Sunday, June 25, 2017

इमरजेन्सी की कहानी

तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने एक लिखित प्रस्ताव पेश किया जाता है। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चार लाइन के इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हैं और अगले दिन से ही देशवासियों के सारे नागरिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं। हजारों लोगों की गिरफ्तारियां होती हैं और यातनाओं का दौर शुरू हो जाता है। आज 40 साल बाद देश इसे "आपातकाल' के भयानक दौर के रूप में याद करता है।
25, जून 1975 के दिन दोपहर के साढ़े तीन बजे थे। इंदिरा गांधी के दिमाग में दूर-दूर तक यह ख्याल नहीं था कि कोई आंतरिक आपातकाल जैसी स्थिति भी होती है। जेपी के आंदोलनों से परेशान इंदिरा ने अपने विश्वसनीय और प. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे से कहा कि वे उन्हें संविधान की कोई कमजोर कड़ी बताएं। रे ने घंटों तक संविधान के पन्ने पलटे। अंतत: उन्हें वह तोड़ मिल गया, जो इंदिरा चाहती थीं। आर्टिकल 152, उसी शाम इंदिरा और रे राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे। इधर, इंदिरा राष्ट्रपति के दस्तखत ले रही थीं और उधर गिरफ्तारी के लिए विपक्ष के नेताओं की सूची बन रही थी। दूसरे दिन यानी 26 जून, 1975 को इंदिरा ने आल इंडिया रेडियो पर आपातकाल की घोषणा कर दी।
तत्कालीन केन्द्र सरकार ने अपने राजनीतिक विरोधियों जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चन्द्रशेखर, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव सहित अन्य नेताओं को चुन-चुन कर जेल भिजवा दिया, लेकिन देश में इन्दिरा की तानाशाही और अत्याचार के विरुद्ध लोगों का आंदोलन भीतर ही भीतर सुलगने लगा था। लोगों की जनसभाएं कांग्रेस की कुरीतियों के विरुद्ध जारी थीं। आपातकाल हटने के बाद कांग्रेस की आम चुनाव में हुई करारी हार ने न केवल इन्दिरा गांधी के तिलिस्म को तोड़ दिया, बल्कि बड़े-बड़े धुरंधरों को मुंह की खानी पड़ी। आज आपातकाल के 40 वर्ष बाद भी उसका दंश झेल चुके लोगों की आंखें भर आती हैं।
उस दौरान पुलिस-प्रशासन द्वारा प्रताड़ना का शिकार हुए लोग आज भी आपातकाल की भयावह कारा के बारे में सोचकर कांप उठते हैं। उन पर हुए अत्याचारों, दमन और अमानवीय कृत्यों के जख्म आज भी ताजा हैं। आपातकाल यानी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा लोकसभा चुनाव में अयोग्य ठहराए जाने के फैसले से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी इस कदर बौखला गई थीं कि उन्होंने आपातकाल लगवा दिया। आपातकाल की इस आपाधापी में पुलिस भूमिका किसी खलनायक से कम न था क्योंकि अपने ही देश की पुलिस के अत्याचार ब्रिटिश राज के अत्याचारों को भी मात दे रहे थे। जो जहां, जिस हालत में मिला उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के सीआईडी विभाग वाले नजर बनाए रहते थे। देश के नामीगिरामी राजनेताओं को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया गया, आम व्यक्ति की तो हैसियत ही क्या थी। पुलिस की दबिश के डर से घर के घर खाली हो गए और लगभग प्रत्येक परिवार के पुरुष सदस्यों को भूमिगत होना पड़ा। वे लोग हर दिन अपना ठिकाना बदलने को विवश थे। मीडिया पर पाबंदी लगाकर सरकार ने खूब मनमानी की। आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने नसबंदी अभियान चलाया। शहर से लेकर गांव-गांव तक नसबंदी शिविर लगाकर लोगों के ऑपरेशन कर दिए गए।
आपातकाल को कोई आजाद भारत के इतिहास का सबसे अलोकतांत्रिक कालखंड मानता है तो कोई इसे जायज ठहराता है।

Friday, June 23, 2017

मीरा कुमार बनाम कोविंद

राष्ट्रपति चुनाव में अगर विपक्ष को एक प्राक़तिकात्मक उम्मीदवार ही बना कर खड़ा करना था, तो सबसे बेहतर नाम मीरा कुमार का ही है. क्योंकि जब बात दलित के राष्ट्रपति बनने की हो, तो मीरा कुमार इस तरह के दो सामाजिक प्रतिनिधित्व करती हैं. उनकी मजबूत उम्मीदवारी होने के दो कारण हैं, पहला तो उनका आधी आबादी (महिलाओं) का प्रतिनिधित्व करना और दूसरा दलित प्रतिनिधित्व. दूसरी तरफ भाजपा ने सबको चौंकाते हुए एक ऐसे उम्मीदवार का नाम आगे किया है जिनके दम पर पूरे देश में बीजेपी राष्ट्रवाद को आगे करके दलितों इसकी आंड में हुए अत्याचार को कवर करने की कोशिश की है. देश के अधिकतर दलों को इस दलित कार्ड के नाम पर आम सहमति के साथ खड़ा करने की कोशिश की है. कल नीतीश कुमार का एनडीए को समर्थन उसका ही एक नतीजा था. मुझे अभी भी उम्मीद है क़ि नीतीश कुमार अपने फ़ैसले को बदल सकते हैं. शायद उन्हें उम्मीद नहीं रही होगी क़ि मीरा कुमार का नाम भी सामने आ सकता है. जबकि शरद यादव और केसी त्यागी जैसे उनके बड़े नेता आज शाम तक का इंतजार करने की बात कर रहे थे. मुझे ऐसा लगता है क़ि मीरा कुमार गुणों के दम पर कोविंद से मजबूत उम्मीदवार हैं. क्योंकि उनका सांसदीय अनुभव भी अच्छा ख़ासा है, और उनके लोकसभा स्पीकर रहते हुए किसी दल के मतभेद या राजनीतिक विरोध नहीं हुआ. वो सर्वमान्य, सम्मानित और देश के एक बड़े नेता की बेटी हैं. इसलिए मुझे लगता है क़ि सबको उनका समर्थन करना चाहिए.

किसानों पर होती राजनीति

दो खबरें देखी जिनको देखकर अंदर से हिल गया. पहली खबर थी, पंजाब की जहाँ किसान ने अपने छोटे से बेटे को पेट में बँधकर नहर में कूदकर आत्महत्या कर ली. क्योंकि उसको पता था क़ि उसका बेटा बड़ा ह होकर जिंदगी भर में उसका कर्ज़ नहीं चुका पाएगा. 
दूसरा सीन महाराष्ट्र का है जहाँ एक लड़की ने अपने घर के ही कुएँ में कूदकर जान दे दी. सुसाइड लेटर में लिखा हुआ कारण था क़ि पिछले तीन सालों से सूखे के कारण पिता पर इतना कर्ज़ था जो जिंदगी भर में ना चुका पाएँगे. जबकि उसकी शादी के लिए और भी कर्ज़ लेने की ज़रूरत पड़ेगी. वो नहीं चाहती थी, क़ि उसका बाप उसके कारण और भी कर्ज़ में दबे और एक दिन फाँसी से लटक जाए. 
अब आते हैं इसपर होने वाली राजनीति पर आज हमारे देश के शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू का एक बयान आया जिसमें उन्होने कहा क़ि किसानों की कर्ज़ माफी का एक ट्रेंड या फैशन चल गया है. जबकि अगर बात किसानों के कर्ज़ माफी की है तो अभी हाल ही में 4 राज्यों में माफ़ हुए कर्जे की राशि 85 हज़ार करोड़ ही होती है. जबकि केवल एक कॉरपोरेट भूषण स्टील का 80 करोड़ का लोन माफ़ करने का प्लान कर लिया है. मतलब ग़रीब का लोन माफ़ करने के समय सरकार को फ़िजिकल डिफीसिट की बात करती है, जबकि कॉरपोरेट का लोन राइट ऑफ कहलाता है. जबकि सरकार को किसानों के साथ इसलिए खड़ा रहना चाहिए क्योंकि उसने अपना पेट काटकर देश को सस्ता आनाज उपलब्ध कराया है. हमारे देश में आजकल एक और तरह के अर्थशास्त्री पैदा हो गये हैं, जो कहते हैं क़ि फसलों के दाम इसलिए गिरे क्योंकि देश में फसल उत्पादन अधिक हो गया था. हमने आजतक हमेशा पढ़ा और सुना है क़ि अधिक प्रोडक्शन हमेशा फयदेमंद होता है जबकि यहाँ उल्टा है अधिक प्रोडक्शन से नुकसान कैसे हो सकता है? जबकि हरित क्रांति की शुरूआात में उसके नीति निर्मात्ताओं ने एमएसपी का नियम ही ये सोचकर रखा था क्योंकि किसानों को बाजार के भरोसे पर ना रहना पड़े. क्योंकि बाजार तो माल की मात्रा और उपभोक्ताओं पर निर्भर करता है, जबकि इस सबमें सरकारी नीतियों का सबसे अहम रोल होता है. किसान कभी नहीं कहता है क़ि उसका लोन माफ़ कर दो, उसको तो केवल फसल का असली दाम चाहिए. अभी तक देश के किसानो पर 12 लाख करोड़ का लोन है, जबकि माफ़ केवल 12% मतलब 1लाख 40 हज़ार करोड़ ही हुआ है. 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने हलफ़नामा देकर बताया है क़ि एमपी में 2015 में 581 किसानों ने आत्महत्या की और देश में यह आकड़ा हर साल 12 हज़ार तक पहुँच जाता है. अक्सर सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है क़ि किसानों ने बैंक से लोन लेने के कारण आत्महत्या नहीं की है. जबकि अभी हाली ही में आई एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है क़ि देश में हुई आत्महत्याओं में 70 फीसदी केवल बैंक लोन से परेशान होकर की गई होती हैं. हमारे नीति निर्माता ऐसे हैं जो किसानों का दर्द समझने को तैयार ही नहीं हैं. एक बॅंकिंग नियम है क़ि अगर नया ट्रैक्टर खरीदना है तो उसपर 12% ब्याज लगेगा और अगर पुराना खरीदा तो उसपर लिए हुए लोन पर 20% ब्याज देना पड़ेगा. जो मर्सडीज के लिए गए लोन  पर लगने वाले ब्याज से बहुत अधिक होता है. 
अभी हाल ही में 12 कंपनियों के 10 लाख करोड़ के लोन पर चर्चा हो रही थी, जिसमें से 7 लाख करोड़ तो केवल राइट ऑफ होने की कगार पर है. जबकि जो लोन किसानों का माफ़ हो रहा है वो केवल 1 लाख 40 हज़ार करोड़ है और उससे 15 लाख किसानों को फायदा होगा. वहीं  चंद टेलीकॉम सेक्टर में 4 लाख करोड़ का लोन राइट ऑफ करने की तैयारी चल रही है. देश में जो नॉन परफ़ार्मिंग एसेट है, उसमें 70% कॉरपोरेट और केवल 1% किसानों का है. 
देश में किसानों की किसी को नहीं पड़ी है, वो मर जाएँ, या लुट जाएँ कोई फ़र्क नहीं पड़ता किसी को. 70% किसानों के पास केवल 1 हेक्टेयर ज़मीन है. और बाकी बचे किसानों की भी हालत अच्छी नहीं है. पिछले 5 साल से किसानों को एमएसपी के नाम पर लूटा जा रहा है. एनएसओ के आकड़े के हिसाब से 80-83% किसानों की 3000 से भी कम आमदनी  है, ऐसे में अगर सरकार 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का दावा भी करती है, तो कौन सा बड़ा तीर मार लेगी? ये किसान तबतक मरते रहेंगे जबतक किसानों को उनके हक नहीं मिलेंगे. आपको पता हो क़ि 45 साल में गेहूँ का एमएसपी केवल 19% बढ़ा है, वहीं इन्हीं 45 सालों में सरकारी नौकरियों में कर्मचारियों के भत्ते 150-180 % तक बढ़ाए गए हैं. अगर ये सरकार उनके लिए भी 5वें वेतन आयोग के बाद सेलरी न बढ़ाती तो वो भी आत्महत्या करने लगते, नौकरी छोड़ने लगते. इसलिए कम से कम मोदी जी जो खुद को ग़रीब का बेटा कहते हैं वो तो न स्वामी नाथन कमेटी की सभी सिफारिशें लागू कर पाएँ तो अपने वादे (लागत मूल्य का 50% मुनाफ़ा) ही निभा दें. अन्यथा ये फसल बीमा वीमा से कुछ नहीं केवल प्राइवेट बीमा कंपनियों का ही फ़ायदा होगा न क़ि किसान का. 

Friday, June 16, 2017

गुजरात में कांग्रेस की नई चाल

गुजरात में बीजेपी को चुनौती देने की आधी ईमानदार कोशिश भी कांग्रेस के लिए गेम चेंजर साबित होती. यह असंतुष्‍ट पार्टी कार्यकर्ताओं में भी नया जोश पर देती जो लगातार मिल रही हार के कारण धीरे-धीरे पार्टी से दूर होते जा रहे हैं और जिन्‍होंने राहुल गांधी को नेता के रूप में और गंभीरता से लेने का मौका दिया. तो आप सोचेंगे कि गांधी परिवार के वंशज और उनकी पार्टी इस साल के आखिर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए कड़ा परिश्रम कर रहे हैं जिसकी उन्‍हें जरूरत है. लेकिन अब कांग्रेस वैसी नहीं होगी, क्‍या होगी? बीजेपी के दलबदलू और अब कांग्रेस के बागी शंकरसिंह वाघेला की मंगलवार को सार्वजनिक रूप से अपनी ताकत दिखाने की योजना है जिसमें वह दिखाना चाहते हैं कि पार्टी के 57 विधायक उनके साथ हैं. गुजरात में कांग्रेस के प्रभारी और पार्टी के महासचिव अशोक गहलोत रविवार को भरतसिंह सोलंकी के साथ वाघेला के घर लंच पर गए थे. सोलंकी गुजरात कांग्रेस के अध्‍यक्ष हैं और वाघेला के मुख्‍य प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं. सोलंकी ने फोन पर बताया, 'मुझे अभी तक नहीं पता कि बापू (वाघेला) की समस्‍या क्‍या है. मैं तीसरी पीढ़ी का कांग्रेसी हूं और गुजरात में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए हर कुर्बानी देने को तैयार हूं. मैं आपसे पहली बार कह रहा हूं कि मैंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया है और मैंने पार्टी को यह भी बता दिया है कि मुख्‍यमंत्री पद के लिए मैं कोई दावेदार नहीं हूं. इस सबके बावजूद अगर उनको कोई दिक्‍कत है, तो अब मैं और क्‍या कह सकता हूं?' उन्‍होंने आगे कहा, 'गुजरात में जबरदस्‍त सरकार विरोधी लहर है और पूरी टीम क्षेत्र में यह सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है कि हम जीतें. अगर कोई इस लड़ाई में शामिल नहीं होना चाहता, तो मैं क्‍या कह सकता हूं? बापू मुझसे कहीं बड़े हैं, मैं उनका आदर करता हूं.' वाघेला ने सोलंकी की टिप्‍पणी पर या फिर अपनी योजनाओं पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उनके सहयोगियों ने बताया कि मंगलवार को उनका शक्ति प्रदर्शन पार्टी को उनका जवाब होगा. (7 हफ्ते पहले भी अपने घर पर उन्‍होंने ऐसी ही बैठक बुलाई थी जिसमें कांग्रेस के 57 में से 37 विधायक शामिल हुए थे.) वाघेला ने कथित रूप से मांग की है कि सोलंकी की जगह उन्‍हें गुजरात में कांग्रेस अध्‍यक्ष बनाया जाए और साथ ही उन्‍हें मुख्‍यमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित किया जाए. कांग्रेस सोलंकी को अध्‍यक्ष पद से हटाने को तैयार है लेकिन उनकी जगह वाघेला जो कि एक राजपूत नेता हैं, को नहीं बल्कि सोलंकी की तरह ही किसी ओबीसी नेता को राज्‍य में पार्टी की कमान सौंपना चाहती है. राहुल गांधी इस बात को लेकर अड़े हुए हैं कि वह वाघेला को चुनाव से पहले मुख्‍यमंत्री पद का उम्‍मीदवार भी घोषित नहीं करेंगे. सभी वर्तमान विधायकों को टिकट देने की सार्वजनिक घोषणा कर कांग्रेस को यकीन है कि उसने वाघेला के विद्रोह को दबा दिया है. वाघेला के सहयोगी इस पर हंसते हैं और कहते हैं, विधायक जीतना और सरकार का हिस्‍सा बनना चाहते हैं लेकिन दिल्‍ली के नेता संभवत: दो दशकों से राज्‍य में सत्ता पर काबिज बीजेपी सरकार के खिलाफ सत्ताविरोधी लहर को भुनाने का मौका गंवा रही है. वाघेला ने राहुल गांधी के साथ अपनी नाखुशी खुले तौर पर जाहिर कर दी है. वह राहुल के साथ होने वाली मुलाकातों में नहीं पहुंचे, ट्विटर पर उन्‍हें अनफॉलो भी कर दिया और बीजेपी अध्‍यक्ष अमित शाह के साथ खुलेआम बात भी की. बीजेपी भी राज्‍य में कांग्रेस पार्टी को तोड़ने के लिए उत्‍सुक हैं, क्‍योंकि गुजरात चुनाव अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के लिए प्रतिष्‍ठा की लड़ाई है और कांग्रेस में फूट पड़ने के बाद मिलने वाली यह जीत दोनों के लिए ज्‍यादा ही मीठी होगी. बीजेपी के सूत्र दावा करते हैं कि अमित शाह का सपना भी खुद गुजरात का मुख्‍यमंत्री बनने का है, लेकिन फिलहाल उनके लिए निश्चित रूप से मिशन 2019 से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण कुछ भी नहीं है. गुजरात के एक कांग्रेस नेता ने कहा, 'यूपी में जहां कि चतुष्‍कोणीय मुकाबला था, अपनी सारी ऊर्जा खर्च करने की बजाय राहुल गांधी को गुजरात पर ध्‍यान केंद्रित करना चाहिए था, जहां बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस अकेली पार्टी है, विशेषकर पाटीदार आंदोलन और मेहसाणा में दलितों के प्रदर्शन के बाद.' राहुल गांधी को साल भर के लिए गुजरात में ही रहना चाहिए था और खुद इन प्रदर्शनों का नेतृत्‍व करना चाहिए था. हमने उन्‍हें राजी करने की कोशिश की थी लेकिन नाकाम रहे. इसलिए अब हम परिचित परिदृश्‍य की ओर देख रहे हैं, यानी - हार.'
गुजरात के एक स्‍थानीय नेता ने बताया, 'वास्‍तव में पाटीदारों के युवा नेता हार्दिक पटेल को कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेताओं द्वारा तब झिड़की मिली थी जब उन्‍होंने अपने संदेशवाहकों को भेजा था, जिसके बारे में बताया भी नहीं जा सकता.' उनमें से एक ने व्‍यंग्‍यपूर्वक कहा, 'इस उम्र में भी बापू में सत्ता की जबर्दस्‍त भूख है. ऐसा लगता है कि हमारे नेताओं में सत्ता पाने की इच्‍छा ही नहीं है. गोवा के मामले को ही देखें, जहां हमने हार को जीत में बदल दिया.' कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता कहते हैं, अफवाहें जैसे कि वरिष्‍ठ पार्टी नेता अहमद पटेल के बेटे फैसल भी गुजरात चुनाव लड़ेंगे, जो कि बिल्‍कुल गलत है, का भी कांग्रेस द्वारा खंडन नहीं किया जा रहा है. एक कांग्रेसी नेता ने कहा, 'वे (बीजेपी) इन चीजों का इस्‍तेमाल हमें वंशवादी पार्टी बताकर खारिज करने के लिए कर रहे हैं और हम उसका माकूल जवाब तक नहीं दे रहे.' गुजरात में दिसंबर से पहले विधानसभा चुनाव होने हैं, और मौजूदा स्थिति के अनुसार अक्‍टूबर में राहुल गांधी कांग्रेस की कमान संभालने वाले हैं. जब तक कोई चमत्‍कार न हो, उनके अध्‍यक्ष पद के कार्यकाल की शुरुआत एक और हार से हो सकती है.

Thursday, June 8, 2017

किसानों पर गोली क्यों चली?

मध्य प्रदेश में किसान अब सड़क पर हैं. लोग कह रहे हैं उन्हें खेतों में या गाय-भैंसों के बाड़े में होना चाहिए. वे फल, सब्जियां और दूध मैदान में बहा रहे हैं. शिक्षित लोग कह रहे हैं, उन्हें सब्जी, फल और दूध बर्बाद नहीं करना चाहिए. इससे किल्लत पैदा हो जायेगी और दाम बढ़ जायेंगे. मध्यमवर्गीय-शहरी समाज को सुबह की चाय न मिल पाएगी. आजकल सुबह की चाय के बिना पेट में दबाव नहीं बनता और मल प्रवाह बाधित होता है. वैसे किसानों में पिछले आठ-दस दिनों में समाज से लेकर सरकार तक के पेट में दबाव बन दिया है, पर मल फिर भी नहीं निकल पा रहा है. मंगलवार को मंदसौर में किसान प्रदर्शन के दौरान सरकार ने गोली चलवाई (बहरहाल सरकार इनकार कर रही है) और छः किसानों की मौत हो गयी. हमें यह समझना होगा कि बर्तानिया हुकूमत ने फूट डालो-राज करो और तकनीक आधारित आर्थिक विकास (जिसमें श्रम को गुलाम मान जाता है) की जो नीति स्थापित की है, वह केवल उनके दायरे तक ही सीमित नहीं रही. जब भी उपनिवेशवाद की स्थापना की पहल होती है, इन्हीं नीतियों को लागू किया जाता है. हमारी मौजूदा व्यवस्था में किसान और मजदूर राज्य के उपनिवेश हैं. इसे बनाए रखने के लिए राजनीतिक दलों के माध्यम से ऐसे संगठन भी खड़े किये जाते हैं, जो इन समाजों के बीच मौजूद रह कर उन्हें संगठित न होने दें और बदलाव के लिए खड़े न होने दें. मध्य प्रदेश में हाल ही में चल रहा घटनाक्रम यह साबित करता है कि कोई न कोई किसान संगठन राज्य के विस्तार के रूप में जरूर काम करता है. हिंसा किसी भी तरफ से हो, है तो अपराध ही. इसकी निंदा तो होनी ही चाहिए. इस अपराध की यह जवाबदेयता और सजा सुनिश्चित नहीं हुई, तो राज्य समाज का विश्वास खो देगा. हम जानते हैं कि प्रचलित रूप में राज्य व्यवस्था में राजनीतिक विचार और प्रशासनिक विचार का मेल होता है. मध्य प्रदेश में यह कहा जा रहा है कि नौकरशाही ने राज्य जनप्रतिनिधि नेतृत्व को भुलावे में रखा. यदि ऐसा है, तो मतलब साफ़ है कि जनप्रतिनिधि नेतृत्व समाज से विलग और जुदा हो चुका है. वह सचमुच मायावी व्यवस्था में खो गया है. यदि हमारी सरकार सच में समाज से जुड़ी होती तो उसे फसल बीमा सरीखे भांति-भांति से सम्मेलन करके ‘लोक धन’ खर्च करके लाखों लोगों की भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं पड़ती. पिछले कुछ सालों में केवल सम्मेलनों में ही अपनी सरकार ने 3400 करोड़ रुपये खर्च किये हैं. यही लोक धन किसानों तक पहुंचना चाहिए था, जो नहीं पहुंचा. मुझे लगता है कि प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी थी कि वह सरकार को ऐसे गैर जरूरी व्यय करने से रोकती, उसनें नहीं रोका. हमारे मीडिया की जिम्मेदारी थी कि वह इन्हीं किसानों और मजदूरों के मसले उठाकर सरकार को अपव्यय करने से रोकती लेकिन हमारा मीडिया भी उस सत्ता के पक्ष में खड़ा हुआ क्योंकि इसी से उन्हें भी राजस्व भी मिलने वाला था. जरा साम्प्रदायिक-शहरी-मध्यमवर्गीय हुए बिना सोचिये कि कि क्या किसान और मजदूर के बिना अपना एक दिन भी गुज़र सकता है? यदि नहीं गुज़र सकता, तो अपन चुप रहकर उनके खिलाफ़ क्यों हो जाते हैं? अतः यह मानना कि कोई एक व्यक्ति इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदारी है, उचित नहीं है. किसानों के संकट को देखने के बाद समझ नहीं आ रहा है कि अपनी ही सरकार पर अविश्वास कैसे करूं? यदि किसानों पर विश्वास करता हूं तो सरकार पर विश्वास करने का कोई बिंदु ही नहीं बचता. जरा यह देखिये. वर्ष 2006-07 में मध्य प्रदेश में खाद्यान्न का कुल उत्पादन 144.52 लाख मीट्रिक टन हुआ था. जो वर्ष 2015 में बढ़ कर 321.48 लाख टन हो गया. यानी दस सालों में उत्पादन में 222 प्रतिशत की वृद्धि हुई. मध्य प्रदेश में कुल सिंचित क्षेत्रफल वर्ष 2006 में 65.43 लाख हेक्टेयर था, जो दस साल बाद 2015 में बढ़ कर 103.01 लाख हेक्टेयर हो गया. पर तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद स्याह है. थोड़ा यह जान लें कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच मध्य प्रदेश में 19,768 किसानों ने आत्महत्या की है और यह क्रम लगातार जारी है. इसमें पिछले चार सालों में उन 768 किसानों की मृत्यु की संख्या शामिल नहीं है, जो फसल बर्बाद होने पर अपने खेतों में गए और या तो आघात से वहीं दम तोड़ दिया या घर वापस आकार चिरनिद्रा में लीन हो गए. इन दस सालों में मध्य प्रदेश में जोतों का आकार 2.2 हेक्टेयर से कम होकर 1.78 हेक्टेयर हो गया. इन्हीं दस सालों में मध्य प्रदेश में काश्तकारों की संख्या 110.38 लाख से घट कर 98.44 लाख पर आ गई. यानी 11.94 लाख काश्तकार कम हो गए. इसे विकास मत मानिए, क्योंकि काश्तकार खेतिहर मजदूर में बदल दिए गए हैं. इन दस सालों में मध्य प्रदेश में खेतिहर मजदूरों की संख्या 74.01 लाख से बढ़ कर 121.92 लाख हो गयी. क्या सरकार का वायदा यही था कि लोगों को मजदूर बनाया जाएगा. वस्तुतः मध्य प्रदेश में मजदूरों की संख्या में 47.92 लाख की बढ़ोतरी हुई. नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन की रिपोर्ट (क्रमांक 576/अप्रैल 2016 में जारी) के मुताबिक मध्य प्रदेश के 70.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवार खेती पर निर्भर हैं. इन कृषि परिवारों की कुल आय औसतन 6,210 रुपये मासिक थी, इसमें से खेती से आय का हिस्सा 4,016 रुपये था. इस औसत तो जरा खोलकर देखने पर पता चलता है कि आदिवासियों और दलितों की स्थिति और ज्यादा बुरी है. आदिवासी किसान परिवार की कुल मासिक आय 4,725 रुपये हैं, इसमें से 2,002 रुपये खेती से अर्जित होते हैं. जबकि दलित किसानों की मासिक आय 4,725 रुपये है, इसमें से 2,607 रुपये खेती से हासिल होते हैं. बहरहाल, अन्य पिछड़ा वर्ग के खेती आधारित परिवार 7,823 रुपये की आय हासिल करते हैं, जिसमें से 5,534 रुपये का योगदान खेती करती है. यह जरूरी नहीं कि हम अभी चल रहे किसान आंदोलन को सामाजिक वर्ग आधारित नज़रिए से ही देखें, लेकिन यह जान लेना जरूरी है कि यह आंदोलन तुलनात्मक रूप से बड़े और ताकतवर किसानों के नेतृत्व का आन्दोलन है. छोटे और मझौले किसान इसके केन्द्र में नहीं हैं. बहरहाल खेती के सवाल और संकट सभी किसानों के लिए मायने रखते हैं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...