Saturday, September 12, 2015

बैन पॉलिटिक्स V/S हिटलरिज्म

हमारे देश में आजकल हर चीज़ पर बैन करके ही सुशासन दिखाने की कोशिश की जा रही है।  हाल ही में महाराष्ट्र में मीट बैन को लेकर बड़ी सियासत गरमाई हुई है। जैन समुदाय के पर्यूषण पर्व के दौरान शहर में दो दिनों तक वध एवं मांस की बिक्री पर प्रतिबंध के बीएमसी के फैसले का देशभर में जबरदस्त विरोध हुआ। इस निर्णय पर विरोध का सामना कर रही बृहन्मुम्बई महानगर पालिका (बीएमसी) ने शुक्रवार को बम्बई हाई कोर्ट को बताया कि उसने अपना निर्णय वापस लेने का निर्णय किया है।बीएमसी ने अदालत को अपने निर्णय के बारे में मांस विक्रेताओं की ओर से दायर एक अर्जी की सुनवायी के दौरान सूचित किया। मांस विक्रेताओं ने मांस बिक्री पर चार दिन के प्रतिबंध को चुनौती देते हुए अर्जी दायर की थी, जिसमें राज्य सरकार का दो दिवसीय प्रतिबंध भी शामिल है। बीएमसी ने प्रतिबंध की घोषणा 13 और 18 सितम्बर के लिए की थी, सरकार ने 10 और 17 सितम्बर को इस पर प्रतिबंध लगाया है।
बीएमसी की तरफ से पेश होने वाले वरिष्ठ वकील एन।वी। वालावाल्कर ने न्यायमूर्ति अनूप वी। मेहता और न्यायमूर्ति अमजद सैयद की एक खंडपीठ को बताया कि बीएमसी ने गत एक सितम्बर वाला अपना परिपत्र वापस लेने का निर्णय किया। इसके तहत शहर में 13 और 18 सितम्बर को मटन और चिकन के लिए वध और बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया था। वालावाल्कर ने कहा, 'जनहित और मुंबईवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए परिपत्र को वापस लेने का निर्णय किया गया है।' हाई कोर्ट बाम्बे मटन डीलर्स एसोसिएशन की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवायी कर रहा था। याचिका में राज्य सरकार के 10 और 17 सितम्बर को मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के निर्णय को भी चुनौती दी गई थी। जब बीएमसी ने हाई कोर्ट को प्रतिबंध वापस लेने के अपने निर्णय के बारे में सूचित किया तो सभी पक्षों की दलीलों पर सुनवायी पूरी कर चुकी अदालत ने मामले की अगली सुनवायी 14 सितंबर तय की। 14 सितंबर को इस पर आदेश जारी किये जाने की संभावना है। बीजेपी हालांकि इस पूरे मामले पर सहयोगी दल की भूमिका को लेकर खिन्न थी, लेकिन परिषद के अन्य दलों के साथ उसने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया। बाद में एमसीजीएम के वकील ने बम्बई हाई कोर्ट को बम्बई मटन डीलर्स एसोसिएशन द्वारा रोक के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान इस संबंध में सूचना दी।अदालत ने गुरुवार को इस आदेश को गंभीरता से लेते हुए सरकार से इस पर जवाब मांगा था। अदालत ने शुक्रवार को इस फैसले और स्थानीय निकाय के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा कि मुंबई जैसे शहर पर इस तरह की पाबंदियां नहीं लगाई जानी चाहिए। अदालत ने कहा, 'मुंबई के साथ एक प्रगतिवादी सोच जुड़ी हुई है। ऐसे फैसले प्रकृति से प्रतिगामी होते हैं। क्या खाना है यह एक व्यक्तिगत पसंद है। कोई इस पर बंदिश कैसे लगा सकता है?' 
इसी भावनाओं की पंक्ति में मैं आपको एक किस्सा बताना चाहता हूँ। 2012 में कर्नाटक के डिप्टी सीएम के।एस। ईश्वरप्पा गांधी जयंती के दिन मांसाहार करते पकड़े गए और कांग्रेस ने मौका भांप कर गवर्नर को याचिका दे दी कि ईश्वरप्पा को तुरंत बर्खास्त किया जाये क्योंकि उन्होंने गांधीवादी लोगों की भावनाएं आहत की हैं। 
भावनाओं के कई प्रकार हैं। सिर्फ धर्म की वजह से नहीं, बल्कि पार्टी, नेता, इतिहास, जाति, विचारधारा, दर्शन, फिल्मों, किताबों और कभी-कभी यूंही आहत हो जाती हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में सरकार के द्वारा जैन धर्म के धार्मिक त्यौहार पर्युषण के दौरान मीट पर बैन लगाये जाने के खिलाफ पूरे विपक्ष और उनके साथी दल शिवसेना ने भी मोर्चा संभाल लिया है। शिवसेना और मनसे वही दल हैं जो गौ-मांस पर प्रतिबन्ध लगाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़ी थी। देखा जाये तो हिन्दू धर्म की भावनाओं का खयाल रखते हुए गौ-मांस बंद हो सकता है तो फिर जैन धर्म के लोगों की भावनाओं के सम्मान में 4 दिन का मीट बैन तो न्यायोचित है। प्रतिबन्ध की समय सीमा भी दोनों धर्मों के लोगों की संख्या के अनुपातिक लगती है। अगर भाजपा शासित महाराष्ट्र की सरकार ऐसा नहीं करती है तो फिर तो उस पर सिर्फ हिन्दुओं के तुष्टिकरण का आरोप लगना तय है। गणेश चतुर्थी पर भी महाराष्ट्र में एक दिन के लिए मीट पर बैन लगता ही है।
ये तो राजनीतिक न्याय की बात हुई। लेकिन देश के संविधान में साफ़-साफ़ लिखा है कि आप बिना किसी खौफ के अपने-अपने धर्म का पालन कर सकें।  वहां ये बिलकुल नहीं लिखा है कि आप पूरे देश से अपने धर्म का पालन करवाएं। इस देश में नास्तिकों का भी आपकी तरह एक अल्पसंख्यक समुदाय है। इसलिए किसी भी समाज के द्वारा सरकार से इस तरह के प्रतिबन्ध का अनुरोध करना सरासर गलत है। महाराष्ट्र में ही नहीं, ये बैन कई और राज्यों में भी लगता रहा है। गुजरात में पिछले कई वर्षों से पर्युषण के दौरान ऐसा प्रतिबन्ध लगाया जाता रहा है। इसके खिलाफ 2008 में कुरैशी जमात ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी डाली थी लेकिन मार्कण्डेय काटजू और एच. के. सेमा की बेंच ने मुग़ल बादशाह अकबर की मिसाल देते हुए अपने फैसले में कहा कि अकबर भी हफ्ते में कुछ दिन अपनी हिन्दू पत्नी और शाकाहारी हिन्दुस्तानियों के सम्मान में शाकाहार का पालन करता था और इसलिए हमें भी दूसरे लोगों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। बेशक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए लेकिन उससे पहले भावनाओं पर एक किताब छप जानी चाहिए जिसे पढ़ कर हम और आप दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना सीख जाएं। फिर तो कानून की किताब भी मोटी होते रहने से बच जाएगी। अगर भावनाओं पर ही कानून बनते तो आज आपका या मेरा लिखना भी मुनासिब नहीं होता। महाराष्ट्र में मीट बैन को लेकर जो राजनीति हो रही है और जिस तरह की भाषा का इस्तमाल हो रहा है उससे लग रहा है कि एक दिन खाना बैन करने के बाद समुदायों को भी बैन किया जाएगा। फिलहाल मुंबई में कुछ समय के लिए शिवसेना और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के कार्यकर्ता चिकन बेचते नज़र आए। ये हिम्मत अगर किसी तथाकथित सेकुलर दल ने की होती तो चैनलों के ज़रिये प्रवक्ताओं ने धावा बोल दिया होता। अक्सर शाकाहार बनाम मांसाहार का विवाद मुस्लिम विरोध में बदल जाता है। हिंदुत्ववादी पार्टियां सभी हिन्दुओं को शाकाहारी पेंट करने लगती हैं। लेकिन शिवसेना और मनसे ने यह साफ कर दिया कि मराठी मानुष हिन्दू तो है मगर मांसाहारी है। शिवसेना के नेता टीवी पर बोल रहे हैं कि करोड़ों लोग मांसाहार करते हैं। उनके खाने के अधिकार के समर्थन में शिवसेना ने चिकन का ठेला तक लगा दिया। ऐसा करने में सेकुलर दलों के तो हाथ कांपने लगते। लेकिन शिवसेना मनसे के इस साहस में एक समस्या है। अगर ये दोनों खाने की आज़ादी की वकालत कर रही हैं तो फिर मुसलमानों और इसाइयों के खाने की आज़ादी का सवाल अलग कैसे हो जाता है। मुसलमान और ईसाई के बीफ खाने से हिन्दू आस्था को ठेस पहुंचती है तो इस लिहाज़ से मराठी मानुष, जो कि हिन्दू भी हैं, के मीट खाने से जैन समुदाय की आस्था आहत नहीं हो सकती है।

खाने पर प्रतिबंध की राजनीति का संबंध सीधा सीधा कट्टरता से है। अगर आप कट्टरता के एक रूप को मंज़ूरी देंगे तो इसके दूसरे स्वरूप को भी मानना पड़ेगा। कट्टरता का समर्थक भी कट्टरता का शिकार हो सकता है इस मामले से साफ हो जाता है।
जैसे जब बीफ बैन को लेकर मुसलमानों और इसाइयों को टारगेट किया गया तो जैन समुदाय हमेशा हिन्दुत्व ब्रिगेड की तरफ गिन लिया जाता होगा। अब उन्हीं हिन्दुत्व पार्टियों के निशाने पर जैन गए हैं। इन दोनों मामले में एक चीज़ कॉमन है। वो ये कि मुसलमान, ईसाई और जैन तीनों अल्पसंख्यक हैं। जैन भी मुसलमानों की तरह कम से कम राजनीतिक बोलचाल में टारगेट हो रहे हैं। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पार्टी मुखपत्र सामना में लिखा है, 'जैन धर्मांध बनें। उनकी धर्मांध मानसिकता उन्हें हिंदुओं का दुश्मन बना देगी। बिलकुल वैसे ही जैसे धर्मांध मुसलमान हिंदुओं के दुश्मन बन गए। इसलिए पर्यूषण का आडंबर किया जाए। पर्यूषण में हिंसा ना करने का आग्रह करते जैन क्या इन दिनों ब्लैक मनी लेना बंद कर देंगे। मुंबई में ज़्यादातर बिल्डर जैन हैं। क्या वे अपने सौदे में पर्यूषण काल में काला धन नहीं लेंगे। हिंसा विचारों में भी होती है। याद रखें कि 92-93 के दंगों में इस जैन समाज के कारोबार की रक्षा शिवसेना ने की थी। और ये भी ना भूलें कि जैन लोगों के कारोबार को उखाड़ फेंकने में हमें ज़्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए कह देता हूं कि जिसे जो खाना है, खाने दो।'
ऐसी धमकी किसी समाज को और किसी को एतराज़ तक नहीं। क्या जैन समाज के तुष्टिकरण के विरोध के नाम पर मराठी मानुष का तुष्टिकरण नहीं हो रहा है। जैसे मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर हिन्दू तुष्टिकरण होता है। जैन समाज के साम्राज्य को नष्ट करने की धमकी देने वाली शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र में बीजेपी की सहयोगी पार्टी है। मोदी सरकार में शिवसेना का मंत्री है। महाराष्ट्र में शिवसेना बीजेपी से मिलकर सरकार चला रही है। हिन्दू मुस्लिम वाला मामला होता तो सेकुलर को सिकुलर बताकर ट्वीट करने वाले भाड़े के देशभक्त जाते लेकिन जैन समाज को ऐसी धमकी के बाद भी चुप्पी नज़र आती है। यह सवाल तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी पूछा जाना चाहिए कि आपकी सहयोगी पार्टी जैन समाज को बर्बाद करने की धमकी दे रही है। क्या आप कोई ट्वीट करेंगे। हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में पर्युषण के दौरान मीट बैन करने वाली बीजेपी मुंबई में जैन समाज के खिलाफ हो रही इन बातों को कैसे देखती है। क्या वो भी चुप है जैसे जैन चुप नज़र आते हैं। क्या इसलिए चुप है कि उसके सामाजिक नेता मुस्लिम-ईसाई विरोध की राजनीति के खिलाफ खड़े हो सके या इसलिए चुप हैं कि उनकी कोई नहीं सुनेगा। क्या इस मुल्क में हमेशा बहुसंख्यक तय करेगा। क्या तय करने की राजनीति का लाभ कभी भी अल्पसंख्यक को नहीं मिलेगा।
पर्युषण पर्व आठ से दस दिनों तक चलने वाला पर्व है। कहीं दो दिन का मीट बैन है तो कहीं चार दिन तो कहीं आठ दिन। चिकन, मटन पर बैन है, मछली पर बैन नहीं। उत्तर भारत में नवरात्र और सावन के महीने में बड़ी संख्या में लोग मांसाहार बंद कर देते हैं। बिहार में छठ के दौरान मांसाहार बंद हो जाता है लेकिन कोई बैन नहीं करता। इस तरह की मांग की भी अपनी एक समस्या है। अब यह बात निकल कर रही है कि मुंबई छह में जहां गुजराती, मारवाड़ी और जैन समाज के प्रभावशाली लोगों का बहुमत है वहां एक भी दुकान मांसाहार का नहीं है। यह अपने आप हो गया या किसी मांसाहारी रेस्त्रां को खुलने नहीं दिया गया। दरअसल सब अपनी अपनी कट्टरता के मारे हैं। लेकिन मांसाहार पर बैन कोई नई बात नहीं है। गणेश चतुर्थी के दिन भी मांसाहार पर रोक होती है। इस तरह सूची लंबी हो सकती है। मनसे ने तो प्रस्ताव पास किया था कि जो बिल्डर किसी मांसाहारी को फ्लैट नहीं बेचेगा उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
इस बीच यह मामला मुंबई हाईकोर्ट भी पहुंच गया है। शुक्रवार को भी इस पर सुनवाई होगी। अदालत ने अपनी शुरूआती टिप्पणी में कहा है कि जैन पर्व के लिए जानवरों को मारने और मीट बेचने पर चार दिन की पाबंदी मुबई जैसे मेट्रोपॉलिटन शहर के लिए व्यावहारिक नहीं है। मीट पर ऐसी सीधी पाबंदी कोई फॉर्मूला नहीं हो सकती। मारने और मीट बेचने पर पाबंदी है। अन्य स्रोतों का क्या? बाज़ार में पहले से मौजूद पैकेज्ड मीट का क्या होगा?
उद्धव ठाकरे जी ने जैन समाज का जो चित्रण किया है उससे उन्हें भी समस्या होनी चाहिए। सभी को तो होनी ही चाहिए। लेकिन मुंबई में ज्यादातर बिल्डर जैन हैं और वे काला धन लेते हैं ये अच्छा नहीं हो रहा है। क्या किसी भी समाज को बुरा कह देना सही है, किसी को गद्दार, किसी को दंगाई, किसी को बीमारी वाला तो किसी को पाकिस्तान भेजने की बात करके कोई भी निकल जाता है, और हमारे देश की सरकार सोती रहती है. हमारे प्रधानमंत्रीजी ने लाल किले से कहा था क़ि सांप्रदायिकता जहर है, अगले 10-15 सालों तक ऐसा कुछ भी होना ही नहीं चाहिए क्या अब प्रधानमंत्री या सरकार उद्धव ठाकरे के खिलाफ कुछ कार्यवाही करेंगे पहले जब मुंबई से यूपी वालों को निकालने की बात होती थी, तो सब खुश थे, आज सबको क्यों बुरा लग रहा है दरअसल यह बहुसंख्यक सांप्रदायिकता की मानसिकता ही जहर है, यह आज मुस्लिमों को पाकिस्तान भेज रहे हैं, कल सिखों को, फिर जैन फिर हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बोलने लग जाएँगे। इसको रोंकेने के लिए सरकार को मजबूती से कदम उठाने चाहिए. उनको सज़ा मिलनी चाहिए चाहे फिर ओवैसी हों, कोई गिलानी हो या फिर तोगड़िया, वरुण गाँधी, गिरिराज या साक्षी महाराज या फिर भाजपा का कोई सहयोगी

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