Thursday, November 30, 2017

गुजरात में संयमित दिखती कांग्रेस

गुजरात चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस संभल-संभल कदम रख रही है और अपनी खोई जमीन को पाने के लिए के लिए बीजेपी को घेरने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है. गुजरात में सबसे ज्‍यादा आबादी हिन्‍दुओं की है इसलिए कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी भी हिन्‍दू वोट पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं. इतना ही नहीं कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला करने से भी बच रही है. क्‍योंकि 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान सोनिया गांधी ने तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदगार' कहा था जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा था.
गुजरात में 90 प्रतिशत आबादी हिन्‍दुओं की है और कांग्रेस पार्टी की नजर इन वोटरों पर है. यहीं वजह हे कि पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल, दलित आंदोलन के नेता जिग्‍नेश मेवाणी और ओबीसी आंदोलन के नेता अल्पेश ठाकोर को अपने साथ लेकर आ गई है. जब जिग्‍नेश मेवाणी ने वडगाम विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की तो कांग्रेस के वर्तमान विधायक मणिभाई वाघेला ने इस सीट से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. वहीं अल्पेश ठाकोर कांग्रेस में शामिल हो गए तो हार्दिक पटेल भी कांग्रेस को समर्थन का ऐलान कर चुके हैं. राहुल गांधी अपनी तरफ से भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं इसलिए वह अब तक 20 से ज्‍यादा मंदिर जा चुके हैं और अपनी हर रैली से पहले मंदिर में जाकर मत्‍था जरूर टेकते हैं. सोशल मीडिया पर भी राहुल गांधी ने अपनी रणनीति बदली है.राहुल ने अपनी डिजिटल टीम में कई बदलाव किए हैं और दिव्या स्पंदना उर्फ राम्या को टीम की हेड बनाया है. राहुल की ये टीम सोशल मीडिया पर व्‍यक्तिगत हमलों से बच रही है और मोदी सरकार को निशाना बनाकर कैंपन चला रही हैं. इसी के तहत ही सोशल मीडिया पर कांग्रेस ने 'विकास पागल हो गया' कैंपन चलाया. राहुल गांधी अपनी रैलियों के दौरान भी किसी पर व्‍यक्तिगत हमलों से जहां तक हो बचने की कोशिश कर रहे हैं. यहीं वजह है वह सरकार के फैसलों को लेकर बीजेपी को घेर रहे हैं. जैसे जीएसटी टैक्‍स पर उन्‍होंने केन्‍द्र सरकार को 'गब्‍बर सिंह टैक्‍स' के नाम पर घेरा था और नोटबंदी समेत केन्‍द्र सरकार के कई फैसलों पर उन्‍होंने सवाल खड़े किए. गुजरात दौरे के दौरान राहुल गांधी कई बार ऐसे फैसले लिए हैं जिससे पार्टी के नेता ही नहीं उनकी सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी भी दंग रह गए हैं. जैसे भरूच दौरे के दौरान जब एक लड़की उनकी गाड़ी के पास पहुंची तो उन्‍होंने उस लड़की को गाड़ी में ऊपर आने दिया. इसके बाद लड़की ने राहुल को बुके दिया और सेल्‍फी भी ली. इतना ही नहीं राहुल अपने दौरे के दौरान कई बार मंदिर जाने और पूजा करने का फैसला भी लिया. अब कांग्रेस में एक नया आत्‍मविश्‍वास आ गया है. राहुल गांधी अब पप्पू नहीं हैं जैसा कि ट्रेडिशनल और सोशल मीडिया में पेश किया जा रहा था. अब उन्हें अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है, खासकर उनके बर्कले प्रवास के बाद. राहुल को लेकर मेनस्‍ट्रीम टीवी के कवरेज में भी एक बदलाव देखने को मिला है. अब पहले से बेहतर रूप से कवर किया जा रहा है और ज्यादा स्‍पेस भी दी जा रही है. दूसरा बदलाव मोदी की लोकप्रियता में एक निश्चित गिरावट के रूप में सामने आ रही है. उन्‍हें प्रत्‍यक्ष तौर पर नोटबंदी और जीएसटी को लेकर आर्थिक विकास में तेज गिरावट के लिए दोषी ठहराया जा रहा है. तीसरा और सबसे सबसे बड़ा कारण यह है कि मोदी राहुल गांधी, और कांग्रेस तथा उसके गुजरात कनेक्‍शन पर काफी हमला बोल रहे हैं. चुनावों के दौरान, मोदी सिर्फ अपने ऊपर चर्चा को केंद्रित करने में सफल रहते हैं. चाहे वह नाकारात्‍मक हो या साकारात्‍मक सबकुछ उनके इर्द-गिर्द ही घूमते रहता है. उनकी शैली ऐसी ही है कि वह अपने आसपास एक ध्रुवीकृत वातावरण बना लेते हैं जिसमें कोई उन्‍हें पसंद करे या उनसे घृणा करे लेकिन कभी भी उनकी अनदेखी नहीं कर सकता. लेकिन इस बार वह ऐसा जादू चलाने में असमर्थ दिख रहे हैं. राहुल और हार्दिक पटेल के गठबंधन ने मोदी को सकते में डाल दिया है और बीजेपी को डिफेंसिव मूड में ला दिया है. मोदी अब अपनी नीतियों पर सफाई देते नजर आ रहे हैं. 
राहुल गाँधी ने गुजरात चुनाव प्रचार के दौरान कई मुद्दे उठाए हैं, जिसमें रोजगार, मकान और संसद के शीतकालीन सत्र में देरी जैसी मुद्दे उठाए. इतना ही न ही नहीं उन्‍होंने राफेल सौदा और जय शाह जैसे मुद्दों को भी अपनी चुनावी रैलियों में उठाया. 

Tuesday, November 28, 2017

वीपी सिंह एक समाजवादी नेता

राजपाट छोड़कर मांडा में एक मजदूर की ही तरह सिर पर मिट्टी ढोकर सड़क बनाने वाले, कोरांव में तालाब में फावड़े से मिट्टी खोदने वाले, एक विद्यालय में मास्टरी करने वाले और फिर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते एक घटना पर त्यागपत्र देने वाले, दो पहिया बुलेट मोटर साइकिल से ही पूरे देश में चुनाव प्रचार करने वाले, भ्रष्ट्राचार से लड़ने, टैक्स चोर पूंजीपतियों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देने वाले सामाजिक न्याय के मसीहा, महान विचारक, कवि, चित्रकार और गरीबों के सबसे बड़े रहनुमा को उनकी पुण्यतिथि 27 नवम्बर पर शत्- शत् नमन, एक सच्ची श्रद्धांजलि. 
सच्चे अर्थों में वीपी सिंह, महात्मा बुद्ध (राजुमार सिद्धार्थ)के बाद  जन कल्याण के लिये अपना सब कुछ त्याग देने वाले आखिरी राजकुमार थे. आगे कई सदियों तक वीपी सिंह का नाम अमर रहेगा. राजनेताओं में वह भारत के दूसरे अम्बेडकर हैं, जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों, दबे कुचले समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने का काम किया है. यह अलग बात है कि बाबा साहब को मान्यवर कांशीराम ने दलितों का मसीहा बना दिया और उनके विचारों से बहुजन आन्दोलन पैदाकर राजनीति की धारा ही बदल दी. वहीं मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान से लेकर देवगौड़ा तक ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पीठ में छूरा भोकने का काम किया. तीन माह पूर्व मुलायम सिंह यादव ने तो प्रेस कांन्फ्रेस कर कहा कि वीपी सिंह की ११ महींने की सरकार को उन्होंने ही गिरवाई थी. वीपी सिंह का पार्थिव शरीर जब इलाहाबाद पहुंचा तो बहन मायावती पूरे दिन वहां उपस्थित रहीं, लेकिन मुलायम वहां नजर नहीं आये.
वीपी सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बनने से इंकार करने वाले शायद पहले राजनेता होंगे. बीमारी के बावजूद भूमि अधिग्रहण के विरोध में पूर्व प्रधान मंत्री वीपी सिंह स्वयं ट्रैक्टर चलाकर दादरी (उ.प्र.) अधिग्रहीत जमीन की जुताई करने पहुंच गए और पहली बार इस देश में किसान और उनका मुद्दा राजनीति की मुख्यधारा में पहुंचा. सहकारी बैंक से कर्जदार किसानों का कर्ज माफ करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री थे..
आज जिस टैक्सचोरी रोकने व काले धन की बात की जा रही है, उस पर सबसे पहले वीपी सिंह ने ही लगाम लगाने की पहल की थी. जब धीरुभाई अम्बानी, अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ बच्चन सहित सैकड़ों टैक्सचोर भागकर विदेश में शरण लिये हुये थे, तब यही भाजपा वालों ने पूंजीपतियों को लेकर कमंडल रथ निकाला और एक ईमानदार प्रधानमंत्री को हटाकर ही दम लिया. वीपी सिंह एक मोटरसाइकिल से पूरे देश में प्रचार कर साबित कर दिया था कि उन्हें किसी टैक्स चोर के पैसे की जरुरत नहीं.
अयोध्या विवाद और आरक्षण आंदोलन के केंद्र रहे पूर्व पीएम वीपी सिंह की आज पुण्यतिथि है। वीपी वही 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री थे जिन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिन्हें इंदिरा जैसी 'ताकतवर' नेता तक लागू करने से बचती रही। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण वीपी की सरकार ने ही सुनिश्चित किया। देश की सड़कों पर नाराज़ सवर्ण युवकों का हुजूम था। वो खुद को आग लगा रहे थे। जिस राजपूत समाज के वो नेता थे उसने भी उनमें अब दुश्मन खोज निकाला था। कहा जाता है कि डिप्टी पीएम देवीलाल की सियासी चुनौती ने उन्हें ओबीसी का दामन थामने को मजबूर किया था लेकिन वाकई वीपी जानते तो थे ही कि वो कितना बड़ा चैलेंज ले रहे हैं। पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि वीपी ने उनसे एक बार कहा था कि भले ही अपनी एक टांग गंवा दी हो, लेकिन उन्होंने गोल करके ही दम लिया। 
एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने कुलदीप नैयर से कहा था कि मंडल ना होता तो कमंडल भी ना होता। हालांकि आडवाणी अपनी आत्मकथा में ऐसा नहीं मानते, बल्कि वो तो बार बार कहते हैं कि उनके चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा था, तो ऐसे में जब भाजपा वीपी का साथ दे रही थी तो गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्हें भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता बरतनी चाहिए थी। बहरहाल, सबने देखा कि वीपी ने कोई मुरव्वत नहीं की। वैसे आरोप ये भी लगता रहता है कि वीपी ने रथ को शुरू में ही क्यों नहीं रोका। रथ चलते ही देश में दंगे भड़कने लगे थे लेकिन वीपी भाजपा के समर्थन से मिली कुरसी पर चुप्पी लगाए बैठे रहे। आखिरकार वीपी एक राजनेता ही तो थे। आडवाणी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बंबई के एक्सप्रेस टॉवर्स की एक बैठक में वीपी ने सबके सामने कहा था- 'अरे भाई, मस्जिद है कहां? वह तो अभी मंदिर है। पूजा चल रही है। वह इतना जर्जर है कि एक ही धक्के में नीचे गिर जाएगा। उसे ढहाने की ज़रूरत ही क्या है?' अरुण शौरी ने भी 1990 में इस बैठक पर एक लेख लिखा था। ज़ाहिर है, वीपी स्थिति समझ तो रहे ही थे। वीपी ने अयोध्या मसले का हल निकालने के लिए राम जन्मभूमि से जुड़े संतों से 4 महीने का वक्त मांगा था, वो फेल रहे। इसके बाद संघ ने कारसेवा की घोषणा कर दी। आडवाणी ने इसी के बीच में गुंजाइश देखी और प्रमोद महाजन के सुझाव से रथयात्रा का आरंभ हुआ। डॉ कोनराड एल्स्ट अपनी किताब में बताते हैं कि वीपी सिंह के मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले से कुछ लोग इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा तक पर पत्थर फेंके। भाजपा वीपी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी इसलिए आक्रोशित सवर्णों की नज़र में वो इस फैसले का हिस्सा ही थी। वहीं वीपी भी किसी तरह इस विवाद को सुलझाने में जुटे थे। एस गुरुमूर्ति सरकार और मंदिर आंदोलन के नेताओं के बीच वार्ताकार बने थे। वो देशभर में घूम घूम कर धार्मिक गुरूओं से मिल रहे थे। खैर, बाद में किसी भी मसौदे पर सहमति बन पाने से पहले ही लालू सरकार के हाथ आडवाणी गिरफ्तार हो गए, नतीजतन सरकार संकट में आ गई। आज तक अयोध्या विवाद देश का सबसे ज्वलनशील मुद्दा है। किरदार बदल गए हैं लेकिन समस्या जस की तस है। प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने कैबिनेट तक में आधी सीटें पिछड़ा वर्ग को दे दी थीं। ये वीपी थे जिन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर का चित्र संसद के केंद्रीय सभागृह में लगवाया और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। खुद को भारत रत्न देनेवाले नेहरू और इंदिरा ने कभी बाबासाहेब को भारत रत्न देने योग्य क्यों नहीं समझा ये तो जाना नहीं जा सकता लेकिन वीपी ने कृतज्ञ देश की ओर से उन्हें भारत रत्न दिया। वीपी की राजनीति खत्म हो गई लेकिन उनके फैसलों का असर आज भी देश पर बना हुआ है।

Wednesday, November 15, 2017

गुजरात में बदले दिखे राहुल

गुजरात में राहुल गांधी एक नए अंदाज़ में हैं. इस बार राहुल गांधी का फोकस खास तौर पर पिछड़ों, दलितों आदिवासी और मुस्लिमों पर है. शायद राहुल गांधी को पाटीदारों के वोटों पर उतना भरोसा नहीं है. शायद उन्हें लगता है कि पाटीदार परंपरागत तौर पर बीजेपी को वोट देते आए हैं. पहले भी गुजरात में कांग्रेस खाम का फार्मूला अपना चुकी है यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम, मगर इस बार राहुल पोडा (पाटीदार, ओबीसी, दलित, आदिवासी) पर फोकस कर रहे हैं. गुजरात में पाटीदार 12 से 15 प्रतिशत है जबकि 14 फीसदी आदिवासी, 9 फीसदी मुस्लिम और 7 फीसदी दलित हैं. राहुल आदिवासी इलाकों में जाते हैं तो किसी आदिवासी युवक को मंच पर बुला कर भाषण दिलवाते हैं. राहुल को मालूम है कि जीएसटी यानी 'गब्बर सिंह टैक्स' हिट हो गया है, इसलिए इस मुहावरे का खूब इस्तेमाल करते हैं. यही नहीं, इस बार राहुल अपने ट्वीट को ले कर भी काफी सुर्ख़ियों में हैं. लगता है कि ट्वीट के किये राहुल ने कोई खास टीम तैयार की है. राहुल का हर ट्वीट खबर बनता है जिससे उनकी इमेज भी मीडिया में बदल रही है. ज़ीएसटी में जो सरकार ने बदलाव किया है उसका भी श्रेय राहुल खुद को देते हैं. राहुल अपने भाषण में एक संवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं. वह लोगों से पूछते हैं कि घर देने का वायदा किया गया, मिला कि नहीं और लोग जवाब भी देते हैं. दरअसल दो दशकों से बीजेपी गुजरात में सत्ता में है, यही उसकी मुसीबत भी बन गयी है. कई जगह लोग अब बदलाव की बात भी करने लगे हैं. उन्हें लगता है कि कांग्रेस को भी एक चांस मिलना चाहिए.
राहुल की राह को वाघेला ने भी आसान बना दिया है. वाघेला ने कांग्रेस की राह आसान कर दी है. दरअसल वाघेला कांग्रेस में रहते तो राहुल पर अतिरिक्त भार पड़ता क्योंकि वाघेला कम से कम अपने समर्थकों के लिए 40 सीट जरूर ले जाते ताकि जरुरत पड़ने पर मुख्यमंत्री की दावेदारी पेश की जा सके. मगर अब यह हालत नहीं है. यही वजह है कि राहुल गांधी को टिकट बांटने में आसानी होगी. वह बिना किसी दबाव में आए टिकट बांट सकते हैं. दरअसल राहुल गुजरात में सांप्रदायिक ध्रुविकरण से बचना चाहते हैं. उन्हें लगता है इस पर वो बीजेपी से जीत नहीं सकते, यही वजह है कि राहुल मंदिरों की खाक तो छान रहे हैं मगर मस्जिदों पर नज़र भी नहीं डालते हैं. कांग्रेस ने राहुल की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि बनाई है. राहुल के पक्ष में हार्दिक पटेल हैं जो पाटीदार हैं, ओबीसी नेता के रूप में कांग्रेस में भारत सिंह सोलंकी हैं और साथ में अल्पेश ठाकोर रभी हैं, दलित नेता के रूप में जिग्नेश मेवानी हैं तो आदिवासी नेता के रूप में छोटू भाई वसावा हैं, जिसके वोट से अहमद पटेल ने राज्यसभा का चुनाव जीता था. कुल मिला कर राहुल गांधी को समझ में आ गया है कि लालू का माय हो, खाम हो या पोड़ा हो, यदि चुनाव जीतना है तो एक समीकरण का चलना जरूरी है.

आख़िर जीएसटी पर भी पीछे क्यों भागी सरकार?

जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी. अलबत्ता सरकार का पूरा अमला प्रचार करने में लगाया गया है कि जीएसटी की वसूली के रेट कम करने को जनता के लिए बड़ी राहत के तौर पर प्रचारित किया जाए. टीवी पैनल की चर्चाओं में यह बात खासतौर पर चलवाई जा रही है कि इससे गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी कम हागी. इस तरह से आरोप की शक्ल में इस प्रचार पर जो़र है कि गुजरात चुनाव के मददेनज़र यह फैसला किया गया है.                  
पहला सवाल यह कि क्या वाकई यह टैक्स गब्बर सिंह जैसा था जिसे अब कम भयावह बनाने का ऐलान हुआ है. अगर ऐसा है तो यह सवाल सबसे पहले कौंधेगा कि यह भारी भरकम टैक्स लगाया किसने था? जब लगाया गया था तब तर्क दिया गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं. उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीज़ों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा. सो नया सवाल यह पैदा हुआ है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स घटाने से अब देश हित की योजनाएं चलाने में कमी नहीं आ जाएगी क्या? गौरतलब है कि खासतौर पर ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स वसूली के रेट घटाने से सरकार के ख़ज़ाने में बीस हजार करोड़ रुपए कम पहुंचेंगे.
जनता को 20 हजार करोड़ का यह तोहफा देने के लिए सरकार पैसा कहां से जुटा लाई. एक सरल सा जवाब है कि सरकार ने चार महीने पहले जो टैक्स वसूली की नई योजना बनाई थी उससे एक लाख करोड़ की वसूली की योजना थी वह वसूली कम कर दी गई है. यानी, देश के हित में सरकार ने जनता के सिर पर जो बोझ लादा था उस बोझ में कटौती का एलान किया है. इस तरह से क्या यह बहस शुरू नहीं हो जाएगी कि जनता को जो बेजा सज़ा का ऐलान हुआ था उस सज़ा में कटौती हो गई है.
नोटबंदी से मची भारी अफरातफरी और भारी घाटे का काम साबित होने के बाद जीएसटी से भी चारों तरफ परेशानियों का अंबार खड़ा होता जा रहा था. व्यापारी और उपभोक्ता दोनों परेशान हैं. हालांकि व्यापारी टैक्स के रेट से परेशान नहीं थे क्योंकि उन्हें टैक्स अपने पास से नहीं बल्कि नागरिकों से उगाही कर जमा करना था. व्यापारी लोग टैक्स भरने की समय खपाऊ और हिसाब बनाने की खर्चीली प्रक्रिया से परेशान हैं. सो उनके लिए भी सरकार ने टैक्स के कागज़ तैयार करने का बोझ कुछ कम कर दिया. क्या इसे पहले नहीं सोचा जा सकता था? इस तरह सरकार खुद को नौसिखिया साबित करवा रही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नोटबंदी में साबित हुई थी. जानकार लोग नफे नुकसान का हिसाब भी बैठा रहे हैं. व्यापारी और नागरिक बेजा तरीके से खा न पाएं उससे सरकार को जितना पैसा बच सकता है उससे कई गुना उस चोरी न हो पाने का इंतजाम करने में खिन्न होकर बर्बाद तो नहीं हो रहा है? इसलिए, एक हिसाब लगना चाहिए कि गोदाम में जितने का माल है उसकी चौकीदारी पर उससे ज्यादा खर्चा तो नहीं बैठ रहा है. यानी, जीएसटी और नोटबंदी के जरिए ऐसी चौकीदारी घाटे का सौदा तो नहीं बन रही है. वैसे इसका पता आम बजट पेश होते समय चलेगा.
केंद्र और राज्य सरकारें अपने पास संसाधनों का रोना रोती रहती हैं. वे तरह तरह के जो टैक्स वसूलती थीं उसकी जगह एक ही टैक्स की व्यवस्था बनाने पर रजामंदी बनाई गई थी. यह रजामंदी इस आश्वासन पर बनी थी कि राज्यों को नई व्यवस्था से अगर कोई घाटा हुआ तो केंद्र सरकार उसकी भरपाई का इंतजाम करेगी. वैसे तो राज्य सरकारें बिल्कुल भी जोखिम उठाने को राजी नहीं होतीं लेकिन राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि ज्यादातर राज्यों में भी भाजपा की ही सरकारें काबिज़ हैं. सो राज्य सरकारों की तरफ से केंद्र की इच्छा, मंशा या योजना पर नानुकुर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता लेकिन राज्यों के संसाधनों में कमी को आखिरकार उन्हें ही झेलना पड़ता है. वे किस तरह से झेलेंगी यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा. जीएसटी से नया हाहाकार न मचने लगे इसे दोनों प्रकार की सरकारों को सोचकर रखना पड़ेगा. और भारतीय लोकतंत्र की जनता को बजट तक इंतजा़र करना पडे़गा कि जीएसटी लागू होने के तोहफे से उसने क्या खोया पाया. खासतौर पर जीएसटी के 28 फीसद टैक्स वाले स्लेब की चीजों पर टैक्स घटने से गरीब जनता को  क्या हासिल होगा?
नोटबंदी के नियमों में बार बार बदलाव की तरह जीएसटी में भी बार बार बदलाव के नफे नुकसान पर मीडिया में रोचक बहसें हो रही हैं. सरकार के तरफदार विशेषज्ञों की सबसे दिलचस्प थ्योरी यह है कि जीएसटी की कंपलायंस यानी इसके मुताबिक टैक्स जमा होने में दिक्कत आ रही थी. उनका तर्क है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स कम होने से टैक्स जमा करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी. इस तरह से उन्होंने दिलासा दिलाना शुरू किया है कि बदले ऐलान से सरकार के खजाने को 20 हजार करोड़ से कम का ही नुकसान होगा. ऐसा तर्क देने वाले क्या उस समय यह तर्क नहीं दे सकते थे जब 28 फीसद टैक्स वाली स्लैब बनाई गई थी. तब तो यह तर्क दिया गया था कि गरीब जनता के लिए अच्छी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए और यह पैसा ऐशो आराम से रहने वालों पर टैक्स से लिया जा सकता है. चार महीने में ही थ्योरियां बदल गईं.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...