Sunday, July 31, 2016

मुंशी प्रेमचंद की जन्मदिन विशेष टिप्पणी

आज हिन्दी के महान उपन्यासकार, साहित्य लेखक मुंशी प्रेमचंद का जन्म दिन है। मैं बचपन से ही उन्हें पढता रहा हूँ। उनकी जीवन शैली, कहानी हिंदी के सिलेबस में थी। फिर जब रवीश का फैन होकर लिखने के बारे में सोच रहा था तब पता चला कि गूगल से ज्यादा किताबें पढ कर तैयारी करें तो मैं फिर से मुंशी प्रेमचंद को पढने लगा। उनकी सब कहानियां और उपन्यास पढ डाले मुस्किल से कोई छूटा हो। ऐसा नशा था कि दो रात में गबन जैसी बडी किताब खत्म कर दी।
फिर आज के ही दिन 2013 में पहला ब्लाग लिखा था, मुंशी प्रेमचंद के साहित्य योगदान के लिए। तब से वो सिलसिला जारी है। रवीश कुमार का लमही (प्रेमचंद की जन्म भूमि) वाला प्रोग्राम तो 15 से अधिक बार देखा है। अब तो कानून के आगे साहित्य पढने का समय कम ही मिलता है लेकिन समय मिलते ही पूस की रात, सवा सेर गेहूँ जैसी कहानी पढ लेता हूँ। नमक का दरोगा तो हर साल पढता हूँ, यही वजह है कि मैं अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं कर सकता। मेरे कमलेश होने में मुंशी प्रेमचंद का बहुत बडा हाथ है। मेरी विचारधारा बदली है उन्हें पढकर।  गरीब समर्थक, सामंतवाद विरोधी, सेकुलर और जातिवाद विरोधी उन्हें पढकर ही हुआ मैं। समाज में चल रही असमानता और दमन को सही ढंग से समझा। कहानियाँ पढते पढते खूब रोया हूँ। आज भी रात में उन्हें पढा और सपने में देखा। मेरे जूनियर को एक बडी परिक्षा के लिए तैयार करना है तो आज के दिन ही उसको दो बैलों की कहानी पढने को दी। क्योंकि उसकी लगातार पढने की आदत छूट गई है तो उसे आदत डालना है। क्योंकि आज की जेनरेशन तो मोबाइल और गूगल वाली है जिसे पढना कम पसंद है।

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