Saturday, January 7, 2017

कागजों पर बीजेपी सबपर भारी



उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां हमेशा चतुष्कोणीय मुकाबला रहा है और जीत के लिए किसी दल को महज 25 से 30 पर्सेंट वोट की जरूरत रहती है। आम चुनाव में बीजेपी ने 324 सीटों पर 30 पर्सेंट से अधिक वोट हासिल किए थे। 253 सीटों पर यह आंकड़ा 40 पर्सेंट से अधिक था और 94 सीटों पर तो बीजेपी को 50 पर्सेंट से भी अधिक वोट मिले थे। 2012 में समाजवादी पार्टी को महज 15 सीटों पर ही 50 पर्सेंट से अधिक वोट मिले थे। 2014 में बीएसपी और एसपी को संयुक्त रूप से मिले वोटों से अधिक वोट बीजेपी को मिले थे। ऐसे में यह अनुमान निकाला जा सकता है कि 2014 के तीन साल बाद भी बीजेपी कम से कम जीत की राह तो तय कर ही सकती है। हालांकि इस विश्लेषण के खिलाफ एक तर्क यह है कि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वोटर अलग ट्रेंड के साथ वोटिंग करते हैं। यह एक ऐसा मिथक है, जिसे चुनावों में हमेशा इस्तेमाल किया जाता रहा है। आमतौर पर लोग राज्य और देश के चुनावों में मतदान के वक्त दोनों सरकारों के कामकाज का भी आकलन करते हैं। इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यदि आम चुनाव के साथ किसी राज्य के विधानसभा चुनाव होते हैं तो करीब 77 पर्सेंट वोटर एक ही पार्टी को दोनों जगह वोट करते हैं। इसके बाद भी यदि कोई कहता है कि मतदाता आम चुनाव से अलग ट्रेंड पर चलकर विधानसभा चुनाव में वोट करेंगे, तब भी सिर्फ यही एक वजह बीजेपी की हार का कारण नहीं बन सकती है। यदि बीजेपी को इन विधानसभा चुनावों में 200 से कम सीटें मिलती है और वह राज्य की सत्ता से दूर रहती है तो इसका सीधा अर्थ होगा कि उसके 15 पर्सेंट वोटर्स ने दूसरी पार्टी पर भरोसा जताया। यदि कोई दो विपक्षी पार्टियां एक साथ आती हैं तो बीजेपी को 2014 में मिले वोटों में 10 पर्सेंट का नुकसान झेलना पड़ेगा। यदि ऐसा होता है तो बीजेपी को 200 से कम सीटों पर ही संतोष करना पड़ सकता है। 2015 में बिहार में बीजेपी को 2014 के मुकाबले 4 पर्सेंट कम वोट मिले थे और करारी हार झेलनी पड़ गई थी। इस तरह यदि यूपी में बीजेपी बिहार की तुलना में 4 गुना खराब प्रदर्शन करे, तभी हार का सामना करना पड़ेगा।

No comments:

Post a Comment

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...