Thursday, June 25, 2015

आपातकाल की कहानी

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार फिर तानाशाही की वापसी की आशंका जताकर इस विषय पर तीखी बहस छेड़ दी है।
आडवाणी की आशंका को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता क्योंकि 1975 में जब आपातकाल की घोषणा की गई थी तब सत्ता और संगठन के सारे सूत्र श्रीमती इंदिरा गांधी के हाथ में ही थे और आज भी कमोबेश स्थितियां वैसी ही बन रही हैं। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं, जबकि पार्टी अध्यक्ष पद पर उनके खासमखास अमित शाह हैं।
केंद्र के साथ विभिन्न मुद्दों पर टकराव की स्थिति का सामना कर रहे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गुरुवार को भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के उस बयान से सहमति व्यक्त की कि देश में आपातकाल लगने की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता, साथ ही संदेह व्यक्त किया कि क्या दिल्ली में इसका पहला प्रयोग होगा।
केजरीवाल ने ट्वीट किया कि आडवाणीजी सही कहते हैं कि आपातकाल को खारिज नहीं किया जा सकता। क्या दिल्ली प्रथम प्रयोग होगा? आप नेता आशुतोष ने कहा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता की टिप्पणी मोदी की राजनीति पर अभियोग है। आशुतोष ने ट्वीट किया कि आडवाणी का साक्षात्कार मोदी की राजनीति पर पहला अभियोग है। आडवाणी ने एक समाचारपत्र को दिए साक्षात्कार में कहा कि संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा होने के बावजूद अभी के समय में जो ताकतें लोकतंत्र को कुचल सकती हैं, वे मजबूत हुई हैं। उन्होंने कहा कि 1975-77 में आपातकाल के समय के बाद से मैं नहीं समझता कि ऐसा कुछ किया गया, जो आश्वस्त करता हो कि नागरिक स्वतंत्रता फिर से निलंबित या ध्वस्त नहीं की जाएगी। ऐसा बिलकुल नहीं हुआ।
आइए अब हम बताते हैं आपको कि कैसे इंदिरा के एक फैसले ने बदल दी देश की दिशा
25 और 26 जून 1975 की दरमियानी रात को देश में आपातकाल लगाया गया था। खुद इंदिरा गांधी ने रेडियो पर देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। इसी रात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में इमरजेंसी लागू करने के ड्राफ्ट पर हस्ताक्षर किए थे। 26 जून 1975 की सुबह जब देश में इसकी खबर फैली थी तो देश भर में हड़कंप मच गया था। इससे पहले देश में एक्सटर्नल इमरजेंसी लगी थी। ये 1962 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय की बात है।
न्यायपालिका के साथ इंदिरा गांधी का टकराव बहुत पुराना था। इंदिरा गांधी की हमेशा कोशिश यही रही की किसी तरह से न्यायपालिका के पर कतरे जाएं। जब केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार तेरह जजों की बेंच ने कोई फैसला सुनाया। इस बेंच ने ये फैसला सात बनाम छह के बहुमत से 24 अप्रैल 1973 को सुनाया था। फैसले में कहा गया था कि संसद अपनी संवैधानिक भूमिका में संविधान के सभी प्रावधानों को बदल नहीं सकती। फैसले में ये भी कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान के मूल ढांचे के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकती है।
सरकार के फैसलों के खिलाफ राय देने वाले न्यायाधीशों को परेशान किया जाने लगा। इस दौरान सरकार के कामकाज और सरकारी गतिविधियां निरंकुश हो गई थीं। 1973 में देश में महंगाई और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया। इंदिरा सरकार पर विपक्ष के हमले तेज हो गए। गुजरात में सरकार के विरोध का पहला बिगुल बजा। यहां के इंजीनियरिंग कॉलेजों में मेस बिल में हुई बढ़ोतरी के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। जेपी के आह्वान पर संपूर्ण क्रांति आंदोलन शुरू हो गया। हालत खराब हो गए। इंदिरा गांधी ने गुजरात विधानसभा भंग करा कर चुनाव कराए। गुजरात के बाद बिहार में भी जेपी की अगुआई में आंदोलन खड़ा हो गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर ने छात्रों के संघर्ष को दबाने के लिए गोलियां तक चलवा दी। तीन हफ्ते तक हिंसा होती रही। सेना और अर्द्धसैनिक बलों को बिहार में मोर्चा संभालना पड़ा। आठ अप्रैल 1974 को पटना की सड़कों पर मूक रैली निकाली।
जेपी द्वारा शुरू किए गए आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया। देश के सभी विपक्षी दल इसमें जुड़ते चले गए। इसमें एक तरफ जनसंघ था, तो दूसरी तरफ सीपीएम| सिर्फ सीपीआई ही एक मात्र ऐसी बड़ी पार्टी रही, जो जेपी के इस आंदोलन में शामिल नहीं हुई। इन दलों ने अपनी समन्वय समिति भी बनाई। देश में धरने, प्रदर्शन होने लगे। जॉर्ज फर्नांडीस ने अप्रैल 1974 में रेलवे की सबसे बड़ी स्ट्राइक की। इंदिरा ने डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट का सहारा लेकर रेल कर्मचारियों की हड़ताल को तीन हफ्तों में खत्म करा दिया। आग तो अंदर सुलग ही रही थी। असंतोष बढ़ता चला गया।
इंदिरा ने अपने खिलाफ आए दो फैसलों के कारण देश में आपातकाल लागू कर दिया था। ये फैसले इमरजेंसी लगाए जाने से पहले पखवाड़े में आए थे। पहला फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट से आया था। दूसरा फैसला सुप्रीम कोर्ट से। दोनों ही प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लोकसभा चुनाव से संबंधित थे। ये फैसले 1971 के लोकसभा चुनाव के थे। इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने अदालत में रिट दायर की थी। रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है।
राजनारायण इंदिरा गांधी से करीब एक लाख वोट से हारे थे। अपनी जीत को लेकर वो इतने सुनिश्चित थे कि नतीजे घोषित होने के पहले ही विजय जुलूस निकाल डाला था। जब परिणाम के बारे में उनको मालूम चला तो उन्हे भरोसा ही नहीं हुआ की वह हार गए हैं। उन्होने अदालत से ये गुहार लगाई कि इंदिरा ने चुनाव जीतने के लिए सिर्फ सरकारी मशीनरी और संसाधनों का इस्तेमाल किया है, बल्कि वोट खरीदने के लिए पैसे भी बांटे हैं। ऐसे में उनका चुनाव निरस्त कर दिया जाए। इस मामले की सुनवाई 15 जुलाई 1971 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में शुरू हुई। सुनवाई के दौरान ही राजनारायण और इंदिरा गांधी सुप्रीम कोर्ट चले गए। मार्च 1975 में जस्टिस सिन्हा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को उनका बयान दर्ज कराने के लिए अदालत में पेश होने का फरमान जारी कर दिया। इंदिरा गांधी अदालत में हाजिर हुई। जस्टिस सिन्हा ने 12 जून 1975 को अपना फैसला सुनाया और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया। जस्टिस सिन्हा ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की मोहलत दी। सुप्रीम कोर्ट के वेकेशन जज जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे दे दिया। 24 जून 1975 के अपने फैसले में जस्टिस अय्यर ने इंदिरा गांधी को बतौर प्रधानमंत्री संसद में आने की इजाजत दे दी। लेकिन बतौर लोकसभा सदस्य वोट करने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस फैसले को इंदिरा गांधी ने अपना अपमान समझा। अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर दी। जिस पर राष्ट्रपति ने 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में ही हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह देश में आपातकाल लग गया। 24 जून 1975 के अपने फैसले में जस्टिस अय्यर ने इंदिरा गांधी को बतौर प्रधानमंत्री संसद में आने की इजाजत दे दी। लेकिन बतौर लोकसभा सदस्य वोट करने पर प्रतिबंध लगा दिया। इस फैसले को इंदिरा गांधी ने अपना अपमान समझा। अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर दी। जिस पर राष्ट्रपति ने 25 और 26 जून की मध्य रात्रि में ही हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह देश में आपातकाल लग गया।
जून 1975 में गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस हार गई और जनता पार्टी सत्ता पर काबिज हो गई| उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दियाआंदोलन में शामिल विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफा माँगा| जेपी ने विपक्ष की इस माँग का समर्थन किया| देश में सरकार विरोधी माहौल बना और इंदिरा गांधी का सत्ता में रहना मुश्किल होने लगा| चंद्रशेखर, मोहन धारिया, हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम, रामधन और रामकृष्ण हेगड़े सरीखे नेताओं के कांग्रेस से अलग होकर जेपी के समर्थन में उतर आने से इंदिरा गांधी बुरी तरह बिफर गईंइन घटनाओं से असुरक्षित महसूस कर रही इंदिरा गांधी ने देश में रातोंरात इमरजेंसी लगा दी| देशभर में सेंसरशिप लागू कर दी गई और जेपी समेत सैकड़ों बड़े नेताओं को मीसा और राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर ज़ेलों में डाल दिया गयाअख़बारों का मुँह बंद कर दिया गया और पुलिस को खुली छूट दे दी गई| इमरजेंसी का विरोध हो, इसके लिए लाखों कार्यकर्ताओं को ज़ेलों में ठूँस दिया गया| इस दौरान संजय गांधी का नसबंदी कार्यक्रम खूब परवान चढ़ा| 19 महीने के काले क़ानून के बाद जनवरी 1977 में इंदिरा गांधी ने आम चुनाव की घोषणा कर दी| जेपी का गुर्दा ख़राब था, लेकिन डायलसिस पर होने के बावजूद उन्होंने चुनाव की चुनौती स्वीकार की| चुनाव में उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गयाइंदिरा और संजय गांधी चुनाव हार गए| जेपी की नैतिक शक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान ने उन्हें वो अवसर दिया था कि वे इंदिरा और उनकी राज्य शक्ति को पराजित कर सकेंइमरजेंसी की भनक मंत्रिमंडल के सदस्यों और सेना के अधिकारियों को भी नहीं लगने दी गई| सिर्फ़ तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद, पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और संजय गांधी को ही इस फ़ैसले की जानकारी थी|
इंदिरा गांधी ने सेना के तीनों प्रमुखों को बुलाकर इतना संकेत ज़रूर दे दिया था कि वे सतर्क रहें| दूसरे दिन न्यायपालिका, कार्यपालिका, संवैधानिक संस्थाओं और यहाँ तक कि सेना को इंदिरा गांधी ने अपने नियंत्रण में ले लिया था| श्रीमती गांधी की इस पहल की देश भर में प्रतिक्रिया हुईदुनिया यह देख-सुन कर स्तब्ध थी कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र लड़खड़ा गया है और शासन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ गई है| इंदिरा गांधी पर इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ा क्योंकि उनका उद्देश्य सिर्फ़ कुर्सी बचाए रखने तक सीमित हो गया था| 1971 में बांग्लादेश युद्ध से वीरांगना बनीं इंदिरा गांधी पर चार साल बाद तानाशाही के भी आरोप लगेआपातकाल के 19 महीनों के बाद जब उन्होंने आम चुनाव कराने का निश्चय किया तो उन्हें इस बात की तनिक भी भनक नहीं थी कि देश की जनता उन्हें सत्ता से बेदखल करने का मन बना चुकी है| जेपी के आहवान पर देश भर के नेता आपस में कांग्रेस के खिलाफ़ संगठित हो गए| 1977 में जनता पार्टी केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गईमोरारजी देसाई जनता पार्टी सरकार के प्रधानमंत्री बनाए गए| विभिन्न प्रदेशों में जब चुनाव हुए तो वहाँ भी जनता पार्टी एक वैकल्पिक राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरकर सत्तारूढ हो गई| विश्व के राजनीतिक क्षितिज पर यह पहली और अनोखी घटना थी जब शांतिपूर्ण तरीके से सत्ता का परिवर्तन किया गयादुनिया के देशों ख़ासकर अमरीका, तत्कालीन सोवियत रूस और ब्रिटेन तक की सरकारों को भारत की इस घटना पर आश्चर्य हुआ था|
केंद्र में जनता पार्टी सरकार का जब विजयोत्सव मनाया जा रहा था, तब जेपी वहाँ होकर सीधे इंदिरा गांधी से मिलने पहुंचे, और दोनों रो पडे। मोरारजी देसाई को देश का प्रधानमंत्री बना दिया गया। कुछ दिनों बाद जनता पार्टी में भी व्यक्तित्व की टकराहट शुरू हो गई| दोहरी सदस्यता का सवाल उछाला जाने लगा| समाजवादियों को यह स्वीकार्य नहीं था कि जनसंघ गुट को सरकार में ज़्यादा महत्व दिया जाए| समाजवादियों की यह चिंता स्वाभाविक थी क्योंकि जनसंघ के लोग काफ़ी तेज़ी से सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर क़ाबिज कर दिए गए थेदेखते-देखते मोरारजी सरकार में आतंरिक संघर्ष तेज़ होने लगा और कुछ दिनों में देसाई की सरकार गिर गई| जेपी की बातें अनसुनी की जाने लगीं| वे असहाय सी स्थिति में थे| इन घटनाओं ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया| जेपी जनता पार्टी सरकार के सिर्फ़ माध्यम भर थेदेसाई सरकार के पतन के बाद कांग्रेस के सहयोग से चौधरी चरण सिंह की सरकार बनी| उनका प्रधानमंत्री बनना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं थी| इंदिरा गाँधी और उनके पुत्र संजय से वे सीधे संपर्क में थेचरणसिंह का जनता पार्टी से टूटना कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण घटना थीजेपी की लड़ाई से उपजे राजनेता ख़ासकर लालू प्रसाद यादव, नितिश कुमार, शरद यादव, जार्ज फ़र्नांडिस, सुबोधकांत सहाय और जाबिर हुसैन सरीखे नेताओं के लिए जेपी के निधन के लगभग चार दशक बाद आज जेपी के मूल्य, सिद्धांत और उनके आदर्श शायद उतने प्रासंगिक नज़र नहीं आते हैं।

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