2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन तैयार करने के विपक्ष के मंसूबे को नीतीश कुमार ने करारा झटका दिया है. बुधवार की शाम नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और राजद, कांग्रेस वाले महागठबंधन से अलग होकर बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए से हाथ मिला लिया. नीतीश कुमार आज सुबह 10 बजे बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. बीजेपी भी नीतीश की सरकार में शामिल होगी. कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी दलों ने नीतीश के इस कदम की खुलकर आलोचना की है. उमर अब्दुल्ला ने नीतीश को ‘रिश्ता मुबारक’ कहा है, तो सीपीआई के डी राजा ने कहा कि नीतीश को लेकर यह शक था और यह हो गया. अब चूंकि नीतीश, नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं, तो सवाल ये है कि विपक्षी दलों की सियासी एकजुटता कितनी मजबूत हैं. कहां खड़े हैं विपक्षी दल? नीतीश के बीजेपी के साथ जाने से राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की विपक्ष की कोशिशों को करारा झटका लगा है. दर्जन भर से ज्यादा दलों वाले विपक्ष में अब एकजुटता बनाए रखना मुश्किल दिखता है. विपक्ष के पास नीतीश के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य एक चेहरा था, लेकिन अब ऐसा नहीं है. साफ सुथरी छवि वाले नीतीश के एनडीए में जाने में विपक्ष का प्रतिरोध अब और हल्का हो गया है. महागठंबधन टूटने के बाद लालू और उनके परिवार के सामने सियासी संकट आ खड़ा हुआ है. ये परिवार अब सत्ता में हिस्सेदार नहीं है. करप्शन और बेनामी संपत्ति के मामले में जांच एजेंसियां इनके पीछे पड़ी हुई है. बिहार में नई सरकार आने के बाद आरजेडी विधायकों के टूटने का भी डर है. लालू के सामने अपने विधायकों को साथ बनाए रखने की चुनौती है. देखना ये है कि इन सब बाधाओं के बीच लालू यादव अपनी सियासत की गाड़ी को कितना संभाल पाते हैं. कांग्रेस बिहार में गठबंधन का हिस्सा थी. कहा जाता था कि नीतीश के साथ राहुल गांधी और सोनिया गांधी के संबंध ठीक थे. लालू के साथ भी कांग्रेस की अपनी राजनीतिक साझेदारी रही है. फिर भी कांग्रेस नेतृत्व महागठबंधन बचाने में नाकामयाब रहा. हालांकि कांग्रेस के लिए नीतीश के मुकाबले लालू ज्यादा भरोसेमंद रहे हैं और यही वजह लगती है कि कांग्रेस लालू के खिलाफ नहीं जा पाई. नीतीश के एनडीए में चले जाने से कांग्रेस की नरेंद्र मोदी के खिलाफ घेराबंदी की कोशिशें कमजोर हुई है. लालू-नीतीश की इस क्रास फायरिंग में कांग्रेस के भीतर भी मतभेद था. कुछ नेताओं का मानना था कि नीतीश दबाव बनाने की राजनीति कर रहे हैं, तो वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि बिहार में गेम पूरा हो गया है. और इसी गफलत में कांग्रेस के हाथ से बिहार में सत्ता की साझेदारी फिसल गई.
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राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट
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