क्या आपको पता है, क़ि भारत सरकार श्रम क़ानूनों में एक बड़ा बदलाव करने जा रही है. यह बदलाव मजदूर विरोधी हैं. ठीक उसी तरह सरकार अभी इनपर अपनी सफाई दे रही है, जैसी पहले भूमि अधिग्रहण क़ानून पर दे रही थी. अंततः सरकार को जनता के आगे झुकना ही पड़ा ना? फिर क्यों सरकार फिर से ऐसे क़ानून लेकर आ रही है?
इन क़ानूनों के बदलाव में महत्वपूर्ण बात यह है क़ि सरकार मजदूरों के सारे के सारे अधिकार छीन रही है. उदाहरण के तौर पर मजदूरों के यूनियन बनाने के अधिकार, मजदूरों का हड़ताल करने का अधिकार. हड़ताल करने के लिए अब 14 या 21 दिन पहले सरकार को नोटिस देना पड़ेगा. इतने दिनों मे तो कंपनी नए मजदूरों को लेकर आ जाएगी. फिर तो उन मजदूरों की हड़ताल का कुछ मतलब ही नहीं रह जाएगा. सरकार इसमें आप्रेंटिन्स(प्रशिक्षु) क़ानून में भी बदलाव कर रही है. बदलाव में यह बात सबसे प्रमुख है क़ि एक आप्रेंटिस वर्कर को पहले साल न्यूनतम मज़दूरी (6200) का 70% (4340), दूसरे साल में न्यूनुतम मज़दूरी का 80% (4960) और तीसरे साल में न्यूनतम मज़दूरी का 90% अर्थात 5580 रुपए ही मिलेगा. तब कहीं जाकर वो वर्कर चौथे साल में 6200 रुपए का हकदार बनेगा. इसीलिए सरकार से मजदूरों की माँग है क़ि उनकी न्यूनतम मज़दूरी 15000 रुपए की जाए. यह माँग पूरी तरह से सही भी है, क्योंकि ऐसी भारी मंहगाई में 5-6 हज़ार रुपए में मजदूर क्या खाएगा और क्या बचाएगा? मुझे तो ऐसा लगता है कि मोदी जी यह क़ानून अपने उद्योगपति मित्रों के लिए करवा रहे हैं. वो खुद चुनाव के दौरान चिल्ला चिल्लाकर कहते थे क़ि वो भी मजदूर के बेटे हैं, आज वो मजदूरों के दुश्मन क्यों बनते जा रहे हैं?
इन क़ानूनों के बदलाव में महत्वपूर्ण बात यह है क़ि सरकार मजदूरों के सारे के सारे अधिकार छीन रही है. उदाहरण के तौर पर मजदूरों के यूनियन बनाने के अधिकार, मजदूरों का हड़ताल करने का अधिकार. हड़ताल करने के लिए अब 14 या 21 दिन पहले सरकार को नोटिस देना पड़ेगा. इतने दिनों मे तो कंपनी नए मजदूरों को लेकर आ जाएगी. फिर तो उन मजदूरों की हड़ताल का कुछ मतलब ही नहीं रह जाएगा. सरकार इसमें आप्रेंटिन्स(प्रशिक्षु) क़ानून में भी बदलाव कर रही है. बदलाव में यह बात सबसे प्रमुख है क़ि एक आप्रेंटिस वर्कर को पहले साल न्यूनतम मज़दूरी (6200) का 70% (4340), दूसरे साल में न्यूनुतम मज़दूरी का 80% (4960) और तीसरे साल में न्यूनतम मज़दूरी का 90% अर्थात 5580 रुपए ही मिलेगा. तब कहीं जाकर वो वर्कर चौथे साल में 6200 रुपए का हकदार बनेगा. इसीलिए सरकार से मजदूरों की माँग है क़ि उनकी न्यूनतम मज़दूरी 15000 रुपए की जाए. यह माँग पूरी तरह से सही भी है, क्योंकि ऐसी भारी मंहगाई में 5-6 हज़ार रुपए में मजदूर क्या खाएगा और क्या बचाएगा? मुझे तो ऐसा लगता है कि मोदी जी यह क़ानून अपने उद्योगपति मित्रों के लिए करवा रहे हैं. वो खुद चुनाव के दौरान चिल्ला चिल्लाकर कहते थे क़ि वो भी मजदूर के बेटे हैं, आज वो मजदूरों के दुश्मन क्यों बनते जा रहे हैं?
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