राजपाट छोड़कर मांडा में एक मजदूर की ही तरह सिर पर मिट्टी ढोकर सड़क बनाने वाले, कोरांव में तालाब में फावड़े से मिट्टी खोदने वाले, एक विद्यालय में मास्टरी करने वाले और फिर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहते एक घटना पर त्यागपत्र देने वाले, दो पहिया बुलेट मोटर साइकिल से ही पूरे देश में चुनाव प्रचार करने वाले, भ्रष्ट्राचार से लड़ने, टैक्स चोर पूंजीपतियों को देश छोड़ने पर मजबूर कर देने वाले सामाजिक न्याय के मसीहा, महान विचारक, कवि, चित्रकार और गरीबों के सबसे बड़े रहनुमा को उनकी पुण्यतिथि 27 नवम्बर पर शत्- शत् नमन, एक सच्ची श्रद्धांजलि.
सच्चे अर्थों में वीपी सिंह, महात्मा बुद्ध (राजुमार सिद्धार्थ)के बाद जन कल्याण के लिये अपना सब कुछ त्याग देने वाले आखिरी राजकुमार थे. आगे कई सदियों तक वीपी सिंह का नाम अमर रहेगा. राजनेताओं में वह भारत के दूसरे अम्बेडकर हैं, जिन्होंने गरीबों, पिछड़ों, दबे कुचले समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन कर भारतीय राजनीति की दिशा और दशा बदलने का काम किया है. यह अलग बात है कि बाबा साहब को मान्यवर कांशीराम ने दलितों का मसीहा बना दिया और उनके विचारों से बहुजन आन्दोलन पैदाकर राजनीति की धारा ही बदल दी. वहीं मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान से लेकर देवगौड़ा तक ने पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के पीठ में छूरा भोकने का काम किया. तीन माह पूर्व मुलायम सिंह यादव ने तो प्रेस कांन्फ्रेस कर कहा कि वीपी सिंह की ११ महींने की सरकार को उन्होंने ही गिरवाई थी. वीपी सिंह का पार्थिव शरीर जब इलाहाबाद पहुंचा तो बहन मायावती पूरे दिन वहां उपस्थित रहीं, लेकिन मुलायम वहां नजर नहीं आये.
वीपी सिंह दुबारा प्रधानमंत्री बनने से इंकार करने वाले शायद पहले राजनेता होंगे. बीमारी के बावजूद भूमि अधिग्रहण के विरोध में पूर्व प्रधान मंत्री वीपी सिंह स्वयं ट्रैक्टर चलाकर दादरी (उ.प्र.) अधिग्रहीत जमीन की जुताई करने पहुंच गए और पहली बार इस देश में किसान और उनका मुद्दा राजनीति की मुख्यधारा में पहुंचा. सहकारी बैंक से कर्जदार किसानों का कर्ज माफ करने वाले वह पहले प्रधानमंत्री थे..
आज जिस टैक्सचोरी रोकने व काले धन की बात की जा रही है, उस पर सबसे पहले वीपी सिंह ने ही लगाम लगाने की पहल की थी. जब धीरुभाई अम्बानी, अमिताभ बच्चन के भाई अजिताभ बच्चन सहित सैकड़ों टैक्सचोर भागकर विदेश में शरण लिये हुये थे, तब यही भाजपा वालों ने पूंजीपतियों को लेकर कमंडल रथ निकाला और एक ईमानदार प्रधानमंत्री को हटाकर ही दम लिया. वीपी सिंह एक मोटरसाइकिल से पूरे देश में प्रचार कर साबित कर दिया था कि उन्हें किसी टैक्स चोर के पैसे की जरुरत नहीं.
अयोध्या विवाद और आरक्षण आंदोलन के केंद्र रहे पूर्व पीएम वीपी सिंह की आज पुण्यतिथि है। वीपी वही 'कमज़ोर' प्रधानमंत्री थे जिन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, जिन्हें इंदिरा जैसी 'ताकतवर' नेता तक लागू करने से बचती रही। सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण वीपी की सरकार ने ही सुनिश्चित किया। देश की सड़कों पर नाराज़ सवर्ण युवकों का हुजूम था। वो खुद को आग लगा रहे थे। जिस राजपूत समाज के वो नेता थे उसने भी उनमें अब दुश्मन खोज निकाला था। कहा जाता है कि डिप्टी पीएम देवीलाल की सियासी चुनौती ने उन्हें ओबीसी का दामन थामने को मजबूर किया था लेकिन वाकई वीपी जानते तो थे ही कि वो कितना बड़ा चैलेंज ले रहे हैं। पत्रकार कुलदीप नैयर कहते हैं कि वीपी ने उनसे एक बार कहा था कि भले ही अपनी एक टांग गंवा दी हो, लेकिन उन्होंने गोल करके ही दम लिया।
एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने कुलदीप नैयर से कहा था कि मंडल ना होता तो कमंडल भी ना होता। हालांकि आडवाणी अपनी आत्मकथा में ऐसा नहीं मानते, बल्कि वो तो बार बार कहते हैं कि उनके चुनावी घोषणापत्र में राम मंदिर का मुद्दा था, तो ऐसे में जब भाजपा वीपी का साथ दे रही थी तो गठबंधन धर्म का पालन करते हुए उन्हें भी इस मुद्दे पर संवेदनशीलता बरतनी चाहिए थी। बहरहाल, सबने देखा कि वीपी ने कोई मुरव्वत नहीं की। वैसे आरोप ये भी लगता रहता है कि वीपी ने रथ को शुरू में ही क्यों नहीं रोका। रथ चलते ही देश में दंगे भड़कने लगे थे लेकिन वीपी भाजपा के समर्थन से मिली कुरसी पर चुप्पी लगाए बैठे रहे। आखिरकार वीपी एक राजनेता ही तो थे। आडवाणी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बंबई के एक्सप्रेस टॉवर्स की एक बैठक में वीपी ने सबके सामने कहा था- 'अरे भाई, मस्जिद है कहां? वह तो अभी मंदिर है। पूजा चल रही है। वह इतना जर्जर है कि एक ही धक्के में नीचे गिर जाएगा। उसे ढहाने की ज़रूरत ही क्या है?' अरुण शौरी ने भी 1990 में इस बैठक पर एक लेख लिखा था। ज़ाहिर है, वीपी स्थिति समझ तो रहे ही थे। वीपी ने अयोध्या मसले का हल निकालने के लिए राम जन्मभूमि से जुड़े संतों से 4 महीने का वक्त मांगा था, वो फेल रहे। इसके बाद संघ ने कारसेवा की घोषणा कर दी। आडवाणी ने इसी के बीच में गुंजाइश देखी और प्रमोद महाजन के सुझाव से रथयात्रा का आरंभ हुआ। डॉ कोनराड एल्स्ट अपनी किताब में बताते हैं कि वीपी सिंह के मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के फैसले से कुछ लोग इतने आक्रोशित थे कि उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा तक पर पत्थर फेंके। भाजपा वीपी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही थी इसलिए आक्रोशित सवर्णों की नज़र में वो इस फैसले का हिस्सा ही थी। वहीं वीपी भी किसी तरह इस विवाद को सुलझाने में जुटे थे। एस गुरुमूर्ति सरकार और मंदिर आंदोलन के नेताओं के बीच वार्ताकार बने थे। वो देशभर में घूम घूम कर धार्मिक गुरूओं से मिल रहे थे। खैर, बाद में किसी भी मसौदे पर सहमति बन पाने से पहले ही लालू सरकार के हाथ आडवाणी गिरफ्तार हो गए, नतीजतन सरकार संकट में आ गई। आज तक अयोध्या विवाद देश का सबसे ज्वलनशील मुद्दा है। किरदार बदल गए हैं लेकिन समस्या जस की तस है। प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने अपने कैबिनेट तक में आधी सीटें पिछड़ा वर्ग को दे दी थीं। ये वीपी थे जिन्होंने बाबासाहेब अंबेडकर का चित्र संसद के केंद्रीय सभागृह में लगवाया और उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। खुद को भारत रत्न देनेवाले नेहरू और इंदिरा ने कभी बाबासाहेब को भारत रत्न देने योग्य क्यों नहीं समझा ये तो जाना नहीं जा सकता लेकिन वीपी ने कृतज्ञ देश की ओर से उन्हें भारत रत्न दिया। वीपी की राजनीति खत्म हो गई लेकिन उनके फैसलों का असर आज भी देश पर बना हुआ है।
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