महाराष्ट्र में प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं, और उससे आम जनमानस में काफ़ी समस्याएँ हैं. अच्छी बात है अगर इसको पर्यावरण बचाने के उद्देश्य से किया जाए. लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं जिनको रखने से आप मुझे कम्युनिस्ट कहेंगे. लेकिन आप सोचकर देखिए क्या ये सही है?
1- आपके बच्चे बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की थैली में अपनी किताबें नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन वे प्लास्टिक कवर में सील किए गए चिप्स को खा सकते हैं।
2- आप स्थानीय स्टोर से खुली दाल, चावल या आंटा नहीं खरीद कर प्लास्टिक बैग में नहीं पैक कर सकते हैं, लेकिन आप एक बड़े बिग बाजार टाइप डिपार्टमेंटल स्टोर से प्लास्टिक बैग में पैक अदानी विल्मार दाल खरीद सकते हैं।
1- आपके बच्चे बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की थैली में अपनी किताबें नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन वे प्लास्टिक कवर में सील किए गए चिप्स को खा सकते हैं।
2- आप स्थानीय स्टोर से खुली दाल, चावल या आंटा नहीं खरीद कर प्लास्टिक बैग में नहीं पैक कर सकते हैं, लेकिन आप एक बड़े बिग बाजार टाइप डिपार्टमेंटल स्टोर से प्लास्टिक बैग में पैक अदानी विल्मार दाल खरीद सकते हैं।
3- छोटे चाय वाले आपको थर्मोकॉल या प्लास्टिक कप में चाय नहीं दे सकते हैं लेकिन आपका नया LED टीवी अभी भी थर्मोकॉल सिक्योरिटी में पैक हो सकता है।
4- आप प्लास्टिक के थैले या कंटेनर में अपने स्थानीय डेयरी से खुला दूध नहीं खरीद सकते हैं, लेकिन आप अमूल जैसे ब्रांड के दूध के पैकेट खरीद सकते हैं.
5- आप बारिस में अपना पर्स बचाने के लिए प्लास्टिक में रखकर उसे नहीं घूम सकते हैं लेकिन आपकी कार में अभी भी लगभग 150 किलो प्लास्टिक लगाया जा सकता है.
इसलिए उन सभी लोगों के लिए दो मिनट की मौन, जो सोचते हैं कि महाराष्ट्र में प्लास्टिक प्रतिबंध पर्यावरणीय कारणों से है, न कि गरीब असंगठित व्यापारी को मारने और कॉर्पोरेट बिक्री को बढ़ावा देने के लिए। अगर इतना ही पर्यावरण की चिंता है तो कुछ वैकल्पिक थैली पहले से निर्धारित करते थे. पर्यावरण खराब करने वाले कुछ और प्रयास भी करते थे. सड़क से निजी वाहन कम करते थे. किसी फैक्ट्री के धुएँ, और निकालने वाले केमिकल्स को बंद करवाते थे. ज़मीन और जंगल ख़त्म करने वाले किसी काम को बंद करवाते थे. इन सरकारों ने ज़मीन के ऊपर, नीचे, बाहर, नदियों, समंदर, आसमान जहाँ से कुछ निकल सकता है सब निकाल के बर्बाद कर दिया, और आज नाटक कर रहे हैं. अगर यही प्लास्टिक बैन ही ढंग से कर दें तो बड़ी बात है. ये थोड़े दिन बाद फिर से कुछ ना कुछ नाटक करके चुप बैठेंगे नोटाबंदी की तरह. उससे कितना काला धन कम हुआ, आतंकवाद ख़त्म हुआ? वैसे ही ये होगा.
और ऊपर से 5000 रुपए जुर्माना? मज़ाक बना रखा है. कोई आदमी 1000-2000 का समान थैली सहित छोड़ देगा. और आम आदमी 5000 देगा कैसे? कहीं ऐसा ना हो क़ि ये भी अधिकारियों की कमाई का ज़रिया हो जाए. ठीक ट्रैफिक नियमों की तरह. उसमें भी नागरिक की सुरक्षा या ट्रैफिक जाम की चिंता नहीं पुलिस को बस कैसे भी बिना हेल्मेट और लाइसेंस के मिल जाए कोई और अपना टारगेट पूरा करें.
इसलिए उन सभी लोगों के लिए दो मिनट की मौन, जो सोचते हैं कि महाराष्ट्र में प्लास्टिक प्रतिबंध पर्यावरणीय कारणों से है, न कि गरीब असंगठित व्यापारी को मारने और कॉर्पोरेट बिक्री को बढ़ावा देने के लिए। अगर इतना ही पर्यावरण की चिंता है तो कुछ वैकल्पिक थैली पहले से निर्धारित करते थे. पर्यावरण खराब करने वाले कुछ और प्रयास भी करते थे. सड़क से निजी वाहन कम करते थे. किसी फैक्ट्री के धुएँ, और निकालने वाले केमिकल्स को बंद करवाते थे. ज़मीन और जंगल ख़त्म करने वाले किसी काम को बंद करवाते थे. इन सरकारों ने ज़मीन के ऊपर, नीचे, बाहर, नदियों, समंदर, आसमान जहाँ से कुछ निकल सकता है सब निकाल के बर्बाद कर दिया, और आज नाटक कर रहे हैं. अगर यही प्लास्टिक बैन ही ढंग से कर दें तो बड़ी बात है. ये थोड़े दिन बाद फिर से कुछ ना कुछ नाटक करके चुप बैठेंगे नोटाबंदी की तरह. उससे कितना काला धन कम हुआ, आतंकवाद ख़त्म हुआ? वैसे ही ये होगा.
और ऊपर से 5000 रुपए जुर्माना? मज़ाक बना रखा है. कोई आदमी 1000-2000 का समान थैली सहित छोड़ देगा. और आम आदमी 5000 देगा कैसे? कहीं ऐसा ना हो क़ि ये भी अधिकारियों की कमाई का ज़रिया हो जाए. ठीक ट्रैफिक नियमों की तरह. उसमें भी नागरिक की सुरक्षा या ट्रैफिक जाम की चिंता नहीं पुलिस को बस कैसे भी बिना हेल्मेट और लाइसेंस के मिल जाए कोई और अपना टारगेट पूरा करें.
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