Tuesday, June 26, 2018

इमरजेंसी, इंदिरा गाँधी या हिटलर

यह सच है कि इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है. इस दौर में नागरिक अधिकार छीन लिए गए. नेताओं, लेखकों, पत्रकारों को जेल में डाला गया. उन्हें यंत्रणाएं दी गईं. लोगों की जबरन नसबंदी कराई गई. 20 सूत्री कार्यक्रम थोपा गया. अनुशासन पर्व के नाम पर तानाशाही का चाबुक चलाया गया. यह भी सच है कि इंदिरा गांधी को इतिहास उनके इस कृत्य के लिए कभी माफ़ नहीं करेगा. भारतीय जनता ने तो उन्होंने 1977 में ही दंडित कर दिया था.
लेकिन कुछ बातें इस संदर्भ में और जोड़ने और समझने की ज़रूरत है. कांग्रेस जिस तरह आ़ज़ादी की लड़ाई में अपने शामिल होने के सूद के सहारे भारतीय लोकतंत्र की ठेकेदारी का दावा नहीं कर सकती, उसी तरह बीजेपी भी इमरजेंसी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई की कमाई को लोकतंत्र पर अपने कब्ज़े का आधार नहीं बना सकती. आज़ादी की लड़ाई अगर 70 साल पुरानी घटना है तो इमरजेंसी भी 40 साल पीछे छूट चुकी है. लेकिन सिर्फ अतीत हो जाने के तर्क से नहीं, भारतीय लोकतंत्र का हाल देखते हुए भी कांग्रेस और बीजेपी के अपने-अपने दावों को फिर से परखने की ज़रूरत है. मिसाल के तौर पर जेटली को हिटलर और इंदिरा गांधी के बहुत सारे साम्य याद आए, यह नहीं याद आया कि हिटलर ने अंत में एक बंकर में आत्महत्या की. जबकि इंदिरा गांधी ने 19 महीने बाद चुनाव करवाए, उनमें हारीं, तीन साल सत्ता से बाहर रहीं और अंततः जनता पार्टी की टूटन के बाद नए सिरे से चुनाव जीत कर सत्ता में वापस लौटीं. वापसी का यह मौका भी इंदिरा गांधी को जिन वजहों से मिला, उनमें बाकी बातों के अलावा जनता पार्टी से जनसंघ घटक का विश्वासघात भी था. आरएसएस के साथ अपना जुड़ाव बनाए रखने की ज़िद में जनसंघ से जुड़े नेताओं ने जनता पार्टी को टूटने दिया. इसी से इंदिरा गांधी की वापसी हुई. दूसरी बात ज़्यादा गंभीर है. हिटलर ने सिर्फ देश का हवाला नहीं दिया था, जर्मनी को आर्यों की श्रेष्ठता के सिद्धांत पर पुनर्परिभाषित करने की कोशिश भी की. जर्मनी में सारी हिंसा दरअसल नस्ली श्रेष्ठता की इस वैचारिकी की देन थी. दूसरी तरफ़ इंदिरा गांधी ने भारत की बहुलता का अंत-अंत तक सम्मान किया और अंततः उसी की रक्षा के लिए जान दी. यह बात सार्वजनिक है कि इंदिरा गांधी को ख़ुफिया एजेंसियों ने सलाह दी थी कि वे अपने सुरक्षा दस्ते में सिखों को जगह न दें. लेकिन सांप्रदायिक आधार पर ऐसा भेदभाव इंदिरा गांधी को मंज़ूर नहीं था. अंततः वे अपने इस विश्वास के लिए शहीद हो गईं. दिलचस्प ये है कि सिख आतंकवाद से जुड़़े चेहरों को जिन दलों ने नायकत्व प्रदान किया, जो आतंकवादियों को सरोपा भेंट करते रहे, जो बेअंत सिंह के हत्यारों की माफ़ी के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास करते रहे, उनके साथ आज की तारीख बीजेपी खड़ी है. दूसरी बात यह कि हिटलर की यह जो वैचारिक विरासत है, उसके असली वारिस भारत में कौन हैं? कौन हैं जो एक धर्म या नस्ल की श्रेष्ठता के आधार पर एक नया और ख़ौफ़नाक भारत बनाना चाहते हैं. निस्संदेह यह बीजेपी है जो इस मामले में हिटलर के ज़्यादा करीब दिखती है, बल्कि हिटलर, नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली उसकी प्रेरणा रहे हैं, यह बात भी किसी से छुपी नहीं है. आरएसएस के पहली पंक्ति के नेताओं में एक बीएस मूंजे बाक़ायदा इटली जाकर मुसोलिनी से मिले थे और अपनी डायरी में उन्होंने मुसोलिनी की तारीफ़ की थी. वीर सावरकर भारत को जर्मनी की तरह पितृभूमि कहते रहे और मुसलमानों से उसी तरह पेश आना चाहते थे जैसे यूरोप में "नीग्रो' के साथ पेश आया जाता था. तो यह बीजेपी है जो नाज़ी पार्टी के ज़्यादा क़रीब है. अफ़सोस और चिंता की बात यह है कि यह क़रीबी सैद्धांतिक स्तर पर हाल के वर्षों में कुछ और बड़ी हुई है. पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों को गैंग बताना, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों की हत्या, गोरक्षा के नाम पर लोगों को घर से निकाल कर मारना, सड़कों पर पीटना, लव जेहाद के नाम पर होने वाली हिंसा, तरह-तरह के जुलूसों और आयोजनों के बहाने बहुसंख्यकवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति- ये सब बताते हैं कि भारत में पहली बार इतने व्यापक पैमाने पर बहुसंख्यकवाद की आक्रामकता को सत्ता का संरक्षण मिल रहा है. मॉब लिंचिंग का ऐसा माहौल किसी दूसरे दौर में याद नहीं आता है. सोशल मीडिया पर झूठ और नफ़रत की जो नई भाषा दिख रही है, पत्रकारिता पर जिस तरह के दबाव बनाए जा रहे हैं, वे एक तरह की इमरजेंसी का ही इशारा हैं, बल्कि इस मायने में ज़्यादा ख़ौफ़नाक कि यह इमरजेंसी बिल्कुल अदृश्य है. यह सच है कि 'इंदिरा इज़ इंडिया' की तरह इस दौर में कोई 'नरेंद्र मोदी इज़ इंडिया' नहीं कह रहा. लेकिन नरेंद्र मोदी की जिस तरह नायक-पूजा हो रही है, वह इंदिरा गांधी के दौर की ही याद दिलाने वाला है. पूरी सरकार उनके भरोसे है, सारे चुनाव उनके सहारे लड़े जा रहे हैं, हर जगह उनका चेहरा पेश किया जा रहा है. वे आकाशवाणी पर मन की बात कह रहे हैं, विज्ञापनों में गैस बेच रहे हैं और ख़बरों में उनके लंबे-लंबे भाषण इस्तेमाल हो रहे हैं. नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े-बडे फ़ैसले या तो गोपनीय ढंग से या फिर हड़बड़ी में लागू किए जा रहे हैं, विश्वविद्यालयों और दूसरे लोकतांत्रिक संस्थानों को तहस-नहस किया जा रहा है. 19 महीने की इमरजेंसी इंदिरा गांधी की वह राजनीतिक महाभूल थी जो उनके दशकों के राजनीतिक करियर पर भारी पड़ रही है, लेकिन बीते 4 साल में जिस चालाकी से इमरजेंसी जैसे हालात बना दिए गए हैं, वह बीजेपी का डरावना सयानापन है.

Monday, June 25, 2018

महाराष्ट्र में प्लास्टिक बैन

महाराष्ट्र में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, और उससे आम जनमानस में काफ़ी समस्याएँ हैं. अच्छी बात है अगर इसको पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से किया जाए. लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनको रखने से आप मुझे कम्युनिस्ट कहेंगे. लेकिन आप सोचकर देखिए क्या ये सही है?
1- आपके बच्चे बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की थैली में अपनी किताबें नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन वे प्लास्टिक कवर में सील किए गए चिप्स को खा सकते हैं।
2- आप स्थानीय स्टोर से खुली दाल, चावल या आंटा नहीं खरीद कर प्लास्टिक बैग में नहीं पैक कर सकते हैं, लेकिन आप एक बड़े बिग बाजार टाइप डिपार्टमेंटल स्टोर से प्लास्टिक बैग में पैक अदानी विल्मार दाल खरीद सकते हैं।
3- छोटे चाय वाले आपको थर्मोकॉल या प्लास्टिक कप में चाय नहीं दे सकते हैं लेकिन आपका नया LED टीवी अभी भी थर्मोकॉल सिक्योरिटी में पैक हो सकता है।
4- आप प्लास्टिक के थैले या कंटेनर में अपने स्थानीय डेयरी से खुला दूध नहीं खरीद सकते हैं, लेकिन आप अमूल जैसे ब्रांड के दूध के पैकेट खरीद सकते हैं.
5- आप बारिस में अपना पर्स बचाने के लिए प्लास्टिक में रखकर उसे नहीं घूम सकते हैं लेकिन आपकी कार में अभी भी लगभग 150 किलो प्लास्टिक लगाया जा सकता है.
इसलिए उन सभी लोगों के लिए दो मिनट की मौन, जो सोचते हैं कि महाराष्ट्र में प्लास्टिक प्रतिबंध पर्यावरणीय कारणों से है, न कि गरीब असंगठित व्यापारी को मारने और कॉर्पोरेट बिक्री को बढ़ावा देने के लिए। अगर इतना ही पर्यावरण की चिंता है तो कुछ वैकल्पिक थैली पहले से निर्धारित करते थे. पर्यावरण खराब करने वाले कुछ और प्रयास भी करते थे. सड़क से निजी वाहन कम करते थे. किसी फैक्ट्री के धुएँ, और निकालने वाले केमिकल्स को  बंद करवाते थे. ज़मीन और जंगल ख़त्म करने वाले किसी काम को बंद करवाते थे. इन सरकारों ने ज़मीन के ऊपर, नीचे, बाहर, नदियों, समंदर, आसमान जहाँ से कुछ निकल सकता है सब निकाल के बर्बाद कर दिया, और आज नाटक कर रहे हैं. अगर यही प्लास्टिक बैन ही ढंग से कर दें तो बड़ी बात है. ये थोड़े दिन बाद फिर से कुछ ना कुछ नाटक करके चुप बैठेंगे नोटाबंदी की तरह. उससे कितना काला धन कम हुआ, आतंकवाद ख़त्म हुआ? वैसे ही ये होगा.
और ऊपर से 5000 रुपए जुर्माना? मज़ाक बना रखा है. कोई आदमी 1000-2000 का समान थैली सहित छोड़ देगा. और आम आदमी 5000 देगा कैसे? कहीं ऐसा ना हो क़ि ये भी अधिकारियों की कमाई का ज़रिया हो जाए. ठीक ट्रैफिक नियमों की तरह. उसमें भी नागरिक की सुरक्षा या ट्रैफिक जाम की चिंता नहीं पुलिस को बस कैसे भी बिना हेल्मेट और लाइसेंस के मिल जाए कोई और अपना टारगेट पूरा करें.

Wednesday, June 20, 2018

केजरीवाल की धारणा पॉलिटिक्स

जो लोग दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों पर अहंकारी और अराजक होने की तोहमत लगाते हैं, उन्हें दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल का रवैया देखना चाहिए. उनके गेस्ट रूम में आठ दिन से राज्य के मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री धरने पर बैठे हैं, उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्यमंत्री अनशन की वजह से अस्पताल तक पहुंच चुके, लेकिन उपराज्यपाल ने जैसे तय कर रखा है कि जब तक केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिलेगी, वह इन आंदोलनकारियों से बात तक नहीं करेंगे. उनके लिए मुख्यमंत्री के ट्वीट और उनकी ओर से आ रहे अनुरोध भी बेमानी हैं.
केजरीवाल की मुख्य शिकायत क्या है? यही कि अफसर हड़ताल कर रहे हैं, उन्हें काम पर लौटने के लिए कहना चाहिए. अफसरों का कहना है कि वे हड़ताल पर नहीं हैं, लेकिन वे किस तरह काम कर रहे हैं? क्या उन्हें अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों की ऐसी अवहेलना करने का हक है? अगर उन्हें ल्ग की शह न हो, तो क्या वे मंत्रियों की बुलाई बैठक का बहिष्कार कर सकते हैं? क्या यही अफसर दूसरे राज्यों और नेताओं के कहीं ज़्यादा अवमाननापूर्ण व्यवहार के आदी नहीं रहे हैं? क्या वे नेताओं के जूते उठाने से लेकर उनकी गालियां तक सुनते-खाते नहीं देखे गए हैं? कहीं और तो अफसरों के इस रवैये की शिकायत नहीं है?
कहने का मतलब यह नहीं कि अफसरों से ऐसा व्यवहार होना चाहिए. किसी लोकतंत्र में सबको सम्मान और गरिमा के साथ जीने का हक है और अगर हम यह सुनिश्चित नहीं कर पाते, तो हमें इस पर शर्मिन्दा होना चाहिए. आम आदमी पार्टी के प्रसंग में बताया जा रहा है कि उसके नेताओं ने मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट की. मारपीट की यह बात भरोसे लायक नहीं लगती. बहुत संभव है, धक्कामुक्की जैसा कुछ हुआ हो, जिसे मुख्य सचिव मारपीट बता रहे हैं. जिस मेडिकल रिपोर्ट के सहारे यह केस बनाया जा रहा है, वह हादसे के 24 घंटे बाद की है. फिर भी मुख्य सचिव की शिकायत वैध है. उनके साथ भी किसी सरकार को हिंसक अहंकार के साथ पेश आने का हक नहीं है. लेकिन क्या इसी बिना पर किसी लोकतांत्रिक सरकार को आप काम करने नहीं देंगे? आप उसको सबक सिखाने के लिए अफसरों को प्रोत्साहित करेंगे कि वे मंत्रियों द्वारा बुलाई गई बैठकों में न जाएं? आप काम न करने के लिए उनकी तरफ़दारी करेंगे?
यह सच है कि अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम के तौर-तरीके कई बार एक तरह की अराजकता का एहसास कराते हैं. कई बार उनकी वैचारिक दिशा से गहरी असहमति का अनुभव होता है. शासन-प्रशासन के खुर्राट लोगों को आम आदमी पार्टी के तौर-तरीके कई बार गैरपेशेवर लगते हैं. उन्हें लगता है कि यह पार्टी नियम-कायदों पर अमल नहीं करती. लेकिन इसके बावजूद इसमें शक नहीं कि भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में जो सबसे उजली धारा देखी है, वह आम आदमी पार्टी की है. यही वजह है कि दिल्ली के लोगों ने उन पर भरोसा जताया है. शिक्षा और सेहत जैसे बुनियादी सवालों पर आम आदमी पार्टी की पहल प्रशंसनीय रही है. लेकिन माहौल कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जैसे केजरीवाल और सिसोदिया को धरनों के अलावा कुछ नहीं आता, कि उन्हें दिल्ली का नहीं, अपनी राजनीति का ही ख़याल है. और यह माहौल सिर्फ ब्ज्प-कांग्रेस जैसी पार्टियां ही नहीं बना रहीं, वह अफसरशाही बना रही है, जो दरअसल अपने-आप को बचाए रखने के बाद ही कोई दूसरे काम करती है. राजनीतिक दल और नेता भले बदनाम रहे हों, लेकिन सत्ता का सुख और उसका बेजा लाभ लेने में अफसरशाह उनसे कहीं ज़्यादा आगे रहे हैं. भारत में भ्रष्टाचार की मूल वजह नेता नहीं, अफसर ही हैं.
दरअसल यह पूरी अफसरशाही - खासकर ईयेज़ संवर्ग - इस देश का वह श्रेष्ठिवर्ग है, जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी सहूलियत के लिए बनाया था. यह देशसेवा के लिए नहीं, अंग्रेजों की सुविधा के लिए बनाया गया. लेकिन इस गलती के बहाने यह अफसरशाही जिस तरह की मांग कर रही है, वह ख़तरनाक है. वह एक तरह से राजनीतिक नेतृत्व को बेमानी बनाने पर तुली हुई है. सवाल है, इस पर कौन कार्रवाई करेगा? बस एक घटना को लेकर महीनों तक खिंचे इस टकराव का असली मकसद दरअसल अपनी बादशाहत कायम रखना है.

कश्मीर में क्यों पीछे हटी बीजेपी?

जम्मू एवं कश्मीर में ऐसा होने की भनक किसी को नहीं लगी. मीडिया को अचानक बताया गया कि ब्ज्प वहां महबूबा मुफ्ती सरकार से अलग होने जा रही है, और दो घंटे के भीतर ही नाकामियों का ठीकरा महबूबा पर फोड़ते हुए ब्ज्प ने सरकार गिराने का ऐलान कर दिया. मसला एक विशेष राज्य में सरकार गिराए जाने का है. सब कुछ फटाफट हुआ, लिहाज़ा जम्मू एवं कश्मीर जैसे खास प्रदेश में इतनी बड़ी राजनीतिक घटना का विश्लेषण ढंग से नहीं हो पा रहा है. फैसला BJP का था, सो, कारण बताने की ज़िम्मेदारी उसी की थी, लेकिन उसने जो कारण गिनाए, उनमें एक भी ऐसा नहीं था, जिसे तात्कालिक कारण माना जा सके. एक ही बात प्रमुखता से कही गई कि कश्मीर में आतंकवाद काबू में नहीं आ रहा था. यानी इसी नाकामी की ज़िम्मेदारी महबूबा के मत्थे मढ़कर सरकार से अलग होने का बहाना समझ में आता है. अब यह अलग सवाल है कि यह बात जनता के गले उतरेगी या नहीं. खासतौर पर इसलिए कि जम्मू एवं कश्मीर सरकार में शामिल यही BJP तीन साल से कहती आ रही थी कि वहां के हालात सुधारने में उसने कमाल कर दिया है. भले ही कश्मीर और साथ ही साथ पूरे देश की जनता का अनुभव इस दावे से उलट रहा हो, लेकिन यह तो जगज़ाहिर है कि नोटबंदी करते समय भी काले धन को आतंकवाद से जोड़ने का प्रचार हुआ था. पत्थरबाजी के खिलाफ मुहिम के तौर पर केंद्र सरकार ने उस नारे का इस्तेमाल किया था. बहुत ही मुश्किल दौर में सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचारित करना पड़ा था. लेकिन सामान्य अनुभव यह था कि आए दिन अपने जवानों की शहादत की खबरें रुक नहीं रही थीं. इन हालात में ब्ज्प वहां अपनी छवि बचाने का कोई तरीका नहीं ढूंढती तो और क्या करती?
पिछले तीन साल में कश्मीर को लेकर जो हताशा और निराशा का माहौल बनता चला आया, उसका फायदा कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस को खुद-ब-खुद मिल ही रहा था. यही कारण है कि सरकार गिराने के ऐलान के लिए BJP की प्रेस कॉन्फ्रेंस के फौरन बाद ही कांग्रेस की तरफ से गुलाम नबी आज़ाद  और नेशनल कॉन्फ्रेंस की ओर से उमर अब्दुल्ला सबसे पहले मीडिया के सामने आए. यहां तक कि महबूबा मुफ्ती ने इन दोनों नेताओं के दो घंटे बाद मीडिया से बात की.
महबूबा मुफ्ती की प्रेस कॉन्फ्रेंस की एक बात बहुत ही गौरतलब थी. वह यह कि उन्होंने BJP से नाराज़गी बिल्कुल भी नहीं दिखाई. वह अपनी पार्टी (और गठबंधन) की सरकार के तीन साल के कामकाज का ब्योरा ही देती रहीं. वह बताती रहीं कि जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के हित में उन्होंने क्या किया. सभी को लग रहा था कि महबूबा भी BJP जैसे तेवरों में ही BJP के खिलाफ बोलेंगी, लेकिन उन्होंने ऐसा एक भी शब्द न बोलकर मीडिया को चक्कर में डाल दिया. उनके इस अंदाज़ का विश्लेषण अभी हो नहीं पाया है, लेकिन एक अटकल लगाई जा सकती है कि शायद वह अब घाटी की बजाय जम्मू और लद्दाख में जनाधार बढ़ाने की बात सोच रही हों. उनका संयत रहना इस मकसद को हासिल करने में कुछ काम का हो सकता है. आखिरकार वह लम्बे अरसे तक जम्मू एवं कश्मीर की मुख्यमंत्री रही हैं.
BJP-PDP की गठबंधन सरकार तीन साल से ऊपर चल चुकी थी. राजनीतिक विचारधारा में भारी भेद के बावजूद इतने समय तक ऐसी सरकार का चलना आश्चर्य ही माना जाना चाहिए. और फिर अगले साल लोकसभा चुनाव में गठबंधन को भारी दिक्कत आना तय था. सो, आम चुनाव से 10 महीने पहले के वक्त से ज़्यादा माकूल मौका और कौन सा होता. BJP और PDP दोनों के लिए अपने-अपने जनाधारों के पास लौटने के लिए कम से कम इतना वक्त तो चाहिए ही. किसी बात को भुलाने के लिए इतना समय तो लगता ही है. वैसे तो BJP के बड़े नेताओं ने अच्छी तरह सोच लिया होगा कि सरकार गिराकर वहां राष्ट्रपति शासन लगने से उसका झंझट कम नहीं हो जाएगा. राज्यपाल का शासन केंद्र सरकार के शासन जैसा ही माना जाता है, और फिर जम्मू-कश्मीर के मामले में राज्यपाल के सामने हर दिन ही एक चुनौती बनकर खड़ा होगा. ऊपर से राज्यपाल शासन हटाकर जल्दी चुनाव कराने का दबाव भी बना रहेगा. अगर बीच में कोई नया समीकरण नहीं बना, तो ज़्यादा आसार यही हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव अब लोकसभा चुनाव के साथ ही करवाने पड़ेंगे, और अगर ऐसा हुआ, तो BJP के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती साबित होगी.

राहुल गांधी बनाम कॉरपोरेट

*साल था 2010। उड़ीसा में "नियमागिरी" के पहाड़। जहां सरकार ने वेदांता ग्रुप को बॉक्साइट खनन करने के लिए जमीन दे दी। आदिवासियों ने व...