राष्ट्रपति चुनाव में अगर विपक्ष को एक प्राक़तिकात्मक उम्मीदवार ही बना कर खड़ा करना था, तो सबसे बेहतर नाम मीरा कुमार का ही है. क्योंकि जब बात दलित के राष्ट्रपति बनने की हो, तो मीरा कुमार इस तरह के दो सामाजिक प्रतिनिधित्व करती हैं. उनकी मजबूत उम्मीदवारी होने के दो कारण हैं, पहला तो उनका आधी आबादी (महिलाओं) का प्रतिनिधित्व करना और दूसरा दलित प्रतिनिधित्व. दूसरी तरफ भाजपा ने सबको चौंकाते हुए एक ऐसे उम्मीदवार का नाम आगे किया है जिनके दम पर पूरे देश में बीजेपी राष्ट्रवाद को आगे करके दलितों इसकी आंड में हुए अत्याचार को कवर करने की कोशिश की है. देश के अधिकतर दलों को इस दलित कार्ड के नाम पर आम सहमति के साथ खड़ा करने की कोशिश की है. कल नीतीश कुमार का एनडीए को समर्थन उसका ही एक नतीजा था. मुझे अभी भी उम्मीद है क़ि नीतीश कुमार अपने फ़ैसले को बदल सकते हैं. शायद उन्हें उम्मीद नहीं रही होगी क़ि मीरा कुमार का नाम भी सामने आ सकता है. जबकि शरद यादव और केसी त्यागी जैसे उनके बड़े नेता आज शाम तक का इंतजार करने की बात कर रहे थे. मुझे ऐसा लगता है क़ि मीरा कुमार गुणों के दम पर कोविंद से मजबूत उम्मीदवार हैं. क्योंकि उनका सांसदीय अनुभव भी अच्छा ख़ासा है, और उनके लोकसभा स्पीकर रहते हुए किसी दल के मतभेद या राजनीतिक विरोध नहीं हुआ. वो सर्वमान्य, सम्मानित और देश के एक बड़े नेता की बेटी हैं. इसलिए मुझे लगता है क़ि सबको उनका समर्थन करना चाहिए.
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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