Friday, June 23, 2017

किसानों पर होती राजनीति

दो खबरें देखी जिनको देखकर अंदर से हिल गया. पहली खबर थी, पंजाब की जहाँ किसान ने अपने छोटे से बेटे को पेट में बँधकर नहर में कूदकर आत्महत्या कर ली. क्योंकि उसको पता था क़ि उसका बेटा बड़ा ह होकर जिंदगी भर में उसका कर्ज़ नहीं चुका पाएगा. 
दूसरा सीन महाराष्ट्र का है जहाँ एक लड़की ने अपने घर के ही कुएँ में कूदकर जान दे दी. सुसाइड लेटर में लिखा हुआ कारण था क़ि पिछले तीन सालों से सूखे के कारण पिता पर इतना कर्ज़ था जो जिंदगी भर में ना चुका पाएँगे. जबकि उसकी शादी के लिए और भी कर्ज़ लेने की ज़रूरत पड़ेगी. वो नहीं चाहती थी, क़ि उसका बाप उसके कारण और भी कर्ज़ में दबे और एक दिन फाँसी से लटक जाए. 
अब आते हैं इसपर होने वाली राजनीति पर आज हमारे देश के शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू का एक बयान आया जिसमें उन्होने कहा क़ि किसानों की कर्ज़ माफी का एक ट्रेंड या फैशन चल गया है. जबकि अगर बात किसानों के कर्ज़ माफी की है तो अभी हाल ही में 4 राज्यों में माफ़ हुए कर्जे की राशि 85 हज़ार करोड़ ही होती है. जबकि केवल एक कॉरपोरेट भूषण स्टील का 80 करोड़ का लोन माफ़ करने का प्लान कर लिया है. मतलब ग़रीब का लोन माफ़ करने के समय सरकार को फ़िजिकल डिफीसिट की बात करती है, जबकि कॉरपोरेट का लोन राइट ऑफ कहलाता है. जबकि सरकार को किसानों के साथ इसलिए खड़ा रहना चाहिए क्योंकि उसने अपना पेट काटकर देश को सस्ता आनाज उपलब्ध कराया है. हमारे देश में आजकल एक और तरह के अर्थशास्त्री पैदा हो गये हैं, जो कहते हैं क़ि फसलों के दाम इसलिए गिरे क्योंकि देश में फसल उत्पादन अधिक हो गया था. हमने आजतक हमेशा पढ़ा और सुना है क़ि अधिक प्रोडक्शन हमेशा फयदेमंद होता है जबकि यहाँ उल्टा है अधिक प्रोडक्शन से नुकसान कैसे हो सकता है? जबकि हरित क्रांति की शुरूआात में उसके नीति निर्मात्ताओं ने एमएसपी का नियम ही ये सोचकर रखा था क्योंकि किसानों को बाजार के भरोसे पर ना रहना पड़े. क्योंकि बाजार तो माल की मात्रा और उपभोक्ताओं पर निर्भर करता है, जबकि इस सबमें सरकारी नीतियों का सबसे अहम रोल होता है. किसान कभी नहीं कहता है क़ि उसका लोन माफ़ कर दो, उसको तो केवल फसल का असली दाम चाहिए. अभी तक देश के किसानो पर 12 लाख करोड़ का लोन है, जबकि माफ़ केवल 12% मतलब 1लाख 40 हज़ार करोड़ ही हुआ है. 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने हलफ़नामा देकर बताया है क़ि एमपी में 2015 में 581 किसानों ने आत्महत्या की और देश में यह आकड़ा हर साल 12 हज़ार तक पहुँच जाता है. अक्सर सरकार यह कहकर पल्ला झाड़ लेती है क़ि किसानों ने बैंक से लोन लेने के कारण आत्महत्या नहीं की है. जबकि अभी हाली ही में आई एनसीआरबी की रिपोर्ट बताती है क़ि देश में हुई आत्महत्याओं में 70 फीसदी केवल बैंक लोन से परेशान होकर की गई होती हैं. हमारे नीति निर्माता ऐसे हैं जो किसानों का दर्द समझने को तैयार ही नहीं हैं. एक बॅंकिंग नियम है क़ि अगर नया ट्रैक्टर खरीदना है तो उसपर 12% ब्याज लगेगा और अगर पुराना खरीदा तो उसपर लिए हुए लोन पर 20% ब्याज देना पड़ेगा. जो मर्सडीज के लिए गए लोन  पर लगने वाले ब्याज से बहुत अधिक होता है. 
अभी हाल ही में 12 कंपनियों के 10 लाख करोड़ के लोन पर चर्चा हो रही थी, जिसमें से 7 लाख करोड़ तो केवल राइट ऑफ होने की कगार पर है. जबकि जो लोन किसानों का माफ़ हो रहा है वो केवल 1 लाख 40 हज़ार करोड़ है और उससे 15 लाख किसानों को फायदा होगा. वहीं  चंद टेलीकॉम सेक्टर में 4 लाख करोड़ का लोन राइट ऑफ करने की तैयारी चल रही है. देश में जो नॉन परफ़ार्मिंग एसेट है, उसमें 70% कॉरपोरेट और केवल 1% किसानों का है. 
देश में किसानों की किसी को नहीं पड़ी है, वो मर जाएँ, या लुट जाएँ कोई फ़र्क नहीं पड़ता किसी को. 70% किसानों के पास केवल 1 हेक्टेयर ज़मीन है. और बाकी बचे किसानों की भी हालत अच्छी नहीं है. पिछले 5 साल से किसानों को एमएसपी के नाम पर लूटा जा रहा है. एनएसओ के आकड़े के हिसाब से 80-83% किसानों की 3000 से भी कम आमदनी  है, ऐसे में अगर सरकार 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का दावा भी करती है, तो कौन सा बड़ा तीर मार लेगी? ये किसान तबतक मरते रहेंगे जबतक किसानों को उनके हक नहीं मिलेंगे. आपको पता हो क़ि 45 साल में गेहूँ का एमएसपी केवल 19% बढ़ा है, वहीं इन्हीं 45 सालों में सरकारी नौकरियों में कर्मचारियों के भत्ते 150-180 % तक बढ़ाए गए हैं. अगर ये सरकार उनके लिए भी 5वें वेतन आयोग के बाद सेलरी न बढ़ाती तो वो भी आत्महत्या करने लगते, नौकरी छोड़ने लगते. इसलिए कम से कम मोदी जी जो खुद को ग़रीब का बेटा कहते हैं वो तो न स्वामी नाथन कमेटी की सभी सिफारिशें लागू कर पाएँ तो अपने वादे (लागत मूल्य का 50% मुनाफ़ा) ही निभा दें. अन्यथा ये फसल बीमा वीमा से कुछ नहीं केवल प्राइवेट बीमा कंपनियों का ही फ़ायदा होगा न क़ि किसान का. 

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