राजनीति में कुछ भी संभव है. जब लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक हो सकते हैं, तो फिर क्या संभव नहीं है. नीतीश कुमार का वापस एनडीए के पास जाना कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता. यह तो होना ही था. ऐसा पहले भी कहा जा रहा था और अब भी यही कहा जा रहा है. हालांकि नीतीश कुमार गठबंधन में संघर्ष के 20 महीने भी नहीं झेल पाए और निकल लिए. बिहार के राज्यपाल को अपना त्यागपत्र सौंपने के बाद जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की, उसमें यही कहा कि अब झेलना संभव नहीं है. लालू और नीतीश एक ही परिवार के दो भाइयों की तरह है. दोनों को राजनीति करनी है और अपनी ज़मीन को भी मजबूत बनाए रखना है. लालू प्रसाद ने जहां पिछड़े वर्ग और मुस्लिमों को साथ लेकर बिहार की राजनीति में अपनी ज़मीन को मजबूत किया, वहीं नीतीश कुमार अपने लिए एक अलग वर्ग तैयार करने में कामयाब रहे. मंडल कमीशन लागू होने के बाद वह बिहार के पिछड़े वर्ग में जो समृद्ध थे और खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे, ऐसे लोगों को साथ लेकर चले. रामविलास पासवान के वोट बैंक में सेंध लगाई और एक अलग वर्ग महादलित के नाम से तैयार किया. लालू प्रसाद के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाकर पसमांदा वोट बैंक को अपने साथ जोड़ा और इस तरह नीतीश एक नए वोट बैंक के साथ बिहार की राजनीति में अपनी पहचान बनाई. बिहार में चुनाव से पहले जब गठबंधन की बात चल रही थी, उस दौरान दोनों नेता अपने-अपने हित को देख रहे थे. नीतीश कुमार ने देख लिया था कि कैसे नरेंद्र मोदी की भारी जीत के बाद भी दिल्ली की जनता ने उन्हें नकार दिया था. मतलब साफ था कि राज्य के चुनाव में राज्य के मुद्दे हावी रहेंगे. हालांकि जातीय गणित को देखा जाए, तो लालू के साथ मिलकर चुनाव लड़ना फायदेमंद था. नीतीश कुमार वैसे भी एनडीए से खफा चल रहे थे कि उनकी साफ छवि के बावजूद गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम क्यों नहीं लिया गया. यही कुछ व्यक्तिगत कारण थे, जिन्हें लेकर नीतीश कुमार ने बीजेपी से दूरी बना ली और लालू के साथ गठबंधन बनाकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला लिया। लालू प्रसाद पर खुद को बचाए रखने का संकट था. एक मामले में कोर्ट से उन्हें सजा मिल चुकी थी. वह चुनाव नहीं लड़ सकते थे. इस दौर में राबड़ी देवी को लेकर चुनाव में उतरना उनके लिए सेफ नहीं था. मीसा चुनाव हार चुकी थीं, तो लालू के पास दोनों बेटों को राजनीति के लिए तैयार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था. और यह तभी संभव था, जब कोई मजबूत ढाल उनके पास हो. बिहार की राजनीति में पासवान उतने प्रासंगिक नहीं बचे थे. उपेंद्र कुशवाहा का उदय हो रहा था, जो कोइरी-कुर्मी वोट बैंक के साथ लोकसभा की कुछ सीटों पर कब्जा जमाए थे. लालू के पास एकमात्र विकल्प नीतीश कुमार थे, जो उनके काम आ सकते थे. और उधर, नीतीश कुमार को एक सहारे की ज़रूरत थी, जो उनके वोट बैंक के साथ मिलकर बहुमत हासिल कर सके. यह महज संयोग नहीं था, बल्कि दोनों के अपने अपने हित थे, जो दोनों को ज़िन्दा बचाए रखने के लिए ज़रूरी था. अगर दोनों अकेले-अकेले चुनाव मैदान में जाते, तो उनका वोट बैंक बिखर जाता और इसका सीधा फायदा बीजेपी को होता. यह दोनों के हित में नहीं। अब इस गठबंधन के बिखर जाने से दोनों को फायदा हुआ है. नीतीश ने साबित कर दिया कि नरेंद्र मोदी की आंधी के बाजवूद बिहार में वही नेता हैं. यह नीतीश कुमार की व्यक्तिगत संतुष्टि भी है और उपलब्धि भी. वैसे भी नीतीश कुमार इस गठबंधन में फिट नहीं बैठ रहे थे. लालू प्रसाद का साथ न उनके व्यक्तित्व से मेल खा रहा था, न उनकी राजनीति के तौर-तरीकों से. गठबंधन बना और भारी जीत के साथ नीतीश सत्ता में आ गए. बिहार को नीतीश मिल गए, लेकिन लालू प्रसाद की पार्टी भी बच गई. एक राजनीतिक परिवार मजबूत हो गया. उनके दोनों बेटे चुनाव जीते और मंत्री बन गए. लालू प्रसाद को और क्या चाहिए था. गठबंधन की सरकार पूरे 20 महीने चली और इतने समय में लालू प्रसाद के दोनों बेटों की ट्रेनिंग भी हो गई. लालू के दोनों युवराज अब राजनीति में संघर्ष करने के दांव-पेंच देख लिए और संभव है, लालू की विरासत को दूर तक लेकर जाएं. इसके लिए लालू प्रसाद को अपने 'कल तक सहयोगी रहे' नीतीश कुमार का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.
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