथ रेप करेगा? लेकिन यूएन के एक सर्वे के अनुसार भारत में घर में यौन अपराध सहने वाली महिलाओं की संख्या उन महिलाओं से 40% अधिक होती है जिनके साथ बाहर ऐसाहुअ है। एक और भारत में हुए सर्वे के मुताबिक 75% मर्दो ने खुद माना है कि उन्होने कभी ना कभी अपनी लाइफ पार्टनर के साथ जबरजस्ती सेक्स किया है। 2013 में आई जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि मॅरिटल रेप जुर्म माना जाना चाहिए, लेकिन सरकार ऐसा करने से मना कर रही है। दुनिया के 80 से अधिक देशों में ऐसे कानून हैं जिसमे पत्नी के साथ किया गया जबरजस्ती का सेक्स रेप है। अमेरिका में 1993 से और नेपाल, भूटान में भी ऐसे कानून हैं। नेपाल तो हिन्दू राष्ट्र है जिसकी दुहाई आप इसके विरोध में देते हैं। भारत की ही एक संस्था ने 2010 में यूपी, राजस्थान, महाराष्ट, तमिलनाडु और कर्नाटक में एक सर्वे किया था जिसमें  गाँव और शहरों की महिलाओं से बात की गई थी, हर 5 में से तीसरी महिला ने माना था कि उनके साथ अक्सर ऐसा होता है, कि जब उनका मन ना हो और उनके पति ने सेक्स किया हो।
हम शादी को एक सिक्का मानकर चलते है, जिसके दो साइड होते हैं, लेकिन हर बार केवल हेड ही आएगा ऐसा भी होता है क्या? अर्थात पत्नी की मर्जी का कोई मतलब है ही नहीं, जब पति चाहे तब वो अपनी मनमर्जी कर सकता है। इसमें सब मर्दों की बात मैं नहीं कर रहा हूं। शादी में महिलाओं को कोई अधिकार ही नहीं दिए गए हैं। सरकार और अधिकतर पुरुष एक बात कहते हुए नजर आते हैं कि शादी एक पवित्र बन्धन है, उसके बिस्तर की चीजें बाहर नहीं लाना चाहिए। क्यों भाई? सारे बन्धन को निभाने  की जिम्मेदारी महिला की ही क्यों होती है? क्यों नहीं पुरुष भी उसका भागीदार बने? सब बराबर है भगवान के यहा से तो अधिकार क्यों नहीं? इस संस्कृति और पवित्र बन्धन के चक्कर में ना जाने कितनी औरते मरती होंगी रोज। ना जाने कितनी औरतों का सेक्सुअल हारसमेन्ट होता है। लेकिन समाज के डर से वो बर्दास्त करती हैं। ज्यादातर शादियों में तो लड़कियों को पता ही नही होता है कि इस मामले में उनके पति कैसे होगे? क्योंकि वो शादी के थोड़े दिन पहले ही मिलती हैं, उससे। या केवल देख ही पाती हैं। अब रही बात बिस्तर से बाहर बाते आने की तो लोग कहते हैं क़ि इसे आप प्रूफ कैसे करेंगे क़ि रेप या जबरजस्ती हुई है, तो हम इसको ठीक उसी प्रकार से मान सकते हैं जैसे आई पी सी की धारा 498 में पारिवारिक हिंसा को साबित किया जाता है, महिला की गवाही मानी जाएगी। अगर वह झूंठ बोल रही है, जज को इतना अनुभव तो होता है कि वो 100 मे से 80 झूंठ पकड सकता है, इसलिए झूंठ फँसाए जाने का डर तो भूल जाओ। अगर उस कानून का मिसयूज किया जाएगा तो उसे सजा मिलेगी। रही बात परिवार टूटने की तो हम यह नहीं कह रहे हैं क़ि हर पत्नी जाकर अपने पतियों के खिलाफ एफ आई आर करे जाकर। आखिर किसे शौक है जो अपने पति के खिलाफ केश करेगा? लेकिन कानून बनाने से कम से कम एक बराबरी का अधिकार तो होगा।एक डर तो होगा। हम तो इतनी मांग कर रहे हैं कि शादी एक पवित्र बन्धन है, जिसमें दोनो का अधिकार बराबर होता है, सेक्स का अधिकार भी बराबर होना चाहिए, जिसके लिए शादी की गई है। यह एक महिला की आजादी के खिलाफ भी है। कल एक वकील साहब टीवी पर बोले कि ऐसे अपराधों के लिए आई पी सी में बहुत सारी धाराएँ हैं, 498 , 376, 377,324, 325 और 327 इनका भी मिसयूज होगा तो इनको भी ख़त्म करोगे? दुनिया के हर कानून का मिसयूज हो रहा है लेकिन उसे सजा तो मिलती है। क्यों फालतू के तर्क देते हो साहब।
मैने कल ही एक केस राज्य सभा टीवी की डिबेट में देखा जिसमे महिला खुद की आपबीती बता रही थी, मुम्बई की क्रिश्चन महिला थी उसने गुजराती युवक से शादी कर ली, फिर लड़कें के घर वालों को नापसंद आई  लड़की तो लड़के ने लड़की को सेक्सुअलि हारसमेन्ट करना शुरु कर दिया। फिर तलाक ले लिया। दूसरी महिला थी उसकी अरेंज मैरिज थी, कुछ दिन बाद नशेबाज पति उसको सेक्सुअलि हरासमेंट करने लगा। उसकी तबियत ठीक हो या हो, ओरल सेक्स, पीजिकल फोर्स, एनल और टॉर्चर करना शुरु कर दिया। उसके माहवारी के दिनों में भी उस महिला के दर्द को नहीं समझा और अपनी हवस के हिसाब से काम करता रहा, तब जाकर लड़की ने तलाक लेने की सोंची। ठीक ऐसा ही एक मेरे क्लासेज की प्रोफेसर मेडम में बताया जो उन्होने खुद लड़ा था कुछ दिन पहले। मैने वो केश की कॉपी फाईल उनसे लेकर पढी। जिसमें पता चला कि महिलाओं का एक दर्द यह भी होता है। मेरी हिम्मत हुई इत्ने लोगो के बीच में स्पीच देने की। पहले तो मैं बहुत शरमा रहा था। फिर मेरे दोस्त अमित गुप्ता और मेरे बीच क्लास में जबरजस्त 15 मिनट की बहस हुई,कोई नहीं हारा अभी तक दो दिन बाद हम मुम्बई का डेटा (रिसर्च)लेकर बहस करेगे। अमित पुरुषों की तरफ बोल रहे हैं, इस बार मेरा उनसे पहला ही सवाल होगा, कि कितने % महिलायें पुरुषो को पीकर मारती हैं? कितने % महिलाएं यौन हिंसा करती हैं।कितने %महिलाओं को शौक है पति से केश लड़ने का? जो पति अच्छे हैं हम उनकी तारीफ़ करते हैं। लेकिन जैसा की ऊपर के सर्वे में बताया गया है कि 75%मर्द खुद मानते हैं कि वो लाइफ पार्टनर की बिना मर्जी के सेक्स कर चुके हैं और हर 5 में से तीसरी महिला ऐसा मानती है कि उनके साथ ऐसा हुआ है तो क्यों हम इसके खिलाफ कानून बना दें? हमने कितने ऐसे मर्दों को देखा है जो बीवी को मारना बहादुरी मानते हैं। खुद नशेबाजी करें और पत्नी को गाली दें या पीटें,खुद का जब मन हो जबरजस्ती कर लें। पत्नी बीमार हो, मन हो उसका या उसके कष्ट के दिन (लेडीज प्रॉब्लम)हों तो सहन वही करे, लेकिन समाज और परिवार के डर से चुप रहे। कम से कम उसको इतनी तो आजादी हो क़ि जब उसका मन नहीं है तो कोई उसके साथ जबरजस्ती करे चाहे पति ही क्यों हो?
मैं तो इसे मर्डर से भी बड़ा जुर्म मानता हूँ क्योकि ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस शादी में सबने बराबर कस्मे खाई उसमें सारे अधिकार मर्द को दे दो। मर्जी एक ही इंसान की। महिला खुश तो भी हाँ, नाखुश तो भी हाँ कहना पड़ेगा। जब बात सारे कष्टों की आये तो महिला को बर्दास्त करना है चाहे परिवार की इज्जत की बात हो या उसकी प्राकृतिक महिला समस्याओं से लेकर बच्चा 9 महीने गर्भ में रखना और दूध पिलाने तक। फिर जब सारा क्रेडिट पति को। इसमें तो बदलाव होना चाहिए। पीएम को भी इसपर सही सोंचना होगा नहीं तो हमारे जैसे युवा फिर लड़ेंगे। क्यों कि अब बात निकल भी चुकी है और दूर तक जा भी चुकी है। 

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