तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के सामने एक लिखित प्रस्ताव पेश किया जाता है। वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चार लाइन के इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते हैं और अगले दिन से ही देशवासियों के सारे नागरिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं। हजारों लोगों की गिरफ्तारियां होती हैं और यातनाओं का दौर शुरू हो जाता है। आज 40 साल बाद देश इसे "आपातकाल' के भयानक दौर के रूप में याद करता है।
25, जून 1975 के दिन दोपहर के साढ़े तीन बजे थे। इंदिरा गांधी के दिमाग में दूर-दूर तक यह ख्याल नहीं था कि कोई आंतरिक आपातकाल जैसी स्थिति भी होती है। जेपी के आंदोलनों से परेशान इंदिरा ने अपने विश्वसनीय और प. बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थशंकर रे से कहा कि वे उन्हें संविधान की कोई कमजोर कड़ी बताएं। रे ने घंटों तक संविधान के पन्ने पलटे। अंतत: उन्हें वह तोड़ मिल गया, जो इंदिरा चाहती थीं। आर्टिकल 152, उसी शाम इंदिरा और रे राष्ट्रपति से मिलने पहुंचे। इधर, इंदिरा राष्ट्रपति के दस्तखत ले रही थीं और उधर गिरफ्तारी के लिए विपक्ष के नेताओं की सूची बन रही थी। दूसरे दिन यानी 26 जून, 1975 को इंदिरा ने आल इंडिया रेडियो पर आपातकाल की घोषणा कर दी।
तत्कालीन केन्द्र सरकार ने अपने राजनीतिक विरोधियों जय प्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, चन्द्रशेखर, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव सहित अन्य नेताओं को चुन-चुन कर जेल भिजवा दिया, लेकिन देश में इन्दिरा की तानाशाही और अत्याचार के विरुद्ध लोगों का आंदोलन भीतर ही भीतर सुलगने लगा था। लोगों की जनसभाएं कांग्रेस की कुरीतियों के विरुद्ध जारी थीं। आपातकाल हटने के बाद कांग्रेस की आम चुनाव में हुई करारी हार ने न केवल इन्दिरा गांधी के तिलिस्म को तोड़ दिया, बल्कि बड़े-बड़े धुरंधरों को मुंह की खानी पड़ी। आज आपातकाल के 40 वर्ष बाद भी उसका दंश झेल चुके लोगों की आंखें भर आती हैं।
उस दौरान पुलिस-प्रशासन द्वारा प्रताड़ना का शिकार हुए लोग आज भी आपातकाल की भयावह कारा के बारे में सोचकर कांप उठते हैं। उन पर हुए अत्याचारों, दमन और अमानवीय कृत्यों के जख्म आज भी ताजा हैं। आपातकाल यानी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा लोकसभा चुनाव में अयोग्य ठहराए जाने के फैसले से तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी इस कदर बौखला गई थीं कि उन्होंने आपातकाल लगवा दिया। आपातकाल की इस आपाधापी में पुलिस भूमिका किसी खलनायक से कम न था क्योंकि अपने ही देश की पुलिस के अत्याचार ब्रिटिश राज के अत्याचारों को भी मात दे रहे थे। जो जहां, जिस हालत में मिला उसे जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस के सीआईडी विभाग वाले नजर बनाए रहते थे। देश के नामीगिरामी राजनेताओं को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया गया, आम व्यक्ति की तो हैसियत ही क्या थी। पुलिस की दबिश के डर से घर के घर खाली हो गए और लगभग प्रत्येक परिवार के पुरुष सदस्यों को भूमिगत होना पड़ा। वे लोग हर दिन अपना ठिकाना बदलने को विवश थे। मीडिया पर पाबंदी लगाकर सरकार ने खूब मनमानी की। आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने नसबंदी अभियान चलाया। शहर से लेकर गांव-गांव तक नसबंदी शिविर लगाकर लोगों के ऑपरेशन कर दिए गए।
आपातकाल को कोई आजाद भारत के इतिहास का सबसे अलोकतांत्रिक कालखंड मानता है तो कोई इसे जायज ठहराता है।
Sunday, June 25, 2017
इमरजेन्सी की कहानी
Friday, June 23, 2017
मीरा कुमार बनाम कोविंद
राष्ट्रपति चुनाव में अगर विपक्ष को एक प्राक़तिकात्मक उम्मीदवार ही बना कर खड़ा करना था, तो सबसे बेहतर नाम मीरा कुमार का ही है. क्योंकि जब बात दलित के राष्ट्रपति बनने की हो, तो मीरा कुमार इस तरह के दो सामाजिक प्रतिनिधित्व करती हैं. उनकी मजबूत उम्मीदवारी होने के दो कारण हैं, पहला तो उनका आधी आबादी (महिलाओं) का प्रतिनिधित्व करना और दूसरा दलित प्रतिनिधित्व. दूसरी तरफ भाजपा ने सबको चौंकाते हुए एक ऐसे उम्मीदवार का नाम आगे किया है जिनके दम पर पूरे देश में बीजेपी राष्ट्रवाद को आगे करके दलितों इसकी आंड में हुए अत्याचार को कवर करने की कोशिश की है. देश के अधिकतर दलों को इस दलित कार्ड के नाम पर आम सहमति के साथ खड़ा करने की कोशिश की है. कल नीतीश कुमार का एनडीए को समर्थन उसका ही एक नतीजा था. मुझे अभी भी उम्मीद है क़ि नीतीश कुमार अपने फ़ैसले को बदल सकते हैं. शायद उन्हें उम्मीद नहीं रही होगी क़ि मीरा कुमार का नाम भी सामने आ सकता है. जबकि शरद यादव और केसी त्यागी जैसे उनके बड़े नेता आज शाम तक का इंतजार करने की बात कर रहे थे. मुझे ऐसा लगता है क़ि मीरा कुमार गुणों के दम पर कोविंद से मजबूत उम्मीदवार हैं. क्योंकि उनका सांसदीय अनुभव भी अच्छा ख़ासा है, और उनके लोकसभा स्पीकर रहते हुए किसी दल के मतभेद या राजनीतिक विरोध नहीं हुआ. वो सर्वमान्य, सम्मानित और देश के एक बड़े नेता की बेटी हैं. इसलिए मुझे लगता है क़ि सबको उनका समर्थन करना चाहिए.
किसानों पर होती राजनीति
Friday, June 16, 2017
गुजरात में कांग्रेस की नई चाल
Thursday, June 8, 2017
किसानों पर गोली क्यों चली?
राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...
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इस समय पाकिस्तान में बड़ा ही अच्छा एक सीरियल आ रहा है, " बागी........." जो पाकिस्तान के प्रोग्रेसिव तबके और भारत में भी बहुत प...