Wednesday, November 15, 2017

आख़िर जीएसटी पर भी पीछे क्यों भागी सरकार?

जीएसटी की भी नोटबंदी जैसी गत बन रही है. नोटबंदी में जिस तरह से रोज़रोज़ रद्दोबदल करने पड़े थे उसी तरह से जीएसटी में भी शुरू हो गए. नोटबंदी में जैसी बार बार बदनामी हुई थी वैसी अब जीएसटी में होने लगी. अलबत्ता सरकार का पूरा अमला प्रचार करने में लगाया गया है कि जीएसटी की वसूली के रेट कम करने को जनता के लिए बड़ी राहत के तौर पर प्रचारित किया जाए. टीवी पैनल की चर्चाओं में यह बात खासतौर पर चलवाई जा रही है कि इससे गुजरात के व्यापारियों की नाराज़गी कम हागी. इस तरह से आरोप की शक्ल में इस प्रचार पर जो़र है कि गुजरात चुनाव के मददेनज़र यह फैसला किया गया है.                  
पहला सवाल यह कि क्या वाकई यह टैक्स गब्बर सिंह जैसा था जिसे अब कम भयावह बनाने का ऐलान हुआ है. अगर ऐसा है तो यह सवाल सबसे पहले कौंधेगा कि यह भारी भरकम टैक्स लगाया किसने था? जब लगाया गया था तब तर्क दिया गया था कि सरकार को देश के हित में बहुत सी योजनाएं चलानी पड़ती हैं. उसके लिए पैसे की जरूरत पड़ती है सो ऐशोआराम की चीज़ों पर ज्यादा टैक्स तो लगाना ही पड़ेगा. सो नया सवाल यह पैदा हुआ है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स घटाने से अब देश हित की योजनाएं चलाने में कमी नहीं आ जाएगी क्या? गौरतलब है कि खासतौर पर ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स वसूली के रेट घटाने से सरकार के ख़ज़ाने में बीस हजार करोड़ रुपए कम पहुंचेंगे.
जनता को 20 हजार करोड़ का यह तोहफा देने के लिए सरकार पैसा कहां से जुटा लाई. एक सरल सा जवाब है कि सरकार ने चार महीने पहले जो टैक्स वसूली की नई योजना बनाई थी उससे एक लाख करोड़ की वसूली की योजना थी वह वसूली कम कर दी गई है. यानी, देश के हित में सरकार ने जनता के सिर पर जो बोझ लादा था उस बोझ में कटौती का एलान किया है. इस तरह से क्या यह बहस शुरू नहीं हो जाएगी कि जनता को जो बेजा सज़ा का ऐलान हुआ था उस सज़ा में कटौती हो गई है.
नोटबंदी से मची भारी अफरातफरी और भारी घाटे का काम साबित होने के बाद जीएसटी से भी चारों तरफ परेशानियों का अंबार खड़ा होता जा रहा था. व्यापारी और उपभोक्ता दोनों परेशान हैं. हालांकि व्यापारी टैक्स के रेट से परेशान नहीं थे क्योंकि उन्हें टैक्स अपने पास से नहीं बल्कि नागरिकों से उगाही कर जमा करना था. व्यापारी लोग टैक्स भरने की समय खपाऊ और हिसाब बनाने की खर्चीली प्रक्रिया से परेशान हैं. सो उनके लिए भी सरकार ने टैक्स के कागज़ तैयार करने का बोझ कुछ कम कर दिया. क्या इसे पहले नहीं सोचा जा सकता था? इस तरह सरकार खुद को नौसिखिया साबित करवा रही है. बिल्कुल उसी तरह जिस तरह नोटबंदी में साबित हुई थी. जानकार लोग नफे नुकसान का हिसाब भी बैठा रहे हैं. व्यापारी और नागरिक बेजा तरीके से खा न पाएं उससे सरकार को जितना पैसा बच सकता है उससे कई गुना उस चोरी न हो पाने का इंतजाम करने में खिन्न होकर बर्बाद तो नहीं हो रहा है? इसलिए, एक हिसाब लगना चाहिए कि गोदाम में जितने का माल है उसकी चौकीदारी पर उससे ज्यादा खर्चा तो नहीं बैठ रहा है. यानी, जीएसटी और नोटबंदी के जरिए ऐसी चौकीदारी घाटे का सौदा तो नहीं बन रही है. वैसे इसका पता आम बजट पेश होते समय चलेगा.
केंद्र और राज्य सरकारें अपने पास संसाधनों का रोना रोती रहती हैं. वे तरह तरह के जो टैक्स वसूलती थीं उसकी जगह एक ही टैक्स की व्यवस्था बनाने पर रजामंदी बनाई गई थी. यह रजामंदी इस आश्वासन पर बनी थी कि राज्यों को नई व्यवस्था से अगर कोई घाटा हुआ तो केंद्र सरकार उसकी भरपाई का इंतजाम करेगी. वैसे तो राज्य सरकारें बिल्कुल भी जोखिम उठाने को राजी नहीं होतीं लेकिन राजनीतिक परिदृश्य ऐसा है कि ज्यादातर राज्यों में भी भाजपा की ही सरकारें काबिज़ हैं. सो राज्य सरकारों की तरफ से केंद्र की इच्छा, मंशा या योजना पर नानुकुर करने का कोई सवाल ही नहीं उठता लेकिन राज्यों के संसाधनों में कमी को आखिरकार उन्हें ही झेलना पड़ता है. वे किस तरह से झेलेंगी यह भी आने वाले दिनों में पता चलेगा. जीएसटी से नया हाहाकार न मचने लगे इसे दोनों प्रकार की सरकारों को सोचकर रखना पड़ेगा. और भारतीय लोकतंत्र की जनता को बजट तक इंतजा़र करना पडे़गा कि जीएसटी लागू होने के तोहफे से उसने क्या खोया पाया. खासतौर पर जीएसटी के 28 फीसद टैक्स वाले स्लेब की चीजों पर टैक्स घटने से गरीब जनता को  क्या हासिल होगा?
नोटबंदी के नियमों में बार बार बदलाव की तरह जीएसटी में भी बार बार बदलाव के नफे नुकसान पर मीडिया में रोचक बहसें हो रही हैं. सरकार के तरफदार विशेषज्ञों की सबसे दिलचस्प थ्योरी यह है कि जीएसटी की कंपलायंस यानी इसके मुताबिक टैक्स जमा होने में दिक्कत आ रही थी. उनका तर्क है कि ऐशोआराम की चीजों पर टैक्स कम होने से टैक्स जमा करने वालों की संख्या बढ़ जाएगी. इस तरह से उन्होंने दिलासा दिलाना शुरू किया है कि बदले ऐलान से सरकार के खजाने को 20 हजार करोड़ से कम का ही नुकसान होगा. ऐसा तर्क देने वाले क्या उस समय यह तर्क नहीं दे सकते थे जब 28 फीसद टैक्स वाली स्लैब बनाई गई थी. तब तो यह तर्क दिया गया था कि गरीब जनता के लिए अच्छी योजनाओं के लिए पैसा चाहिए और यह पैसा ऐशो आराम से रहने वालों पर टैक्स से लिया जा सकता है. चार महीने में ही थ्योरियां बदल गईं.

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