Friday, September 18, 2015

गणेश चतुर्थी विशेष

मुंबई में एक उत्तरभारतीय प्रवासी होने के नाते पहले पहले तो गणेश चतुर्थी मेरे लिए एक छोटे से फेस्टिवल के रूप में था, लेकिन जब 5 साल यहाँ निकाल लिए तो मराठी समाज के जैसा ही हर्षोल्लास रहने लगा. हर साल सिद्धिविनायक मंदिर, और लाल बाग गणपति बप्पा के दर्शन के लिए जाता हूँ. पिछले साल भी गणपति बप्पा के इतिहास पर लिखने के लिए बहुत पढ़ा, और रिसर्च किया था. बहुत जगह के गणपति पंडालों में गया था. इसबार भी वो सिलसिला जारी है, और इस त्यौहार के कुछ अनकहे तथ्यों को बताने का प्रयास करूँगा. 
एक वक्त गणेश चतुर्थी एक दिन का पर्व हुआ करता था लेकिन अब 11 दिन तक चलने वाले गणेशोत्सव की रौनक अब सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नही रह गई है। आंध्र प्रदेश समेत देश भर में इसे मनाया जाने लगा है, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में अंग्रेज़ों के खिलाफ हिन्दुओ को एकजुट करने के लिए गणेश के इस पर्व को यह रूप दिया था। अंग्रेज तो चले गये लेकिन यह पर्व एक उत्सव के तौर पर लोगो के जहन में समा गया, मुम्बई में जीवन 11 दिन तक गणेशमय रहता है। लोग इसके रंग और रौनक में विलीन हो जाते हैं, ख़ासकर वो तबका जो रोजमर्रा की परेशानियो से दबा रहता है।
गणेश की मूर्ति खरीद कर स्थापित करना और फिर इसका विसर्जन, यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। बाजार में गणेश की सुन्दर छोटी-बड़ी प्रतिमाऐं, ज्यादातर प्लास्टर ऑफ पैरिस (pop)से बनी हुई मिल रही है। इनमें  आभूषण प्लासटिक से बने हुए और पेन्ट से रंगे होते है जिनमें घातक केमिकल्स मिले होते है। मूर्तियों की चमक और सुन्दरता इस कदर लुभावनी होती है कि उनका बाजार लगातार बढ़ता जा रहा है। विघ्नहर्ता को घर ला कर मनुष्य अपनी परेशानियो का अंत करने की कोशिश में लग जाता है लेकिन इस रौनक में पर्यावरण की खासी अनदेखी हो रही है।
हमारे देश में नदियों का खासा महत्व है, गंगा जैसी नदियों को मां माना जाता है लेकिन विसर्जन की वजह से इन्हें काफी नुकसान हो रहा है। ग्लोबल वार्मिग के खतरों के बीच बड़ी मात्रा में मिट्टी की जगह प्लास्टर ऑफ पैरिस, कैमिकल्स, धातू से बनी मूर्तियां पानी में जहर सा घोल देती है। National green tribunal ने भी यमुना में पीओपी से बनी मूर्तियों के विसर्जन पर रोक लगा दी है लेकिन क्या बिना सख्ती के इस पर अमल हो पाएगा। सरकार क्यों सख्त कानून बनाने से बचती हैं? पूजा की शुद्धता और पर्यावरण को सहेजने के लिए क्या आम नागरिक भी बाध्य नही है?
हमारा धर्म एक सतत चलने वाले जीवन्त प्रवाह की तरह है जो सदियों से बदलाव को अपने अंदर समाहिता किए जा रहा है। दुर्गापूजा, नवरात्री, कावड़ियों से हमारे त्यौहारों की रौनक हमेशा बनी रहे लेकिन क्या हम अपने नज़रिये में बदलाव ला कर विसर्जन की परम्परा में कुछ सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं?

राजनयिकों के लिए महिलाओं की बलि

हमारे देश में नेपाल की दो औरतें जिनके साथ बेहिसाब नाइंसाफी हुई है, जो दो देशों के बीच संबंधों की बेड़ियों में बंधी हैं। उन दो औरतों पर जो बीती है, जो कुछ उनके बीच चल रहा होगा वो निश्चित रूप से मुल्कों के बीच नहीं चल रहा होगा। उनको इंसाफ की उम्मीद थी  है लेकिन भारतीय सरकार सउदी अरब से अपने संबंधों की चिंता में है।
गुड़गांव की इस सोसायटी का नाम है एंबिएंश कैत्रियोना। इस हाउसिंस सोसायटी को सेवेन स्टार का दर्जा हासिल है। इसके टावर के फ्लैट नंबर 502 में आरोप है कि दो नेपाली ओरतों के साथ सामूहिक बलात्कार और शोषण की घटना होती है। अप्रैल के महीने में नेपाल में आए भूकंप के बाद वहां से दो औरतें एक एजेंट के ज़रिये सऊदी अरब के दूतावास में प्रथम सचिव के रूप में कार्यरत राजनियक के घर पहुंचती हैं। एक बेहतर ज़िंदगी की तलाश में इनका सपना भारत में काम करने के बाद सऊदी अरब भी जाना था। राजनयिक के घर में दो तीन महीनों के दौरान इनके साथ बडा ही घिनौना काम हुआ। इनका आरोप है कि इन्हें भूखा रखा गया। बुखार और बीमार होने के बाद भी काम कराया गया। इनके साथ बलात्कार हुआ और राजनयिक के साथ साथ कथित रूप से उनके दोस्त भी इस करतूत में शामिल रहे। एक दिन में सात आठ लोगों ने बलात्कार किये हैं। दो दो बार मेडिकल जांच में यही बात आई है कि शरीर के अलग अलग हिस्सों में चोट के निशान हैं और बलात्कार हुआ है। किसी तरह ये दोनों जान बचाकर भागने में सफल रही। इनके साथ जो अब हो रहा है उस पर तो किसी विएना कंवेशन का बस चल रहा है किसी कानून का। इनका जो परिवार और समाज है वो हर तरह के कंवेंशन से आज़ाद है। उसे भी वैसी ही छूट हासिल है जैसी राजनयिक को।
दोनों में एक 50 साल की महिला है। नेपाल में इनका कोई नहीं है। सिर्फ एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है। 50 साल की पीड़िता नेपाल जाना चाहती हैं। दूसरी पीड़िता तीस साल की हैं। इनकी एक चार साल की बेटी है और दो साल का बेटा है। 
अब आते हैं दो मुल्कों के संबंधों पर। वियना कंवेंशन के अनुसार राजनयिको पर स्थानीय कानून लागू नहीं होते हैं। पराये मुल्क में उन पर तभी मामला चलता है जब उनके मायके से इस संरक्षण को हटा लिया जाता है। आप जानते हैं कि भारत और सऊदी अरब के बीच दोस्ताना संबंध हैं। सऊदी अरब में तीस लाख भारतीय काम करते हैं।
इसलिए इतना आसान नहीं है कि भारत झट से कोई कार्रवाई कर दे। उल्टा सऊदी अरब दूतावास ने पहले कहा कि हमारा राजनयिक निर्दोष है। फिर भी भारत ने कहा कि हरियाणा पुलिस को जांच में सहयोग करे। मेडिकल रिपोर्ट में यातना और बलात्कार की पुष्टि होने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि भारत सऊदी अरब से कहेगा कि राजनयिक संरक्षण हटाये और और भारतीय कानून का सामना करने के लिए कहे। दोनों ही औरतों ने आरोप लगाया है कि राजनयिक के अलावा उसके दोस्त भी उनके साथ बलात्कार करते थे। अलग अलग कमरों में ले जाकर यातना देते थे। सवाल उठा कि मुख्य आरोपी अगर राजनयिक है तो क्या इसके बहाने उन लोगों को भी छूट मिल रही है जो इस अपराध में शामिल थे। वे कौन लोग हैं। इसकी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है।
बुधवार को खबर आई कि सऊदी अरब ने अपने इस राजनयिक को वापस बुला लिया है। हरियाणा पुलिस के पास केस तो है लेकिन मुख्य आरोपी नहीं है। हम अपने मेहमानों से पूछेंगे कि इन औरतों को इंसाफ कैसे मिलेगा। भारत में अपराध हुआ, मुख्य आरोपी सऊदी अरब चला गया, औरतों नेपाल की हैं। क्या भारत को राजनयिक मर्यादाओं के तहत कुछ और सख्त कार्रवाई नहीं करनी चाहिए थी। मसलन उसे निकाला जा सकता था जिससे कड़ा संदेश जा सकता था। उसे पर्सोनो नान ग्राटा घोषित किया जा सकता था, क्योंकि वियना कंवेंशन के मुताबिक भारत अगर यह घोषित करता तो सऊदी को मजबूर होना पड़ता वापस बुलाने के लिए।
इतिहास में कई देशों ने भी अपने राजनयिकों से संरक्षण हटाए हैं लेकिन सऊदी अरब ने हमेशा ही अपने राजनयिकों का बचाव किया है। जबकि उसके राजनयिकों के ख़िलाफ गंभीर आरोपों के मामले सामने आते रहे हैं। अमरीका और इंग्लैंड में भी औरतों को दासी बनाकर रखने के आरोप लगे हैं। 2004 में इंग्लैंड में सऊदी अधिकारी पर 11 साल की एक लड़की को प्रताड़ित करने का आरोप लगा मगर कुछ नहीं हुआ। भारत सऊदी अरब सरकार को जवाबदेही के लिए बाध्य करे। भारत की ज़िम्मेदारी ज़्यादा बनती है क्योंकि नेपाल उसके भरोसे का साथी है।

2013 का साल याद कीजिए। न्यूयार्क में भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी देव्यानी खोब्रागडे की एक मामले में पूछताछ होती है और सर्च किया जाता है, गिरफ्तार होती हैं। अमरीका कहता है कि उन्हें राजनयिक संरक्षण हासिल नहीं था इसलिए ऐसा किया गया क्योंकि वे दूतावास में नहीं काउंसलेट में तैनात थीं। देवयानी ने कहा था कि उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक किया गया। बस क्या सरकार क्या विपक्ष सब अपमान से बदला लो राजनीतिक उद्योग में बदल गए थे।
सबको देवयानी खोब्रागढे के ज़रिये भारतीय राष्ट्र के पुरुषार्थ को चमकाने का मौका मिल गया। दिल्ली में अमरीकन सेंटर से कहा गया कि बिना लाइसेंस के फिल्म नहीं दिखा सकते हैं। अमरीकी दूतावास से बाहर से शराब मंगाने की अनुमति वापस ले ली गई। बीजेपी नेता और पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने कहा कि भारत को भी इसका बदला लेना चाहिए जितने भी समलैंगिग राजनियक हैं उन सबको जेल में डाल देना चाहिए।
तब के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने अमरीकी राजदूत को बुलाकार अपना विरोध जताया कि ये तो अपमान हुआ है। तब गुजरात से नरेंद्र मोदी ने भी ट्वीट कर दिया कि वे भी अपने देश के साथ खड़े हैं और हमारी महिला राजनयिक के साथ जो अपमान हुआ है उसके विरोध में अमरीकी प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इंकार कर दिया है। वैसे अब भारतीय विदेश मंत्रालय ने यहां की अदालत से कहा है कि उन्हें देवयानी खोब्रागडे की निष्ठा पर संदेह है। 2013 से 2015 गया है। औरत तो तब भी थी, औरत ही अब भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि चुनाव नहीं है। मगर आरोप तो लग ही रहे हैं कि भारत सरकार ने सऊदी अरब के राजनयिक को जाने कैसे दे दिया।
वियना कंवेंशन के अनुसार राजनयिको पर स्थानीय कानून लागू नहीं होते हैं। ऐसा होने पर 2013 में हमारे देश में देवयानी खोब्रागडे के लिए अमेरिका के खिलाफ एक लहर दौड गई थी। संसद में मुलायम सिंह यादव से लेकर सुषमा स्वराज तक ने खूब भाषण दिये थे। मोदी जी के बडे ट्वीट आए थे।
नेपाल की दो महिलाओं के साथ सऊदी अरब के राजनयिक ने गुडगांव स्थित अपने घर में महीनों तक बलात्कार और शोषण किया। अब मामला बडा ही जटिल है क्योंकि इसी वियना कंवेंशन के अनुसार सऊदी अरब अपने बलात्कारी डिप्लोमैट को बचा रहा है क्या प्रधानमंत्री नेपाल से देश के और स्वयं के घनिष्ठ संबंध भूल गए जो अपराधी को चोर की तरह भगा दिया। ऊपर से थोडी बहुत कार्यवाही करने वाली पुलिस को फटकार लगाई और सऊदी अरब से संबंधों का हवाला देकर जानकारी छुपाने को कहा। 
अब देखना यह होगा कि क्या सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी जी (हिन्दू ह्रदय सम्राट) हमारे पडोसी (हिंदू)राष्ट्र की दो (हिंदू) महिलाओं को न्याय दिलाने की कोशिश करेंगे
वैसे अगर यही किसी और सरकार में होता तो शायद अब तक सेकुलर कुत्ते, मुल्ला और ना जाने क्या क्या बातें सोसल मीडिया में फैलाई जाती।



राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

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